बुधवार, 30 दिसंबर 2015

शाख़ें उलझ रही हैं



मेरी कीर्ति फैली जग में मुझे
सब जानते हैं
सब छाँव लेते मुझसे मुझे सब
मानते हैं,
पर इन दिनों क्यों मेरी जड़ें
मुरझ रही हैं,
तनिक सघन हुआ क्या शाख़ें
उलझ रही हैं।।

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

एक और दामिनी



एक लड़की मैंने देखी है

जो दुनिया से अनदेखी है

दुनिया उससे अनजानी है

मेरी जानी-पहचानी है।

रहती है एक स्टेशन पर

कुछ फटे-पुराने कपड़ों में

कहते हैं सब वो ज़िंदा है

बिखरे-बिखरे से टुकड़ों में।

प्लेटफॉर्म ही घर उसका

वो चार बजे जग जाती है

न कोई संगी-साथी है

जाने किससे बतियाती है।

वो बात हवा से करती है

न जाने क्या-क्या कहती है

हाँ! एक स्टेशन पर देखा

एक पगली लड़की रहती है।

मैंने जब उसको देखा

वो डरी-सहमी सी सोयी थी

आँखें  उसकी थीं बता रहीं

कई रातों से वो रोई थी।

बैडरूम नहीं है कहीं उसका

वो पुल के नीचे सोती है,

ठंढी, गर्मी या बारिश हो

वो इसी ठिकाने होती है।

वो हंसती है वो रोती है

न जाने क्या-क्या करती है

जाने किस पीड़ा में  खोकर

सारी रात सिसकियाँ भरती है।

जाने किस कान्हा की वंशी

उसके कानों में बजती है

जाने किस प्रियतम की झाँकी

उसके आँखों में सजती है।

जाने किस धुन में खोकर

वो नृत्य राधा सी करती है

वो नहीं जानती कृष्ण कौन

पर बनकर मीरा भटकती है।

उसके चेहरे पर भाव मिले

उत्कण्ठा के उत्पीड़न के,

आशा न रही कोई जीने की

मन ही रूठा हो जब मन से।

है नहीं कहानी कुछ उसकी

पुरुषों की सताई नारी है

अमानुषों से भरे विश्व की

लाचारी पर वारी है।

वो पगली शोषण क्या जाने

भला-बुरा किसको माने

व्यभिचार से उसका रिश्ता क्या

जो वो व्यभिचारी को जाने?

वो  मेरे देश की बेटी है

जो सहम-सहम के जीती है

हर दिन उसकी इज्जत लुटती

वो केवल पीड़ा पीती है।

हर गली में हर चौराहे पर

दामिनी दोहरायी जाती है,

बुजुर्ग बाप के कन्धों से

फिर चिता उठायी जाती है।

कुछ लोग सहानुभूति लिए

धरने पर धरना देते हैं,

गली-नुक्कड़-चौराहों पर

बैठ प्रार्थना करते हैं,

पर ये बरसाती मेंढक

कहाँ सोये से रहते हैं

जब कहीं दामिनी मरती है

ये कहाँ खोये से रहते हैं।

खुद के आँखों पर पट्टी है

कानून को अँधा कहते हैं

अपने घड़ियाली आंसू से

जज्बात का धंधा करते हैं।

जाने क्यों बार-बार मुझको

वो पगली याद आती है,

कुछ घूँट आँसुओं के पीकर

जब अपना दिल बहलाती है।

उसकी चीखों का मतलब क्या

ये दुनिया कब कुछ सुनती है

यहाँ कदम-कदम पर खतरा है

यहाँ आग सुलगती रहती है।

हर चीख़ यहाँ बेमतलब है

हर इंसान यहाँ पर पापी है,

हर लड़की पगली लड़की है

पीड़ा की आपाधापी है।




शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

राधिका काकी

राधिका काकी नहीं रही। ये भी कोई जाने की उम्र होती है क्या? बमुश्किल अभी पैंतालीस-छियालीस साल ही तो उम्र रही होगी और इतने कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कहना कुछ हज़म नहीं हुआ। भले ही उम्र कम थी पर अपने तीन पोते देख कर गयी।भरा-पूरा परिवार छोड़ कर गयी।तीन बेटे और एक छोटी सी दस-बारह बरस की बेटी। गांव में कुछ हो न हो शादी पहले हो जाती है। लड़कियाँ बहु बनकर घर में आती हैं वो माँ बन कर आई थी। मौसी तो पहले से थी पर इस बार माँ बन कर आई। पवन कुमार की माई हाँ वो अपने ससुराल इसी पहचान के साथ आई। कुछ साल बाद परदेसी पैदा हुए। क़रीब दस साल बाद मक्कूऔर फिर बिक्की। यानि तीन लड़के और एक बेटी। भरा पूरा परिवार। बड़ी बहु आई। पोते हुए। जिस उम्र में बड़े घर की लड़कियों की शादी होती है उसी उम्र में वो दादी बनी। मज़ाल क्या बहु पोतों को डाँट दे। परदेसी की भी शादी हुई। अवध में गौने का रिवाज़ होता है। अभी इसी साल शादी हुई है पर गौना नहीं आया है। बहू के आने की तैयारियाँ चल रही थीं कि सारी की सारी तैयारियां धरी की धरी रह गईं। बेटे के गौने की तैयारी थी पर खुद ही दुनिया से विदा ले ली।
मेरे मीता (काकी के पति) की दो शादियाँ हुईं। पहली पत्नी बड़े बेटे के जन्म के कुछ साल बाद ही स्वर्ग सिधार गई। फिर दूसरी शादी राधिका काकी से हुई। मीता मेरे पापा से बड़े हैं पर हमारे घर के हर बच्चे के वो मीता(दोस्त) बन जाते हैं। मीता हैं बहुत ज़िंदादिल इंसान। अल्हड़......मस्त। पापा के कॉलेज के दिनों के अच्छे साथी रहे। फिर रोज़ी-रोटी की तलाश में मुम्बई यात्रा।फिर वहीं एक अलग दुनिया बनी। मीता के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये रहा कि वे न तो अपनी पहली पत्नी को अंतिम विदाई दे सके, न माँ को और न ही पिता को...और जाते-जाते काकी को भी न देख सके। कल भी वो मुम्बई में ही थे.....अब गांव जा रहे हैं। बड़ा बेटा पवन भी दिल्ली से निकल चुके हैं शायद घर पहुँच भी गए होंगे। आज ही अंतिम विदाई है।
दुनिया छोड़ने के आधे घण्टे पहले तक बिलकुल स्वस्थ थी। मधुमेह था पर नियंत्रण में था। अम्मा और मम्मी से घण्टों बातें की फिर अम्मा से कहा कि- "अम्मा अब हम जाइत है।"
घर गई फिर अचानक से दर्द उठा। बहू को बुलाकर कहा कि- "साँस नाहीं लै पाइत है। अब हम बचब नाहीं। लड़िकन के सम्हारे।"(अब मैं बचुँगी नहीं, बच्चों की देख-भाल ठीक से करना)।
अंतिम यात्रा तक यही कहानी थी। अभिनय पूरा हो चुका था...पटकथा में अब कोई संवाद बाक़ी नहीं रहा। पर्दा गिर गया। अंत्येष्टि की तैयारी हो रही है....बड़ा बेटा अब तक घर पहुँच चुका होगा।
मेरी बहिन ने मुझे मैसेज़ किया कि भैया पवन कुमार भइया की मम्मी मर गईं। सन्न रह गया। आंसू आ गए। हमारे परिवार से उसे बहुत प्यार था। हमें भी बहुत मानती थी। जब गांव पहुँचता था तो देखते ही खुश हो जाती थी। यही कहते हुए बुलाती- अरे हमार बाऊ! आइ गयो लाला।
आज दुःख हो रहा है। कल आंसू रोक नहीं सका। काकी अब नहीं है। दुःख सिर्फ इस बात का है कि अभी मक्कू और बिक्की बहुत छोटे हैं। माँ के बिना तो एक पल भी जीना मुश्किल होता है इन्हें तो माँ छोड़ कर चली गई। कल अम्मा काकी को देखने गई थी। मक्कू अम्मा के पैर पकड़ कर रोने लगा।अम्मा काँप उठी। घर फोन किया तो अम्मा ने उदास मन से सब कुछ कहा।
दो छोटे बच्चे जिन्होंने अभी दुनिया भी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी उनके लिए ये आघात सहना कितना वेदना पूर्ण है। माँ। बहुत दुःखी है।
अजीब सी ज़िन्दगी है कब ख़त्म हो जाये पता ही नहीं चलता।
रह जाती हैं तो बस यादें। बहुत धोखेबाज़ ज़िन्दगी है। कुछ भरोसा नहीं इसका....जो लम्हा सामने है वही सब कुछ है। अगल-बगल सब कुछ ख़्वाब। कुछ भी शाश्वत नहीं..... ज़िन्दगी भी किसी सपने की तरह है.....आँख खुली सपना टूटा.....पता नहीं क्या है ज़िन्दगी।
किसी शायर ने सच ही कहा है-

ज़िन्दगी क्या है?
फ़क़त मौत का टलते रहना।।

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने.





प्रिये तुम्हारे प्रेम-पाश ने इस हिय का अवकाश किया,

तुमने क्या जादू कर डाला धरती को अकाश किया।।

जब से जीवन में तुम आई जीवन-दर्शन समझ लिया

तुम्हें ही अपना सब कुछ माना तुमको दर्पण समझ लिया।

तुम मुझमे प्रतिविम्बित होती हर-पल ये आभास हुआ

तुम बिन बहुत अधूरा हूँ मैं अब मुझको आभास हुआ

प्रिये तुम्हारे.....

रातों में नींदों को तजकर मैंने तुम पर गीत लिखे

तुमको डच तो जग सोचा सर भूमि में प्रीत लिखे

चलते चलते खो जाता हूँ बैठे-बैठे सो जाता हूँ

कभी तुम्हारी सुधि जो आई हँसते-हँसते रो जाता हूँ

योगी बन मैं दर-दर भटका कान्हा पर विश्वास किया

प्रिये तुम्हारे....

प्रिये तुम्हारे सुन्दर मन ने मेरे मन को मोह लिया

जिस पथ से तुम आती-जाती उसी राह की टोह लिया,

जहाँ-जहाँ मेरे पग जाएँ वहां तुम्हारे चरण चिन्ह हों

तुम मेरी मैं बना तुम्हारा तुम मुझसे न तनिक भिन्न हो

मैं अँधेरे का प्रेमी था तुमने सहज प्रकाश किया

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने....




शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

माँ जब तू याद आती है

यहाँ जब रात होती है तो मैं अक्सर सिसकता हूँ
                                                माँ! जब तू याद आती है मैं दुनिया भूल जाता हूँ,
                                                  झुकी हैं नीम की शाख़ें मेरे कॉलेज की राहों में
                                                जिन्हें बाँहें समझ तेरी मैं अक्सर झूल जाता हूँ।।
                                                                                                             -अभिषेक

