गुरुवार, 23 जुलाई 2020

समय धरावै तीन नाम- परशु, परशुवा परशुराम

गांव में पहली बार दो तल्ले का घर तैयार हुआ. झोपड़ियों वाले गांव में पहली बार ईंट-गारा का पक्का मकान देखकर लोग हैरान रह गए. जब घर बन रहा था तब सुबह-शाम लोग यह देखने आते कि कैसे घर तैयार किया जाता है. जब घर बन गया तो ढींगुर दो तल्ले पर बड़का रेडियो पर गाना गवाते. जो घर देखने आता कहता कि ढींगुर की क्या गाढ़ी कमाई है.

यह घर ढींगुर का ही था. ढींगुर कोई ज़मींदार नहीं थे. न ही कोई बड़े काश्तकार. जो थे, उसके लिए हद दर्जे का दुर्दांत होना पड़ता है. दुर्दांत ही, जिसे दूसरों का ख़ून नोचने में मज़ा आए.

यह वही दौर था जब ढींगुर का परचम पूरे जवार में लहराता था. बिरादरी तो बिरादरी, दूसरे लोगों के भी कंकाल कांपते थे उन्हें देखकर. गांव में किसी की क्या मजाल जो उनके सामने तन के खड़ा हो जाए. तूती ऐसी बोलती थी कि जिस ज़मीन पर पांव रख दें, उन्हीं की हो जाती.

जवार की पूरी बंजर ज़मीन उन्हीं के नाम. जो छुटभैये मर्द बनते थे, ढींगुर की लाठी के सामने पस्त हो जाते थे. जो सज्जन थे, वे सरेंडर कर चुके थे. सारे गिरहकट्टों के सरदार थे ढींगुर. गांव के सारे धन्ना सेठ भी उनके सामने हार बैठे थे. किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि ढींगुर को मनमानी रोकने की हिम्मत करे. हिम्मत भी करे तो कोई कैसे, किसे सालभर भूखे मरना है.

भूखा ही मरने का तो डर था. थोड़े ही कोई आज वाला ज़माना था नहीं कि परदेस जाकर चार पैसे का जुगाड़ हो जाए. मनरेगा भी नहीं था कि गड़हा पाटकर चार पैसे मिल जाएं. तब पैसा मतलब खेती था. तो सबका धन, सिवान में गड़ा होता था, जिसकी रखवाली राम भरोसे होती थी.

किसान और व्यापारी में यही तो अंतर होता है कि एक अपना धन सात तिजोरी में बंद करके रखता है तो दूसरा खुले आसमान के तले. उसे आसमान से बरसती आफत से भी डर होता है और ज़मीन के गिद्धों से भी.

इसी खुलेपन का तो फ़ाएदा उठाते थे ढींगुर. दिन में जो भी ढींगुर से अकड़ता, रात में उसका खेत सफाचट. ढींगुर अपने गुर्गों को लेकर खेत पर पहुंचते और रातो-रात फसल काट ले जाते. दिन में बेचारा किसान खेत पहुंचकर माथ पीटता. थाना-पुलिस का आलम ये कि कोई किसी की बात न सुने. पुलिस का आज ही वाला चेहरा कल भी तो था.
जो आदमी किसी तरह से दो वक़्त के खाने का जुगाड़ कर पाता हो, उससे क्या ही पुलिस उगाही कर पाती. जब पैसा नहीं तो सुनवाई क्या?

और ढींगुर, लूट का माल बराबर बांटने में भरोसा रखते थे. जितना ख़ुद खाते, उतना ही दूसरों को खिलाते. लूट के माल का एक हिस्सा साल-छह महीने में थाने पर पहुंच जाता. फिर गांव की सुधि कौन ले.

लूट, डकैती, चोरी, छिनैती, जुआ-गुच्ची, कौन सी ऐसी कुलत्ति थी जो ढींगुर किए नहीं. अत्याचारी इंसान सिर्फ दूसरों के लिए ही नहीं होता. अपने घर पर भी वह अत्याचारी रहता है. गांव के मज़लूमों पर जैसा अत्याचार, वैसा ही अपने घरवाली पर. दारू पीने के बाद तो आलम यह रहता था कि पत्नी को ढोल बना देते थे.

हर तीसरे दिन ढींगुर बहू, कराहती ही मिलतीं. ढींगुर के चार बच्चे हुए. 4 बेटियां भी. बेटियां बियाह के बाद घर चली गईं. बेटे धीरे-धीरे बाप के रास्ते पर चले. कहते हैं जो जितना तपता है, ढलता भी उसी रफ़्तार से है. धीरे-धीरे ज़माना बदला. ढींगुर को दमा हो गया. जवानी का पाप बुढ़ापे में नज़र आने लगा.

बेटे निकले बाप से जार जवा आगे. उन्होंने पाप का ककहरा अपने घर से ही सीखा. जो-जो ढींगुर ने दूसरों के साथ वही उनके साथ हुआ. चार बेटों में चार लक्षण. एक बेटा निकला जुआरी. दूसरा बेटा निकला शराबी. तीसरा बेटा निकला गंजेड़ी और चौथा निकला फराडी.

बेटे जवान हुए और ढींगुर ढल गए. जुआरी बेटा बड़ा था. धूम-धाम से शादी हुई. शादी के एक महीने बाद बांटकर घर से अलग हो गया. ढींगुर ताकते रह गए. शराबी बेटा दूसरे नंबर का था. उसकी शादी हुई तो तीसरे महीने अपनी पत्नी को छोड़कर किसी और के साथ फुर्र हो गया. सोचा भी नहीं कि कोई तीसरा भी आ रहा है, जिसकी ज़िम्मेदारी से वो भाग रहा है. ढींगुर का इतना तो चला कि उसे ज़मीन जायदाद से बेदख़ल कर दिया.

गंजेड़ी बेटा तीसरे नंबर का था. दिनभर गांजे में व्यस्त. गांजा पीने के बाद इंसान स्वघोषित महादेव का भक्त हो जाता है. सो उसने भक्ति की राह चुन ली. ढींगुर के रहते ही ऐसा फ़रार हुआ कि अब तक नहीं आया. सबसे छोटा जो फराडी था, वो ढींगुर का ही अपडेटेड वर्जन था. जितने ऐब ढींगुर में, उतने ही उसमें.

शादी के कुछ महीने तक तो किसी ने उसे देखा ही नहीं, चौथे महीने से पत्नी को पीटने की प्रैक्टिस शुरू कर दी. इतना मारता कि कई बार मरने की नौबत आ जाती. ढींगुर की बुढ़ापे में ख़ूब दुर्गति हुई. हर तीसरा आदमी गाली देकर निकल जाता. ज़माना बदल गया था. सबके जेब में पैसा था. पुलिस तो उसकी की जिसका पैसा. ढींगुर की कमाई रह नहीं गई थी, खेती-किसानी पर बेटों ने डाका डाल लिया.

