गुरुवार, 15 नवंबर 2018

सांत्वना नागफनी है, गहरे भेदती है

कई बार भाग जाने का मन करता है। अकेलापन काटने दौड़ता है, किसी का साथ होना चुभता है।

लोग साथ हों तो बेचैनी, न हों तो अजीब सी चुभन। ठहाके हर बार अच्छे नहीं लगते, अपनी हंसी भी कई बार ख़राब लगती है।

ख़ुश होना चाहते हैं लेकिन हो नहीं पाते। सच है जो गया है उसे लाया नहीं सकता, फिर भी मन किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए रहता है।

इक उम्मीद कि जो बुरा सपना हम देख रहे हैं अचानक से टूट जाएगा। सब सपना है जिसे हम देखकर परेशान हो रहे हैं। आख़िर आंखें मूंदने पर हमारे आसपास दुनिया होती ही कहां है?

जगह बदलते ही उस जगह के होने का क्या प्रमाण रह जाता है।
शून्य, सब शून्य।

पर शून्य को मन मानता कहां है। थोड़ी सी चेतना मन पर भारी पड़ती है।

साहित्य हर बार दिलासा दे ज़रूरी नहीं, कई बार अवसाद भी देता है। गहरा।

कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि मन पर महादेवी का अधिग्रहण हो गया हो, तन निराला हो गया हो, जिसे कुछ भी सुधि नहीं।

कहानियां स्थिर मन से पढ़ी जा सकती हैं। कविताएं उद्विग्नता में नहीं समझ आतीं। दोनों स्थितियां जूझ रहीं हैं एक-दूसरे से।

मन कह रहा है सब बीत जाएगा। बुद्धि कह रही कि कुछ नहीं बीतता। जो बीत गया है, वह भूलता नहीं, जीवन बच्चन की कविता नहीं है, व्यवहार है।

धरातल पर आकर सिद्धांत बदल जाते हैं। टीस, पीर, मोह सच है, भूलना आदर्श स्थिति।
व्यवहार और आदर्श दो 'ध्रुव' हैं, जिन्हें कोई काल्पनिक रेखा नहीं मिला पाती।

......सांत्वना....दूसरों को देना कितना आसान है....ख़ुद के लिए नागफनी है। गहरे भेदती है।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

दुनिया को हादसों की आदत हो गई है!



हादसों की आदत हो गई है. हादसे हर बार आंखों में ढेर सारा आंसू देकर चले जाते हैं.

अमृतसर हादसे में जिन लोगों की मौत हुई है उनकी तस्वीरें देखकर दिल थमा सा जा रहा है.

इतनी विभत्स तस्वीरें शायद ही पिछले दिनों में देखने को मिली हों.

बहुत डरावनी तस्वीरें हैं भीतर से कंपकंपा देने वाली.

दशानन का दहन हो रहा था, कइयों के आनन छिन्न-भिन्न हो गए. विभत्स तस्वीरें आ रही हैं. जिन्हें देखने के लिए साहस चाहिए.

यह प्रकृति की मार नहीं थी. न ही किसी आतंकी संगठन की पूर्वनियोजित हत्या. यह हादसा कैसे हुआ इसका अंदाजा उन लोगों भी नहीं जिनकी मौत हो गई.

रावण का पुतला अपने साथ कई जीवित लोगों को लेकर चला गया.

हादसा हुआ पंजाब के अमृतसर के जोड़ा रेल फाटक के पास. ऐसी खबरें चल रही हैं कि कम से कम 58 लोगों की मौत हो गई है और 72 से अधिक लोग घायल हो गए हैं. आंकड़े और भी बड़े हो सकते हैं.

पठानकोट से अमृतसर जा रही डेमू ट्रेन की चपेट में इतने लोग आए और चले गए. रावण दहन के साथ-साथ इतने निर्दोष लोग भी जा चुके हैं.

मृत्यु के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया जा सकता. परिस्थितियों और प्रशासन को कोसा जा सकता है लेकिन किसी को वापस नहीं लाया जा सकता.

हे भगवान, मृतआत्माओं को शांति दें...मन बहुत उन्मन है.