शनिवार, 28 नवंबर 2015

भारत असहिष्णु राष्ट्र नहीं है

इन दिनों भारत में तथाकथित असहिष्णुता का माहौल बनाया जा रहा है। असहिष्णुता की विधिवत पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। साहित्यकारों का पुरस्कार लौटना, अभिनेताओं के बड़बोले और ऐसे बयान जिसे सुनकर हर भारतीय की आत्मा आहत होती है, धार्मिक प्रतिनिधियों के ऐसे वक्तव्य जिसे सुनकर लगता है कि भारत इतना असहिष्णु हो गया है कि पाकिस्तान भी सहिष्णु राष्ट्र लगने लगा है। भारत की असहिष्णुता साबित करने के लिए लोग युद्ध स्तर से इसी काम में लग गए हैं। असहिष्णुता का बीज बोया जा रहा है। भारत को असहिष्णु राष्ट्र घोषित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के कार्यकर्त्ता हैं न्यूज़ चैनल्स, राजनितिक पार्टियां, धार्मिक राजनीति की फसल काटने वाले ढोंगी लोग और सेलेब्रिटीज़ जिनकी बातों पर जनता को आँख मूँद कर विश्वास होता है।न्यूज़ चैनल्स पर वही दिखाया जा रहा है जिससे भारतीय जनमानस में कटुता पैदा हो, तलवारें खिंचे, रक्तपात और नरसंहार हो।
 जो वास्तव में बौद्धिक वर्ग हैं और सच्चे भारतीय हैं उन्हें तो कहीं असहिष्णुता नज़र नहीं आती। कुछ लोगों की तथाकथित समाजिकता ने देश की संस्कृति पर सवाल उठा दिया है। धर्म के दलालों ने तो देश में अराजकता का ऐसा बीज बोया है जो भले ही कभी उग सकने में सक्षम न हो  पर त्वरित रूप से तो अकारण ही कष्ट देता है। मन कहता है हाय! जल रहा है देश जबकि वास्तविकता यह है कि कुछ लोगों की लगायी गई आग है जिसे जनता कभी भी पानी फेंक कर बुझा सकती है।
असहिष्णुता का आशय ऐसी परिस्थिति से है जिसमें किसी भी विपरीत धर्मावलम्बी को हेय दृष्टि से देखा जाये, उन्हें आतंकित किया जाये, उनका उत्पीड़न किया जाये किन्तु भारत में तो ऐसी कोई परिस्थिति दूर-दूर तक नहीं दिखती। हाँ यह नितांत विचार सत्य है कि व्यक्तिगत झगड़ों को सांप्रदायिक दंगा घोषित करने की प्रवित्ति हो गयी है इन दिनों हर बुद्धिजीवी की। हर झगड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं होता।
एक भारतीय होने के कारण कुछ बातें चुभती हैं। मेरे देश पर असहिष्णुता का कलंक मढ़ा जा रहा है। मैं जरूर जानना चाहूँगा की भारत में असहिष्णुता कहाँ है?
अभी कुछ महीनों पहले भारत की एक अपूर्तनीय क्षति हुई। भारत के मिसाइल मैन कहे जाने वाले, युवाओं के आदर्श और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे.अब्दुल कलाम का निधन हुआ।कलाम साहब आधुनिक भारत के ऐसे सपूत है जिनका ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता।उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। जब उनका निधन हुआ तब पूरा देश रोया। रोने वालों में केवल मुसलमान नहीं थे बल्कि हर सच्चा भारतीय रोया था। भारत का हर युवक उन्हें आदर्श मानता है। हर बच्चा जिसे विज्ञान में रूचि है उसके घर में देवी-देवताओं के पोस्टर हों या न हों कलाम साहब के पोस्टर जरूर होते हैं। हर विद्यार्थी उनकी तरह बनना चाहता है। क्या भारत असहिष्णु राष्ट्र होता तो ऐसा होता?
अभी कुछ महीने ही हुए हैं मुहर्रम का त्यौहार बीते हुए।यह एक ऐसा त्यौहार है जिसे हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर मानते हैं। ताज़िया मुसलमानों से कहीं ज़्यादा हिंदुओं के घरों में बनता है। कर्बला पर जितनी संख्या में मुसलमान परिक्रमा नहीं करते उससे कहीं ज्यादा हिंदू करते हैं। मज़ारों पर माथा टेकते हैं, दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं।
मेरे गांव में केवल एक घर मुसलमान है। उसके यहाँ ताज़िया कई बार नहीं बनता पर हिंदुओं के यहाँ घर-घर में बनता है। ताज़िया जो बनवाता है वो क़ुरबानी की रात से अगले दिन शाम तक पानी तक नहीं पीता। क़ुरबानी के ग़म में मातम मनाता है।
मैं भारत में बौद्धिक आतंक फैलाने वाले असहिष्णु लोगों से पूछना चाहूँगा कि ऐसा किसी असहिष्णु राष्ट्र में हो सकता है क्या?
कौन सा ऐसा राष्ट्र है जहाँ के लोग विपरीत धर्म पर आस्था रखते हैं और दुसरे धर्म के आराध्य देव की उपासना करते हैं? ये केवल भारतवर्ष में संभव है जहाँ "सर्व धर्म समभाव" की परंपरा है।
भारत इकलौता ऐसा राष्ट्र है जहाँ सभी धर्मों के अनुयायी सुरक्षित अनुभूत करते हैं। जहाँ हर भारतवासी जानता है कि भले ही हमारी उपासना की पद्धतियाँ अलग हों किन्तु सब तो उसी परमेश्वर की संतान हैं और सारी प्रार्थनाएं उन्हीं को जाती हैं चाहे उपासना मंदिर में किया जाये या मस्जिद में या चर्च में।
भारत की आदि काल से यही सनातन संस्कृति रही है। जाने कौन से लोग हैं जिन्हें भारत असहिष्णु राष्ट्र लगता है।
कुछ राष्ट्रद्रोहियों के बयानों से भारत असहिष्णु हो जायेगा? कुछ व्यक्तिगत झगड़ों से भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं रह जायेगा। ये जनता भी भली-भांति समझती है कि ये राजनीति की चालें हैं। कोई भी राजनीति भारत की एकता,अखण्डता और सम्प्रभुता पर प्रभाव नहीं डाल सकती। ये राजनीति दो दिन में दफ़न हो जायेगी पर भारत की साझी संस्कृति युगों-युगों तक सलामत रहेगी।
हम भारतवासी हैं और भारतीयता हमारे रक्त में है। सनातन संस्कृति हमारे रक्त में है।क्रिसमस ईसाइयों का त्यौहार है पर लगभग-लगभग हर स्कूलों में मनाया जाता है।हमारे सपनों में भी सांता क्लाज़ आता है और खिलौने छोड़ जाता है। नया साल हम भी मानते हैं। मुहर्रम मनाया ही जाता है, पारसियों का त्यौहार नौरोज़ भी हम मानते हैं इससे ज्यादा साझा संस्कृति और भाई-चारे का उदाहरण क्या होगा? इतना मिल-जुलकर तो संसार में किसी भी देश के लोग नहीं रहते फिर भी भारत असहिष्णु है। भारत असहिष्णु नहीं है...असहिष्णु है उन सबकी रुग्ण मानसिकता जिन्हें भारत जितना उदार देश भी असहिष्णु दिखता है।आप भले ही कुछ भी कहें पर हम भारतीय हैं और हमारी संस्कृति हमें "विश्वबंधुत्व", "वसुधैव कुटुम्बकम्" और "सर्व धर्म समभाव" का पाठ पढ़ाती है.....हमने विश्व को सहिष्णुता का उपदेश दिया हम असहिष्णु कैसे हो सकते हैं?

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने



कुछ दिनों से सोच रहा था की अपने कविताओं की एक वीडियो अपलोड करूँ जिसे आप सब देखें...पर बस सोच ही रहा था...दीपावली पर मैंने इस बार एक कविता रेकॉर्ड किया...

"प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने"....सबसे पहले इस गीत को घर में गाया...अम्मा,मम्मी,पापा और भइया...इन सबने सबसे पहले सुना...उन्होंने क्या कहा ये नहीं बताऊंगा....पर आप को कैसा लगा ये जरूर जानना चाहूँगा......इस वीडियो को record किया है आकाश ने...छोटा सा, प्यारा सा,मासूम सा बच्चा....जिसकी वजह से ये वीडियो बन सकी......आप भी सुनिए.....और मेरे साथ गुनगुनाइए.... आभार!  :)

ये वीडियो YouTube पर भी है..लिंक है-





priye tumhare https://t.co/Z4DS1uLDfh

सोमवार, 2 नवंबर 2015

सीरिया संकट का वैश्वीकरण

सीरिया के गृह युद्ध ने विश्व को ऐसे रणक्षेत्र में लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ युद्ध के दर्शक भी वहां के सैनिकों एवं नागरिकों से कम असुरक्षित नहीं हैं भले ही युद्ध का प्रसारण उन तक दूरदर्शन के माध्यम से पहुँच रहा हो।
इस युद्ध का रक्तपात ही एक मात्र लक्ष्य है और इस हिंसक एवं बर्बर युद्ध के अंत का कोई मार्ग निकट भविष्य में भी नहीं दिख रहा है।
इस युद्ध के कारणों पर गौर करें तो प्रतीत होता है कि यह केवल सीरिया का गृह युद्ध नहीं है अपितु यह युद्ध दो परस्पर विरोधी वैश्विक गुटों का है जो शीत युद्ध के समाप्ति के बाद दर्शक दीर्घा में बैठे-बैठे सीरिया में व्याप्त अराजकता और गंभीर मानवीय संकट के उत्प्रेरक बने हुए हैं।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार एवं उनकी सैन्य शक्ति तथा विद्रोहियों के संगठन एवं उनकी सामूहिक सैन्य शक्ति दोनों में से कोई भी एक इस स्थिति में नहीं हैं कि युद्ध का परिणाम अपने पक्ष में करा सकें। ऐसी दशा में रक्तपात और अराजकता के अतिरिक्त किसी अन्य अवस्था की कल्पना भी आधारहीन है।
सरकार एवं विद्रोही संगठनों में कोई समझौता इसलिए भी होना असंभव है कि विद्रोहियों की मांग राष्ट्रपति बशर अल असद एवं उनके सरकार को अपदस्थ करने की है वहीं सरकार ऐसे किसी भी शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं है। कुछ दिनों से अमेरिका और रूस के संयुक्त प्रयासों के फलस्वरूप ऐसे आसार बन रहे हैं कि राष्ट्रपति अपना पद त्याग करेंगे, इस बार रूस सहमत भी हो गया है और आम चुनावों के लिए भी सहमति बन रही है किन्तु वास्तविकता की धरातल पर अभी ये बातें बचकानी लगती हैं।
सीरिया के विध्वंसक गृह युद्ध का एक और महत्वपूर्ण कारण जो दुर्भाग्य से अब आधे एशिया और यूरोप को अपने चपेट में ले रहा है  वह है जातीय एवं धार्मिक संघर्ष। सीरिया में धार्मिक एवं जातीय पहलुओं ने ही इस युद्ध को इतना जटिल एवम् अन्तहीन बनाया है।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद एवं उनके सत्ता के सभी सहयोगी वहां के अल्पसंख्यक शिया समुदाय(अलवाइट) से हैं वहीं विद्रोही दल बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय के सदस्य हैं। शिया और सुन्नी समुदाय में हिंसक तनाव कोई नया मसला नहीं है। मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों में अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा से ही बहुसंख्यक समुदाय के लोगों से शोषित होते हैं,  फलस्वरूप सामूहिक नरसंहार होते हैं किन्तु ऐसी घटनाएं मुस्लिम राष्ट्रों में शुरू हुए अचानक से जन आन्दोलन के कारण बहुत तेज़ी से बढ़ी हैं। सन् 2010 के बाद से ही ऐसे आन्दोलन खाड़ी राष्ट्रों में दिन-प्रतिदिन विध्वंसक होता जा रहा है। यह ज़िहाद अब धार्मिक न होकर नितांत जातीय एवम् सम्प्रदायिक हो गया है।
सीरिया के अस्थिर राजनीतिक संग्राम के कारणों का अध्यन करें तो वैश्विक महाशक्तियों का अनुचित हस्तक्षेप ही मुख्य कारण प्रतीत होता है।
खाड़ी के देश अथवा अरब विश्व अपने पेट्रोलियम एवम् तेल संसाधनों के लिए विख्यात है, ऐसे में विश्व के सभी ताक़तवर राष्ट्रों एवम् महाशक्तियों जैसे अमेरिका,रूस,ब्रिटेन तथा पश्चिमी राष्ट्र अपने-अपने हितों को साधने के लिए ऐसे राष्ट्रों पर अपनी गिद्ध दृष्टि बनाए रखते हैं। सीरिया के पड़ोसी राष्ट्र भी अपने सुरक्षित भविष्य के लिए इस युद्ध में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिकाओं में संलग्न हैं।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सरकार के विद्रोहियों के समर्थन में अमेरिका, ब्रिटेन,फ़्रांस जर्मनी, टर्की और सऊदी अरब जैसे राष्ट्र है तो समर्थन में रूस,चीन और ईरान हैं।
विश्व की लगभग सभी प्रमुख शक्तियों के हस्तक्षेप के कारण यह युद्ध केवल सीरिया का गृह युद्ध नहीं रह गया है वरन वैश्विक युद्ध हो गया है जिसकी लपटें भारत में भी सुलग रही हैं।
सीरिया के गृहयुद्ध और कलह के समाप्ति के आसार निकट भविष्य में भी नहीं दिख रहे हैं।
मार्च 2011 में सीरिया में व्याप्त राजनितिक भ्रष्टाचार के विरोध में शुरू हुआ जन आन्दोलन आज आज अपने विध्वंसक स्वरुप में है। कई ऐतिहासिक महत्त्व वाले शहर ध्वस्त हो गए। कितने मासूम मरे और अभी कितने ही और मरेंगे। इस भीषण नरसंहार और रक्तपात का कोई परिणाम नहीं है।
पिछले पाँच वर्षों में लाखों लोग मारे जा चुके हैं। लाखों लोग जेलों में बंद हैं। एक बड़ी जनसँख्या गुमशुदा है। 6.7 मिलियन नागरिक अव्यवस्थित जीवन जीने के लिए बाध्य हैं।4 मिलियन से अधिक सीरियन नागरिकों ने टर्की एवम् जॉर्डन के शरणार्थी शिविरों में शरण ली है। बड़ी संख्या में सीरियाई नागरिकों ने यूरोपीय देशों में वैध-अवैध प्रवेश किया है किन्तु यूरोपीय राष्ट्रों को अब मुस्लिम शरणर्थियों को शरण देने में भय लग रहा है क्योंकि जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों से वे भाग कर आये हैै, जिस तरह की विध्वंसक घटनाओं से वे पीड़ित हैं उन्हें देखकर यह कहना मुश्किल है कि वे वहां शालीनतापूर्ण आचरण करेंगी।
सीरिया में उत्पन्न हुए मानवीय संकट के लिए एक से अधिक राष्ट्र जिम्मेदार हैं।
23 मिलियन से अधिक आबादी वाले देश में आधे से अधिक लोग अत्यंत निर्धनता में जीवन यापन कर रहा हैं जहाँ दो वक़्त का पेट भर पाना भी किसी सपने से कम नहीं है।
शिक्षा एवम् स्वास्थ्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हैं किन्तु ऐसी बुनियादी सुविधाओं से भी सीरियाई नागरिक वंचित हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने इस गृह युद्ध के लिए कमर कसा है किन्तु वैश्विक स्तर पर जिन मुद्दों पर जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका भी शामिल हो वहाँ यह संस्था मूकवत और पक्षपात पूर्ण आचरण करती है। वैसे भी कोई संस्था युद्ध की स्थिति में कोई मदद नहीं कर सकती।राहत कार्यों का क्रियान्वयन तभी संभव है जब सरकार और विरोधी गुटों में संघर्ष वीराम हो।
सीरिया विवाद केवल तभी सुलझाया जा सकता है जब वहां की सरकार और विद्रोही गुटों में विध्वंसक युद्ध बंद हो तथा अमेरिका और रूस का आक्रामक हस्तक्षेप बंद हो।
सीरिया की बशर अल असद के नेतृत्व वाली अलोकतांत्रिक  सरकार और विद्रोही संगठन जब तक किसी स्थायी शांतिपूर्ण समझौते पर बहस करने के लिए तैयार नहीं होते और ऐसे राष्ट्र जिनकी वजह से सीरिया में  हिंसात्मक विध्वंस और अराजकता विद्यमान है जब तक निष्पक्षता से बिना अपना स्वार्थ साधे सीरिया की मदद नहीं करेंगे किसी भी शांति एवम् सौहार्दपूर्ण वातावरण की परिकल्पना भी कोरी कल्पना है। वर्तमान में सीरिया संकट का कोई समाधान दिख नहीं रहा है। भविष्य में या तो कोई चमत्कार हो अथवा ईश्वरीय कृपा तभी वहां कोई शान्ति स्थापित हो सकती है अन्यथा यह हिंसात्मक आग शनैः शनैः कई राष्ट्रों को झुलसएगा।
-अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

