शनिवार, 22 अप्रैल 2017

किसान की आह!

मैं किसान हूं। पेशाब पीना मेरे लिए खराब बात नहीं है। जहर पीने से बेहतर है पेशाब पीना। जहर पी लिया तो मेरे साथ मेरा पूरा परिवार मरेगा पर पेशाब पीने से केवल आपकी संवेदनाएं मरेंगी। मेरा परिवार शायद बच जाए।
कई बार लगता है आपकी संवेदनाएं मेरे लिए बहुत पहले ही मर गईं थीं लेकिन कई बार मुझे यह मेरा वहम भी लगता है। उत्तर प्रदेश के किसानों को बिना मांगे बहुत कुछ मिल गया लेकिन हम अपनी एक मांग के लिए अनशन किये, भूखे रहे, कपड़े उतारे और पेशाब तक गटक लिए लेकिन आप तक कोई खबर नहीं पहुंची।
यह भेद-भाव क्यों? क्या मेरी भाषा आपके समझ में नहीं आती या मैं आपके 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का हिस्सा नहीं हूं?
मैं तो कश्मीरियों की तरह पत्थरबाज भी नहीं हूं, नक्सलियों की तरह हिंसक भी नहीं हूं। मैं तो गांधी की तरह सत्याग्रही हूं । मेरी पुकार आप तक क्यों नहीं पहुंचती?
आप भारत के सम्राट हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक आपके साम्राज्य का विस्तार है।आपकी इजाजत के बिना भारत में पत्ता तक नहीं हिलता तो क्या आपने, अपने कानों और आंखों पर भी ऐसा दुर्जेय नियंत्रण कर लिया है?
मेरी चीखें आपके कानों के पर्दों तक क्यों नहीं पहुंचती? मैं चीखते-चीखते मर जाऊंगा और आपके सिपाही मेरी लाशों को कुचलते हुए आगे बढ़ जाएंगे लेकिन आप तक मेरे मरने की खबरें नहीं पहुंचेंगी।
आप तो वस्तविक दुनिया के सापेक्ष चलने वाली आभासी दुनिया के भी सम्राट हैं। पूरी आभासी दुनिया आपके और आपके प्रशंसकों से भरी पड़ी है। ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, ऑनलाइन वेब पोर्टल हर जगह तो आप ही आप छाए हुए हैं। क्या मेरी अर्ध नग्न तस्वीरें आपको नहीं मिलतीं? मेरे दर्द से आप सच में अनजान हैं?
शायद कभी गलती से आप ख़बरें भी देखते होंगे, अख़बार भी पढ़ते होंगे, क्या कहीं भी आप मेरी व्यथा नहीं पढ़ते?
हर साल मैं मरता हूं। जय जवान और जय किसान का नारा मुझे चुभता है। जवान कुछ कह दे तो उसका कोर्ट मार्शल हो जाता है और किसान कुछ कहने लायक नहीं रहा है। क्या हमारी बेबसी पर आपको तरस नहीं आती?
मैं हार गया हूं कर्ज से। मुझसे कर्ज नहीं भरा जाएगा। न बारिश होती है, न अनाज होता है। पेट भरना मेरे लिए मुश्किल है कर्ज कहां से भरूं?
सूदखोरों, व्यापारियों, दबंगों से जहां तक संभव हो पाता है मैं कर्ज लेता हूं, इस उम्मीद में कि इस बार फसल अच्छी होगी। न जाने क्यों प्रकृति मुझे हर बार ठेंगा दिखा देती है।
मैं किसान हूं हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर हूं। बारिश न हो तो बर्बादी, ज्यादा हो जाए तो बर्बादी। कभी-कभी लगता है कि मेरी समूची जाति खतरे में है। सब किसान मेरी ही तरह मर रहे हैं पर सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
कभी मुझे आत्महंता बनना पड़ता है तो कभी मुझे राज्य द्वारा स्थापित तंत्र मार देता है। राज्य मेरी मौत का अक्षम्य अपराधी है लेकिन दोष मुक्त है। शास्त्र भी कहते हैं राज्य सभी दंडों से मुक्त होता है। कुछ जगह लिखा भी गया है कि धर्म राज्य को दंडित कर सकता है लेकिन अब तो धर्म भी अधर्मी हो गया है। वह क्या किसी को दंड देगा।
ऐसी परिस्थिति में मेरी मौत थमने वाली नहीं है।
आत्महत्या न करूं तो अपने परिवारों को अपनी आँखों के सामने भूख से मरते देखूं। यह देखने का साहस नहीं है मुझमें।
मैं भी इसी राष्ट्र का नागरिक हूं। भारत निर्माण में मेरा भी उतना ही हाथ है जितना भगोड़े माल्या जैसे कर्जखोर लोगों का। वो आपको उल्लू बना कर भाग जाते हैं। आप उन्हें पकड़ने का नाटक भी करते हैं। दुनिया भर की ट्रिटीज का हवाला देते हैं पर उन्हें पकड़ नहीं पाते हैं। वे हजारों करोड़ों का कर्ज लेकर विदेश भाग जाते हैं। विदेश में गुलछर्रे उड़ाते हैं लेकिन मैं कर्ज नहीं चुका पाता तो मेरी नीलामी हो जाती है। घर, जमीन, जायदाद सब छीन लिया जाता है। मैं बिना मारे मर जाता हूं।
आप गाय को तो कटने से बचाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं लेकिन जब मुझे बचाने की बात आती है तब आपके दरवाजे बंद क्यों हो जाते हैं?
जितनी पवित्रता गाय में है उतनी मुझमें भी है। गाय को तो आप बचाने के लिए समिति पर समिति बनाये जा रहे हैं लेकिन मेरे लिए कुछ करने से आप घबराते क्यों हैं? मैं ही सच्चा गौरक्षक हूं। अगर मेरे पास कुछ खाने को रहेगा तभी न मैं गायों की रक्षा कर पाऊंगा। आप मुझे बचा लीजिए मैं गाय बचा लूंगा। मां की तरह ख्याल रखूँगा।
बस मेरा कर्ज माफ कर दीजिए। मुझे जी लेने दीजिए। असमय मर जाना, आत्महत्या कर लेना मेरी मजबूरी है शौक नहीं। मैं भी जीना चाहता हूं। आपके सपनों के भारत का हिस्सा बनना चाहता हूँ। आपके मिट्टी की सेवा करना चाहता हूं। मैं भी राष्ट्रवादी हूं। भारत को गौ धन, अन्न धन से संपन्न करना चाहता हूं लेकिन ये सब तभी संभव हो सकता है जब मैं जिन्दा रहूंगा।

क्या आप मुझे मरने से रोक लेंगे?