-अभिषेक शुक्ल

(तस्वीर प्रतीकात्मक)

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

अंततः कवि के हिस्से रिक्तता आती है





वही कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं जो कवि के मन में पलती हैं। जिन्हें कोई और नहीं सुन पाता। जिनकी तारीफ़ कवि ख़ुद ही करता है, जिन्हें वह ख़ुद लिखकर मिटा देता है।

उसकी नज़रों में अपनी अनगढ़ कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं लेकिन दुनिया के लिए वह उन्हें छंदों की बेड़ियों में जकड़ता है, अलंकारों का तड़का लगाता है, आलम्ब खोजता है, समास जोड़ता है, संयोग तलाशता है, वियोग ख़ुद छलक जाता है।

दरअसल यह सब दिखावा है। कवि की जिन कविताओं को लोग पढ़ते हैं वे बनावटी होती हैं। असली कविताएं तो कवि के मन में पलती हैं, जिन्हें वह किसी से नहीं कहता। ख़ुद से भी नहीं।

अच्छी कविता की तलाश में हैं तो कवि को पढ़ें, उसकी रचनाओं को नहीं। बहुत बनावटी होते हैं किताबों के अक्षर।

कवि अपनी रचनाओं में उन्माद की हद तक काट-छांट करता है। ज़रा भी दयावान नहीं।

कवि को पता है कि उसकी रचनाएं उत्पाद नहीं हैं जिनके विनिमय से उसे कुछ मिले। कवि जानता है कि वह मूर्तिकार नहीं है, उसे पता है कि वह सुनार भी नहीं, फिर भी उसे कविताओं की काट-छांट बहुत प्यारी है। क्यों है, इसका जवाब उसे भी नहीं पता।

वह उलझता है, टूटता है, थकता है, बेचैन रहता है, कहते-कहते अटकता है क्योंकि कवि मन की कभी कह नहीं पाता।

अंततः कृत्रिमता उस पर बहुत भारी पड़ती है, जो उसे भीतर से ख़ाली कर देती है।

रिक्तता!
कवि की यही नियति है जो उसे बिन मांगे मिल जाती है, जिसमें वह कुछ रचने की संभावनाएं तलाशता है।


-अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हम भाषा के अपराधी हैं

सहज भाषा के नाम पर हमने, भाषा का वास्तविक सौंदर्य बोध खो दिया है।

नई पीढ़ी कितना कुछ क्लिष्ट कहकर अनदेखा कर देगी। कितने अध्याय अनछुए रह जाएंगे। 

भाषाई सरलीकरण के नाम पर कितने शब्दों की निर्मम हत्या हुई है। उन्हें याद रखने वाली पीढ़ी अंग्रेज़ी में भविष्य तलाश रही है। 

एक पूर्वाग्रह कि हिंदी में लिखा जो कुछ भी है, सब अपशिष्ट है; गहरे तक बैठ गया है। इसे पुष्ट करने वाले लोगों में कोई अपराधबोध नहीं है। उन्हें लगता है, उन्होंने भाषा को जनवादी बनाया है। 

जनवाद! 
भाषा पर बहस करने वाले ज़्यादातर लोगों के भीतर निपट आभिजात्य आत्मा है। स्वप्न या मद में भी इन्हें 'जन' की सुधि कहां?

समाचारों की भाषा साहित्य की भाषा बन गई है। संपादकों ने अपने 'वरिष्ठों' से सीखा है कि भाषा ऐसी हो, जिसे अनपढ़ भी समझ ले। किसी ने अनपढ़ को सुपढ़ बनाने में रुचि ही नहीं दिखाई, क्योंकि 'जन' की सुधि किसे?

यही वजह है कि अनपढ़ व्यक्ति को 'एक्सक्यूज़ मी' और 'प्लीज़' कहना आ गया लेकिन 'कृपया' अथवा 'क्षमा' कहना नहीं आया।

साहित्य वही नहीं है जिसे प्रेमचंद ने लिखा है, दिनकर, प्रसाद, अज्ञेय, महादेवी और भारतेंदु ने भी जो लिखा उसे भी साहित्य ही कहेंगे। बहुत नाम छूटे भी हैं इनमें। 

विश्वभर की तमाम भाषाएं लोग सीख रहे हैं। जिन लिपियों और भाषाओं से हमारा कोई परिचय नहीं, उन्हें हम सीख लेते हैं, लेकिन हिंदी?

