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मंगलवार, 21 मार्च 2017

अंधी दौड़

इन दिनों रेस लगी है। ये रेस आम नहीं है। इसमें जीतने के लिए आपसे कहा जाएगा कि दौड़िए मग़र टूटे हुए पैरों के साथ।आपको भगाया जाएगा पर  पैर काट कर। आपको घिसटने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन हाथों में पड़े छाले ऐसा कुछ करने के लिए आपको इजाज़त नहीं देंगे।
कंपटीशन है बॅास लोग मारकर आपको ज़िन्दा रखना चाहते हैं।
लिखवाया आपसे जाएगा पर शब्द उनके रहेंगे।  बुलवाया आपसे जाएगा लेकिन वही जो उनके कान सुनना चाहें । चीखने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन साउंडप्रूफ़ कमरे में जहां आपकी आवाज़ शोर में तब्दील होकर आपके कानों के पर्दे फाड़ दे और आप कभी सुन ना पाएँ।
ये बाज़ार है। यहां आपकी मौलिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां आने के लिए या तो आप ख़ुद को बदल लें या कंपटीशन ही छोड़  दें।
आपकी बोली लगाई जाती है। मोल-भाव होता है। आप अगर दुधारू निकले तो बिकेंगे वरना बांझ बैल को कोई नहीं ख़रीदता। यहां ऐसी मशीनें लगाई गईं हैं जो बैल से भी दूध निकाल लेतीं हैं। बैल बनिये शायद क़ीमत लग जाए।
जिस लीक पर चलने की आदत आपकी है, जिसे आपने तलाशा और तराशा है, जिसकी वज़ह से आपकी पहचान है, उससे लगाव होना स्वाभाविक है। उस लीक से अलग हट कर चलना हर मज़हब के ख़ुदा की नज़रों में गुनाह है।
अपनी मौलिकता का दम घोंट कर कुछ हासिल करना ख़ुद को मारकर ज़िन्दगी तलाशने जैसा है। भूत बनकर जीना इंसानियत के लिहाज़ से  ठीक नहीं है।
किसी के डिमांड पर बदल जाना और ख़ुद को वैसा ही तैयार करना जैसा कोई चाहता है, अपनी जड़ों में तेज़ाब डालने जैसा है। जिस दिन इनका मक़सद पूरा हुआ मैंगोफ़्रूटी के बोतल की तरह निचोड़ कर फेंक देंगे ये लोग।
पिचका हुआ डिब्बा बनकर डस्टबिन में जाने से अच्छा है शीशे का बोतल बनकर चकनाचूर हो जाना। कोई पैरों से रौंदना भी चाहे तो चुभने के डर ऐसा न कर पाए।
अपनी मौलिकता के लिए शहीद हो जाना अच्छा है, टूट जाना बेहतर है लेकिन पहचान खो कर सुरक्षित रहना नहीं।
ख़ुद को संवारना है, निखारना है, चमकाना है लेकिन खोना नहीं है। बहुत प्यार है ख़ुद से। बदल गया तो बेवफ़ाई हो जाएगी अपने आपसे। ख़ुद से बेवफ़ाई करने की हिम्मत अभी नहीं है ।
कभी होगी भी नहीं।
इंसान होने का कुछ तो घाटा होना चाहिए, रोबोट तो हूँ नहीं जो प्रोग्रामिंग से चलूँगा...कुछ डीएनए में ही खोट है...
कानून पढ़ते-पढ़ते भारत के संविधान की तरह रिजिड हो गया हूँ, जीवन के कुछ अनुच्छेदों को लेकर। फ्लेक्सीबिलटी तो रूठ के चली ही गई है..सुप्रीम कोर्ट के आदेश को  दिल ने अप्रूवल दे दिया है, जिसके कारण i can't amend the basic structure of my life.
अब जैसा भी हूं, जितना भी हूं, ऐसा ही हूं...बदल गया तो शायद ख़ुद की नज़रों में गिर जाऊंगा जो मैं हरगिज़ नहीं चाहता।
- अभिषेक शुक्ल