पैसा सबके पास पहुंच गया था. चोरों का स्टारडम घट गया था. ख़ुद ढींगुर का भी. छोटे बेटे ने एक दिन नाराज़ होकर ढींगुर को पीट दिया. ऐसे पिटाई की कि ढींगुर की पूरी ज़िन्दगी में नहीं हुई थी. माथे से ख़ून बह रहा था. बेटा ही सात पीढ़ी न्यौत रहा था बाप की. ढींगुर को सदमा लग गया. मुश्किल से 12 दिन जिए थे. हानि में मर गए.

दुर्गति अब शुरू हुई. ढींगुर अपने पीछे छोड़ गए थे एक पत्नी, जो आजीवन उनके सुख-दुख में शामिल रही. सुख तो उसे कभी मिला नहीं, मिली बस मार. वक़्त की भी, नियति की भी.

अर्धांगिनी वाला जो कॉन्सेप्ट है न, वह कलियुग में भी फलीभूत होता है. ढींगुर के हिस्से का आधा पाप तो भोगकर वे चले गए, आधा सिरे आया पत्नी के. बेटे एक से बढ़कर एक नालायक. मां के पास जो भी है, उस पर डाका डाल गए. हर किसी ने मां को निकाल दिया. 

मां को मिला अलगाव. मां ने सबको हिस्सा दिया, मां किसी के हिस्से नहीं आई. मां ही बेसहारा हो गई. शराबी पूत का जो लाल वो छोड़कर भागा था, वह भी जवान हुआ. जिस घर में वह रह रही थी, वही शराबी पूत के हिस्से आया था. घर निकाला हो गया था, लेकिन एक हिस्सा ढींगुर के जीते-जीते उसे मिल गया था. पोते का आश्रय मिला दादी को. पोते ने कुछ दिन दादी के पास पैसे भेजे, फिर यह जताने लगा कि वही उसे जिला-खिला रहा है. ऐसा था नहीं. मेहनत-मजदूरी करके वो ख़ुद कमा रही थी. दो वक्त का खाना, उसी के भरोसे उसे मिल रहा था.

पोते ने भी एक दिन तनकर कहा कि मेरा घर छोड़कर जाओ, मेरा सारा पैसा तुम लुटा दे रही हो. चार जवान बेटों की मां के पास घर नहीं. ढींगुर का बनवाया घर जर्जर होकर ढह गया था. बच्चों ने अपनी-अपनी कमाई से घर तैयार कर लिया था. मां के सिर पर छत नहीं था. छप्पर के मकान में महलों में रह चुकी राजमाता रह रही थी. जिसका पूत न हुआ, उसका पोता क्या होगा?

खेत मां के नाम, घर मां के नाम लेकिन बेटों ने सब हड़प लिया. ढींगुर का सारा यत्न, सारी व्यवस्था, सारा रुतबा धरा का धरा रह गया. उनके मरने के महज कुछ दिन बाद ही सब का सब खत्म हो चुका था. मकान खंडहर था. घर तोड़ा इसलिए गया कि बेटों को हिस्सा नहीं मिल रहा था.

हिस्सा मिला, किसी का निवाला छिन गया. ढींगुर बहू की किस्मत में मार लिखी थी. मार मिली. कभी बहुओं की तो कभी समय की. कुछ जीव ऐसे होते हैं, जिनके भाग्य में दुख मढ़ा गया होता है.

ढींगुर ने मरने से पहले कहा भी था कि जवानिया में हम तपेन, बुढ़पवा हम्मे तापत है. जितना ढींगुर ने जिस तरीके से कमाया था, उन्हीं के सामने वह ख़त्म हो गया.

जो धन जइसे आत है, सो धन तइसे जात. ढींगुर भवन से गुज़रता हर शख़्स यही कहते हुए निकलता है. आज सब मरे हुए ढींगुर को नसीहत दे रहे हैं, वही लोग, जो उनके सामने कभी बोल नहीं सके थे. ढींगुर बहू भी सब कुछ सहते, सहाते कह ही देती हैं कभी-कभी.

समय धरावै तीन नाम. परशु, परशुवा परशुराम.

-अभिषेक शुक्ल.

सोमवार, 1 जून 2020

मौलिकता भ्रम से इतर कुछ भी नहीं.....

मौलिकता अनैतिक भ्रम से इतर कुछ भी नहीं. एक साहित्यकार पूरा जीवन पढ़ने-लिखने में खपा दे, घट-घट भटके, अनुभवों की गंगा पार कर ले तो भी जीवन के अंत तक वह कुछ भी मौलिक नहीं लिख सकता है. कुंवर नारायण यह कहकर जा चुके हैं. उनसे पहले भी कई लोगों ने यही कहा है, उनके बाद भी कई लोग यही कह रहे हैं. आगे भी लोग यही कहेंगे.

मौलिकता एक आदर्श स्थिति है, आदर्श स्थितियां अस्तित्व में होने के लिए नहीं होतीं. सोचकर देखिए कि ऐसा क्या आप कहेंगे, जिसे दूसरों ने न कहा हो. क्या लिख देंगे, जिसे कभी न लिखा गया हो. ऐसा क्या आपने पढ़ा है, जो इससे पहले न लिखा गया हो. जो मैं लिख रहा हूं ये भी मौलिक नहीं. जो आप लिखेंगे उसे भी मौलिक नहीं कहा जा सकता. सब कही-सुनाई बातें हैं, पढ़ते-गुनते चलिए.

मौलिक होने का चस्का जिसे लगता है, उसकी साहित्यिक गतिविधियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. लिख दें तो लगता है कि यह तो लिखा जा चुका है. न लिखें तो लगता है कि रचनाओं को गर्भ के भीतर ही मार दे रहे हैं.

रचनाकारों की ऐसी भी प्रजाति है जो ख़ुद तो न जाने क्या-क्या लिखते हैं लेकिन दूसरे की रचनाओं को अमौलिक होने का प्रमाणपत्र देते हैं. सच यही है कि किसी ने कुछ भी मौलिक नहीं लिखा है. लिखा ही नहीं जा सकता है. अब अगर महर्षि वाल्मीकि, वेदव्यास या कालिदास फिर से अवतार ले लें तो भी कुछ ऐसा न लिख सकें, जो कभी लिखा न गया हो.

दोहराव सामान्य सी बात है. एक ही बात लोग रोज़ कह रहे हैं. आगे भी कोई कुछ नया नहीं कहेगा. नहीं, मैं भविष्य में कोई किताब या महाकाव्य नहीं लिख रहा जिसके अमौलिक होने पर लोग कोसेंगे मुझे, जिसके बचाव की अग्रिम पटकथा मैं लिख रहा हूं.