शब्द क्लिष्ट नहीं होते, सहज होते हैं। क्लिष्ट कहकर उन्हें प्रचलन से बाहर कर दिया जाता है। वे किताबें जिनमें तथाकथित 'क्लिष्टता' का प्रयोग ज़्यादा है, वे निरर्थक नहीं, उन्हें पढ़ा और समझा जा सकता है। 

क्लिष्टता से जुड़ा हुआ एक प्रसंग याद आ रहा है। उन दिनों मैं दिनकर को पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा,

"गत्वर, गैरेय, सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर, 
थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर।"



मुझे गत्वर, गैरेय, सुघर और भूधर का अर्थ नहीं पता था। मुझे लगा कि ये शब्द मुझसे कह रहे हों कि 'दिनकर को समझना हो तो पढ़ो। तुम्हें समझ में नहीं आ रहे शब्द तो यह तुम्हारी जड़ता है, दिनकर इसके लिए दोषी नहीं हैं।'

हम सब शब्दों के अपराधी हैं। हमने शब्दों की उपेक्षा की है। सृजनशीलता की चौखट से शब्द अपमानित होकर लौटे हैं। शब्द निहार रहे हैं नई पीढ़ी को, मिल रही उपेक्षा से टूटते जा रहे हैं। 

जब किसी देश में नवीन राज व्यवस्था जन्मती है और वृद्ध राजा को अपदस्थ कर, नया राजा पदस्थ होता है तब वृद्ध राजा राजपाट, संन्यास या वानप्रस्थ नहीं चाहता। वह मृत्यु चाहता है।

कुछ शब्द वही चाह रहे हैं। नई पीढ़ी उनकी अंतिम इच्छा पूरी कर रही है.

शनैः शनैः।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

इश्क़ में मनमर्ज़ियां चलती कब हैं...

एक लड़की अपने प्यार के साथ भागने के लिए कैसे भी तैयार हो जाती है, बिना कुछ सोचे-समझे लेकिन लड़के बहुत सोचते हैं। उनके लिए बेड सेफ़ साइड है, लिव-इन या शादी मुश्किल। मां-बाप शादी के लिए तैयार भी हों तो भी, लड़के अकसर बचते हैं। वजह बेहतर की तलाश हो, या कुछ और लेकिन अकसर ऐसा होता है। प्रैक्टिकल में लड़कियां ज़्यादा सीरियस होती हैं रिश्तों को लेकर, लड़के भागना चाहते हैं रिश्तों से। अपवाद भी हैं।

कहानी मनमर्ज़ियां की...

अगर डायरेक्टर दमदार हो तो एक्टर की कायापलट करने में उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। अनुराग कश्यप ने वही किया है विकी कौशल के साथ। विकी कौशल शक्ल से बेहद मासूम नजर आते हैं। भोले-भाले स्मार्ट नौजवान टाइप; लेकिन मनमर्जियां में उनके कैरेक्टर को देखने के बाद विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे मसान, राज़ी, लस्ट स्टोरीज या संजू वाले विकी कौशल हैं।


मनमर्ज़ीयां में उन्होंने ख़ुद को पूरी तरह बदल लिया है।



तापसी पन्नू अच्छी एक्ट्रेस बनकर उभरी हैं। इस फ़िल्म में उनकी शुरुआती सनक देखने लायक है। कंगना याद आती हैं। थोड़ी सी सनकी टाइप।

कनिका ढिल्लन ने कहानी अच्छी लिखी है। हालांकि कहानी बिलकुल फ़िल्मी है। रूमी(तापसी) की तरह उदार पेरेंट्स शायद ही भारत में होते हों। अगर होते भी होंगे तो उन्हें विलुप्तप्राय जीव की श्रेणी में डालकर रेड लिस्ट में रखने लायक है।
फ़िल्म की कहानी जैसी भी है, अनुराग कश्यप ने उसे पर्दे पर ख़ूबसूरती से उतारा है। फ़िल्म के क्लाइमेक्स में आपको कई फिल्मों की कहानियां याद आ सकती हैं।

कौन-कौन सी, यह फ़िल्म देख लीजिए फिर बताइए।

फ़िल्म में असली ट्विस्ट मध्यांतर के बाद आता है। असली कहानी तभी शुरू होती है। अभिषेक बच्चन एक्टिंग में वापसी अरसे बाद हुई है। उनके करियर की बीते कई वर्षों में आई रिक्तता को भरने वाली फ़िल्म है यह।

फ़िल्म की शुरुआत में उनकी एक्टिंग ज़रा भी नहीं लुभाती लेकिन मध्यांतर के बाद असली हीरो वही हैं।

विकी कौशल विकी के ही किरदार में हैं। रूमी के किरदार में हैं तापसी। रॉबी बने हैं अभिषेक बच्चन।