शनिवार, 18 मार्च 2017

कुछ तो मेरा इलहाम रहे

दिन भर कोई काम करूं पर
शाम तुम्हारे नाम रहे
तुमको पल भर ना बिसराना एक
ही मेरा काम रहे,
क़ातिल शोख़ अदाओं से तुम
दुनिया भर की चाह बनो
आख़िर में मेरी हो जाना
कुछ तो मेरा इलहाम रहे।
- अभिषेक

मंगलवार, 7 मार्च 2017

क्या हुआ उम्र भर साए में खड़ा था ख़ुद के


                            वक़्त बीतेगा मगर मैं नहीं जाने वाला
                            अपने साए को अलग छोड़ भुलाने वाला,
                            लोग आते हैं मुझे छू के चले जाते हैं
                            है नहीं कोई मेरा साथ निभाने वाला,
                            क्या हुआ उम्र भर साए में खड़ा था ख़ुद के
                            मैं नहीं अपने किसी ग़म को जताने वाला,
                            वक़्त-दर-वक़्त ख़ुद से प्यार मेरा बढ़ता है
                            मैं न आंसू को कभी आंख में लाने वाला,
                            मैं तो भटका हूं मुझे राह दिखा दे साथी ।
                            आ मेरे साथ मुझे चलना सिखा दे साथी।।

                                                                                                                    -अभिषेक

शनिवार, 4 मार्च 2017

गाली क्यों देते हो ?