निन्दक नियरे राखिये

कुछ व्यक्तियों का मुख्य ध्येय ही निन्दा करना होता है, वे इसी पावन उद्देश्य हेतु धरती पर अवतरित होते हैं। निन्दा का विषय वैसे तो नियमित बदलता रहता है पर कुछ स्थायी चरित्र ऐसे होते हैं जो इनके विशेष लक्ष्य होते हैं। भले ही निन्दक से मिले बेचारे को वर्षों बीत गए हों पर निन्दा ऐसे करते हैं जैसे कल ही उससे मिले हों। निन्दा भी पटकथा के संवाद जैसे की जाती है।
अरे! आपने सुना नहीं वो बहुत गन्दा लड़का है, मोहल्ले भर की लड़कियों से अफेयर है उसका(जैसे कोई लड़का न होकर साक्षात् कामदेव हो)।
जान! सुना नहीं है क्या आपने उनके बारे में?बहुत गन्दा चरित्र है उनका, एक बार तो मेरे पापा ने उन्हें डाँट के घर से भगाया था।(चाहे उनके सात खानदान की औकात उस लड़के से बात तक करने की न हो, चाहे हर कदम पर उस लड़के की जरूरत उन्हें पड़े...चाहे ज़िन्दगी भर उस लड़के के परिवार के परीजीवी रहे हों इनके पुर्वज)।
आपको पता है एक बार मैंने उन्हें चौराहे पे मार करते हुए देखा था इतना क्रूर है कि किसी से भिड़ पड़ता है(चाहे इन्ही की हिफाज़त के लिए उसने दो-चार को ठोका हो और इन्ही की वजह से बदनाम हुआ हो)।
उस लड़की से इतने दिनों तक अफेयर था उसका(चाहे हर दो-चार दिन बाद इनका भी अफेयर कॉलेज और मोहल्ले के दो-चार सड़क छाप आशिकों से हो जाता हो)।

मैं कोई पटकथा नहीं लिख रहा। लोग दूसरों के चरित्र की पटकथा लिखने,प्रकाशित और प्रसारित करने से पहले अपने आप को भी देख लिया करें और ऐसे लोगों के माँ-बाप भी ज़रा अपने बच्चों की हरकतें देख लिया करें कि घर में क्या सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती रहती हैं। दूसरों के बच्चों की बुराइयाँ करने से बेहतर है कि अपने बच्चों पर नज़र रखा जाये।
बूढ़ी माँ से बर्तन धुलवाना,उससे बिना वजह लड़ना, प्रतिस्पर्धा करना, सर दबवाना, मेहमानों से बदतमीज़ी करना,बैठे-बैठे संसार भर की बुराई करना संस्कार है और एक इंसान जो किसी को अपनी बहन से ज्यादा प्यार करे और कोई उसे छेड़े तो छेड़ने वाले की मरम्मत कर दे वो गुण्डा है, चरित्रहीन है,कुसंस्कारी है? हाँ!  है। क्योंकि उसने कृतघ्नों पर उपकार किया है। उसने अपना फ़र्ज़ तो निभाया पर ये भूलकर कि जिसके लिए मैंने किया है कल वही मुझे बदनाम करेगा।
क्या करे मज़बूर है वो अपने खून से क्योंकि उसे ये हरकतें विरासत में मिली हैं। जिस परिवार का वो हिस्सा है वहां का एक ही नारा है-तुम कितनी भी मेरे साथ कृतघ्नता क्यों न करो, मुझे बदनाम क्यों न  करो मैं तुम्हारे साथ हमेशा अच्छा करूँगा। (क्योंकि मुझे यही संस्कार मिले हैं।)
एक बात कहूँ किसी दिन आप अपने भाई से झूठ-मूठ का झगड़ा कर लें और अगले दिन अपने पड़ोसियों के घर घूम लें आपके भाई की एक हज़ार खामियाँ आपको जानने को मिल जाएँगी और फिर अपने भाई को दौरे पे भेजें जहाँ-जहाँ आप गए हों। आपको अपनी भी हज़ार खामियाँ जानने को मिल जाएँगी। ये वाक़ई बेहद सच्ची और परखी हुई बात है।
हद है यार! दीवारों के भी कान होते हैं सुना नहीं है क्या? एक भाई से दुसरे भाई की शिकायत करोगे तो क्या बातें पच जाएँगी? बहुत बेवक़ूफ़ हो यार...हम साथ-साथ पले-बढ़े हैं। टॉफी तो हम छिपा नहीं पाते थे एक-दुसरे से ये तो बातें हैं। सब कुछ ख़बर मिलती है...वो भी अक्षरशः....इतनी बड़ी बेवकूफ़ी तो आपको नहीं करनी चाहिए। एक भाई से दुसरे भाई की बुराई? दिमाग़ तो ठीक है न आपका?
किसी की नज़रों में आप महान नहीं हो सकते किसी को नीचा दिखा कर।
कितना फालतू समय है आपके पास बैठकर उसकी बुराई करने का जिसके पास सुबह से लेकर शाम तक काम का ढ़ेर लगा रहता है? जिसे आपके बारे में सोचने तक का समय नहीं है उसके व्यक्तित्व पर आप शोध कर रहे हैं....कोई और काम नहीं है क्या आपके पास अनावश्यक नुक्ताचीनी करने के अलावा?
बहुत अच्छा है आप अपने काम को इसी समर्पण के साथ करते रहिये आपकी बहुत जरुरत है हमें...मन तो कर रहा है आपको अपने ही घर में लेते आऊँ पर....
हिन्दी के एक बड़े होनहार सिपाही ने एक बात कही है जो मुझे बहुत प्रिय है..आपने भी सुनी ही होगी-
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय,
बिन साबुन-पानी बना निरमल करे सुभाय।।
आप का बहुत-बहुत धन्यवाद......कान में मैल जमी थी अब साफ़ हो गई...अरे हाँ! सुना है आपके पास पूरी दुनिया के चरित्र प्रमाणपत्र का ठेका है? एक तथ्य निष्पक्ष होकर कहेंगे दुनिया से.......आपका चरित्र कैसा है?

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

जो रहे अपरिचित स्वयं से भी


मैं गीत नहीं गा सकती हूँ अब
मौन मुझे हो जाने दो
इस काल की कलरव लीला में अब
गौण मुझे हो जाने दो,
अवरुद्ध कण्ठ से गीत कहूँ यह
मुझसे न हो पायेगा
जो रहे अपरिचित स्वयं से भी वह
कौन मुझे हो जाने दो।।

(मेरी नानी पता नहीं कहाँ चली गयी.....जाने किस अनजान जगह...जाने किस अनजान देश में..बादलों के पार.दिल कह रहा है कि नानी भगवान् के पास बैठी है और हमें देखकर कह रही है....न रो दहिजरा..हम फिर आइब)

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

ए-दिल! इश्क़ की राहों में


फिर तबीयत बिगड़ रही है ए-दिल! इश्क़ की
राहों में
फिर मेरा दिल तड़प रहा है रात कट रही
आहों में,
फिर सुलगी है इक चिंगारी फिर दिल तेरे
पनाहों में,
फिर तू दौड़ी-दौड़ी आजा कोरी-कोरी
बाँहों में
(wonderful
painting by my sister himani)

शनिवार, 26 सितंबर 2015

कंदर्प का संहार होना है...


एक कम्पन हो रहा मेरे
ह्रदय में
मेरे विखण्डन को कोई 
आतुर हुआ है,
इस तरह उद्विग्न है स्वासों 
का प्रक्रम,
जैसे यम ने आज ही सहसा 
छुआ है,
मैं बना हूँ लक्ष्य संभवतः 
प्रलय का
आज मेरे दर्प का उपचार 
होना है,
युगों से जिस नेह ने जकड़ा 
मुझे था,
आज उस कन्दर्प का संहार 
होना है।।
-अभिषेक शुक्ल
(प्रस्तुत पंक्तियाँ मेरी कविता "अविजित दुर्ग" के आगे की कड़ी है)

बुधवार, 23 सितंबर 2015

मैं अविजित दुर्ग हूँ अपने समय का...

मैं अविजित दुर्ग हूँ अपने समय का
सैकड़ों सेनाएं थक कर हार बैठीं,
किन्तु टूटा नहीं मेरा एक कण भी
धैर्य साहस वीरता सब वार बैठीं।
किन्तु अब मैं स्वयं ही फटने लगा हूँ
चल रहा एक द्वंद्व और एक युद्ध मुझमें,
शांति और उत्पात का संगम बना हूँ
आज गुण-अवगुण सभी हैं क्रुद्ध मुझमें।।
-अभिषेक
(क्रमशः)

रविवार, 20 सितंबर 2015

गरज-गरज घनघोर घटा ने..