मैंने कुछ भी मौलिक नहीं लिखा है, लिख भी नहीं सकता. जिन्हें पढ़ा है, उनका प्रभाव हो सकता है मेरी शैली में झलके. ऐसा भी हो सकता है कि मैं पूरी तरह वही भाव लिख रहा हूं लेकिन सच मानिए यह जानबूझकर नहीं होगा. ऐसा होता रहेगा, बार-बार होता रहेगा. मैं चाहूं भी तो मौलिकता के भ्रम में जी नहीं सकता.

प्यारे वरिष्ठ साथियो,
यह भ्रम आपको भी नहीं होना चाहिए............सृजनशीलता बनी रहेगी.

सोमवार, 11 मई 2020

ना जाइब परदेस.....


माथे पर झोला लिये, मन में लिए जुनून
काटो तो पानी बहे, इतना पतला खून।
बेहद पथरीली डगर, पानी मिले न छांव,
शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव।

भूख यहां भी वहां भी, पर वो अपना देस,
रूखा-सूखा खाय ल्यो, जइहौ मत परदेस।
अपनी माटी प्रेम की, वाकी माटी सौत
अपनी ने जीवन दिया, दूजी ने दी मौत।












घाम लगे पाथर पड़े, कब इसकी परवाह
शहरों से अनसुनी थी, मजदूरों की आह।

सूखी रोटी गांव की, चुटकी भर का नोन
कटे कइसहूं आज बस, कल की सोचे कौन।
माना अपने गांव में, रहता बहुत कलेस।
कुल पीड़ा स्वीकार है, ना जाइब परदेस।

- अभिषेक शुक्ल.

(तस्वीर- साभार PTI)

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

पलायन का वर्ष

31 दिसंबर 2018। दुनिया नए साल के स्वागत की तैयारी कर रही थी, मैं अम्मा(दादी) की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने वाराणसी जा रहा था, भवानी चाचा के साथ। साल बीत रहा था, साथ ही अम्मा की स्मृतियां भी।



रात के 12 बजे ट्रेन में हैप्पी न्यू ईयर बोल रहे थे लोग लेकिन मेरे लिए कुछ अच्छा नहीं था। जिसने ख़ुद से हमें कभी कभी अलग नहीं किया, जिसका होने हमारे लिए भगवान के होने से कहीं ज्यादा ज़रूरी था, उसका मंदिर ही ख़त्म हो चुका था। राख बची थी। स्वार्थी होने का मन कर रहा था उस वक़्त। मन कर रहा था कि अम्मा को हमेशा ही ऐसे ही रहने दूं। नहीं रख सकता था। ये मिस्र नहीं, भारत है।

पूरे साल एक गहरा अवसाद रहा लेकिन हंसने से भी परहेज़ नहीं रहा। इस साल शेखर के जाने के कुछ दिनों बाद ही अम्मा भी चली गई। कई बार विश्वास नहीं होता है कि कोई गया है।

लगता है कि शेखर अचानक से कूदकर बोलेगा, 'भइया का सोचत हो?'...और..अम्मा बोल देगी 'ललनवा।'
दोनों अब कुछ नहीं बोलेंगे, ख़ुद को हर बार पूरे साल तसल्ली देते रहे.

अम्मा जब कभी सपने में दिखती है, मानने का मन ही नहीं करता है कि अब नहीं है. ऐसा लगता है, अम्मा अब बुलाएगी. कुछ कहेगी. बहुत अफनाहट होती है, अचानक से कभी कभी.

उस वक़्त लगता है अम्मा है, मेरे आस पास ही। सब ठीक है, तभी कुछ ठक से लग जाता है। एहसास होता है सपना था। अम्मा तो वह थी जो धुआं बनकर उड़ गई। हमारी आंखों के सामने ही। 24 दिसंबर को।

इंसान होने में तक़लीफ़ बहुत है। समझ होती है। सपने को सच नहीं मान सकते। सच को सपना। मन कहता है कि सब सपना था, नींद टूटते ही जो बुरा सपना हमने देखा था, टूट जाएगा। कुछ टूटता नहीं लेकिन भीतर ही भीतर बहुत कुछ टूट रहा होता है।

शेखर विलक्षण प्रतिभा का धनी था, उतना ही प्यारा। ईश्वर के प्रति अगाध समर्पण। दुनिया के तौर-तरीक़ों से अछूता, सच में किसी ऋषि-मुनि की तरह। ईश्वर ने उसे हमारे पास रहने ही नहीं दिया। 20 की उम्र में पलायन। ऐसा गया कि लौटने की सारी संभावनाएं ख़त्म हो गईं।

और अम्मा!

सुबह उठकर सबसे पहला काम अम्मा को फ़ोन करना होता था। हर 2 घंटे में एक बार। अम्मा थी तो बातें थीं, अब अम्मा नहीं है तो बातें ख़त्म हो गई हैं।

आज भी कई बार हूक सी उठती है अम्मा को फ़ोन करना है..फ़ोन पर नज़र जाती है और....

अम्मा की गोदी, अब महसूस भी नहीं कर पाता….अब ख़ुद को बच्चा भी नहीं मान पाता..अब लगने लगा है बहुत बड़ा हो गया हो गया हूं मैं..बहुत ज़्यादा।

कई लोग चले गए। अजीब ही साल था। नाना अप्रैल में चले गए। नाना अब बच्चे हो गए थे। पहले वाले नाना से डर लगता था, नानी के जाने के बाद नाना मासूम हो गए थे। प्यार आता था। एक ही बात दस बार पूछते, फिर भूल जाते..अब नाना भी नहीं हैं।

बड़की मौसी भी अब नहीं है। जुलाई में मौसी की तबीयत बिगड़ी, फिर कुछ दिन कोमा में रही, एक दिन ख़बर आई मौसी अब नहीं है...मैं उन ख़ुशनसीब लोगों में एक था जो दौड़कर अपने मौसी के पास जा सकते हैं...अब अम्मा की तरह मौसी भी जा चुकी है।

जुलाई में ही पाले काका भी चले गए......किसी को नहीं जाना था। रुकना था..ऐसी भी क्या जल्दी थी जाने की। दुनिया इतनी बुरी भी जगह नहीं है जहां रहा न जा सके।

काश, कोई ऐसी युक्ति होती जिससे जो गए हैं, उन्हें लौटा लाते। वैसे ही जैसे सावित्री ने यम से सत्यवान को छीन लिया था... या जैसे कृष्ण अपने भाइयों को लौटा लाए थे....।

अच्छा ज़माना था जब स्वर्ग तक इंसानों का आना-जाना था। अब कोई चुपके से आता है, उठा ले जाता है।

यह साल, सच में पलायन का साल था।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

उद्योग बनते क्यों नज़र आ रहे हैं सरकारी शैक्षणिक संस्थान?