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

किसके हैं आडम्बरहीन अम्बेडकर


वर्तमान भारतीय राजनीति में राजनीतिक विचारकों पर एकाधिकार जमाने का दौर शरू हो गया है। हर दल विचारकों पर एकाधिकार चाहता है। पार्टियाँ किसी भी विचारक को अपनाने में संकोच नहीं कर रहीं हैं चाहे उक्त विचारक उनके पार्टी के संविधान का, अतीत में धुर विरोधी और आलोचक रहा हो।  
भीम राव अम्बेडकर भी इसी राजनीतिक मानसिकता का शिकार बन गए हैं। दलितों, शोषितों और वंचितों की राजनीती करने वाली पार्टियाँ, एक ओर बाबा साहेब पर एकाधिकार चाहती हैं तो वहीँ दूसरी ओर  विरोधी पार्टियाँ भी बाबा साहब को अपनाने के लिए जी-जान से आयोजनों पर पैसे खर्च कर रही हैं। यह वैचारिक सहिष्णुता का लक्षण नहीं अवसरवादिता का लक्षण है।
बीते 14 अप्रैल को लगभग सभी राजनीतिक दल अम्बेडकर को ओढ़ते-बिछाते नज़र आये। पूरा भारत अम्बेडकरमय था। काश उनके जीवन काल में, उनके विचारों को इतने बड़े स्तर पर स्वीकृति मिल गयी होती तो शायद असमानता और सामाजिक संघर्ष की लड़ाई अब तक नहीं लड़नी पड़ती। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महू जाकर, पूरी दुनिया को बता आये कि वे अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित नीतियों की वजह से प्रधानमंत्री बने हैं। इसमें कितनी सच्चाई है इसे उनकी पार्टी से बेहतर कोई नहीं जान  सकता है।  
अम्बेडकर की इस राजनीतिक स्वीकार्यता का मतलब है कि दलितों पर ध्यान देना हर राजनीतिक पार्टी की चुनावी मजबूरी है। दलितों और वंचितों की समस्याओं पर राजनीतिक रोटी सेंकनी है तो अम्बेडकर का सहारा लेना ही पड़ेगा।
हर विचारक के विचारों का, उसकी मृत्यु के बाद तमाशा बनता है लेकिन तब वह अपने कहे गए तथ्यों और कथ्यों का स्पष्टीकरण देने के लिए खुद मौजूद नहीं होता। उसके विचारों को चाहे तोड़ा जाये या गलत तरीके से अपने पक्ष में अधिनियमित कर लिया जाए वह कुछ नहीं कर सकता।
आज हर राजनीतिक पार्टी अम्बेडकर के विचारों को ताक पर रख  रही है लेकिन उनके तस्वीरों के सामने उन्हें पूजते हुए सोशल मीडिया पर अपने फोटोज डालना नहीं भूल रही है। यह राजनीती का ‘तस्वीर काल’ है।