गरज गरज घनघोर घटा ने आज बरसने की
ठानी है,
बरसा दे ओ नभ् के ईश्वर जितना तेरे तेरे घर
पानी है,
तू विस्तृत है तो हम सागर बन तेरा आह्वान
करेंगे,
मेघदूत तेरे कलरव का हम हिय से सम्मान
करेंगे।।
-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

साहित्य मंथन

यदि सारे साहित्यकार एक-दूसरे की घृणित
आलोचना छोड़कर कुछ सकारात्मक कार्य
करने लगें, नए प्रतिभाओं को हेय दृष्टि से न
देखकर उनकी अनगढ़ प्रतिभा को गढ़ें, सुझाव दें
तथा भाषा को रोचक बनायें और नए
साहित्यिक प्रयोगों की अवहेलना न करें तो
हिंदी भाषा स्वयं उन्नत हो जायेगी।
बहुत दुःख होता है जब वरिष्ठ साहित्यकारों
की वैचारिक कटुता समारोहों में, सोशल
मीडिया पर प्रायः देखने-पढ़ने को मिलती है।
साहित्यकार कभी विष वमन् नहीं करता
किन्तु इन-दिनों ऐसी घटनाएं मंचों पर
सामान्य सी बात लगती हैं।
कुछ कवि जिन्हें वैश्विक मंच मिला है, जिन्हें
दुनिया सुनती है, जिन्होंने साहित्य का
सरलीकरण किया उनकी आलोचना करना
आलोचना कम ईर्ष्या अधिक लगती है।
किसी का लोकप्रिय होना उसकी
मृदुभाषिता,सहजता,व्यवहारिकता तथा
प्रयत्नों की नवीनता पर निर्भर करता
है....यदि आपको पीछे रह जाने का आमर्ष हो
तो मंथन कीजिये, अपने शैली पर ध्यान
दीजिये..कोई परिपूर्ण तो होता नहीं है,
सुधार सब में संभव है...आप अच्छा लिखेंगे.सुनायें
गे तो लोग आपको भी पढ़ेंगे,सुनेंगे।
भला कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जिसे
अच्छा साहित्य अच्छा न लगे।
कुछ साहित्यकार ऐसे भी हैं जिनके मनोवृत्ति
को माँ शारदा भी नहीं बदल पाईं भले ही वे
माँ के सच्चे साधक रहे हों।
कुछ समय पहले एक वरिष्ठ साहित्यकार का
सन्देश आया फेसबुक पर। वो सन्देश कम अध्यादेश
अधिक था मेरे लिए। सन्देश का सार ये था कि
उन्होंने मेरे ब्लॉग पर मेरी कविताएँ पढ़ीं,
आलेख पढ़े। पाठकों की, ब्लॉगर मित्रों की
टिप्पणियां भी पढ़ीं..और उसके बाद खिन्न
होकर मुझे सन्देश भेजा कि- मैं आज की पीढ़ी
को पढ़कर व्यथित हूँ। तुम्हीं लोग हिंदी
साहित्य को गन्दा कर रहे हो। उन्मुक्त
कविता लिखते हो। छंदों का ज्ञान नहीं
है..लयात्मक नहीं लिखते तुकबंदी करके स्वयं को
कवि कहते हो।कोई हिंदी प्रेमी कुछ पढ़ने के
लिए इंटरनेट खोले तो तुम्हारी तरह अनेक
साहित्य के शत्रु दिख जाते हैं।न शैली है न
रोचकता है कुछ भी लिखने लगते हो जो मन में
आये उसे पोस्ट कर देते हो चाहे उसका स्तर
कितना भी निम्न क्यों न हो। तुम छुटभैय्ये
ब्लॉगरों ने हिंदी को बदनाम कर के रख
दिया है।
मैंने भी प्रत्युत्तर दिया- गुरुदेव प्रणाम! क्षमा
चाहता हूँ आप मेरी रचनाओं से व्यथित हुए।
आपने जिन विषयों की ओर इंगित किया है मैं
उनमें सुधार लाने का प्रयत्न करूँगा किन्तु मेरी
एक समस्या है गुरुदेव कि मैं विधि विद्यार्थी
भी हूँ। कानून तो स्वयं पढ़ सकता हूँ पर मेरे
प्रवक्ता गण मुझे साहित्य नहीं पढ़ाते। कुछ
ऐसी विडम्बना है इस देश कि सर्वोच्च
न्यायालयों की भाषा आंग्ल भाषा है। प्रश्न
आजीविका का है इसलिए इसलिए इस विषय
को भी मैंने अंग्रेजी में ही पढ़ा है। हिंदी मुझसे
छूट सी गयी है।मुझे कोई हिंदी आचार्य मिल
नहीं रहा है जो मुझे व्याकरण सिखाये। आप
जैसे वरिष्ठ लोगों से पूछता हूँ तो कहते हैं कि
स्वयं अध्यन करो। केवल पुस्तक पढ़ने से ज्ञान आ
जाता तो अब तक संभवतः हर कुल में एक महर्षि
वाल्मीकि होते।आपने कहा की मेरे जैसे अधम
लोग साहित्य को दूषित कर रहे हैं..गुरुदेव
दूषित वस्तुओं को स्वच्छ करने का कर्तव्य भी
आप जैसे जागरूक लोगों पर होता है। मुझे भी
स्वच्छ कर दीजिये जिससे कि मैं भी स्वच्छता
फैला सकूँ। आपका बहुत-बहुत आभार मुझ पर इस
विशेष स्नेह के लिए।
गुरुदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया किंतु मुझे
ब्लॉक अवश्य कर दिया।
यह कारण मेरे समझ में नहीं आया। मैंने कौन सी
उदण्डता कर दी? मैंने उन्हें कैसे आहत कर दिया?
कुछ दिन ये सोचता रहा कि क्या मैं अपनी
काव्यगत उच्छश्रृंखलता से कहीं सच में साहित्य
को दूषित तो नहीं कर रहा? क्या छन्दमुक्त
कविता, कविता की श्रेणी में नहीं आती.?
इन्ही प्रश्नों में उलझ कर कई दिन कुछ नहीं
लिखा। एक दिन शाम को कुछ पढ़ रहा था
तो अचानक ही रामायण का एक प्रसंग याद
आया। सीता माता का पता चल चुका था।
वानर सेना समुद्र में सेतु निर्माण के लिए लिए
प्रयत्नशील थी। कोई पहाड़ तो कोई पर्वत
तो कोई पत्थर फेंक रहा था समुद्र में, तभी
भगवान की दृष्टि एक नन्ही सी गिलहरी पर
पड़ती है जो स्थल पर लेटकर अपने सामर्थ्य भर
शरीर में रेत इकट्ठा करती और समुद्र के किनारे
उसी रेत को गिरा देती। उसका समर्पण देख
भगवान उसे प्यार से सहलाते हैं आशीष देते हैं और
देखते ही देखते बांध बन जाता है। त्रेता युग में
निर्मित वह सेतु आज भी यथावत है।
मुझे एक क्षण को आभास हुआ कि मैं वही
गिलहरी हूँ जो साहित्य के सागर में सेतु बना
रहा हूँ। निःसंदेह मेरा प्रयत्न अकिंचन है किन्तु
है तो।मैं तो अपने आराध्य की उपासना कर
रहा हूँ। मैं लिखना क्यों बंद करूं?
मुझे उनकी टिप्पणी अप्रिय नहीं लगी थी
किन्तु अपने कार्य पर संदेह होने लगा था।
ये केवल मेरी समस्या नहीं है। मेरे जैसे अनेक हैं
जो लिखते है टूटी-फूटी भाषा में...जिन्हें
सीखने की तीव्र इच्छा तो है पर सिखाने
वाले हाथ खड़ा कर लेते हैं। जो जानते हैं
जिनकी कलम पुष्ट है वे ही लोग बच्चों को कुछ
सिखाने से कतराते हैं। कोई स्वयं ही नहीं
सीख सकता न ही इस युग में आदि कवि
वाल्मीकि जैसा कोई बन सकता है।
गुरु को भारतीय दर्शन नें ईश्वर से श्रेष्ठ कहा
है..आप गुरुवत् आचरण करने लगें तो आप सबका
शिष्य बनने में नई पीढ़ी कब से आतुर है।
एक अनुरोध है साहित्य में पुरोधाओं से यदि
आप कुछ जानते हैं तो आपका सुझाव, आपका
मार्गदर्शन, आपका अनुभव हमारा संबल बन
सकता है...हमें सुधार सकता है।
आपके द्वारा प्रदत्त सकारात्मक वातावरण न
केवल हमारी लिपि,हमारी भाषा को
उन्नतिशील बनाएगा वरन हमारी संस्कृति
को सशक्त बनाएगा..क्योंकि लोग कहते हैं कि
हम बच्चे ही भारत के भविष्य हैं...इस भविष्य
को संवारने में आपका योगदान इस द्वीप के
लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
आपकी आपसी कटुता हमें भी आहत करती है।
साहित्य कला है, कला अर्थात आनंद...और
आनंद सदैव शाश्वत होता है।जब तक साहित्य
शाश्वत है तभी तक पठनीय है जब मन का
ईर्ष्या,द्वेष, दुर्भावना साहित्य में आने लगता
है तो साहित्य बोझिल लगने लगता है..कोई
दुःख नहीं पढ़ना चाहता कोई विषाद नहीं
सुनना चाहता...सब को उल्लास अभीष्ठ
है..प्रयोग करके तो देखिये...दुनिया सुनने के
लिए सदैव उत्सुक रहेगी।एक ऊर्जावान व्यक्ति
सदैव ऊर्जा बिखेरता है..आपके आस-पास आपसे
प्रभावित बिना हुए नहीं रह सकते..सरस्वती के
साधक अवसाद में रहें तो युग अंधकारमय हो
जाता है फिर भाषा की उन्नति तो स्वप्न
जैसा है...देश की ही अवनति प्रारम्भ हो
जाती है।
समदर्शक बनें..सहनशील बनें...गंभीर
बनें..निःसंदेह भाषा भी गौरवान्वित होगी
और देश भी...भविष्य आपकी प्रतिबद्धता पर
टिका है, आपके समर्पण पर टिका है....
सकारात्मकता की ओर बढ़ें.....लक्ष्य तक तो
पहुँच ही जाएंगे शनैः-शनैः।