भारत विश्वगुरु था. भारत को विश्व गुरु एक बार फिर से बनाना है. मगर कैसे...इसका जवाब शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी कैबिनेट और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास भी नहीं है. मोदी सरकार के त्रिमूर्तियों के बयान सुनिए, उनके बयानों से लगता है कि अगले 5 साल में ही भारत विश्व गुरु बनने वाला है या बन चुका है लेकिन हर बार बनते-बनते रह जाता है. लगता है कि विश्वगुरु बनाने की मंशा, सरकार बनाने के चक्कर में कहीं गुम हो गई है.

ऐसा भी हो सकता है कि इस विषय पर ध्यान ही न गया हो क्योंकि यहां साध्य को पूरा करने के लिए युक्ति ज़रूरी नहीं, कथन ज़रूरी है. पूर्ववर्ती सरकारें भी भारत को विश्व गुरु बना रही थीं, उनका ध्यान भी युक्ति पर नहीं कथन पर केंद्रित रहा.

अगर ध्यान गया होता तो अतीत का विश्वगुरु, भविष्य संवारने के लिए शिक्षा पर ध्यान देता क्योंकि गुरु जैसी किसी संस्था को अस्तित्व में लाना है तो उसके लिए कुछ अपरिहार्य है तो वह है शिक्षा. सस्ती शिक्षा. जिसमें सबकी बराबर की भागीदारी हो; अमीर-ग़रीब सबकी.

सड़क के किनारे बैठकर भुट्टा बेचने वाली औरत या गले में काला बैग और सिर पर लाल पगड़ी बांध दूसरों के कानों से खूंट निकालने वाला आदमी, सबकी हसरत होती है कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाएं. रिक्शावान, मजदूर, थवई, रेहड़ी-पटरीदार, मछुआरा, ठेले वाला, सफाई कर्मचारी...हर कोई, चाहता है कि जिस ज़िन्दगी से वे जूझ रहे हैं, उनके बच्चे उससे बाहर निकल सकें.

उनके बच्चों को भी IIT, IIM, MBBS, NEET, NLU, ICAI, IIMC और तमाम विश्वविद्यालयों में पढ़ने का मौका मिले. हर उस जगह जहां वे जाना चाहते हैं. जिस तरह से सरकारी संस्थानों की फ़ीस बढ़ाई जा रही है, उस हिसाब से लगता है कि गरीबों के बच्चे पढ़ नहीं सकेंगे.

जेएनयू के छात्र हाल ही में फ़ीस वृद्धि को लेकर सड़क पर उतरे थे. उनका प्रदर्शन अब भी जारी है, विश्वविद्यालय परिसर में. उत्तराखंड में आयुर्वेद की पढ़ाई करने वाले छात्र बढ़ी फ़ीस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

अब भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं बढ़ी हुई फ़ीस को लेकर. यहां से पत्रकारिता की पढ़ाई होती है. IIMC सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला एक स्वायत्त संस्थान है. सरकारी संस्थान है. मगर फ़ीस प्राइवेट संस्थानों के टक्कर की है. क्यों है, इसका जवाब वहां के डीजी को पता है जो बहुत मासूमियत से धरने पर बैठे छात्रों को बता देंगे. वजहें भी गिना देंगे.

उम्मीद करते हैं कि इन बच्चों पर उस तरह से लाठियां नहीं बरसाई जाएंगी, जैसी सुविधाएं जेएनयू वालों की को दी गईं.

सरकारी संस्थान धन के दोहन के संयत्र बनते नज़र आ रहे हैं. सरकारी विद्यालयों की फ़ीस जितनी मंहगी होगी, गरीब तबक़ा उतना ग़रीब होता जाएगा.

 जब मैंने यहां से पढ़ाई की थी(2016-17) तब हिंदी-अंग्रेज़ी पत्रकारिता की फ़ीस 66,000 रुपये, आरटीवी की फ़ीस 1,20,000 रुपये और ADPR की फ़ीस 93,500 रुपये थी.

इस बार 2019-2020 की फ़ीस कुछ उसी अंदाज में बढ़ी है, जैसे जय शाह और रॉबर्ट वाड्रा की संपत्ति बढ़ी है. हिंदी और अंग्रेज़ी पत्रकारिता के छात्रों की फ़ीस 95,500 रुपये, RTV की 1,68,500 रुपये और ADPR के छात्रों की फ़ीस इस बरस 1,31,500 रुपये बढ़कर हो गई है.

सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों की आमदनी जिस रफ़्तार से बढ़ती है, उतनी रफ़्तार से आम आदमी की नहीं बढ़ती. सिक्योरिटी गार्ड की सैलरी आज भी उतनी ही है जितनी 2009 में थी. दशक खत्म होने वाला है, महंगाई ने आसमान छू लिया है, आम जनता की आमदनी नहीं बढ़ी है. न ही बढ़ीं हैं रोजगार की संभावनाएं.

मैंने इससे पहले जिस-जिस पेशे के लोगों का जिक्र किया है, उनमें से कितने लोग अपने बच्चों को चाहकर भी यहां भेज सकते हैं? दिल्ली में किसी को टिकने के लिए कम से कम 8 हजार रुपये की जरूरत पड़ेगी. अगर हॉस्टल मिल गया तो भी इतने में गुजारा होना मुश्किल है. हॉस्टल की फ़ीस करीब 5,200 रुपये है. सबसे सस्ते कोर्स  हिंदी, अंग्रेज़ी या उर्दू पत्रकारिता में भी एडमिशन लिया है तो भी कोर्स पूरा होने तक दिल्ली में ठहरने का बजट 1,60,000 से ज़्यादा ही बैठेगा. बाकी कोर्स वाले तो 2 लाख तक खिंच जाएंगे.

9 महीने की पत्रकारिता की पढ़ाई इतनी महंगी है तो IIT, IIM, NLU और मेडिकल संस्थानों की फ़ीस कितनी होती होगी? कैसे सुनियोजित तरीके से बढ़ाई गई होगी. इन संस्थानों में पढ़ने का हक सबको है, पर मिलता किसको है?

पैसे वाले तो कहीं से भी पढ़ सकते हैं. जिस हिसाब से उनकी परवरिश होती है, उन्हें परीक्षाएं निकालने में बहुत मुश्किलें नहीं आती होंगी. जिन्हें आती होंगी, उनका मन कुछ और करता होगा. उनके पास प्राइवेट और महंगे विश्वविद्यालयों में पढ़ने का बजट है. आम आदमी के पास रास्ता क्या है? किडनी बेच कर पढ़ाए क्या बच्चों को? प्राइवेट में तो किडनी भी बेचकर एडमिशन न हो पाए.

देशभर में कहीं से भी सस्ती शिक्षा के लिए बच्चे आंदोलन करें तो उनका साथ दीजिए. सरकारी संस्थानों की महंगी फ़ीस, ग़रीबों के बच्चों को अशिक्षा के मुहाने पर ले जाकर छोड़ देगी. पढ़ने का सपना टूटेगा तो पीढ़ियां बर्बाद होंगी. फिर वे आज कल के टीवी ऐंकरों की तरह हिंदू-मुसलमान में ही उलझे रहेंगे. दंगाई बनेंगे. बनाएंगे भी. किसी को हिंदू खतरे में नज़र आएगा, किसी को इस्लाम. भविष्य तो ख़तरे में पड़ेगा ही.