‘एनाहिलेशन ऑफ कास्ट’ अम्बेडकर ने जातिवाद के विरोध में लिखा था, जिसमे उन्होंने कहा था कि, ‘जातिगत भेद-भाव केवल अंतरजाति य विवाह कर लेने भर से नहीं समाप्त हो जाएगा, इस भेद-भाव को मिटाने के लिए धर्म नामक संस्था से बाहर निकलना होगा।’
अम्बेडकर का यह कथन हर हिंदूवादी नेता जानता है लेकिन उनके इस कथन को समाज के निचले तबके तक पहुँचने नहीं देता है। शायद उन्हें इस बात का डर है कि जिस दिन ये तबका अम्बेडकर को जान गया उसी दिन से वो महज़, वोट बैंक का सॉफ्ट टारगेट होने तक सिमटा नहीं रहेगा।
अम्बेडकर की मूर्तियों और फोटोज पर माला चढ़ाने से ज्यादा जरूरी है   उनके विचारों को जनता तक पहुंचाना। जिस सामाजिक उपेक्षा और जाति संघर्ष के कड़वे घूँट को अम्बेडकर जीवन भर पीते रहे उन सबका समाज में मुखरित हो कर आना समाज की जरूरत है।
अम्बेडकर भारत में हमेशा प्रासंगिक रहेंगे क्योंकि जब भी कोई दलित-शोषित व्यक्ति जाति व्यवस्था के विरुद्ध में स्वर उठाएगा अम्बेडकर को उसे पढ़ना ही पड़ेगा।
अम्बेडकर, अंग्रेजों की गुलामी करने से बड़ी व्याधि हिन्दू जाति को मानते थे। भारतीय समस्याओं के मूल में उन्हें हिन्दू धर्म की जाति प्रथा नज़र आती थी जिसके लिए वे आजीवन लड़ते रहे।
हिन्दू धर्म में पैठ बना चुकी जाति प्रथा के विरुद्ध अम्बेडकर मुखर हो कर सामने आये थे। उन्होंने जाति के इस दलदल से बाहर निकलने के लिए अपने जीवन के अंतिम दिनों में जो रास्ता चुना वह उन्हें जाति  प्रथा का त्वरित निदान लगा।
यह कहना बेहद आसान है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसलिए प्रधानमंत्री हैं कि बाबा साहेब ने संविधान में पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा था। प्रधानमंत्री जिस राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिस संगठन का स्वयंसेवक बन कर एक लम्बा वक़्त बिताया है उस संगठन का अम्बेडकर के एनाहिलेशन ऑफ कास्ट पर लिखे आलेख पर क्या विचार है ?
अम्बेडकर, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मापदंडो पर बिलकुल भी खरे नहीं उतरते। जिस हिंदुत्व जनित अत्याचार और भेदभाव से मुक्ति पाने के लिए अम्बेडकर ने अपने समर्थकों के साथ धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म में दीक्षा ली वही हिदुत्व प्रधानमंत्री मोदी  के पार्टी का मुख्या एजेंडा है।
अम्बेडकर भारतीय जनता पार्टी को त्वरित लाभ पहुंचा सकते हैं लेकिन स्थायी नहीं। अम्बेडकर न कांग्रेस के खांचे में फिट बैठते हैं न बहुजन समाज पार्टी के, जिसका अम्बेडकर पर एकाधिकार समझा जाता रहा है। समाजवादी पार्टी लोहिया से कब की कट चुकी है वो भीम राव को क्यों याद करे?
भाजपा को सवर्णों की पार्टी कहा जाता है लेकिन हाल के चुनावों में भाजपा हिन्दू पार्टी बन कर उभरी है। न वह ओबीसी की पार्टी रह गयी है न ही सवर्णों की। उसके एजेंडे में अब दलित भी शामिल हैं जिन पर बसपा का एकाधिकार समझा जाता था।
लोकतंत्र में किसी पार्टी का व्यापक स्तर पर छाना ठीक नहीं, पर भजपा का सामना करने का साहस न सपा में है, न बसपा में है और न ही कांग्रेस में।
उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों में अगर बसपा, सपा और कांग्रेस का त्रिदलीय गठबंधन होता तब भी वो ओबीसी वोटरों को मोह नहीं पाते क्योंकि जातिय समीकरणों की जगह राष्ट्रावाद और हिंदुत्व हावी हो गया है।
अम्बेडकर को अपनाने में भाजपा की व्यावहारिक कठिनाई उसकी विचारधारा है। अम्बेडकर का हिंदुत्व से ३६ का आंकड़ा है। भाजपा यदि तुष्टिकरण की नीति अपनाती है तो वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगी जो संघ कभी होने नहीं देगा। अम्बेडकर भाजपा के राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए घातक है।
भाजपा अगर दलितों को भी हिंदुत्व के रंग में रंग दे और सामाजिक समरसता पर जोर दे तो वंचित तबकों के हक़ की राजनीति करने वाली पार्टियाँ अपना जनाधार खो देंगी। ऐसा होना मुश्किल है पर भेड़ तंत्र में कुछ भी हो सकता है। अगर भाजपा अम्बेडकर को अपना सकती है तो वह सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है।
२०१४ के मोदी मैजिक के बाद अगर कोई भाजपा के गौ रक्षा, घर वापसी और राष्ट्रवाद वाले एजेंडे से लड़ सकता है तो वह है अम्बेडकरवादी राजनीतिक दलों का समूह पर अम्बेडकरवाद केवल विश्वविद्यालयों तक सिमटा है जिनके पास छात्रों से इतर कोई जनाधार नहीं है। वामपंथी और समाजवादी अम्बेडकर के नाम की राजनीती तो करते हैं लेकिन इनके सिद्धांतों का अनुकरण कभी नहीं करते। शायद उनके भारत में हाशिये पर रहने का यही मुख्य कारण है।  
मार्क्सवादीयों के लिए चुनौती है पहले अपने पार्टी में अन्दर तक घुसे ब्राम्हणवाद से निपटना, हिंदुत्व तो बाद की चीज़ है। जनधार तो मार्क्सवादियों के पास न के बराबर है.
समाजवादी तो परिवारवाद की भेंट चढ़ चुके हैं। लोहिया,मार्क्स,एम एन रॉय तो कब के भारत में अप्रासंगिक हो चुके हैं। इनसे राजनीतिक पार्टियों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। अम्बेडकर को हथियाने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर-नहीं छोड़ी है। बस भाजपा इसी द्वंद्व में है कि कैसे जय श्री राम और मनुस्मृति के साथ अम्बेडकर का समन्वयन करे।
फिलहाल अभी तो अम्बेडकर और हिंदुत्व दो अलग अलग धार वाली तलवारें हैं जिन्हें भाजपा के लिए एक म्यान में रखना आसान नहीं है।
-अभिषेक शुक्ल 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