विकी है लापरवाह प्रेमी, उसका प्यार बस बेड पर परवान चढ़ता है। प्यार कम और फ़्यार ज़्यादा करना होता है. प्यार भी उसका अलग की क़िस्म का है. ज़िद्दी आशिक़ टाइप। इमरान हाशमी याद आते हैं फ़िल्म में कई बार। मर्डर-2 के इमरान हाशमी का डायलॉग सूट करता है विकी के किरदार पर, 'तुम मेरी ज़रूरत हो।'
विकी की ज़रूरत लगी है रूमी।

अभिषेक बिलकुल मर्यादा के अवतार लगे हैं। भूत ही समझिए, होते तो हैं, दिखते नहीं ऐसे पुरूष। इतना शालीन, मर्यादा वाला लड़का आसपास में मैंने नहीं देखा, अगर आपने देखा हो तो फ़ौरन चरण गहो, देवता है वह आदमी.

फ़िल्म में दो लड़कियां आती-जाती रहती हैं. जब भी कहानी में नया मोड़ आना होता है दोनों दिख जाती हैं. पहले लगता है कि इनका भी कोई किरदार होगा लेकिन ये बस होती हैं.

फिल्म के कुछ गाने बेहद अच्छे हैं. दरया, चोंच लड़ियां, सच्ची मोहब्बत. अमित त्रिवेदी म्यूजिक डायरेक्शन कई जगह बहुत कर्कश लगा है लेकिन ओवरऑल ठीक है.

वक़्त निकालिए, अरसे बाद कोई मूवी आई है जिसे देखा जा सकता है. देखकर यही कहेंगे-
इश्क़ में मनमर्ज़ियां चलती नहीं, बस मोहब्बत होनी होती है, हो जाती है।

रविवार, 26 अगस्त 2018

राखी के दिन सूनी कलाई

राखी वाले दिन कलाई का सूना रह जाना अखरता है। बेहद ज़्यादा। तब और भी जब आपके पास ढेर सारी बहनें हों, जिनके पास जाने के लिए आपको कम दूरी तय करनी हो।

मन लाख समझाए कि बहनों का आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है भले ही वे कलाई पर राखी बांधे या न बांधे लेकिन दिल नहीं मानता। तब तक, जब तक कि वे राखी बांध न दें।

बचपन से लेकर अब तक कोई साल ऐसा नहीं बीता जब कलाई सूनी रही हो। कलाइयां भर जाती थीं राखी वाले दिन। गांव रहा तो वहां भी खूब सारी राखी। कुछ बड़ी बहनें और छोटी बहनें वहां थीं। कोई न कोई तो ज़रूर रहता था। मीना दीदी, बबली दीदी, रश्मि दीदी, प्रसन्ना दीदी, नीरू दीदी, रुचि दीदी, ऋचा दीदी, पल्लवी, वर्षा, बेटू, सोनल, शिवांगी, छोटी, बिन्नी, इशिता और भी बहुत सारी बहनें। कुछ के तो नाम भी छूट गए होंगे।



गांव वाली बहनों से राखी बंधवा मम्मी-पापा के साथ सुबह ही चेतियां, मदनपुर(बुआ का घर) और बरवां(नानी यहां) के लिए निकलता था। पापा अपनी बहनों से राखी बंधवाते और मैं अपनी।

गांव से बाहर गया तो वहां भी बहनें थीं। रुचि दीदी, दीप्ति दीदी, हिमानी। कुछ साल बाद नीरू दीदी भी आ गई थी। दिल्ली या मेरठ में जमवाड़ा होता था इस दिन।

रुचि दीदी तो ज़रूर रहती थी। इस बार रुचि दीदी भी नहीं थी। बेंगलुरु चली गई बड़े भइया के पास। इस दिन मुंह नहीं बंद रहता था। रुचि दीदी दिन भर खिलाती रहती। मिस कर रहा हूं दीदी तुम्हें।

नौकरी सच में नौकरी है। नौकर बना देती है। आज मेरठ जाना था। दफ़्तर से मुझे छुट्टी मिली नहीं, मैं वहां जा नहीं पाया।

बहुत ज़्यादा बहनों को मिस कर रहा हूं। सबकी बहुत याद आ रही है।

मिस यू ऑल। अगली बार सब राखी ज़रूर भेजना। इस साल की तरह मुझे कोरी नहीं रखनी अपनी कलाई।

लव यू ऑल।

और इस फ़ोटो में सच में मुस्कान झूठी है। कलाई सूनी है।

- अभिषेक शुक्ल।

रविवार, 12 अगस्त 2018

गांव में ऐसा है मनभावन सावन


कोई छह-सात वर्ष हो गए थे झूला झूले हुए. बारहवीं पास करने के बाद जो त्योहार छूटे, सावन में भी उनमें से एक था. मुझे सावन  त्यौहार ही लगता है. महीने भर का त्यौहार. कजरी, आल्हा और गीतों का महीना.