अगर बच्चे पढ़ेंगे नहीं तो विश्व गुरु कैसे बनेंगे. हिंदुत्व, जम्मू-कश्मीर, राम मंदिर, एनआरसी, सीएबी के शोर-शराबे में शिक्षा दब गई है भाई. अमीर तो कहीं से पढ़ लेंगे, ग़रीब कहां जाएगें? जिसके लिए पेट भरना भी मुश्किल हो वो लोन लेकर पढ़ेगा कहां से? लोन अप्रूव कौन करेगा? भूमिहीनों को कौन सा लोन मिलता है? मिल भी गया तो नौकरी की संभावना क्या है? भरेगा कहां से?

IIMC के छात्रों की मांग है कि अगर दूसरे सेमेस्टर में फ़ीस नहीं घटाई गई तो कइयों को आधे सेमेस्टर में दिल्ली छोड़कर जाना पड़ेगा. हर किसी की आर्थिक स्थिति इस लायक भी नहीं होती कि उसे कर्ज़ मिल सके. छात्रों के भविष्य का मामला है और उन सब के लिए जो सपने देखते हैं. ग़रीब...किसान...थवई...ठेले वाला....सब...

समाज में समानता सदियों से गौण थी लेकिन एक जगह तो कम से कम हम समानता ला सकते हैं. शिक्षा में. फ़ीस महंगी न हो. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में सस्ती शिक्षा मिले. सबको शिक्षा मिले. कोई सिर्फ इसलिए न पढ़ पाए कि उसके मां-बाप के पास पैसे नहीं है. पढ़ाई उसके लिए भी सुलभ हो, जिसके मां-बाप न हों...लावारिस हो...सड़क पर रहता हो...बेघर हो.

हां, अमीरों को या मध्यम वर्ग जिसके पास बेहद पैसा है, उन्हें भी विरोध करना चाहिए. क्या पता अमीरी हमेशा न रहे. होता है, कई अरबपति भी रोडपति बनते हैं. शिक्षा सस्ती होगी तो अच्छे और बुरे दोनों दिनों में बच्चों के पढ़ने का भरोसा बना रहेगा.

क्योंकि कोई शायर हैं तुफैल...याद रखने वाली बात कही है-
समय के एक तमाचे की देर है प्यारे,
मेरी फ़क़ीरी भी क्या, तेरी बादशाही क्या?

इस बार भावी पत्रकार धरने पर बैठे हैं. आज का वक़्त ऐसा है कि आप कह सकते हैं कि जो कुछ अच्छा है, पत्रकारों की वजह से अच्छा है, जो बुरा है वह भी पत्रकारों की वजह से है. देश की राजनीति में एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता का बनाया या बिगाड़ा हुआ होता है. यहां से कुछ अच्छे पत्रकार निकले हैं, भविष्य में भी निकलेंगे अगर वे अपनी फ़ीस भर ले गए तो.

विश्व गुरु-विश्व गुरु का जाप बचपन से सुनते आए हैं. पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री अमित शाह, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, संघ प्रमुख मोहन भागवत....सबके बयान देखिए..पढ़िए...सबको भारत को विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित करना है.

गुरु का गुरुकुल होता है. जहां सबके लिए शिक्षा का समान अवसर उपलब्ध होता है. सबको समान शिक्षा मिलती है. जहां गुरु, गुरु होता है, व्यापारी नहीं. गुरुकुल भी गुरुकुल होता है, उद्योग नहीं.

संस्थानों को उद्योग बनने से बचाइए....उद्योग का एकमात्र उद्देश्य धन संचयन है. गुरुकुल का नहीं. मुफ़्त शिक्षा, सस्ती शिक्षा, सुलभ शिक्षा अगर सबको उपलब्ध हुई न तो भारत विश्व गुरु बने या न बने, एक बेहतर देश ज़रूर बन जाएगा.

- अभिषेक शुक्ल.

सोमवार, 9 सितंबर 2019

हम शहरों से ऊबे हैं














पतझर जैसे क्यों दिन हैं
सिसकी वाली सब रातें,
उलझन को अंक समेटे
कितनी अनसुलझी बातें।

क्या समझ हमें आयेगा
नगरों का यह कोलाहल,
हा! कौन यहां पीयेगा
जगती की पीर हलाहल।

जीवन भर का आडम्बर
आडम्बर ही जीवन भर,
मन कहे चलो अब छोड़ो
कुछ शेष बचा है घर पर।

इक खटिया है दो रोटी
जी भर पीने को पानी,
भरपेट हवा मिलती है
दस लोग हज़ार कहानी।

इच्छाओं पर अंकुश है
भोली-भाली सौ आंखें,
दो बूंद धरा पर पड़ती
सबको उग आतीं पांखें।

हर शाम हवा चलती है
हर रात टीमते तारे,
हर सुबह कूकती कोयल
हर दिन क्या ख़ूब नज़ारे।

हम शहरों से ऊबे हैं
वैभव में रहे किनारे,
अब गांव लौट आओ तुम
मन ही मन मीत पुकारे।

हम लौट चलेंगे साथी
शहरों से खाकर ठोकर,
जाने क्या क्या हासिल कर
जाने कितना कुछ खोकर।

बस काट रहे दिन अपना
अनुभव की गीता गाकर,
कर्मों की आहुति देकर
जीवन का आशिष पाकर।

- अभिषेक शुक्ल।

रविवार, 8 सितंबर 2019

दिन बहुरते हैं


अच्छे दिनों की बुराई इतनी सी है कि उनका प्रभाव बहुत क्षणिक होता है. बुरे वक़्त से दो दिनों के लिए ही भेंट हो जाए तो महीनों के अच्छे दिन निष्प्रभावी हो जाते हैं. दुख के दो दिन, महीनों, वर्षों के अच्छे दिनों पर भारी पड़ जाते हैं.

मन बस यही कहता है कि कब दिन बहुरेंगे.

अब दु:ख सहा नहीं जाता. पानी नाक तक आ गया है, अगर डूबे तो फिर नहीं उबरेंगे.

जीवन की सारी सुखद स्मृतियां कहीं बीत जाती हैं, जिनकी रत्तीभर याद नहीं आती.

लगता है सब कुछ ख़त्म. कुछ शेष नहीं. इच्छाएं, अनिच्छाएं, कुछ भी स्थाई नहीं रह जाती हैं. दिन बीतता नहीं है, रात कटती नहीं है. ठहरने का मन करता है, लेकिन मन न जाने किस दिशा में यात्रा करता है, तभी एक झपकी आती है. विराम.

(फोटो साभार- https://wallpaperaccess.com/sunrise)


दिनों की व्यग्रता...पलों में ओझल होती है.