अंधी दौड़

इन दिनों रेस लगी है। ये रेस आम नहीं है। इसमें जीतने के लिए आपसे कहा जाएगा कि दौड़िए मग़र टूटे हुए पैरों के साथ।आपको भगाया जाएगा पर  पैर काट कर। आपको घिसटने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन हाथों में पड़े छाले ऐसा कुछ करने के लिए आपको इजाज़त नहीं देंगे।
कंपटीशन है बॅास लोग मारकर आपको ज़िन्दा रखना चाहते हैं।
लिखवाया आपसे जाएगा पर शब्द उनके रहेंगे।  बुलवाया आपसे जाएगा लेकिन वही जो उनके कान सुनना चाहें । चीखने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन साउंडप्रूफ़ कमरे में जहां आपकी आवाज़ शोर में तब्दील होकर आपके कानों के पर्दे फाड़ दे और आप कभी सुन ना पाएँ।
ये बाज़ार है। यहां आपकी मौलिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां आने के लिए या तो आप ख़ुद को बदल लें या कंपटीशन ही छोड़  दें।
आपकी बोली लगाई जाती है। मोल-भाव होता है। आप अगर दुधारू निकले तो बिकेंगे वरना बांझ बैल को कोई नहीं ख़रीदता। यहां ऐसी मशीनें लगाई गईं हैं जो बैल से भी दूध निकाल लेतीं हैं। बैल बनिये शायद क़ीमत लग जाए।
जिस लीक पर चलने की आदत आपकी है, जिसे आपने तलाशा और तराशा है, जिसकी वज़ह से आपकी पहचान है, उससे लगाव होना स्वाभाविक है। उस लीक से अलग हट कर चलना हर मज़हब के ख़ुदा की नज़रों में गुनाह है।
अपनी मौलिकता का दम घोंट कर कुछ हासिल करना ख़ुद को मारकर ज़िन्दगी तलाशने जैसा है। भूत बनकर जीना इंसानियत के लिहाज़ से  ठीक नहीं है।
किसी के डिमांड पर बदल जाना और ख़ुद को वैसा ही तैयार करना जैसा कोई चाहता है, अपनी जड़ों में तेज़ाब डालने जैसा है। जिस दिन इनका मक़सद पूरा हुआ मैंगोफ़्रूटी के बोतल की तरह निचोड़ कर फेंक देंगे ये लोग।
पिचका हुआ डिब्बा बनकर डस्टबिन में जाने से अच्छा है शीशे का बोतल बनकर चकनाचूर हो जाना। कोई पैरों से रौंदना भी चाहे तो चुभने के डर ऐसा न कर पाए।
अपनी मौलिकता के लिए शहीद हो जाना अच्छा है, टूट जाना बेहतर है लेकिन पहचान खो कर सुरक्षित रहना नहीं।
ख़ुद को संवारना है, निखारना है, चमकाना है लेकिन खोना नहीं है। बहुत प्यार है ख़ुद से। बदल गया तो बेवफ़ाई हो जाएगी अपने आपसे। ख़ुद से बेवफ़ाई करने की हिम्मत अभी नहीं है ।
कभी होगी भी नहीं।
इंसान होने का कुछ तो घाटा होना चाहिए, रोबोट तो हूँ नहीं जो प्रोग्रामिंग से चलूँगा...कुछ डीएनए में ही खोट है...
कानून पढ़ते-पढ़ते भारत के संविधान की तरह रिजिड हो गया हूँ, जीवन के कुछ अनुच्छेदों को लेकर। फ्लेक्सीबिलटी तो रूठ के चली ही गई है..सुप्रीम कोर्ट के आदेश को  दिल ने अप्रूवल दे दिया है, जिसके कारण i can't amend the basic structure of my life.
अब जैसा भी हूं, जितना भी हूं, ऐसा ही हूं...बदल गया तो शायद ख़ुद की नज़रों में गिर जाऊंगा जो मैं हरगिज़ नहीं चाहता।
- अभिषेक शुक्ल

शनिवार, 18 मार्च 2017

कुछ तो मेरा इलहाम रहे

दिन भर कोई काम करूं पर
शाम तुम्हारे नाम रहे
तुमको पल भर ना बिसराना एक
ही मेरा काम रहे,
क़ातिल शोख़ अदाओं से तुम
दुनिया भर की चाह बनो
आख़िर में मेरी हो जाना
कुछ तो मेरा इलहाम रहे।
- अभिषेक

मंगलवार, 7 मार्च 2017

क्या हुआ उम्र भर साए में खड़ा था ख़ुद के


                            वक़्त बीतेगा मगर मैं नहीं जाने वाला
                            अपने साए को अलग छोड़ भुलाने वाला,
                            लोग आते हैं मुझे छू के चले जाते हैं
                            है नहीं कोई मेरा साथ निभाने वाला,
                            क्या हुआ उम्र भर साए में खड़ा था ख़ुद के
                            मैं नहीं अपने किसी ग़म को जताने वाला,
                            वक़्त-दर-वक़्त ख़ुद से प्यार मेरा बढ़ता है
                            मैं न आंसू को कभी आंख में लाने वाला,
                            मैं तो भटका हूं मुझे राह दिखा दे साथी ।
                            आ मेरे साथ मुझे चलना सिखा दे साथी।।

                                                                                                                    -अभिषेक

शनिवार, 4 मार्च 2017

गाली क्यों देते हो ?