गाली सभ्य समाज की असभ्य सच्चाई है। सभी वाद वाले व्यक्ति इसे समान रूप से प्रयोग में लाते हैं।
 अखंड रामचरित मानस का जब पाठ होता है तो एक संपुट चुना जाता है। जिसे बार-बार पढ़ा जाता है। आधुनिक प्रगतिवादी और रूढ़िवादी प्रजाति के जीव गालियों को सम्पुट की तरह प्रयोग में लाते हैं। बहन और मां तो सॅाफ्ट टार्गेट हैं।
 आश्चर्य तब होता है जब खुद के लेखन और विचारधारा को प्रगतिशील बताने वाले लोगों के लेखों में भी गालियां भाषाई सौन्दर्य की तरह प्रयुक्त होती हैं। जिस रफ्तार से गालियां लिखी जा रही हैं, मुझे विश्वास हो रहा है कि किसी दिन कोई साहित्य का मठाधीश गाली को भी साहित्य की एक विधा घोषित करेगा।
 एक ग़लतफ़हमी थी मुझे कि साहित्यकार और पत्रकार सभ्य और शिष्ट भाषा में बात करते हैं और लिखते हैं। आभासी दुनिया ने मेरा ये भ्रम भी तोड़ दिया है।
 गाली पुरुषवादी मानसिकता के पोषक लोग ही नहीं देते हैं। कई नारीवादी लेखक,लेखिकाओं और विद्यार्थियों को भी गाली बकते सुना है। उनका भी सम्बोधन मां, बहन की गाली से ही होता है।
 एक मोहतरमा हैं जिन्हें मैं जानता हूं। दूर से हाय-हेल्लो होती है। इन दिनों कार्ल मार्क्स की उत्तराधिकारी ही समझती हैं वे ख़ुद को। उनसे बड़ा फेमिनिस्ट मैंने कहीं देखा नहीं है।( कुछ लड़के हैं जो उन्हें भी टक्कर देते हैं।)
एक दिन कैंटीन से बाहर निकलते वक़्त पैर में उनके कोई लकड़ी चुभ गई। लकड़ी की बहन को उन्होंने कई बार याद किया। बेचारी लकड़ी की मां-बहन सबको निमंत्रण दिया गया।
 ख़ैर बेचारी लकड़ी का क्या दोष। निर्जीव है वो भी शाखों से टूटी हुई ऐसे में कैसे अपनी बहन संभाले?
इनसे एक मासूम से लड़के ने पूछ लिया कि आप तो नारीवाद पर लेक्चर देते नहीं थकती हैं। लेकिन गाली मां-बहन से नीचे देती ही नहीं हैं आप। उन्होंने बेचारे लड़के को पहले तो लताड़ पिलाई फिर गाली को विमेन एम्पावरमेंट से जोड़ दिया।
 न तो मुझे ही गाली वाला एम्पावरमेंट समझ में आया न उस बेचारे लड़के को।
 मैं भी मेघदूत मंच पर बैठे-बैठे सब देख रहा था।
 तब वहीं बक्काइन के पेड़ के नीचे मुझे ये आत्मज्ञान मिला कि ये सब ढकोसले प्रगतिशील होने के अपरिहार्य अवयव हैं। आप महिला हैं और मां-बहन की गाली नहीं देती हैं तो क्या ख़ाक फैमनिस्ट हैं? चिल्लाइए, समाज को धोखा दीजिए। बात सशक्तीकरण की कीजिए पर शोषण का एक मौका हाथ से न जाने दीजिए।
 जिस दर्शन के अनुयायी होने का हम ढिंढोरा पीटते हैं दरअसल वो हमारे महत्वाकांक्षाओं को तुष्ट करने का साधन मात्र है।
 नारीवादी पुरुषों पर क्या कहूं? सब मोह माया है।
 उनका नारीवादी होना हमेशा संशय में रखता है मुझे। कब ये लोग किसे शिकार बना जाएं कहा नहीं जा सकता।
 बेड और विमेन एम्पावरमेंट को एक ही तराजू में तौलते मिलते हैं ये लोग। लड़की बस लड़की होनी चाहिए चाहे साठ साल की हो या नौ साल की। समदर्शी होने के कारण सबको एक ही नज़र से देखने की आदत होती है इनकी। इनका भी एम्पावरमेंट कमर से शुरू होता है कमरे तक जाता है। फिर रास्ता बदल लेते हैं। लड़की पूछती रह जाती है मुझे भूल गए? इनका जवाब होता है -
कौन? तुम्हें पहचाना नहीं।