मन खिलता है...कुछ याद नहीं रहता.

लगता है कि कोई बोझ था, उतर गया. अब सब कुछ नया. सब कुछ फिर से. जैसे मन उर्जस्वित हो गया हो...जैसे मनचाहा वर मिल गया हो...जैसे किसी ने कह दिया हो- का चुप साधि रहा बलवाना.....अजर अमर गुननिधि सुत होऊ.....

फिर क्या....

लगने लगता है......दिन बहुर गए हैं.

दिन बहुरते हैं.

शनिवार, 6 जुलाई 2019

पाले काका चले गए......

जून में अम्मा की वार्षिकी थी. मैं घर गया था. अम्मा को गए हुए 6 महीने बीत गए थे. पाले काका से मिलने उनके पास गया. काका, जीवन में पहली बार बीमार लगे थे. बहुत असहाय भी. इतने असहाय कि जैसे भगवान भी उनकी पीड़ा न हर सकें. उन पर रौब जंचता था, लेकिन काका डरे-डरे से लगे.

ऐसा लगा कि जैसे नियति ने जाने की तिथि तय कर दी है, और अब वे अपने आख़िरी दिन गिन रहे हैं. जैसे वक़्त ने चाल दिया हो बहुत भीतर तक, जहां से आत्मा आर-पार होने की स्थिति में पहुंच जाए. लग गया था कि अब काका का बुलावा आ गया है. फिर भी मन नहीं मान रहा था कि काका भी चले जाएंगे.

उनकी बातों से तो बिल्कुल भी नहीं लगा. वही रौब, वही अंदाज़ जिसे हम बचपन से देखते-सुनते आए हैं.

अच्छे वाले मन ने कहा कि काका ठीक हो जाएंगे. पहले की तरह ही जैसे वे घोड़ा टमटम टॉनिक पीने के बाद हो जाते थे.

कुछ ठीक नहीं हुआ. काका की तबियत खराब होती चली गई गई.

मुझे याद नहीं, काका एकादशी छोड़कर कोई व्रत रहे हों. मम्मी की ज़िद पर काका कभी-कभार जन्माष्टमी और एकादशी के दिन व्रत रख लेते थे. नहीं तो दोनों वक़्त भरपेट खाने वाले लोगों में से एक मेरे पाले काका भी थे. सुना कि काका ने 23 जून के बाद खाना ही नहीं खाया. कुछ खा ही नहीं पा रहे थे, शायद खाना ही नहीं चाह रहे थे.

जीवन भर का व्रत, जीवन के अंतिम दिनों में कर बैठे, भले विवशता से ही सही. व्रत पूरा हुआ, काका चले गए.

बचपन में काका से डर लगता था फिर भी काका बुरे नहीं लगते थे. बिलकुल बाबा की तरह, काका की भी डांट अच्छी लगती थी. कई बार डांट खाने के लिए ही सही, उन्हें हम लोग जानकर ग़ुस्सा दिलाते थे. कभी बहुत देर तक खेलते रहे तो काका का पारा चढ़ जाता था. कहते, अच्छा चलो, अब पढ़ो. बहुत खेल होइ गय. पढ़ना न लिखना, दिन्न भर उहै बैट.

बद्री, बलराम, परदेसी और बड्डू काका के डांट के बाद खिसक लेते थे, हम भी दबे मन से घर में स्टंप उठाकर चल देते थे. काका ने डांटा तो फ़ाइनल. गेंद-बल्ले का उठना तय.

फिर अगले ही दिन मौका मिलता खेलने को.

काका की डांट मुझे ही नहीं, भइया को भी पड़ी है. भइया की घर में न टिकने की आदत से दो लोग परेशान थे. अम्मा और काका. मम्मी को कुछ ख़ास फ़र्क़ पड़ता नहीं था. बाबा भी अपनी धुन में मस्त रहते थे. पापा देर से आते तो भइया घर में मिलते. लेकिन अम्मा और काका को बहुत दिक़्क़त थी भइया के घूमने से. काका जहां मिलते, सुनाकर भइया को घर ही भेजते. घर में घुसते ही अम्मा फ़ायर.
काका भ्रमणकारी थे. पांव नहीं टिकते थे उनके. गांव में घूमने निकलो तो कहीं न कहीं मिल जाते. जहां मिलते, वहीं टोकते. फिर घर वापस आना पड़ता.

भइया और मेरा पूरा बचपन 'पाले काका हो!' चिल्लाते बीता है. दरअसल काका दिन भर घर रहते थे, लेकिन जब खाने का वक़्त होता, काका निकल लेते थे. अम्मा किसी को खाना ले जाने नहीं देती, जब तक पाले काका खाना न खा लें. मजबूरन हमें चिल्लाना पड़ता. सुबह-शाम दोनों वक़्त. हमारे साथ पापा भी चिल्लाते थे. आस-पड़ोस में भी बच्चे मज़े लेकर चिल्लाते. सबको पता चल जाता कि घर में खाना बन गया है.

उस वक़्त मोबाइल वाला ज़माना नहीं था कि कॉल कर दें. जब मोबाइल वाला ज़माना आया, तब भी काका मोबाइल नहीं रखते, उन्हें ऐसे ही चिल्लाकर बुलाना पड़ता था. काका का फ़ोन, इंद्रजित ही चलाता, काका के हाथ में फोन नहीं रहा. तीन-चार बार काका ने ख़ुद के लिए फ़ोन ख़रीदा होगा. फिर ख़रीदना ही छोड़ दिया. इसलिए काका-काका चिल्लाना हमारी आदत में शुमार हो गया.

पापा चिल्लाते, पाले...पाले हो, ये पाले...
हमें भी हंसी आती. हम भी पापा का साथ देने आ जाते.
काका बस चाय के टाइम पर मौजूद रहते थे. शाम की चाय, उनके आने पर ही बनती थी.



पाले काका, अम्मा के सबसे ख़ास थे. कहां कौन सा खेत, कौन काट-बो रहा है, सबकी ख़बर काका ही रखते. किसे खेत बटइया पर देना है, किसे नहीं देना है, सब काका के हाथ में था. अम्मा का बस अप्रूवल होता था. अम्मा उन्हें बहुत मानती. शायद तभी, अम्मा के जाने के 6 महीने के भीतर काका भी वहीं पहुंच गए जहां अम्मा है. शायद वहां, अम्मा का राज-काज देखने वाला कोई सहयोगी नहीं पहुंचा था, जो भरोसेमंद हो. काका भी वहीं चले गए.