गाली सभ्य समाज की असभ्य सच्चाई है। सभी वाद वाले व्यक्ति इसे समान रूप से प्रयोग में लाते हैं।
 अखंड रामचरित मानस का जब पाठ होता है तो एक संपुट चुना जाता है। जिसे बार-बार पढ़ा जाता है। आधुनिक प्रगतिवादी और रूढ़िवादी प्रजाति के जीव गालियों को सम्पुट की तरह प्रयोग में लाते हैं। बहन और मां तो सॅाफ्ट टार्गेट हैं।
 आश्चर्य तब होता है जब खुद के लेखन और विचारधारा को प्रगतिशील बताने वाले लोगों के लेखों में भी गालियां भाषाई सौन्दर्य की तरह प्रयुक्त होती हैं। जिस रफ्तार से गालियां लिखी जा रही हैं, मुझे विश्वास हो रहा है कि किसी दिन कोई साहित्य का मठाधीश गाली को भी साहित्य की एक विधा घोषित करेगा।
 एक ग़लतफ़हमी थी मुझे कि साहित्यकार और पत्रकार सभ्य और शिष्ट भाषा में बात करते हैं और लिखते हैं। आभासी दुनिया ने मेरा ये भ्रम भी तोड़ दिया है।
 गाली पुरुषवादी मानसिकता के पोषक लोग ही नहीं देते हैं। कई नारीवादी लेखक,लेखिकाओं और विद्यार्थियों को भी गाली बकते सुना है। उनका भी सम्बोधन मां, बहन की गाली से ही होता है।
 एक मोहतरमा हैं जिन्हें मैं जानता हूं। दूर से हाय-हेल्लो होती है। इन दिनों कार्ल मार्क्स की उत्तराधिकारी ही समझती हैं वे ख़ुद को। उनसे बड़ा फेमिनिस्ट मैंने कहीं देखा नहीं है।( कुछ लड़के हैं जो उन्हें भी टक्कर देते हैं।)
एक दिन कैंटीन से बाहर निकलते वक़्त पैर में उनके कोई लकड़ी चुभ गई। लकड़ी की बहन को उन्होंने कई बार याद किया। बेचारी लकड़ी की मां-बहन सबको निमंत्रण दिया गया।
 ख़ैर बेचारी लकड़ी का क्या दोष। निर्जीव है वो भी शाखों से टूटी हुई ऐसे में कैसे अपनी बहन संभाले?
इनसे एक मासूम से लड़के ने पूछ लिया कि आप तो नारीवाद पर लेक्चर देते नहीं थकती हैं। लेकिन गाली मां-बहन से नीचे देती ही नहीं हैं आप। उन्होंने बेचारे लड़के को पहले तो लताड़ पिलाई फिर गाली को विमेन एम्पावरमेंट से जोड़ दिया।
 न तो मुझे ही गाली वाला एम्पावरमेंट समझ में आया न उस बेचारे लड़के को।
 मैं भी मेघदूत मंच पर बैठे-बैठे सब देख रहा था।
 तब वहीं बक्काइन के पेड़ के नीचे मुझे ये आत्मज्ञान मिला कि ये सब ढकोसले प्रगतिशील होने के अपरिहार्य अवयव हैं। आप महिला हैं और मां-बहन की गाली नहीं देती हैं तो क्या ख़ाक फैमनिस्ट हैं? चिल्लाइए, समाज को धोखा दीजिए। बात सशक्तीकरण की कीजिए पर शोषण का एक मौका हाथ से न जाने दीजिए।
 जिस दर्शन के अनुयायी होने का हम ढिंढोरा पीटते हैं दरअसल वो हमारे महत्वाकांक्षाओं को तुष्ट करने का साधन मात्र है।
 नारीवादी पुरुषों पर क्या कहूं? सब मोह माया है।
 उनका नारीवादी होना हमेशा संशय में रखता है मुझे। कब ये लोग किसे शिकार बना जाएं कहा नहीं जा सकता।
 बेड और विमेन एम्पावरमेंट को एक ही तराजू में तौलते मिलते हैं ये लोग। लड़की बस लड़की होनी चाहिए चाहे साठ साल की हो या नौ साल की। समदर्शी होने के कारण सबको एक ही नज़र से देखने की आदत होती है इनकी। इनका भी एम्पावरमेंट कमर से शुरू होता है कमरे तक जाता है। फिर रास्ता बदल लेते हैं। लड़की पूछती रह जाती है मुझे भूल गए? इनका जवाब होता है -
कौन? तुम्हें पहचाना नहीं।
 एक बड़े पत्रकार हैं। आम आदमी या पत्रकारिता के सामान्य विद्यार्थी के लिए तो इतने बड़े कि कई सीढ़ी लगा कर उन तक पहुंचना पड़े। नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण के नाम पर दर्जनों वीडियो यू ट्यूब पर मिल जाएंगी आपको। बड़े से बड़े अख़बार, हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के चाहते हैं कि सर कुछ लिख दें हमारे अख़बार में।
 बीते दिनों उनसे मिला। मेरे साथ मेरे एक सहपाठी भी थे।ज़्यादातर वक़्त उन्होंने ही बात किया। ख़ूब बातें हुईं। जिस तरह की बातें वे कर रहे थे उस तरह की बातों में मेरी अभिरुचि कम है। इसका कारण मेरा रूढ़िवादी होना भी हो सकता है या इसे इस तरह भी आप समझिए कि मेरे पारिवारिक संस्कार मुझे ऐसी बातों को अच्छा नहीं मानने देते।
 उनकी नज़र में भी महिलाएं केवल मनोरंजन मात्र हैं। पत्नी है पर बहुत सारे एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी हैं। काम दिलाने के बहाने भी बहुत कुछ काम करते हैं। बॅालिवुड की भाषा में जिसे कास्टिंग काउच कहते हैं। इनकी भी ख़ास बात ये है कि गाली को संपुट की तरह ज़ुबान पर रखते हैं।
 ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जिन पर नारीवादी होने का ठप्पा लगा है पर सबसे ज्यादा शोषण के मामले भी इन्हें के खिलाफ मिलते हैं। ये लोग गाली और सेक्स को विमेन एम्पावरमेंट मानते हैं।
 दो दशक हो गए लेकिन अब तक एम्पावरमेंट का ये फार्मूला समझ में नहीं आया। सच में ऐसे लोग समाज पर धब्बा होते हैं।
 भारतीय जनसंचार संस्थान में आकर बहुत सारे नए तथ्यों से पाला पड़ा है। कई सारे खांचे होते हैं इस दुनिया में। जो जिस ख़ांचे को सपोर्ट करता मिले समझ लीजिए तगड़ा डिप्लोमेट है। मुखौटा लगा रखा है सबने। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। रंगा सियार की तरह।
 कोशिश कीजिए किसी वाद के चक्कर में न पड़ें।
 अगर पड़ गए हैं तो पहले थोड़े रुढ़िवादी संस्कार जरूर सीख लें। आपको इंसान बनाए रखने में बहुत काम आएंगे। कई बार लोग कहीं से पढ़-सीख कर आएं हों फिर भी ओछी हरकतें करने से नहीं चूकते क्योंकि उनकी प्रवित्ति ही निशाचरों वाली होती है। ऐसे में उनसे केवल सहानुभूति ही रखी जा सकती है। कोई ऐसा सॅाफ्टवेयर बना नहीं जो इन्हें इंसान बना दे।
 गाली कोई भी देता हुआ अच्छा नहीं लगता। महिला हो, पुरुष हो या किन्नर हो।
 कुछ चीज़ें कानों में चुभती हैं। गाली भी उनमें से एक है। किसी की मां-बहन तक जाने से पहले सोच लिया करें कि उन्होंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा है। जिसने बिगाड़ा है उससे सीधे भिड़िए आपको अधिक संतुष्टि मिलेगी।
 गाली को तकिया कलाम न बनाएं, इससे भी अच्छे शब्द हैं जिन्हें प्रयोग में लाया जा सकता है। कोई कितना भी विद्वान क्यों न हो जब गाली देता है तो असलियत सामने आ जाती है। लग जाता है कि पढ़ाई ने केवल दिमाग की मेमोरी फुल की है, व्यवहारिकता के लिए खाली जगह को डीलीट कर के। भाषा अधिक महत्वपूर्ण है विषय से। पहले इसे सीखा जाए फिर विषय पढ़ा जाए। नि:सन्देह अच्छे परिणाम सामने आएंगे। व्यक्ति के अच्छा वक्ता होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं।
 जानते हैं! गाली मानसिक रूप से पंगु और कुंठाग्रस्त लोग देते हैं। आप नहीं न पीड़ित हैं इस रोग से ?