बुधवार, 9 सितंबर 2015

धार्मिक असहिष्णुता से आहत भारत


प्राचीन भारतीय दर्शन के अनुसार धर्म की एक बहुत सुन्दर सी परिभाषा है-"जो धारण करने योग्य है वही धर्म है।"
प्रश्न यह उठता है कि धर्म के लक्षण क्या हैं? इन लक्षणों को मनु ने इस प्रकार  है बताया है-
"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं
धर्मलक्षणम्।
अर्थात- धैर्य, क्षमा, दम(दुष्प्रवित्तियों पर नियंत्रण), अस्तेय, आंतरिक तथा बाह्य शुचिता, इन्द्रिय निग्रहः, बुद्धिमत्ता पूर्ण आचरण, विद्या के लिए तीव्र पिपसा, मन,कर्म तथा वचन से सत्य का पालन करना, क्रोध पर नियंत्रण ये धर्म के दस लक्षण हैं।
आज संसार के किसी भी धर्म में इन लक्षणों का दूर-दूर तक कहीं समावेश नहीं है। भारत जिसे धर्मों का संगम कहा जाता है, जहाँ सदियों से अलग-अलग धार्मिक संस्कृतियां पुष्पित और पल्लवित होती रही हैं, जिस देश ने विश्व के सभी धर्मों के अनुयायियों को संरक्षण प्रदान किया उसी भारत में आज धार्मिक कलह से भारतीयता आहत है।
हर धर्म के अनुयायी उस धर्म की मूल भावना से परे हटकर कुरूतियों को धर्म कहकर देश में धार्मिक कटुता का बीज बो रहे हैं। अब देश में भारतीय खोजना मुश्किल हो गया है। हिन्दू और मुसलमान तो गली-चौराहों पर मिल जाते हैं पर भारतीय विलुप्तप्राय हो गए हैं। सरकार को भारतियों के संरक्षण के लिए कोई बिल पास करना चाहिए ये संकटग्रस्त प्रजाति है।
देश में अलग-अलग जगहों पर पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट के झण्डे फहराये जा रहे हैं, हिंदुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाये जा रहे हैं। जिस देश में खाने के लिए लाले पड़ रहे हों जो खुद दहशत के आग में जल रहा हो उसके अनुयायी भारत में कहाँ से आये ये सोचने वाली बात है। ऐसी कौन सी बात है जिससे आहत हो लोग वतन से गद्दारी कर रहे हैं? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हिन्दू और मुसलमान में नफ़रत इस कदर बढ़ गयी है कि जगह-जगह से सांप्रदायिक तनाव की ख़बरें आ रही हैं। ऐसी धार्मिक असहिष्णुता कभी नहीं थी जिनती अब हो गयी है। ऐसी विषाक्त परिस्थितियों को देखकर देश की आत्मा व्यथित है।
कोई धर्म देश से गद्दारी नहीं सिखाता। किसी भी धर्म की शिक्षाएं मानवता को शर्मसार नहीं करती पर धर्म के ठेकेदारों को कौन समझाए?  आज धार्मिक उन्माद का मुख्य कारण धार्मिक राजनीति है। नफरत उगाई जा रही है और दहशत की फसलें काटी जा रही हैं।
हर धर्म में एक से बढ़कर एक संप्रादियिक तनाव पैदा करने वाले चेहरे हैं जो केवल ज़हर ही उगलते हैं।
धर्म की राजनीति करने वाले इन असहिष्णु लोगों को ये नहीं पता है कि धर्म का उद्देश्य क्या है।
"श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव
अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न
समाचरेत् ॥"
धर्म का सर्वस्व क्या है? उसे समझो और वैसा आचरण करो। जो आचरण तुम्हारे लिए प्रतिकूल हो उसे दूसरों के साथ मत करो।
धर्म का आशय क्या है? धर्म क्या है? आचरण क्या है? पाप क्या है? कुछ नहीं पता पर सब स्वयं को धार्मिक कहते हैं।
जो व्यवहार अपने अनुकूल न हो वैसा आचरण किसी दुसरे के साथ नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करना प्रवित्ति है तो यह पाप है।
किसी भी धर्म का उत्थान हिंसा से असंभव है। जो धर्म सबसे अधिक उदार होगा,समरसता पूर्ण होगा और मानवीय होगा वही अस्तित्व में रहेगा। किन्तु कोई भी इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
जब धर्म राष्ट्र भक्ति में बाधक बने तो उसे त्याग देना चाहिए। क्योंकि जो व्यक्ति अपने मातृभूमि से गद्दारी कर सकता है वह किसी भी धर्म या संस्कृति का पोषक नहीं हो सकता है।
आज पूरे विश्व में आगे बढ़ने की होड़ मची है। कोई मंगल पर तो कोई प्लूटो पर जाने की तैयारी कर रहा है पर एशिया धर्म संरक्षण में कट-मर रहा है। ऐसे धर्म की प्रासंगिकता क्या है जिसमें मानवता लेश मात्र भी न बची हो?
सनातन धर्म की एक प्रचलित सूक्ति है-
"हिंसायाम् दूरते यस्य सः सनातनः।"
आर्थात मन से,वचन से और कर्म से जो हिंसा से दूर है वही सनातन है। जो कर्म प्राणी मात्र को कष्ट दे वह हिंसा है। जो हिंसक है वह सनातनी नहीं है...मानव भी नहीं है। यह कथन सभी धर्मीं के अनुयायियों को समझना चाहिए।
क्या जो लोग ऐसे धार्मिक उन्माद पैदा करते हैं जिससे देश में आतंरिक कलह पैदा होता है उन्हें धार्मिक कहा जा सकता है? ये सत्ता लोलुप लोग हैं किसी भी धर्म से इनका कोई मतलब नहीं है।
न ये हिन्दू हैं न मुसलमान हैं कोई और ही धर्म है इनका। शैतान इन्हें ही कहते हैं शायद।
कुछ मुसलमान इस देश की सरकार से असंतुष्ट लोग पाकिस्तान के बरगलाने की वजह से वतन से ग़द्दारी कर पूरे इस्लाम को कठघरे में खड़ा करते हैं। पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने वाले लोग, देश से ग़द्दारी करने वाले लोग न तो मुसलमान हैं न हिंदुस्तानी।
गद्दारों की कोई कौम नहीं होती है। इस देश को धर्मों में बाँटने वाले लोग ये क्यों भूल जाते हैं जब कलाम साहब विदा लेते हैं वतन से तो पूरा देश रोता है। जब क़साब को,अफज़ल गुरु को और याक़ूब को फाँसी होती है तो देश में लड्डू बंटता है।
कोई भी इंसान वतन से ग़द्दारी करके महान नहीं बनता काफ़िर जरूर बन जाता है। ऐसी हरकतों से न ईश्वर खुश हो सकते हैं न ख़ुदा।
भारतीय दर्शन राष्ट्ररक्षा को ही धर्म मानता है। मंदिरों में कोई भी यज्ञ,हवन की पूर्णाहुति तब तक नहीं होती जब तक "भारत माता की जय" नहीं बोला जाता। देशभक्ति संसार के सभी धर्मों से श्रेष्ठ है। धर्म द्वितीयक हो तथा राष्ट्र प्राथमिक तो समझिये आप ईश्वर के सच्चे उपासक हैं।
आप हिन्दू, मुसलमान या इसाई हों पर  भारतीय होना न भूलें। देश से वफ़ादारी करने वालों पर हर मज़हब के खुद को फ़ख़्र होता है।आइये आप और हम मिलकर देश को मज़बूत बनायें,प्रगतिशील बनायें..विकसित बनायें। हम हिंदुस्तानी हैं। विश्व बंधुत्व का पाठ हम दुनिया को पढ़ाते हैं यदि हम सांप्रदायिक दंगे करेंगे, धार्मिक उन्मादी बनेंगे तो हमारे देश की साझा संस्कृति को कितना ठेस पहुंचेगा।इक़बाल साहब ने बहुत सही बात कही है-
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ
हमारा।।
हम सब एक हैं। एक ही माँ के बेटे हैं। क्या हुआ हमारे पूजा की पद्धतियाँ अलग हैं...हमारा देश तो एक है..हमारी माँ तो एक है।
संसार की प्राचीनतम् सभ्यता जब बर्बरता का ताण्डव देखेगी तो क्या उसका ह्रदय नहीं फटेगा?
आओ इस महान संस्कृति को क्षत्-विक्षत् होने से रोकें। इस देश की आत्मा को व्यथित न होने दें...आओ "वसुधैव-कुटुम्बकम्" की भावना को विकसित करें..हम सब मिलकर रहें...अपने राष्ट्र को एक आदर्श राष्ट्र बनायें जिससे पूरी दुनिया बोल पड़े-
"सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ तुम्हारा।"
जय हिन्द! वन्दे मातरम्।
-अभिषेक शुक्ल।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

यूँ अचानक पकड़ कर तुम हाथ मेरा, क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?



यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा
क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?
प्रेम है अवसाद का ही रूप
दूजा
वर्षों से ये तथ्य दुनिया कह
रही है,
क्या नहीं दिखती तुम्हे
अश्रु गंगा
आज मेरे आँखों से जो
बह रही है।
तुम विरह के वेदना की मुख्य कारक!
ह्रदय की एकांकी होगी
न तुमसे,
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा.....

आज भी भूला नहीं हूँ उस
तिथि को
विरह का एक ज्वार जब जीवित हुआ था,
शून्यमय इस विश्व में आकार
 लेकर
प्रेम का उद्गार मेरा मृत हुआ
हुआ था।
लोग कहते शाश्वत जिस
कल्पना को
आज उसका हो गया तक़रार मुझसे,
अहंकारित स्वरों का अट्टहास
उसका
सुन सहजता रूठ बैठी
 पुनः मुझसे
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा...

क्यों निराशा स्वयं में आशा जगाती
और मन आशान्वित हो
गुनगुनाता?
पर भला किसमें है
सामर्थ्य  ऐसा?
प्रेयसी से बिछुड़ कर जो मुस्कुराता?
मैं विरह से व्याप्त मन की
उपज हूँ,
और तुम परमात्मा की
श्रेष्ठ रचना
मैं बना अवधूत जग में
घूमता हूँ
तुमने सीखा ही कहाँ
निर्लज्ज रहना?
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा...

स्मरित करना कभी तुम उस मिलन को
जब मुझे भी स्वयं का आभास
न था
मैं अलग हूँ क्या प्रिये
तुमसे कभी?
तुम्हें अपने आप पर विश्वास
न था
वह मधुर संयोग जो तुम
भूल बैठी
अब नहीं करना मुझे स्वीकार
कुछ भी
मन तुम्हारे पाश् से मुक्त
है अब
है नहीं जीवन में मेरे प्यार
कुछ भी
और सुनना चाहती हो क्या
तुम मुझसे?
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा
क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?
                                                                          -अभिषेक शुक्ल

( इस चित्र को मेरी छोटी बहिन हिमानी ने बनाया है....मैंने कुछ दिन पहले सोचा था इस चित्र के लिए कोई कविता लिखूँगा पर लिख नहीं सका। कोई कविता इस योग्य लिख ही नहीं पाया जिसे इस चित्र के साथ पोस्ट कर सकूँ।
प्रेम का संयोग पक्ष तो मेरे लिए अनभिज्ञ है.....वियोग की ही तरह..पर वियोग लिखना तनिक आसान है...मैंने वियोग श्रृंगार लिखने की कोशिश की कुछ पल के लिए ये मत सोचियेगा कि ये प्रकृति और पुरुष हैं जो कभी पृथक ही नहीं होते..कुछ पल के लिए ये मानना है की ये चित्र किसी प्रेमी युगल के अतीत की ऐसी छवि है जिसका कोई वर्तमान या भविष्य नहीं है)



शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

समस्याओं के चक्रव्यूह में देश

भारत कलह,अराजकता और समस्याओं का देश है। भारत की दासता के पीछे भी यही कारण थे अन्यथा गोरों में इतनी ताकत नहीं थी जो भारतियों को गुलाम बना लेते। तब भी भारतीय जनता शोषित हो रही थी आज भी भारतीय जनता शोषित हो रही है अन्तर बस इतना सा है कि तब हमें विदेशी रुला रहे थे और आज रोने वाले भी भारतीय हैं और रुलाने वाले भी। तब हमारी आवाज ब्रिटिश हुक़ूमत गोलियों से, फाँसी से और कोडों से दबा देती थी और आज अगर जेब में पैसे न हों तो आवाज अपने आप दब जाती है बिना किसी बाह्य प्रयत्न के। आज हम भ्रष्टाचार के साए में जी रहे हैं और दुर्बल या सशक्त हम पैसों के हिसाब से होते हैं।
इन दिनों असुरक्षा की अजीब सी भावना मन में पनप रही है। हर पल यही लग रहा है कि कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए।ये डर केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है वरन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है।
विगत दो वर्षों में विज्ञान ने जितनी उन्नति की है उतना ही डर भी पैदा किया है। हथियारों को विश्व में अनाज की तरह ख़रीदा है। हमारे पडोसी राष्ट्रों ने तो हथियार ख़रीदने और आतंक मचाने को अपना राष्ट्रीय कार्यक्रम बना लिया है। इनके हथियार खरीदने का मकसद अपनी सुरक्षा नहीं भारत में नरसंहार करना है। पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंकी गतिविधियों के पीछे किसका हाथ है फिर भी संयुक्त राष्ट्र संघ को नहीं दिखता क्योंकि हमारे संसद को ही कुछ नहीं दिखता।जब हमारे लोग मारे जाते हैं तो हमें ही कोई फर्क नहीं पड़ता तो दुनिया को क्यों पड़े। हमारे देश में न सैनिकों के जान की कोई कीमत है न आम जनता के जान की।
किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र की संसद उस राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली और बुद्धिमान संस्था होती है। भारत में तो संसद तो कुछ अधिक ही सक्षम है।
दो सदन हैं राज्य सभा और लोक सभा। राज्य सभा को विद्वानों का गृह कहा जाता है क्योंकि राष्ट्र के विद्वान और अनुभवी राजनीतिज्ञों का जमावड़ा यहीं लगता है, विभिन्न क्षेत्रों से इसके सांसदों का चुनाव किया जाता है किन्तु यहाँ भी आज-कल एक सूत्रीय कार्यक्रम चल रह है संसद को ठप्प करने का। पता नहीं क्यों भारत में कोई भी पार्टी विपक्ष में जैसे ही जाती है कट्टर ईमानदार बन जाती है और सत्तारूढ़ सरकार का विरोध करना राष्ट्रीय धर्म।
ख़ैर बात चाहे राज्यसभा की हो या लोकसभा की हर जगह वामपंथियों का उत्पात है।
किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष का कार्य सरकार को दिशा निर्देश देना है, उन विषयों पर विरोध करना है जहाँ पर सरकार का काम गलत हो लेकिन भारत में तो उल्टा नियम चल रहा है। यहाँ बेहद संवेदनशील विषयों पर भी हंगामा किया जाता है। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा की हो या विकास की सरकार और विपक्ष की निरर्थक बहस चलती रहती है,  कोई आम सहमति नहीं बन  रही है।
भारत की कलहप्रिय राष्ट्र भी है।यहाँ का कलह प्रेम तो युगों-युगों से विख्यात है। त्रेता , द्वापर और अब कलियुग हर  युग में कलह का क्रमिक विकास हुआ है। घर से लेकर संसद हर जगह समान रूप से यह विद्यमान है। संसद में तो आज-कल अलग ही नजारा है। राजनीतिज्ञों की कलह जनता को खून के आँसू रुला रही है। जिस परिवार में कलह हो वह परिवार भ्रष्ट हो जाता है....किसी कवि ने कहा भी है-
"संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।"
कुछ ऐसी ही विषम परिस्थितियां हैं मेरे देश में। जब देश में इतना कलह है तो पडोसी राष्ट्र क्यों न हमें तबाह करने के लिए हाथ आजमाएं। तभी तो रोज घुसपैठ होती है। जब घर के दाम खोटे हों तो परखने वाले का क्या दोष?
रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं। नक्सलवाद की आग में देश जल रहा है। नक्सली देश की व्यवस्था या सरकार से रुष्ट लोग नहीं हैं बल्कि विदेशी शक्तियों से दुष्प्रेरित लोग हैं जिन्होंने देश को कुरुक्षेत्र बना दिया है।
मुद्दे और भी हैं, विपदाएँ और भी हैं, शिकायतें और भी हैं। भारतीय जनमानस व्यथित है। देश की दुर्दशा देखि नहीं जा रही है। देश के वीर सपूत मर रोज़ शहीद हो रहे हैं, आतंकवादी गाज़र-मूली की तरह इंसान काट रहे हैं। मुट्ठी भर की जनसँख्या वाला देश पाकिस्तान हमारे खिलाफ जहर उगल रहा है, दहाड़ रहा है, तेवर दिखा रहा है, धमकी दे रहा है। सरकार हर बार शहादत पर दो सांत्वना के बोल बोलकर चुप हो जाती है। आतंकवादी हमलों पर भी राजनीती की जाती है। झूठी संवेदनाओं का कुछ दिन दौर चलता है। कुछ घड़ियाली आंसू,कुछ वादे और कुछ सांत्वना के शब्द..हद है राजनीति की भी। केंद्र तो कई बार गंभीर दिखती है पर प्रदेश सरकारों के बयान तो समझ से परे होते हैं, कई बार विदूषकों के जैसे वक्तव्य आते हैं।
प्रदेश की व्यवस्था देख नहीं पाते केंद्र को कोसने पहले कूदते हैं। आम जनता  व्यथित है और ये सच है कि समस्याओं को सुलझाने वाला कोई नहीं है। नेता लूटने-खसोटने में व्यस्त हैं। विचित्र परिस्थितियों ने जन्म लिया है। मन बहुत दुखी है..हे ईश्वर! कुछ तो मार्ग बताओ। अब परिस्थिति नियंत्रण से बाहर हो रही है।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

मेरा यार है मेरा वतन...मेरा प्यार है मेरा वतन!