 एक बड़े पत्रकार हैं। आम आदमी या पत्रकारिता के सामान्य विद्यार्थी के लिए तो इतने बड़े कि कई सीढ़ी लगा कर उन तक पहुंचना पड़े। नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण के नाम पर दर्जनों वीडियो यू ट्यूब पर मिल जाएंगी आपको। बड़े से बड़े अख़बार, हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के चाहते हैं कि सर कुछ लिख दें हमारे अख़बार में।
 बीते दिनों उनसे मिला। मेरे साथ मेरे एक सहपाठी भी थे।ज़्यादातर वक़्त उन्होंने ही बात किया। ख़ूब बातें हुईं। जिस तरह की बातें वे कर रहे थे उस तरह की बातों में मेरी अभिरुचि कम है। इसका कारण मेरा रूढ़िवादी होना भी हो सकता है या इसे इस तरह भी आप समझिए कि मेरे पारिवारिक संस्कार मुझे ऐसी बातों को अच्छा नहीं मानने देते।
 उनकी नज़र में भी महिलाएं केवल मनोरंजन मात्र हैं। पत्नी है पर बहुत सारे एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी हैं। काम दिलाने के बहाने भी बहुत कुछ काम करते हैं। बॅालिवुड की भाषा में जिसे कास्टिंग काउच कहते हैं। इनकी भी ख़ास बात ये है कि गाली को संपुट की तरह ज़ुबान पर रखते हैं।
 ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जिन पर नारीवादी होने का ठप्पा लगा है पर सबसे ज्यादा शोषण के मामले भी इन्हें के खिलाफ मिलते हैं। ये लोग गाली और सेक्स को विमेन एम्पावरमेंट मानते हैं।
 दो दशक हो गए लेकिन अब तक एम्पावरमेंट का ये फार्मूला समझ में नहीं आया। सच में ऐसे लोग समाज पर धब्बा होते हैं।
 भारतीय जनसंचार संस्थान में आकर बहुत सारे नए तथ्यों से पाला पड़ा है। कई सारे खांचे होते हैं इस दुनिया में। जो जिस ख़ांचे को सपोर्ट करता मिले समझ लीजिए तगड़ा डिप्लोमेट है। मुखौटा लगा रखा है सबने। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। रंगा सियार की तरह।
 कोशिश कीजिए किसी वाद के चक्कर में न पड़ें।
 अगर पड़ गए हैं तो पहले थोड़े रुढ़िवादी संस्कार जरूर सीख लें। आपको इंसान बनाए रखने में बहुत काम आएंगे। कई बार लोग कहीं से पढ़-सीख कर आएं हों फिर भी ओछी हरकतें करने से नहीं चूकते क्योंकि उनकी प्रवित्ति ही निशाचरों वाली होती है। ऐसे में उनसे केवल सहानुभूति ही रखी जा सकती है। कोई ऐसा सॅाफ्टवेयर बना नहीं जो इन्हें इंसान बना दे।
 गाली कोई भी देता हुआ अच्छा नहीं लगता। महिला हो, पुरुष हो या किन्नर हो।
 कुछ चीज़ें कानों में चुभती हैं। गाली भी उनमें से एक है। किसी की मां-बहन तक जाने से पहले सोच लिया करें कि उन्होंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा है। जिसने बिगाड़ा है उससे सीधे भिड़िए आपको अधिक संतुष्टि मिलेगी।
 गाली को तकिया कलाम न बनाएं, इससे भी अच्छे शब्द हैं जिन्हें प्रयोग में लाया जा सकता है। कोई कितना भी विद्वान क्यों न हो जब गाली देता है तो असलियत सामने आ जाती है। लग जाता है कि पढ़ाई ने केवल दिमाग की मेमोरी फुल की है, व्यवहारिकता के लिए खाली जगह को डीलीट कर के। भाषा अधिक महत्वपूर्ण है विषय से। पहले इसे सीखा जाए फिर विषय पढ़ा जाए। नि:सन्देह अच्छे परिणाम सामने आएंगे। व्यक्ति के अच्छा वक्ता होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं।
 जानते हैं! गाली मानसिक रूप से पंगु और कुंठाग्रस्त लोग देते हैं। आप नहीं न पीड़ित हैं इस रोग से ?