( चित्र का पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है, प्रथम दृश्य में जहां ये महाशय खड़े हैं वहीं मैं बैठा था।)
- अभिषेक



शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

किस ओर जा रहा है भारत में राष्ट्रवाद?

यदि आप स्वयं को भारतीय संस्कृति के रक्षक मानते हैं या आपको अपने घनघोर राष्ट्रवादी होने का अभिमान है अथवा आप भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय सदस्य हैं तो आपसे एक अनुरोध है कि आप फिर से उन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों का अध्ययन करें जिन्हें आपने बचपन में पढ़ा,सोचा या समझा है।
याद कीजिए जब आप घर से स्कूल के लिए निकलते थे तो स्कूल में आपको क्या-क्या सिखाया जाता था। कैसे प्रार्थना में आपको ये समझाया जाता था कि इस संसार में सब पूजनीय हैं, धरती माँ से लेकर पशु-पक्षी तक। किस तरह से आपको समझाया जाता था कि समाज समता मूलक है। दुनिया एक परिवार की भांति है जिसमें सबको परस्पर प्रेम और सहअस्तित्व की भावना को स्वीकार कर साथ-साथ रहना चाहिए।
कैसे समझाया जाता था कि दुनिया एक दर्पण की तरह है जैसा आपका आचरण होगा वैसा ही आपके साथ व्यवहार होगा।
 व्यवहार और आचरण की शुद्धता पर तो नैतिक शिक्षा की कक्षा ही लगाई जाती थी, जिसमें सिखाया जाता था कि शत्रु से भी मित्रवत् आचरण करो। शत्रुता अंततः प्रबल प्रेम के आगे हार जाती है। हर धर्म और विचारधारा का सम्मान करो। अपनी विचारधारा किसी पर थोपो मत। विचारधाराओं की लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई न बनाओ।
मृदुभाषिता, अहिंसा और भाषा की सौम्यता पर तो दर्जनों श्लोक पढ़ाए और समझाए जाते थे।उन सारे  श्लोकों से,शिक्षाओं से आपके व्यवहार का विपथन आपको नितांत अतार्किक और अप्रासंगिक ही बनाएगा। इनमें से तो कोई एक लक्षण आपमें नहीं दिख रहा है।
समझ में नहीं आता कि ये सारी व्यवहारिकता आप लोगों के आचरण से रूठ कर कहां चली गई है। क्या गोस्वामी जी की चौपाई को सही मान लें कि 'जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकि मति पहिले हर लीन्हा'? बीते कुछ दिनों से तो यही लग रहा है।
ग़ज़ब पागलपन सवार है कुछ लोगों पर।
किसी भी संगठन का विनाश उसके आलोचक या प्रतिद्वंद्वी नहीं करते हैं। वे चाहते हैं कि वो संगठन फले-फूले तभी तो दमदार प्रतिद्वंद्वी मिलेगा आलोचना करने को,  हराने को। लड़ाई तो बराबरी वालों से ही अच्छी होती है न?
लेकिन यहां तो संगठन के अंध समर्थक ही संगठन को मिटाने के लिए पर्याप्त  हैं।
इस विनाश के मूल छिपा  है कार्यकर्ताओं का व्यवहार। व्यक्ति का  व्यवहार सामान्यतः उसके पारिवारिक संस्कारों पर निर्भर करता है, कई बार आस-पास का माहौल और सामाजिक दशा पर भी, किन्तु यह ध्रुव सत्य नहीं है। व्यक्ति के अच्छे या बुरे व्यवहार के अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे संगति,स्वभाव, रुचि इत्यादि।
यही अंधसमर्थक कार्यकर्ता संगठन की फजीहत कराते हैं। इनका पढ़ा-लिखा होना भी किसी काम का नहीं होता क्योंकि ये अपने विवेक का इस्तेमाल शायद ही कभी करते हैं। इसे मार दो, इसे पीट दो, ये फालतू बोल रहा है, ये ऐसे कैसे बोल सकता है। चलो साथियों आज इनपे बजा देते हैं, हाथ-पैर तोड़ देते हैं बहुत अकड़ आ रही इसमें...इस चक्कर में सारा संगठन हाशिये पर चला जाता है।
सामान्यतः भारत में जन्म लेने वाला हर दर्शन इसी उन्माद की भेंट चढ़ता है। अंधअनुयायियों की एक फौज पूरी विचारधारा को ले डूबती है। इनकी ख़ास बात होती है कि ये लोग न तो उस दर्शन को पढ़ते हैं न ही समझने भर की बुद्धि होती है। इन्हें केवल ठोकने-पीटने से मतलब होता है। संगठन की सदस्यता ये उस दर्शन से प्रेम की वज़ह से नहीं लेते बल्कि भौकाल बढ़ाने के लिए लेते हैं।
हर संगठन और विचारधारा को ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए। मूढ, कुसंस्कारी और क्रोधी व्यक्ति कभी भी विश्वसनीय नहीं होता और किसी संस्था के लायक नहीं होता। इनसे किसी संस्था का रत्ती भर भी फायदा नहीं हो सकता। हां! इनसे होने वाले नुकसान पर तो महापुराण लिखा जा सकता है।
भारत की सांस्कृतिक विरासत पर यदि आपको अभिमान है, भारतीय मूल्यों पर आपको गर्व है तो ठीक है। होना चाहिए, मुझे भी गर्व है। लेकिन मेरा गर्व अहंकार की परिधि में नहीं आता है।
लाठी- डंडों से आप सबको नैतिकता नहीं सिखा सकते। यह कृत्य स्वयं ही अनैतिक है। भारतीय दर्शन हिंसा की बात तो नहीं करता। शांति, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द और सहअस्तित्व की भावना, भारत के मूल दर्शन का हिस्सा है। सोचिए कितने कटे हैं आप इससे। कितने भटके हुए हैं आप भारतीयता से। किस ओर ले जा रहे हैं आप समाज को?
असहिष्णुता, हिंसा और धार्मिक भेदभाव की ओर?