सारे रिश्ते नाते छोड़कर
सारे कसमें वादे तोड़कर,
हम सरहदों को चल दिए
सर पे कफ़न एक ओढ़कर,
अब अलविदा! ऐ बेख़बर
किस बात का तुमको है डर?
मेरा यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!

बर्फीली राहों की डगर
माना कि है मुश्किल सफ़र,
तेरे इश्क़ का ऐसा असर
अब मौत से लगता न डर,
धुंधली हुई है ज़िन्दगी
पर दुश्मनों पे है नज़र,
मेरा यार है मेरा वतन!
तू प्यार है मेरा वतन!

आज़ादी की चाहत लिए
फाँसी का फन्दा चूमकर,
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्
गाते थे जो दिल झूमकर,
वे तो शहादत को चले
मिट्टी वतन की चूमकर,
उनकी शहादत को नमन!
शान-ए-वतन! शान-ए-वतन!

तेरे इश्क़ में कुर्बान हो
हम देंगे तुझको रौशनी,
हमको शहीदों की कसम
महफूज़ होगी सरज़मीं,
ग़र हम सुपुर्द-ए-ख़ाक हों
या सरहदों पर राख हों,
रोना नहीं प्यारे वतन!
तू है खुशियों का चमन!
मेरा यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!
                   -अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 12 अगस्त 2015

ड्रामामय भारत

आजकल हर तरफ ड्रामा चल रहा है.....मेरे हॉस्टल से लेकर संसद तक।
ड्रामा,हंगामा या अभिनय जो भी हो...सारे कार्यक्रम बड़े दमघोंटू  लग रहे हैं।
कहीं नए भगवान् पैदा हो जा रहे हैं तो कहीं आदिशक्ति...कहीं अल्लाह के रक्षक अल्लाह के बंदों पर कहर बरसा रहे हैं, क़त्ल कर रहे हैं..तो कुछ ऐसे भी नेक बन्दे हैं जो ईश्वर को गाली दे रहे हैं।.किसी को हिंदुओं को मारने में मज़ा आ रहा है...तो कोई घरवापसी में मगन है।
आज भगवान् के घर में भगदड़ मची दर्ज़नो लोग भगवान् के पास ही पहुँच गए।
प्रधानमंत्री जी भाइयों एवं बहनो में व्यस्त हैं...तो विपक्षी पार्टी ने संसद को प्राइमरी पाठशाला बना दिया है...अंतर बस इतना सा है कि प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों से थप्पड़ कर उन्हें सभ्य बनाया जा सकता है लेकिन संसद वाले बच्चों पर कोई लगाम ही नहीं कसा जा सकता.....इन्हें हंगामे करने की मोटी तनख़्वाह दी जाती है...कमीशन भी...घूस भी....एक तो यूनिफार्म इनका ऐसा है कि जितने काले करतूत उतने साफ़ कपडे..।
वाद से भारत का तो रिश्ता पुराना है...जातिवाद, धर्मवाद, सम्प्रदायवाद,मार्क्सवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, अलगाववाद..बलात्कार वाद...हर वाद में भारत अव्वल है...हर विषय पर सीरियल, एपिसोड बन रहा है.....टी.वी. खोलिए चैनल बदलिये..और जी भर के कोसिये अपने आपको...कि आपको नींद नहीं आ रही है....मुझे पता है कि मैं बकवास कर रहा हूँ पर न करूँ तो frustrate होना तय है...कसम से देशव्यापी ड्रामे ने न मेरा सर खा लिया है.....इस बड़े लेवल वाले ड्रामे से मेरे हॉस्टल वाला ड्रामा ठीक है...कम से कम बोलने वाले को चुप तो कराया जा सकता है...टांग पकड़ कर बहार फेंका जा सकता है या सामने वाले पार्क में कुछ देर खुद से बात तो किया जा सकता है...इन संसद वालों का क्या करें......कोई idea हो तो बताओ भाई...इन्हें कैसे सुधारें.....देश के सारे नमूने संसद में हैं...खैर समस्या संसद में ही नहीं है.....संसद के बाहर भी हैं...हमारे आस-पास भी हैं...हम-तुम ही हैं..#बक़वासतुमभीकरो

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

याद आया मनभावन सावन

सावन लग गया है लेकिन पता नहीं चल रहा है।
आज गाँव की बहुत याद आ रही है। मेरे मन में
जो छोटा सा कवि बैठा है न वो इस महीने में
कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो जाता था गाँव
में। जब बारिश होती थी तो अक़्सर मैं भीगते
हुए निकल पड़ता था खेतों की ओर....बादलों
से बात करने। मेरे खेत के आस-पास खूब सारे
तालाब हैं। बारिश में तालाब की सुंदरता कुछ
अधिक ही बढ़ जाती है...हरी-भरी धरती और
सुन्दर सा गगन...इसी ख़ूबसूरती को टटोलने मैं
घर से निकलता था..कभी अकेले तो कभी दो-
चार छोटे बच्चों के साथ...हाँ बच्चों के साथ
घूमना मुझे बेहद पसंद है..सावन जितना ही...।
पुरवाई हवा...काले बादल...खूबसूरत मौसम
भला किसे न अपनी ओर खींच ले....पर याद
सिर्फ इसीलिए नहीं आई है...
सावन भर गाँवों में गली-गली में आल्हा और
कजरी गाया जाता है। कजरी महिलाएं
गाती हैं और पुरुष लोग आल्हा। मुझे दोनों बहुत
पसंद है। शाम को जब भी कोई काकी या
भौजी, अम्मा(दादी) से मिलने आतीं तो मैं
उनसे कजरी ज़रूर सुनता...एक हैं पड़राही
भौजी...दादी के उम्र की हैं पर भौजी लगती
हैं...मज़ाक भी खूब करती है...उनके गाने का तो
मैं फैन हूँ। कजरी ऐसे गाती हैं जैसे आशा ताई
गा रही हों।
सावन व्यर्थ है अगर आल्हा न सुना
जाए.आल्हा सुनाते हैं बेलन भाई....वीर रस का
क्या अद्भुत गान है आल्हा। बेलन भाई का
अंदाज़ भी निराला है जब आल्हा सुनाते हैं
तो खुद ही सारे चरित्र निभाने लगते हैं..सावन
भर बेलन भाई रात को आल्हा सुनाते..एक
लड़ाई ख़त्म होती की दुसरे की ज़िद
करता..10 बजे से कार्यक्रम 12 बजे रात तक
चलता..गाँवों में इतनी रात तक कोई नहीं
जगता..पर मैं, पापा, मम्मी और अम्मा
श्रोता मण्डली में थे..बेलन भइया भी पूरे मन से
सुनाते..जब थक जाते तो कहते- "बाबू अब नहीं
होस् परत थै, भुलाय गय हन, बिहान पढ़ि के
आइब तब सुन्यो।"
रात के एक बजे घर पहुँचते थे भइया भौजी तो
उन्हें बेलन से ही पीटती रही होंगी..पर बताते
नहीं थे...कहते बाऊ तोहार भौजी लक्ष्मी
हिन्...
मैं भी कहता हाँ भइया..सही कहत हौ।
आल्हा और ऊदल का रण कौशल इतना अद्भुत
था जैसे साक्षात् शिव ताण्डव कर रहे हों...
एक पंक्ति है-
"खींच तमाचा जेके हुमकैं निहुरल डेढ़ मील ले
जाय"
आज ऐसे भारतीय होने लगें तो चीन को हम
अंतरिक्ष में फेंक देते।
जीवन का वास्तविक सुख गाँव में ही है...मेरे
मन में बसा छोटा सा साहित्यकार अक्सर
अपना गाँव खोजता है.....मन तो उसका वहीं
रमता है।
करीब चार साल हो गए सावन घर पर बिताए
हुए...मेरठ में तो किसी मौसम का पता ही
नहीं चलता...हमेशा पतझड़ का एहसास होता
है...पता नहीं क्यों...
न यहाँ झूले दिखते हैं न हरे-भरे खेत..न धान की
रोपाई करते लोग गीत गाते हैं...न ही मिट्टी
में वो सोंधी सी खुशबू है जो मेरे गाँव में
है।....आज फिर मन कह रहा है चलो कुछ दिन
रहते हैं गाँव में...घुमते हैं खेतों में..भीगते हैं
बारिश में...बन जाते हैं एक छोटा सा
बच्चा..बच्चों की टोलियों में...शहर के
बनावटीपन से दूर...चलो बिताते हैं कुछ
पल...अपने साथ....अपनों के साथ.....।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