( चित्र का पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है, प्रथम दृश्य में जहां ये महाशय खड़े हैं वहीं मैं बैठा था।)
- अभिषेक



शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

किस ओर जा रहा है भारत में राष्ट्रवाद?

यदि आप स्वयं को भारतीय संस्कृति के रक्षक मानते हैं या आपको अपने घनघोर राष्ट्रवादी होने का अभिमान है अथवा आप भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय सदस्य हैं तो आपसे एक अनुरोध है कि आप फिर से उन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों का अध्ययन करें जिन्हें आपने बचपन में पढ़ा,सोचा या समझा है।
याद कीजिए जब आप घर से स्कूल के लिए निकलते थे तो स्कूल में आपको क्या-क्या सिखाया जाता था। कैसे प्रार्थना में आपको ये समझाया जाता था कि इस संसार में सब पूजनीय हैं, धरती माँ से लेकर पशु-पक्षी तक। किस तरह से आपको समझाया जाता था कि समाज समता मूलक है। दुनिया एक परिवार की भांति है जिसमें सबको परस्पर प्रेम और सहअस्तित्व की भावना को स्वीकार कर साथ-साथ रहना चाहिए।
कैसे समझाया जाता था कि दुनिया एक दर्पण की तरह है जैसा आपका आचरण होगा वैसा ही आपके साथ व्यवहार होगा।
 व्यवहार और आचरण की शुद्धता पर तो नैतिक शिक्षा की कक्षा ही लगाई जाती थी, जिसमें सिखाया जाता था कि शत्रु से भी मित्रवत् आचरण करो। शत्रुता अंततः प्रबल प्रेम के आगे हार जाती है। हर धर्म और विचारधारा का सम्मान करो। अपनी विचारधारा किसी पर थोपो मत। विचारधाराओं की लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई न बनाओ।
मृदुभाषिता, अहिंसा और भाषा की सौम्यता पर तो दर्जनों श्लोक पढ़ाए और समझाए जाते थे।उन सारे  श्लोकों से,शिक्षाओं से आपके व्यवहार का विपथन आपको नितांत अतार्किक और अप्रासंगिक ही बनाएगा। इनमें से तो कोई एक लक्षण आपमें नहीं दिख रहा है।
समझ में नहीं आता कि ये सारी व्यवहारिकता आप लोगों के आचरण से रूठ कर कहां चली गई है। क्या गोस्वामी जी की चौपाई को सही मान लें कि 'जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकि मति पहिले हर लीन्हा'? बीते कुछ दिनों से तो यही लग रहा है।
ग़ज़ब पागलपन सवार है कुछ लोगों पर।
किसी भी संगठन का विनाश उसके आलोचक या प्रतिद्वंद्वी नहीं करते हैं। वे चाहते हैं कि वो संगठन फले-फूले तभी तो दमदार प्रतिद्वंद्वी मिलेगा आलोचना करने को,  हराने को। लड़ाई तो बराबरी वालों से ही अच्छी होती है न?
लेकिन यहां तो संगठन के अंध समर्थक ही संगठन को मिटाने के लिए पर्याप्त  हैं।
इस विनाश के मूल छिपा  है कार्यकर्ताओं का व्यवहार। व्यक्ति का  व्यवहार सामान्यतः उसके पारिवारिक संस्कारों पर निर्भर करता है, कई बार आस-पास का माहौल और सामाजिक दशा पर भी, किन्तु यह ध्रुव सत्य नहीं है। व्यक्ति के अच्छे या बुरे व्यवहार के अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे संगति,स्वभाव, रुचि इत्यादि।
यही अंधसमर्थक कार्यकर्ता संगठन की फजीहत कराते हैं। इनका पढ़ा-लिखा होना भी किसी काम का नहीं होता क्योंकि ये अपने विवेक का इस्तेमाल शायद ही कभी करते हैं। इसे मार दो, इसे पीट दो, ये फालतू बोल रहा है, ये ऐसे कैसे बोल सकता है। चलो साथियों आज इनपे बजा देते हैं, हाथ-पैर तोड़ देते हैं बहुत अकड़ आ रही इसमें...इस चक्कर में सारा संगठन हाशिये पर चला जाता है।