ये आपकी राष्ट्रभक्ति है? एक हाथ में शराब, दूसरे हाथ में डंडा और मुंह में मां-बहन की गाली। उसी बीच में भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा।
किस तरह के भारत का आप प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?
मेरी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा एक संघ समर्थित विद्यालय में हुई है। पहली क्लास लगने से पहले वंदे मातरम्, जन-गण-मन और सरस्वती वंदना होती थी। इंटरवल में लंच से पहले अन्नपूर्णा प्रार्थना होती थी और शाम को छु्ट्टी से पहले राम और वंदे मातरम् का उद्घोष होता था। लेकिन इन सबके बावजूद भी किसी धर्म के प्रति दुराग्रह का पाठ नहीं पढ़ाया जाता था। सब बच्चे साथ रहते थे, खेलते थे,पढ़ते थे। देश प्रेम समझाया जाता था।
मैं संघ पोषित स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को भी जानता हूँ। भारतीय दर्शन और व्यवहार पर जब ये छात्र बोलते थे तो मंत्रमुग्ध हो सुनने का मन करता था। वे सारे छात्र कहीं न कहीं स्थापित हो गए हैं। कोई पढ़ रहा है तो कोई पढ़ा रहा है। कोई प्रशासनिक सेवा में है, कोई सेना में है  तो कोई इंजीनियर है। कोई वकील है तो कोई डॅाक्टर है। सब कामयाब हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में नाम कर रहे हैं।
ये सारे वे लोग हैं जिन्होंने इन संस्थानों में पढ़ाई की है। संस्कारों को जिया है, सीखा है। ये लोग उन्मादी नहीं हैं।
अगर ये लोग उपर्युक्त संस्थानों में आ जाएं तो कितना अच्छा हो।
सावरकर को तो इन्होंने पढ़ा है, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को तो इन्होंने पढ़ा है। भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रवक्ता तो ऐसे लोग हैं फिर ये लोग संगठनों में क्यों नहीं हैं? और वो लोग जो कार्यकर्ता कम गुंडे ज़्यादा हैं कहां से आए हैं? क्या सच में ऐसे संस्थाओं के सदस्यता के लिए अधिनियमित आहर्ता में नया संशोधन किया गया है? अब ऐसे ही लोग सदस्य बन सकेंगे जिनमें उत्पात मचाने का हुनर होगा?
विरोधी विचारधारा को सुने बिना तलवारें तान लेना कहां तक सही है। ये कहां का भारतीय दर्शन है?
लोकतंत्र में विचारधाराओं के सहअस्तित्व की स्वीकार्यता तो होनी चाहिए न?
सुनते क्यों नहीं? आपके पास भी अवसर आएगा असहमति का। अपने तर्कों से उन्हें अतार्किक सिद्ध करें। यह आपका संवैधानिक अधिकार है।लेकिन उनके विनाश के लिए हवन करना न शुरू कीजिए। आप जनमेजय की तरह निस्पाप नहीं हैं।
 अगर सब आपके ही विचारधारा का अनुसरण करने लगे तो भारत नीरस हो जाएगा। आपका  संगठन ही कई धुरियों में बंट जाएगा। कुछ अच्छे लोग ये उत्पात सहन नहीं करेंगे। अगर वे सब आपके संगठन से निकल गए तो फिर किसी भी दिन आप पर पूर्णकालिक बैन लगाया जा सकता है। जनता सब जानती है। किसी को भी एक हद से ज्यादा अवसर नहीं देती।
और हां! एक भारत और श्रेष्ठ भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब आपका व्यवहार और आचरण संयमित हो। आप भारतीय मूल्यों को जानते हों, आप तार्किक होने के साथ-साथ बुद्धिमान और विनम्र भी हों , जिससे लोग आपको सुन सकें और आप लोगों को सुन सकें।
 लेकिन आपका अपने पथ से भटकाव देखकर नहीं लगता कि आपकी कोई ऐसी मंशा है। आप ही बताइये! कहां ले जाना चाहते हैं भारत को? भारत को छोड़िए आपकी वज़ह से भारत को कुछ नहीं होगा। बहुत लोग आए भारत को तहस-नहस करने  सब पता नहीं कहां चले गए।
आप अपने ही संगठन को कहां ले जा रहे हैं? क्या कोई भी बुद्धिजीवी आपके इन ओछी हरकतों को सहन करेगा?
यदि आप सच में चाहते हैं कि आपका संगठन आगे बढ़े, तो आपको दो काम जरुर करना चाहिए-
पहला- आप अपने संगठन से इस्तीफा दे दें। कुछ दिन आराम करें और फिर से संस्कार और अनुशासन सीख कर आएं। आत्मावलोकन करें, आपको आभास हो जाएगा कि आपको सिखाया क्या गया था पर आप कर क्या रहे हैं। अगर पता होने के बाद भी आपको ग्लानि नहीं हो रही है तो आप इन संस्थाओं के लायक नहीं हैं। पुनः सदस्यता लेने की सोचें भी मत।
कुछ और काम कर लीजिए। संगठन आपसे बरबाद ही होगा बनेगा नहीं।
दूसरा ये कि सुनना शुरू कर दीजिए। अगर आलोचना नहीं सुनेंगे तो सुधार नहीं आएगा। सुधार नहीं आएगा तो बिगड़े लोगों को समाज मुख्य धारा में कभी गिनता नहीं है। सुधार अपरिहार्य है। अपने प्रासंगिकता के लिए आपको सुधरना होगा।
ख़ैर, जो भी करना हो कीजिए लेकिन इतना उन्माद और अहंकार न पालें। कुछ भी यथावत नहीं रहता।
जानते हैं न अहंकार ईश्वर का भोजन है। भगवान ने कहा है तो सही ही होगा। न लगे तो ऐसे ही बने रहिए, आभास भी हो जाएगा। फिर खोजते रहिएगा भारत के भूगोल पर स्वयं को।
आपसे सहानुभूति है इसलिए इतना लंबा पुराण लिखा। अपने समय को आपके लिए खर्च किया वो भी नि:शुल्क। आगे सब आप की इच्छा।
जय हिंद! वंदे मातरम्।
-अभिषेक शुक्ल।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