झुलस रहा है देश

मेरे देश के नेताओं की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा के नाम पर किसी भी हद तक जाकर आतंक और आतंकवाद का समर्थन कर स्वयं को उदारवादी या अहिंसक कहना, मार्क्सवाद की कुछ घटिया और  बक़वास किताबें पढ़ कर ईश्वर को झूठ और देश को कुरुक्षेत्र समझने की परम्परा ने देश को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है।
धर्मनिरपेक्षता तो मेरे समझ में आज तक नहीं आयी। जिस देश ने विश्व को "वसुधैव कुटुम्बकम्" और "विश्व बंधुत्व" का पाठ पढ़ाया वहाँ सेक्युलर होने का अद्भुत चलन चल पड़ा है। ये नेताओं की भारतीय जनता के विभाजन की ओछी नीति के अतिरक्त कुछ नहीं,लोग धर्मो में बटेंगे तो नेताओं का धंधा चलता रहेगा।
वैसे आज- कल अपने धर्म की बुराई करना ट्रेंड में है और इस काम में हिंदुओं को महारत हासिल है। मीडिया में चमकते रहेंगे जब तक अपने धर्म की निंदा करेंगे। मार्कण्डेय काटजू को तो अक्सर आप पढ़ते ही होंगे, अक्सर अपनी भड़ास निकलते रहते हैं देश और धर्म के प्रति। गौमांस खाना सेक्युलर होना है, ये उन्ही का कथन है। पता नहीं कैसे जज बन गए थे महाशय, लगता है ठीक ढंग से उन्होंने विधि दर्शन नहीं पढ़ा है।
एक हैं शशि थरूर। अपने पत्नी को पाताल पहुँचाने के बाद याकूब की फाँसी को विधिक हत्या बता रहे हैं। एक हैं दिग्विजय सिंह; इन्हें भी याकूब की फाँसी असंवैधानिक लग रही है। इनके नज़र में सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाला दरिन्दा नेक इंसान और सरकार शैतान लगती है। भारत में धर्म कहीं भी पीछा नहीं छोड़ता,यहाँ भी याकूब के समर्थकों को लगता है उसे मुसलमान होने की सजा मिली है। इस देश में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया जाता है किन्तु कैसे इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देता। शाहरुख़, आमिर और सलमान ख़ान शायद हिन्दू नहीं हैं। हिंदुओं ने इन्हें सुपरस्टार बना दिया, भगवान् की फ़ोटो घरों में हो न हो इनकी जरूर मिल जायेगी।
हाँ! एक ग़लती हुई है, सबने अपने-अपने घरों में याक़ूब, क़साब, अफज़ल गुरु, हाफिज सईद और मुफ़्ती के फोटोज नहीं टाँगे ...इसलिए ये हिन्दू सेक्युलर नहीं हैं। जिन्होंने इन्हें आतंकवादी कहा वे सेक्युलर नहीं हैं। कट्टरवादी है।
अद्भुत प्रवित्ति के लोग रहते हैं मेरे देश में। इंसान होकर लोग नहीं सोचते, हिन्दू और मुसलमान होकर सोचते हैं। फिर एक दुसरे के लिए विषवमन करना अप्रत्याशित भी नहीं, स्वाभाविक है।
मैं सनातनधर्मी हूँ, आप कट्टर हिन्दू कह सकते हैं। मजारों पर झुकता नहीं, सूफी, मौलाना किसी के दर्शन को नहीं पढ़ा। कुरान पढ़ा है किन्तु महिलाओं पर इस्लाम की सोच से मतभेद है
पर मेरा एक बहुत क़रीबी दोस्त मुसलमान है। फोन पर बात मैं बेहद कम करता हूँ पर उससे मेरी घण्टों बात होती है। उससे बहुत सारी ऐसी बातें भी कहता हूँ जो मैं हर किसी से नहीं करता। पर इसमें मेरा धर्म कभी बीच में नहीं आया।
पूजा की अलग-अलग पद्धतियां जब दिलों को बाँटने लगें तो समझ लेना कि तुम्हारे अन्दर की इंसानियत ख़त्म हो रही है।
पर मैं तथाकथित सेक्युलर कहलाना नहीं पसंद करूँगा।
अज़ीब सी बात है न लोग जानवरों को इंसान और इंसानों को भेड़ बकरियां समझते हैं जब जी किया हलाल कर दिया। अभी पंजाब के गुरदासपुर में एक आतंकी हमला हुआ, जवान शहीद हुए, नागरिकों को जानें गईं और देश एक बार फिर रक्तरंजित हुआ। कुछ दिन बाद जब कोई आतंकी पकड़ा जायेगा तो मेरे देश के सेक्युलर और उदारवादी लोग उसे बचाने के लिए जान झोंक देंगे।
हमारे जान की कोई कीमत नहीं,कोई गद्दार आए और हमें गोलियों से छलनी कर दे फिर भी हमारे कुछ सेक्युलर मानवतावादी भारतीय उन आतंकियों  लिए धरने पर बैठ जाएंगे।
कश्मीर की घाटी रोज खून से सींची जाती है। हमारे जवान शहीद होते हैं, उनकी सुरक्षा के लिए जिन्होंने कभी खुद को भारत का हिस्सा ही नहीं माना। भारतीय सेना हर आपदा में कश्मीरियों के हिफाज़त के लिए खड़ी रही पर इन्होंने अक्सर सेना पर पत्थर बरसाए। पाकिस्तान खुद को पाल नहीं सकता पर कश्मीर से दूर रहने की हमें नसीहत देता है। मार्क्सवादियों ने कितना कचरा किया है देश का ये तो जगजाहिर है। मार्क्सवाद तो शुरू होता है सरकार के साथ मतभेद से लेकिन कब नक्सलवाद में बदलते हैं इनके तरीके पता नहीं चलता। पश्चिम बंगाल, बिहार,झारखण्ड,छत्तीस गढ़, असोम सब तो नक्सलवाद की आग में जल रहे हैं। वामपंथियों को सरकार से अकारण ही समस्या होती है। सरकार के अच्छे कामों पर भी वीभत्स भर्त्सना करते हैं। वास्तव में इन्हें लोकतंत्र की संप्रभुता से समस्या होती है। इन्ही की वजह से रोज जवान मर रहे हैं निर्दोष जनता मर रही है क्या इन अमानुषों को मृत्युदण्ड देना असंवैधानिक है? अमानवीय है?
मानवाधिकार तो मानवों के लिए हैं न पिशाचों को भी ये अधिकार देना समझ से परे है।
कभी-कभी लगता है देश विभाजित है अलग-अलग मुद्दों पर। संसद में राज्य सभा हो या लोक सभा दोनों बच्चों की पाठशाला लगते हैं। राज्यसभा में तो पिछले कुछ दिनों से ऐसी हरकतें हो रहीं हैं जिन्हें देखकर शर्म आती है कि ये हैं हमारे देश के नेता। निरर्थक बहस के लिए समय है पर सरकार के साथ सार्थक विषयों पर बहस से समस्याएं हैं। ये संसद का हाल है। वामपंथी होते ही सत्ता रूढ़ सरकार दुश्मन हो जाती है। फिर देश द्वितीयक हो जाता है और अराजकता प्राथमिक।
आज मन बहुत खिन्न है। ऐसा लग रहा है कि चारो तरफ आग लगी है और मेरा देश जल रहा है। धर्म,अराजकता,नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, आतंकवाद ने घेर लिया है देश को......इसकी लपट में आम आदमी झुलस गया...मरणासन्न है...नेताओं के पास हज़ार मुद्दे हैं पर काम का एक भी नहीं...राष्ट्रीयता जैसी कोई भावना नहीं दिख रही है....कोई हिन्दू है कोई मुसलमान है पर इन्सान दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं.....दिख रही हैं आग की लपटें जिनसे इंसानियत और वतनपरस्ती झुलस रही है....

सोमवार, 27 जुलाई 2015

लौट आओ लाल (माँ भारती पुकार रही है)


इतनी जल्दी नहीं जाना था सर आपको, सुरक्षित नहीं है आज भी भारत....आपकी जरुरत थी इस देश को...आपके अनुभव और मार्गदर्शन में भारत अभी और ऊँचाई छूता...नए कीर्तिमान स्थापित करता....आप चले गए तो डर लग रहा है..आपकी कमी हमेशा खलेगी क्योंकि राष्ट्र को जीवन समर्पित करने वाले लोग अब गिनती के बचे हैं....एक और सितारा कम हो गया...एक युग समाप्त हो गया....आपके छोटे-छोटे वक्तव्य हमारे बड़े-बड़े सपनों की नींव हैं..धर्म और जातियों में विभाजित भारतीय जनता को सबसे पहले आपने ही कहा कि इंसान बन जाओ पहले...बाद में हिन्दू या मुसलमान होना...एक सच्चे राष्ट्रभक्त नहीं रहे..एक और सितारा टूटा...एक और सपूत सो गया...एक महान व्यक्तित्त्व अब नहीं रहा....सर! आप देशभक्त हैं न? ईश्वर से कह कर एक बार फिर से आना भारत में...अपने इसी रूप में.....हम भारतीय हमेशा आपके आभारी रहेंगे...लौट आइये सर!
आपकी मिट्टी आपको बुला रही है...देश आपके पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में है...माँ भारती आपको बुला रही है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

देश रौशन रहे, हम रहें न रहें..

हम खड़े हैं यहाँ हाथ में जान
लिए
बुझ रहे हैं घरों में ख़ुशी के
दिए,
देश रौशन रहे हम रहे न
रहे
आखिरी साँस तक हम तो
लड़ने चले,
हम तो परवाने शमां  में जलने
चले।

हम को परवाह हो क्यों जान
की?
हम तो बाजी लगाते हैं प्राण
की,
मोहब्बत हमें अपने माटी से
 है,
है शपथ हमको अपने भगवान्
की।

हाथ में जान लेकर निकलते हैं
हम
मौत के देवता से उलझते हैं
हम,
राहों में हो खड़ी लाख
दुश्वारियां
अपने क़दमों से उनको कुचलते
हैं हम।

हर तरफ दुश्मनों की सजी
टोलियाँ
हर कदम पर लगे सीने में
गोलियाँ
मौत की सज़ रही सैकड़ों
डोलियाँ,
हम तो खेलेंगे अब खून की
होलियाँ।

है कसम माटी की हम मरेंगे
नहीं
चाहे तोपों की हम पर बौछार
हो
कतरा-कतरा बहेगा वतन के
लिए
आख़िरी साँस तक यही हुँकार
हो।

सीमा पर हर क़दम काट डालेंगे
हम
मौत अग़र पास हो उसको टालेंगे
हम,
साँस जब तक चलेगी  क़दम न
 रुकेंगे
यम के आग़ोश में प्राण पालेंगे
हम।

इश्क़ होगी मुकम्मल वतन से
तभी
जब तिरंगे में लिपटे से आएंगे
हम
देश रौशन रहे हम रहें न
रहें,
मरते दम तक यही गुनगुनाएंगे
हम।

( देश के उन प्रहरियों के नाम मेरी एक छोटी सी कविता... जिनकी वज़ह से देश की अखण्डता और सम्प्रभुता सुरक्षित है..जो अपने घर-परिवार से हज़ारों मील दूर बर्फ़ीले पहाड़ियों पर जहाँ मौत ताण्डव करती है दिन-रात खड़े रहते हैं, रेत के मैदानों में, आग उबलती गरमी में खुद जलते हैं पर अपनी तपन से हमें ठंढक देतें हैं....उनके लिए एक अधकचरी सी_टूटी-फूटी कविता...एक  अभिव्यक्ति 'जवानों के लिए' )

रविवार, 12 जुलाई 2015

आत्ममंथन



जब ज्ञान का दीपक बुझने लगे
जब तम की ऐसी आँधी हो,
जब विपद विपत् सा लगने लगे
मन ही मन का अपराधी हो,
तब बंद कपाटों को खोलो
और रश्मि धरा पर आने दो,
जो तिमिर उठे अंतर्मन में
उनका अस्तित्व मिटाने दो।

निशा घेर ले जिस मन को
उसे शान्ति कहाँ मिल पाती है?
दिशा हीन सा मन भटके
पर मुक्ति नहीं मिल पाती है;
सुख दुःख की रलमल सी झाँकी
नयनो के आगे आती है,
मृगतृष्णा में घोर वितृष्णा
मन को सहज लुभाती है।

स्वायत्य सखे! तुम अब जागो
मन से तम की चादर खींचो
जीवन प्रतीत हो मरुस्थल
तो मन को सागर से सींचो,
सोचो! तुमसे अनभिज्ञ है क्या
ये धरा, गगन या दूर क्षितिज
मानव जब सद्संकल्प करे
यह जग कैसे न रहे विजित ??

(हरिद्वार गया था कुछ दिन पहले_ऐसे दर्शन तो यहाँ राह चलने वाले दे देते हैं)

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

गुज़ारिश

बहुत कुछ कहना चाहूँ पर
कहा कुछ भी नहीं जाए,
रब से ये गुज़ारिश है हलक के
पार कुछ आए
यूँ गुमसुम सा रहूँ कब तक
बता दे तू मेरे मौला!
कहीं तेरे बेरुख़ी से दिल
बेचारा हार न जाए।।