सामान्यतः भारत में जन्म लेने वाला हर दर्शन इसी उन्माद की भेंट चढ़ता है। अंधअनुयायियों की एक फौज पूरी विचारधारा को ले डूबती है। इनकी ख़ास बात होती है कि ये लोग न तो उस दर्शन को पढ़ते हैं न ही समझने भर की बुद्धि होती है। इन्हें केवल ठोकने-पीटने से मतलब होता है। संगठन की सदस्यता ये उस दर्शन से प्रेम की वज़ह से नहीं लेते बल्कि भौकाल बढ़ाने के लिए लेते हैं।
हर संगठन और विचारधारा को ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए। मूढ, कुसंस्कारी और क्रोधी व्यक्ति कभी भी विश्वसनीय नहीं होता और किसी संस्था के लायक नहीं होता। इनसे किसी संस्था का रत्ती भर भी फायदा नहीं हो सकता। हां! इनसे होने वाले नुकसान पर तो महापुराण लिखा जा सकता है।
भारत की सांस्कृतिक विरासत पर यदि आपको अभिमान है, भारतीय मूल्यों पर आपको गर्व है तो ठीक है। होना चाहिए, मुझे भी गर्व है। लेकिन मेरा गर्व अहंकार की परिधि में नहीं आता है।
लाठी- डंडों से आप सबको नैतिकता नहीं सिखा सकते। यह कृत्य स्वयं ही अनैतिक है। भारतीय दर्शन हिंसा की बात तो नहीं करता। शांति, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द और सहअस्तित्व की भावना, भारत के मूल दर्शन का हिस्सा है। सोचिए कितने कटे हैं आप इससे। कितने भटके हुए हैं आप भारतीयता से। किस ओर ले जा रहे हैं आप समाज को?
असहिष्णुता, हिंसा और धार्मिक भेदभाव की ओर?
ये आपकी राष्ट्रभक्ति है? एक हाथ में शराब, दूसरे हाथ में डंडा और मुंह में मां-बहन की गाली। उसी बीच में भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा।
किस तरह के भारत का आप प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?
मेरी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा एक संघ समर्थित विद्यालय में हुई है। पहली क्लास लगने से पहले वंदे मातरम्, जन-गण-मन और सरस्वती वंदना होती थी। इंटरवल में लंच से पहले अन्नपूर्णा प्रार्थना होती थी और शाम को छु्ट्टी से पहले राम और वंदे मातरम् का उद्घोष होता था। लेकिन इन सबके बावजूद भी किसी धर्म के प्रति दुराग्रह का पाठ नहीं पढ़ाया जाता था। सब बच्चे साथ रहते थे, खेलते थे,पढ़ते थे। देश प्रेम समझाया जाता था।
मैं संघ पोषित स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को भी जानता हूँ। भारतीय दर्शन और व्यवहार पर जब ये छात्र बोलते थे तो मंत्रमुग्ध हो सुनने का मन करता था। वे सारे छात्र कहीं न कहीं स्थापित हो गए हैं। कोई पढ़ रहा है तो कोई पढ़ा रहा है। कोई प्रशासनिक सेवा में है, कोई सेना में है  तो कोई इंजीनियर है। कोई वकील है तो कोई डॅाक्टर है। सब कामयाब हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में नाम कर रहे हैं।
ये सारे वे लोग हैं जिन्होंने इन संस्थानों में पढ़ाई की है। संस्कारों को जिया है, सीखा है। ये लोग उन्मादी नहीं हैं।
अगर ये लोग उपर्युक्त संस्थानों में आ जाएं तो कितना अच्छा हो।
सावरकर को तो इन्होंने पढ़ा है, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को तो इन्होंने पढ़ा है। भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रवक्ता तो ऐसे लोग हैं फिर ये लोग संगठनों में क्यों नहीं हैं? और वो लोग जो कार्यकर्ता कम गुंडे ज़्यादा हैं कहां से आए हैं? क्या सच में ऐसे संस्थाओं के सदस्यता के लिए अधिनियमित आहर्ता में नया संशोधन किया गया है? अब ऐसे ही लोग सदस्य बन सकेंगे जिनमें उत्पात मचाने का हुनर होगा?
विरोधी विचारधारा को सुने बिना तलवारें तान लेना कहां तक सही है। ये कहां का भारतीय दर्शन है?