पापा की आदत है कि जब वे खेती करते हैं, तो केवल दो से तीन बार ही खेत जाते हैं. पहली बार जिस दिन बुवाई होती है. दूसरी बार जब फसल कटती है. कभी-कभार तब चले जाते हैं, जब खेत में पानी चल रहा हो. शेष दिनों में क्या हो रहा है, इससे ख़ास मतलब नहीं होता. सारी ज़िम्मेदारी पाले काका की होती थी फिर. भइया शाम को टहलने भले ही चले जाते हैं, खेत देखने के मक़सद से शायद ही कभी जाते हों. ऐसा इसलिए होता था, क्योंकि पाले काका थे. पापा जब कचहरी से लौटते थे, दिन भर की सारी बातें, वहीं आंगन में पापा से बताते. पापा हूं-हूं करके सुनते रहते.

कुछ पूछते जो काका को ख़राब लगता तो कहते, भै बाबू, तुहूं उहै मेर कहत हौ. यस नाहीं है. फिर काका अपनी कहानी बताने लगते.

सच बात थी, पापा भी उनका बहुत लिहाज़ करते थे. अम्मा, बड़ी बुआ के बाद, पापा ने शायद उन्हीं की सलाह मानी हो.

सुबह-शाम एक चक्कर खेत का मारे बिना काका को चैन नहीं. जाने से दो महीने पहले तक पाले काका की नियमित दिनचर्या में शामिल था खेत जाना. लेकिन फिर बीमार रहने लगे. उस तरीके से घूम नहीं पाते थे. भगवान नारद की तरह कभी एक जगह न बैठने का वरदान मिला था काका को. जाते वक़्त काका ने खाट पकड़ ली थी. उन्होंने घूमना कम कर दिया था. तभी अम्मा की वार्षिकी थी, और काका उस दिन घर नहीं आ सके. वे अपने घर पर ही लेटे रहे.

लग गया था कि काका अब ज़्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं.

बचपन के हर क़िस्से में काका शामिल हैं. उनके अध्याय को छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. जीवन में पहली बार मेला घूमने काका के साथ ही गया हूं. काका मुझे और भइया को बहुत दिनों तक मेला दिखाने ले जाते. तब तक ले गए हैं, जब तक हम बहुत बड़े नहीं हो गए.

शोहरतगढ़, लेदवां, माधवपुर, काका जहां तक जा पाते, हमें मेला ले जाते. मेला में जलेबी, समोसा और उसके बाद गुब्बारा. हमारा इतना ही मेला होता था. फिर काका गट्टा खरीदते. वहीं से कुछ न कुछ सबके लिए काका खरीदकर लाते. अम्मा सबको मेला करने का पैसा बांटती थी. उसमें काका का भी हिस्सा होता था.

काका को दुनिया का कोई भी डॉक्टर दवा लिखकर दे दे, विश्वास नहीं होता. उनकी वैद्य मम्मी ही थी. मम्मी के बिना अप्रूवल के काका कोई दवा नहीं खाते. चाहे एमडी लिखे काका के लिए दवाई. कहते रुको दुलहिन के देखाय ली तब दवइया खाब न.

एक दिन मैं घर के बाहर क्रिकेट खेल रहा था. सामने गेंद चली गई, उठाने गया तो कुतिया ने काट लिया. ज़रा सा भी ख़ून नहीं निकला था लेकिन काका परेशान हो गए. गांव में ऐसी मान्यता है कि जिसे कुत्ते ने काटा हो, उसे कुआं झंका दिया जाए तो कुत्ते के काटने का प्रभाव कम हो जाता है. काका ने हाथ पकड़कर पूरे गांव का चक्कर लगवा दिया. 52 से ज़्यादा कुएं हैं मेरे गांव में. मैं चिल्लाता ही रहा कि कुत्ते ने नहीं काटा है, काका ने एक न सुनी. काका तो काका थे, उन्हें रोक कौन सकता था.

रिश्ते केवल ख़ून वाले ही सच नहीं होते. भावनाओं के रिश्ते भी उतने ही पवित्र होते हैं, उनकी भी निकटता वैसी ही होती है. कुछ भी अंतर नहीं होता. ऐसे में किसी अपने का चले जाना, बहुत दुखता है. कुछ टूटता है, बेहद भीतर तक.

कहा जा सकता है कि काका को असह्य पीड़ा से मुक्ति मिली, लेकिन मन किसी को भी मुक्त करना कहां चाहता है. अपनों को कौन खोना चाहता है.

काका से जुड़ी हुई कितनी यादें हैं. लेकिन अब वे सिर्फ़ यादें हैं. काका जा चुके हैं. हैं से थे होने की दूरी उन्होंने तय कर ली है.

काका अब स्मृति बन चुके हैं. घर जाने पर उनकी खाट दिख सकती है, जहां रहते थे, वो घर दिख सकता है, उनकी लाठी दिख सकती है, लेकिन काका नहीं दिख सकते. मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते.

कहीं वो आवाज़ सुनाई नहीं दे सकती कि, हो लाला, तू कब पंहुच्यौ. हम अगोरित रहेन न.

काका इस बार भी शायद इंतज़ार करते रह गए होंगे. लेकिन अब का. जब चले गए तो चले गए. जीवन के दूसरे छोर पर जहां समावर्तन के लिए राह नहीं होती. वहां जाने के पदचिन्ह मिलते हैं, और आने की स्मृतियां. इनके बीच कुछ भी शेष नहीं रहता. कुछ भी....

मंगलवार, 14 मई 2019

हम परागों के निषेचन में फंसे हैं



रूप के उपमान आकुल हो गए हैं
दर्प भी उन्माद जितना छा गया है,
हम परागों के निषेचन में फंसे हैं
फूल के प्राणों पे संकट आ गया है।

सूख जाना फूल की अन्तिम नियति है
पर भंवर को कब हुआ है भान इसका,
प्यास अधरों की रहे बुझती परस्पर
लालसा में सच कहो क्या दोष किसका?

जीविका है या गले की फांस है यह
रोज़ इच्छाओं को कसती जा रही है,
दास हूं मैं या तनिक स्वायत्तता है
मति इसी संशय में फंसती जा रही है।

वृक्ष था अब ठूंठ बनकर रह गया हूँ
सूखने के वक़्त शायद आ गया है
मोक्ष ने फिर से मुझे धोखा दिया है
क्षीण हो जाना मुझे भी भा गया है।

-अभिषेक शुक्ल

(तस्वीर- @Philippe Donn)

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

ईश्वर चाहता था कि वह मुक्त हो ईश्वरत्व से!