यहां जब भी हवा चलती

यहां जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैं
कभी जब सोचता तुमको
तो रातें कम सी होती हैं,
अज़ब है ग़म का भी आलम
न मैं कुछ कह के कह पाऊँ,
बिना तेरे मेरी सांसें
बड़ी बेदम सी होती हैं।।
फोटो - पीयूष कौशिक
(पुराने पन्नों से😊)

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।

जो तुम्हारे प्यार में हर पल नया संगीत ढूंढे
चल सके हर पल परस्पर साथ वो मनमीत ढूंढे,
रोज तन्हाई में खुद के संग तेरा नाम जोड़े
बावरा मन हर जगह खोया सा तेरा प्रीत ढूंढे।
काश! काली रात सा मैं भी किसी पल बीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।।
-अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

पुष्प के अभिलाषा का अंत




पुष्पों के मन की अभिलाषा
 नहीं थी कभी मनुज को ज्ञेय,
मौन विषयक मृदु भावों पर
 बुद्धि ने लिया नहीं कुछ श्रेय।
 पुष्प की नियति मृत्यु की भेंट
 मनुज उसे तोड़ बहाएगा,
है तो करकट ही राहों का
 पंकों को क्यों अपनाएगा।
 पुष्प का रूप उसका दुर्भाग्य
 तोड़ कर मानव देता फेंक,
स्वार्थ फिर उसी स्वार्थ का त्याग
 मनुज के अपराधों में एक।।
-अभिषेक शुक्ल

रविवार, 22 जनवरी 2017

शब्द कम पड़ रहे



शब्द कम पड़ रहे मैं सृजन क्या करुं
कोई समिधा नहीं फिर यजन क्या करुं,
ईश रूठा है मुझसे बिना बात ही
मैं भी रोते नयन से भजन क्या करूं?

सोमवार, 2 जनवरी 2017

हमसफ़र में सफ़र

पहली तारीख की रात ट्रेन में कटी। एक टाइम का अघोषित उपवास रखना पड़ा। ट्रेन सात घंटे लेट है,
तो लग रहा है कि दिन में भी उपवास रखना पड़ेगा।
गोरखपुर से आज-कल एक ट्रेन चल रही है, हमसफ़र एक्सप्रेस।

ट्रेन के सारे डिब्बे वातानुकूलित हैं। देखने में भी यह किसी वर्ल्ड क्लास ट्रेन की तरह लगती है।
मेरे दोस्त अतहर ने नई-नई ट्रैवल एजेंसी खोली है।
उसी ने कहा कि भाई! हमसफ़र से जाओ। बेहतरीन ट्रेन है। आठ बजे तक दिल्ली रहोगे।
मैं भी खुश हो गया कि क्लास छूटेगी नहीं।
मेरी तरह जनरल डिब्बे में यात्रा करने वाले व्यक्ति का इस ट्रेन को स्वर्ग कहना भी कम है, इसे बैकुंठ धाम भी कहा जा सकता है
लेकिन इस ट्रेन ने मुझे नए साल की पहली रात को भूखा सुलाया। ट्रेन में चाय , पानी और अंडे वाले केक के अलावा कुछ भी खाने -पीने के लिए नहीं था।
मेरे जैसे शाकाहारी इंसान के लिए पानी पीकर सोने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था।
भूखा होना आम दिनों से ज़्यादा तब अखरता है जब आप घर से आ रहे हों। दिन में चार टाइम गले तक ठूंस के खाने के बाद जब एक टाइम के लिए पेट को आराम मिलता है तब वह आराम किसी वेदना से कम नहीं होता। रात में मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे।
गोरखपुर में खाना इसलिए नहीं खाया कि ट्रेन में खाना मिलेगा। ट्रेन ने उपवास करा दिया।
किसी-किसी को जनरल डिब्बा सूट करता है, वहां खाने-पीने का कार्यक्रम रात भर चलता है।
वहां धड़कनें बन्द हो सकती हैं लेकिन मुंह नहीं।
चाय-चाय की मधुर ध्वनि से नींद तोड़ने वाले इस डिब्बे के आस-पास नहीं फटक रहे।
हमसफ़र में, मैं सच में 'सफ़र' कर रहा हूँ ।

मुझे याद नहीं कि पिछली बार मैं कब रिजर्वेशन करवा के घर गया था। लोकल डिब्बे की खचाखच भीड़ से मुझे कोई ख़ास समस्या नहीं होती है।शौचालय के बगल में बैठ कर इत्र जैसी ख़ुशबू का नियमित महकना मुझे चमत्कृत नहीं करता।
लोगों के द्वारा छोड़े गए कुछ विशिष्ट अपशिष्ट पदार्थों के बीच प्राकृतिक पीड़ा से उबरना भी असाध्य नहीं लगता। लोकल डिब्बा से मुझे विशेष प्रेम है। वहीं बैठकर अपने देहाती होने का एहसास होता है।
कहते हैं न कि हर चीज़ हर किसी के लिए नहीं होती। मेरे लिए 'जो मिले वही ट्रेन पकड़ लो' वाला सिद्धांत ठीक है।
सात घंटे लेट ट्रेन में जनरल डिब्बे की चें-पों मिस कर रहा हूँ।
दुआ कीजिए ये ट्रेन और लेट न हो....बैलगाड़ी से रेलगाड़ी जैसी चाल पकड़े तो बात बने 😓।