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

विद्वता और अहंकार

कुछ व्यक्ति जन्मजात विद्वान होते हैं।विद्वान तो छोटा शब्द है कुछ व्यक्ति विद्वता की पराकाष्ठा होते हैं। कभी स्वघोषित तो कभी एक वर्ग विशेष द्वारा मान्यता प्राप्त। इन्हें अपनी साधना पर इतना अहंकार होता है कि जैसे ये विशेष हों और बाकी अवशेष हों।
इन विद्वानों के कुछ सिद्धान्त होते हैं और कुछ आदर्श सामान्यतः अपने ही वंश के किसी महापुरुष की बातों को सिद्धान्त मानते हैं और उन्हीं के सिद्धान्तों पर चलने की बात
करते हैं, किन्तु यथार्थ इससे बहुत भिन्न होता है। वास्तव में सिद्धान्त नितांत गोपनीय विषय है जिसे आचरण में उतरा जाता है न कि उनका ढिंढोरा पीटा जाता है। व्यक्ति के आचरण से उसके सिद्धान्त परिलक्षित होते हैं न कि उनका स्वांग भरने से।
हर व्यक्ति में वंश विषयक अहंकार होता है, अपने पूर्वजों के सद्कृत्यों पर गर्व होता है, अपने पिता पर अभिमान होता है। ऐसी भावनाएं बुरी नहीं हैं किन्तु जिन आदर्शों पर चलकर
पूर्वज महान कहलाये उन्हें अनुचित विधि से व्याख्यायित करना अपराध है।
जितने भी प्रसिद्ध और महान लोग हुए हैं उनके शिष्य उतने महान और प्रसिद्ध नहीं हो सके क्योंकि उन्होंने अपने गुरुदेव के उपदेश तो सुने पर उन आचरण करने की जगह उन वक्तव्यों के व्याख्याता बन गए। व्याख्याता बनते ही सृजनता समाप्त, उन्नति समाप्त। जो विषय आचरण के हों उन्हें व्याख्यायित और प्रचारित करने लगे तो स्वयं बृहस्पति भी यशहीन हो जाएँ फिर सामान्य मानव की बात ही क्या है।
जिसने कहा कि- "मेरा ये सिद्धान्त है" वास्तव में उसका कोई सिद्धान्त नहीं होता है।
सिद्धान्त वादियों की एक विशेषता होती है, ये परिपक्व और पूर्ण केवल स्वयं को मानते हैं। कोई अन्य इनकी भांति कार्य नहीं कर सकता। इनके निर्णय विधि सम्मत होते हैं और
अन्य गलतियों के पोटली होते हैं।ये जो करते हैं वही उचित होता है और दूसरे केवल गलत होते हैं।हों भी क्यों न, विद्वता और बुद्धिमत्ता के परिचायक तो केवल यही हैं।
इनके कुछ चिर-परिचित कथन होते हैं-
मेरा ये सिद्धान्त है। मुझसे ज्यादा जानते
हो?
तुम क्या जानो? मुझसे अधिक उनके बारे में
जानोगे?
तुम्हें पता क्या है? मुझसे ज्यादा पढ़े हो? मुझसे
ज्यादा अनुभव है?
इत्यादि-इत्यादि।
अजीब लगता है न? किस बात का दम्भ, किस
हेतु अहँकार? ज्ञान की कोई सीमा होती है
क्या?
कभी-कभी इनकी बातें सुनकर श्रोताओं को लगता है कि कानों में इन्ही के सामने रूई ठूंस ले पर क्या करें औपचारिकता और शिष्टाचार भी कोई चीज़ है। इन व्यक्तियों का एक कथन होता है-"मुझे झूठ से सख़्त नफरत है।" कुछ भी कर लो पर मुझसे झूठ मत बोलो झूठे लोगों से मुझे नफरत है। वास्तव में एक झूठ तो ये दुनिया भी है। पढ़ा
नहीं अपने क्या 'ब्रम्ह सत्यम् जगत् मिथ्या?'
इस हिसाब से तो समस्त संसार घृणा के योग्य है क्योंकि जिसे हम संसार कहते हैं वास्तव में तो वो है ही नहीं।
सब सपना है, एक पल में सब हमारे आँखों के
सामने होते हैं अगले ही पल सब ओझल...ये संसार भ्रम नहीं, झूठ नहीं तो और क्या है? क्या नफरत है आपको इस झूठे ज़ीवन से? सत्य बहुत सुन्दर होता है किन्तु कुछ सत्य हमें
जानना भी नहीं चाहिए। ऐसे सत्य तो अकारण ही सबसे वितृष्णा पैदा करते हैं। जीवन झूठ और सच का संगम है, यहाँ विरले ही हरिश्चंद्र मिलते हैं और जो मिल जाते हैं वो
स्वघोषित हरिश्चंद्र होते हैं यथार्थ में उन्हें भी झूठ से प्रेम होता है तभी तो वे इतने महान पद(हरिश्चंद्र) पर होते हैं।
एक और ख़ास बात होती है इनमें,गुस्सा इनकी नाक पर होता है। कब किस बात बार भड़क जाएँ परमात्मा भी नहीं जानते। इनका मिज़ाज़ बड़ा गजब का होता है। खुश हों तो
सिर पे बिठा लें और नाराज़ हों पताल में भी जगह न दें। तात्पर्य यह कि इनका स्वाभाव बड़ा अव्यवस्थित होता है। कोई भी इनका कोपभाजन बन सकता है। ऋषि दुर्वासा के ये
अनुयायी हैं इन्हें खुश रखना भी कठिन काम है। इनसे जितनी दूरी रहे उतना ही अच्छा है क्योंकि यथार्थ में इनके मापदण्डों पर ये स्वयं भी खरे नहीं उतरते। ये किसी को भी अपमानित कर सकते हैं कहीं भी, कभी भी। आपके किसी अपने ने कोई गलती की हो भले ही उसकी गलती में
किञ्चिद मात्र आपका योगदान न हो, आपका कोई मतलब भी उससे न हो फिर भी ये आपको उसकी गलती के लिए सुनाएंगे। आपके दुखती रग पर हथौड़ा जरूर चलाएंगे,भले ही उस आग में स्वयं भी जलें पर त्वरित रूप से तो आप मानसिक आघात के लिए तैयार तो नहीं होते। ऐसे व्यक्ति बुरे नहीं होते इनके अंदर भी बहुत अच्छा इंसान होता है।बुरी होती है इनकी मनोवृत्ति जो इनके सारे किये कराये पर पानी फेर देती है। स्वघोषित लोकपाल वाली भ्रामक स्थिति इन्हें औरों की नज़र मेंबुरा बना देती है।
हम प्रायः देखते हैं कि हमें सुखद अनुभव कम याद
रहते हैं और बुरे अनुभव ज्यादा। यह मानवीय प्रवित्ति है कि किसी का स्नेह,प्रेम भूल जाता है और क्रोध आजीवन याद रहता है क्योंकि अकारण क्रोध किसी को सहजता से
स्वीकार्य नहीं होता। सारी सुकीर्ति,सुयश मिट्टी में मिल जाती
है पल भर के अमर्यादित आचरण से।विद्वता श्रेष्ठतम् वरदान है प्रकृति का। सफलता आपके तपस्या का परिणाम है किन्तु ये दोनों निरर्थक हैं यदि आप व्यवहारिक नहीं हैं। थोड़ी समझ और थोड़ी मेहनत करके कोई भी सफल हो सकता है। कुछ किताबें कुछ सत्संग करके तथाकथित ज्ञानी भी बन सकता है जिसे जनता विद्वता का नाम दे देती है
किन्तु व्यवहारिकता की कोई पाठशाला नहीं होती। इसे सीखने के लिए विनम्र होना पड़ता है। शून्य से सीखना पड़ता है। आपका गुरु आपके घर से कूड़ा उठाने वाले से लेकर सड़क पर भीख़ मांगने वाला छोटा बच्चा भी हो सकता है।
इसे सीखा नहीं आत्मसात किया जाता है।स्मरण रहे लोग आपसे आपके सफल होने की वजह से नहीं जुड़ते, सब सफल होते हैं अपनी-अपनी भूमिका में। आपकी व्यवहारिकता और
विनम्रता के कारण लोग आपसे जुड़ते हैं। कहीं से भी आपके वास्तविक स्वरुप का उन्हें ज्ञान हो जाये तो आपसे दूर होते उन्हें समय नहीं लगेगा। मानव होना अपने आप में एक वरदान है। विधाता के इस वरदान का अपमान न करें।
मानवता क्रोध,अहँकार,वितृष्णा,घृणा जैसी
भावनाओं का नाम नहीं केवल प्रेम, विनम्रता
और व्यवहारिकता का नाम है। इनसे अलग व्यक्ति सब कुछ हो सकता है परइंसान नहीं। कुत्सित मनोवृत्ति आपको
 जानवर बना सकती हैं इंसान नहीं।निर्णय आपको करना है कि आपको मानवता से प्रेम है या पैशाचिकता से? आपके सामने दो विकल्प हैं यह तो आपकी मनोवृत्ति ही जाने कौन
सा मार्ग आपको अभीष्ठ है।नीति कहती है कि निम्न मनोवृत्ति व्यक्ति के उत्थान में अवरोध उत्पन्न करती है.....आपको
पतन से स्नेह तो नहीं?

सोमवार, 1 जून 2015

मंहगाई के अच्छे दिन


जैसे-जैसे आम आदमी की कमाई कम होती जा रही है मंहगाई उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। सरकार की नीतियों का सीधा प्रभाव तो समाज के निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग पर पड़ता है, तकलीफें तो इन्हें ही झेलनी होती हैं। एक तरफ कम आमदनी दूसरी तरफ मँहगे होते दैनिक दिनचर्या में शामिल सामान,एक आम आदमी किस तरह से घर चलाए? हर कदम पे टैक्स, हर उत्पाद पर मंहगाई से आमना- सामना तो आम आदमी का होता है,बड़े लोगों के जेब पे तो मंहगाई का कोई असर पड़ता ही नहीं।
हर आपदा सबसे पहले आम आदमी को चपेट में लेती है। आर्थिक सुधार  के नाम पर जिस तरह मोदी सरकार ने सर्विस टैक्स बढ़ाया है उसका सीधा असर तो आम जनता पर ही होना है, यही आम जनता जो सरकार बनाती है और सरकार इन्ही के लिए कब्रें खोदती है। आम आदमी जाए कहाँ? दैनिक उपयोग की वस्तुएं जब मंहगी होती है तो एक सामान्य व्यक्ति का किचन हिल जाता है। चायपत्ती से लेकर सरसों के तेल तक की मंहगाई और फिर एल.पी.जी का चक्कर कमाने वाले को दिन में तारे दिखने लगते हैं जब घर में समान की एक लम्बी लिस्ट बनती है। खाने-पीने के सामान में कोई कटौती भी करे तो भूखे मरे।
आम आदमी की ज़िन्दगी में बस एक किचन नहीं खर्चे और भी हैं। एक मध्यम वर्गीय परिवार में अब ईंधन से चलने वाले संसाधन आम हो गए हैं, जीवन का अपरिहार्य अंग बन गए हैं पर आज-कल की मंहगाई को देखकर लगता है कि ये अंग शीघ्र ही शिथिल होने वाले हैं। मोदी सरकार की नींव ही मंहगाई और भ्रष्टाचार विरोधी थी पर जाने क्यों न भ्रष्टाचार कम हुआ न मँहगाई। कांग्रेस के पतन में भी मँहगाई और भ्रष्टाचार दोनों का महत्वपूर्ण योगदान था। न जाने क्यों मोदी सरकार दोनों मुद्दों को गंभीरता से नहीं ले रही है?
पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दाम हर बार आम आदमी की कमर तोड़ते हैं, पर सरकार इन्हें मंहगा करती जा रही है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब भी कम ही हैं। कुछ प्रश्न जनता को कचोटते हैं। मोदी सरकार से जनता ने उम्मीदें कुछ ज्यादा पाल ली थीं तभी तो आज जनता व्यथित है। वादे आसमानों में किये जाते हैं और उन पर अमल धरती पर लेकिन सरकार के पावँ कहीं और ही जमे हुए हैं।
अच्छे दिनों की उम्मीद में मोदी सरकार बनी पर अच्छे दिन जाने कहाँ गुम हो गए हैं।
देश में एक बड़ी आबादी के सिर पर छत नहीं है। करोडों लोग बेघर हैं फुटपाथ पर सोते हैं। उनकी कोई पहचान नहीं है। कोई नहीं जनता उन्हें, कोई तीसरी दुनिया है उनकी। आज़ादी के बाद से आज तक सब कुछ बदल गया पर उनके हालात नहीं बदले। ये तब भी सड़क पर सोते थे और आज भी सड़क पर ही सोते हैं। जिस तरह की गरीबों को लेकर सरकार की नीतियाँ हैं कुछ बदलने वाला भी नहीं। क्या इनका बेघर होना ही अपराध है? क्या फूटपाथ पे मारना ही इनका भविष्य है?
भले ही इनके घरों में खाने के लाले पड़े हों पर मँहगाई की मार इन्हें भी झेलनी है। सबसे ज्यादा दलित-शोषित होने के बाद भी,खुले आसमान के नीचे सोने के बाद भी इन्हें सरकार कोई सब्सिडी नहीं देती,क्योंकि सरकार की नज़रों में ये तो हैं ही नहीं। जिनकी ज़िन्दगी सड़क से शुरू होती है उन्हें ख़त्म भी वहीँ होना होता है।
सरकार हर बार अमीरों की होती है। न मध्यम वर्ग, न निम्न वर्ग और न ही फुटपाथ वाले सरकार के निशाने पर होते हैं। वास्तव में सरकारें उद्दोगपतियों की होती हैं चाहे वो केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार।
कभी-कभी मन बहुत दुखी हो जाता है,जब सड़क पर सोए हुए लोग मिलते हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँच गए पर सर पे छत नहीं है। ये सरकारों की खोखली नीतियों का परिणाम है वर्ना सबके सिर पे छत होता। लोग सड़कों पर सोने के लिए बाध्य न होते।
बढ़ती मँहगाई को देखकर लग रहा है कि जिनके पास छत है भी उन्हें भी घर बेचना पड़ेगा क्योंकि अस्पताल से लेकर स्कूल तक की फीस बहुत मंहगी हो गयी है। दवाईयों के दाम आसमान पर,शिक्षा का दाम आसमान पर, गैस, पेट्रोल, डीज़ल सबके दाम आसमान पर,घरेलू सामानों के दाम आसमान पर, मेरे देश में सस्ता क्या है आम आदमी की जान? हाँ! लग तो यही रहा है।
किसान मर रहे हैं, ख़ुदकुशी कर रहे हैं, आम जनता त्रस्त है, गरीब दाने-दाने के लिए तरस रहा है,भ्रष्टाचार कदम-कदम पर काट खाने दौड़ रहा है, रेलवे का किराया आम आदमी की जेब खाली कर रहा है और सरकार सोच रही है अच्छे दिन आ गए।
अजीब हाल है देश का भी, यहाँ बातें बड़ी-बड़ी की जाती हैं और काम किये ही नहीं जाते। हर बार नए चेहरे मिलते हैं पर वे भी वर्षों पुरानी वंश परम्परा निभाते हैं।
भारतीय जनता वर्षों से प्रतीक्षारत है..अच्छे दिन कब आने वाले हैं?