झरने इंतज़ार में थे
कोई उन्हें रुकने को कहेगा
बूंदें चाहती थीं
धरती पर न गिरें
सूरज स्वार्थी होना चाहता था
एक दिन के लिए
चांद चाहता था
उसे न मिले उधार की रोशनी,
पेड़ की बहुत इच्छा थी
कि
इक रोज़ वह अपना फल खाए
गाय अपना ही दूध पीने के लिए
कई दिनों से तड़प रही थी
नदियों की इच्छा थी
कि एक दिन के लिए वे तालाब हो जाएं
समंदर चाहता था
कि
कोई विजातीय धारा उसमें न गिरे,
फगुना की इच्छा थी
कि
एक दिन के लिए ही सही
वह सभी रिश्तों से पार पा ले
माई, बहिन, भौजाई, ननद, मेहरारू
के विशेषणों से इतर
एक दिन वह बस फगुना
ही रहे,
मजदूर चाहते थे
कि
वे ख़ुद अपने मालिक बन जाएं,
प्रथाएं चाहती थीं
कि
उनकी ओट में
किसी की
सिसकियां न सुनाई दें,
आसमान
एक दिन के लिए
सिकुड़ना चाहता था,
धरती चाहती थी
कि
उसकी गोद में
लुटेरों, डाकुओं, चोरों, और बलात्कारियों
को न ज़बरन दफ़नाया जाए,
चाहती तो
सुनरकी भी थी
ब्याह हो जाए बड़के बखरिया में
पर
चाहने से क्या होता है
तन से मनचाहा हमसफ़र तो नहीं मिलता
उसके लिए पैदा होना पड़ता है
कुलीन बनकर,
चाह तो भगवान भी रहा है
उसके सिर न मढ़े जाएं
होनी, अनहोनी करने और कराने के बेतुके कलंक
वह चाहता है कि
मानस की पंक्तियों से कोई मिटा दे
होइहि सोइ जो राम रचि राखा
वह चाहता है कि कोई झुठला दे
वृक्ष कबहु न फल भखें वाला दोहा
उसका भी मन करता है
धरती की तमाम प्रत्याशाओं, वर्जनाओं, कुंठाओं
और
महत्वाकांक्षाओं
के दोष उस पर न थोपे जाएं
लेकिन
चाह तो उसकी भी अधूरी है
विवश है वह
अपने निर्माताओं के रचे गए व्यूह में फंसकर,
एक दिन के लिए वह भी चाहता है
मुक्त होना
इस धारणा से
कि
वह ईश्वर है।

रविवार, 24 मार्च 2019

यार! अब मन न कहीं लगे

 

यार! अब मन न कहीं लगे।

अपलक देखूँ, व्योम निहारूँ,
आतुर होकर तुम्हें पुकारूँ;
अहो! हुए तुम इतने निष्ठुर,
तुम्हारी, चुप्पी क्यों न खले?

सारे वचन तोड़ बैठे हो,
अपने नयन फोड़ बैठे हो;
किसने प्रियतम मति है फेरी
अकिंचन, हम रह गए ठगे!

कल तक सब कुछ उत्सवमय था,
जीवन कितना सुमधुर लय था;
हुए पराये तुम पल भर में,
बरसों, आधी नींद जगे।

प्यार! अब मन न कहीं लगे।

बुधवार, 6 मार्च 2019

जिन्हें चम्बल में रहना था वे अब संसद में रहते हैं

जिन्हें चम्बल में रहना था वे अब संसद में रहते हैं।
किसी ने ठीक ही कहा है।

हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे हैं। इन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद और विधानसभा में भेजा है।
अब वक़्त आ गया है इन्हें जेल भेजा जाए। अपने-अपने कार्यों के अनुरूप। लोकतांत्रिक देश में ये आज़ाद घूमने लायक तो नहीं हैं।

संत कबीर नगर में जिला योजना की बैठक हो रही है।
बैठक के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सांसद शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के विधायक राकेश सिंह को जूतों से पीट डाला।

पहले बहस शुरू हुई, फिर हाथापाई। फिर गालियां और कुटाई साथ साथ।

और जनता इनसे उम्मीद करती है ये विकास करने के लिए बैठे हैं। ये क्रेडिटखोर लोग हैं, इन्हें बस क्रेडिट चाहिए सीवी मजबूत करने के लिए।

अगर बीजेपी में थोड़ी भी शर्म बची होगी तो इन दोनों महानुभावों को पार्टी से बाहर फेंक देगी। साथ ही दूसरी पार्टियों को भी इन्हें लपकने में उत्सुकता नहीं दिखाई जानी चाहिए।

लोकतंत्र के काले धब्बे हैं ऐसे नेता। इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिये।

(वीडियो सुनने से पहले हेडफोन इस्तेमाल करें, और बच्चे इस पोस्ट से दूर रहें।)

रविवार, 3 मार्च 2019

गुलामों में कभी कोई बुद्ध हुआ है क्या?


हमारा वक्त बिक चुका है. एक-एक पल किसी ने खरीद रखा है. किसी की आधीनता के बदले हमें कागज के कुछ टुकड़े मिलते हैं, जिनसे हमारी थोड़ी बहुत जरूरतें पूरी होती हैं. बस पेट पालने भर तक.

पेट सागर है....भर नहीं सकता. आजीवन रिक्त रहता है. ऐसा मैं नहीं 'कड़जाही काकी' कह के गई है.

कई बार लगता है कि भाग जाना चहिए हमें कहीं. अपने-अपने दायित्वों से. क्या ही कर लेंगे हम दुनिया में रहकर या दायित्व निभाकर.

पलायन इतना भी बुरा है क्या.

पर जिन्हें हम छोड़कर भागते हैं वे ज्यादा याद आते हैं. भागना थोड़ा मुश्किल भी है. हर कोई सिद्धार्थ तो है नहीं जिसे भागकर बोध हो जाएगा.

आनंद तो मिलेगा नहीं. मिलते ही नहीं.

भला बुद्ध का क्या होता अगर उन्हें आनंद मिला न होता.

दरअसल महत्ता तो बस आनंद की है. मैं आनंद खोज रहा हूं.

.....काश कह सकता.

आनंद की तलाश बिना स्वतंत्रता के. स्वतंत्रता क्या स्वायत्तता भी. गुलामों के ज्ञान पर भरोसा कौन करे.

कौन कहना है कि दास प्रथा खत्म हुई है. खत्म हो ही नहीं सकती. क्योंकि कुछ भी खत्म नहीं हो सकता. सब सतत् है. अवस्था परिवर्तन ही शाश्वत है. ऐसा मैं नहीं मानता, पर पुरखे मानते हैं.

पुरखे गलत हैं इसे मैं साबित नहीं कर सकता. सही हैं इसे भी.

मन यही कह रहा है कि गुलामों के पास कोई ज्ञान नहीं होता सिवाय दायित्व बोध के.

गले में पट्टा है.....ओखरी में मूड़ा है...पहरुआ गिनते रहो...जूझतो रहो....सवाल यही है कि गुलामों का क्या कोई आनंद हुआ है. अगर हुआ है तो जानने की उत्कंठा है.

कई बार यह भी लगता है कि बंधनों की गुलामी से भागे हुए लोग ही बुद्ध हुए हैं. पता नहीं. कौन जाने. सबकी अपनी-अपनी मंजिल. हमसे क्या.

जेकर मूड़ा ओखरी में हो, तेहि गिनै.

हमसे का.


(फोटो क्रेडिट- pixabay.com)




-अभिषेक शुक्ल.