लोकतंत्र में विचारधाराओं के सहअस्तित्व की स्वीकार्यता तो होनी चाहिए न?
सुनते क्यों नहीं? आपके पास भी अवसर आएगा असहमति का। अपने तर्कों से उन्हें अतार्किक सिद्ध करें। यह आपका संवैधानिक अधिकार है।लेकिन उनके विनाश के लिए हवन करना न शुरू कीजिए। आप जनमेजय की तरह निस्पाप नहीं हैं।
 अगर सब आपके ही विचारधारा का अनुसरण करने लगे तो भारत नीरस हो जाएगा। आपका  संगठन ही कई धुरियों में बंट जाएगा। कुछ अच्छे लोग ये उत्पात सहन नहीं करेंगे। अगर वे सब आपके संगठन से निकल गए तो फिर किसी भी दिन आप पर पूर्णकालिक बैन लगाया जा सकता है। जनता सब जानती है। किसी को भी एक हद से ज्यादा अवसर नहीं देती।
और हां! एक भारत और श्रेष्ठ भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब आपका व्यवहार और आचरण संयमित हो। आप भारतीय मूल्यों को जानते हों, आप तार्किक होने के साथ-साथ बुद्धिमान और विनम्र भी हों , जिससे लोग आपको सुन सकें और आप लोगों को सुन सकें।
 लेकिन आपका अपने पथ से भटकाव देखकर नहीं लगता कि आपकी कोई ऐसी मंशा है। आप ही बताइये! कहां ले जाना चाहते हैं भारत को? भारत को छोड़िए आपकी वज़ह से भारत को कुछ नहीं होगा। बहुत लोग आए भारत को तहस-नहस करने  सब पता नहीं कहां चले गए।
आप अपने ही संगठन को कहां ले जा रहे हैं? क्या कोई भी बुद्धिजीवी आपके इन ओछी हरकतों को सहन करेगा?
यदि आप सच में चाहते हैं कि आपका संगठन आगे बढ़े, तो आपको दो काम जरुर करना चाहिए-
पहला- आप अपने संगठन से इस्तीफा दे दें। कुछ दिन आराम करें और फिर से संस्कार और अनुशासन सीख कर आएं। आत्मावलोकन करें, आपको आभास हो जाएगा कि आपको सिखाया क्या गया था पर आप कर क्या रहे हैं। अगर पता होने के बाद भी आपको ग्लानि नहीं हो रही है तो आप इन संस्थाओं के लायक नहीं हैं। पुनः सदस्यता लेने की सोचें भी मत।
कुछ और काम कर लीजिए। संगठन आपसे बरबाद ही होगा बनेगा नहीं।
दूसरा ये कि सुनना शुरू कर दीजिए। अगर आलोचना नहीं सुनेंगे तो सुधार नहीं आएगा। सुधार नहीं आएगा तो बिगड़े लोगों को समाज मुख्य धारा में कभी गिनता नहीं है। सुधार अपरिहार्य है। अपने प्रासंगिकता के लिए आपको सुधरना होगा।
ख़ैर, जो भी करना हो कीजिए लेकिन इतना उन्माद और अहंकार न पालें। कुछ भी यथावत नहीं रहता।
जानते हैं न अहंकार ईश्वर का भोजन है। भगवान ने कहा है तो सही ही होगा। न लगे तो ऐसे ही बने रहिए, आभास भी हो जाएगा। फिर खोजते रहिएगा भारत के भूगोल पर स्वयं को।
आपसे सहानुभूति है इसलिए इतना लंबा पुराण लिखा। अपने समय को आपके लिए खर्च किया वो भी नि:शुल्क। आगे सब आप की इच्छा।
जय हिंद! वंदे मातरम्।
-अभिषेक शुक्ल।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

यहां जब भी हवा चलती

यहां जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैं
कभी जब सोचता तुमको
तो रातें कम सी होती हैं,
अज़ब है ग़म का भी आलम
न मैं कुछ कह के कह पाऊँ,
बिना तेरे मेरी सांसें
बड़ी बेदम सी होती हैं।।
फोटो - पीयूष कौशिक
(पुराने पन्नों से😊)

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।

जो तुम्हारे प्यार में हर पल नया संगीत ढूंढे
चल सके हर पल परस्पर साथ वो मनमीत ढूंढे,
रोज तन्हाई में खुद के संग तेरा नाम जोड़े
बावरा मन हर जगह खोया सा तेरा प्रीत ढूंढे।
काश! काली रात सा मैं भी किसी पल बीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।।
-अभिषेक शुक्ल