जिधर से गुज़रो कहीं न कहीं से किसी की खनकती आवाज़ में कोई गीत कानों तक पहुंच ही जाता था. कोई पेशेवर गायिका कितने भी दिन सरस्वती की आराधना क्यों न करे, गांव की पड़राही भौजी की राग मिलने से रही. उनकी कजरी सीधे दिल से निकलती थी दिल में उतरती थी. भीतर तक.



हरे राम कृष्ण बने मनिहारी ओढ़ लिए सारी रे हारी
सिर धरे डलरिया भारी हरे रामा करतै गलिन में पुकारी कोई पहिननवारी रे हारी.
स्वर कभी सीखा नहीं जाता. गीत विद्या नहीं है, कला है. कला कोई सिखा नहीं सकता. कोई भी नहीं. कोई गुरु नहीं. कला का शिष्यत्व से चिरंतन बैर है. वाल्मीकि को किसी ने पहला  छंद रचना नहीं सिखाया होगा. न ही किसी ने उन्हें मात्रा गणना का बोध कराया होगा. उन्होंने सीख लिया होगा. वैसे तो कहा जाता है कि वेद अपौरुषेय हैं लेकिन उन्हें जिसने भी मूल रूप में दुनिया को कुछ बताया होगा वहा कलाकार ही रहा होगा.
ठसक लिए कोई देहाती महिला अथवा पुरुष. कोई ज्ञानी ब्राह्मण नहीं. ज्ञानी व्यक्ति तो कला को मारकर ज्ञानी बनता है.

गांव की गायिका को रियाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती. जब मन किया गा लिया. ऐसा संगीत जहां वाद्य यंत्र नगण्य हो जाते हैं. स्वर ही ढोलक की थाप होते हैं, पायलों की छनछन ही झांझ. फिर कौन न सासें रोक गीत सुनने बैठ जाए.

 

दिन में झूला झूल लिया. रात में अम्मा(दादी) से कजरी सुन ली. मेरा तो सावन सार्थक हो गया. धीमी-धीमी बारिश हो रही है. झींगुर टर्र-टर्र कर रहे हैं. मेंढकों ने भी तान छेड़ दिया है. ऐसे में मच्छर कहां पीछे छूटने वाले. उनका भी गायन चालू है. मच्छरों से थोड़ी अनबन है, पर अपने हैं. काट रहे हैं पर पेट भरने के लिए.
वीडियो मेरे ननिहाल का है. बरगद पर झूला पड़ा है. साथ में वीरू भइया हैं, अंकित है और जो  बचा है उस बच्चे  का नाम नहीं पता.
झूमिए....क्योंकि सावन है.



- अभिषेक शुक्ल

रविवार, 5 अगस्त 2018

जब दोस्त, दोस्त के लिए पथरीली राहों पर चला नंगे पांव

दोस्ती का नाम ज़ेहन में आते ही सरस्वती संस्कार मंदिर की कक्षा याद आने लगती है। उस वक़्त क्लास जैसी कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी और 'सर' नहीं आचार्य जी हुआ करते थे।

कक्षा शिशु में मेरे चार बेस्ट फ्रेंड बने। सुमित, अमित, सूरज और अनिल। टिकाऊ दोस्त थे। इनके रहते बहुत दिनों तक कोई और दोस्त बन नहीं पाया। सूरज का मुंडन नहीं हुआ था। बालों में रुमाल बांध कर आता था।

सुमित और अमित असली वाले दोस्त थे। सुमित के पास बहुत से क़िस्से होते थे। पता नहीं कहां-कहां से चुनकर लाता था। गांव-मोहल्ला, ज़िला-जवार सब जगह की जानकारी भाई को थी। चलता-फिरता एंटरटेनमेंट।

अमित हंसने में उस्ताद था। क़िस्से उसके पास भी थे लेकिन सुमित के क़िस्से उसे भी पसंद आते थे। इसलिए नौबत ही नहीं आती थी कुछ सुनाने की।

लेकिन कुछ क़िस्से अमित, सूरज को सुनाता था कोने में ले जाकर। भगवान ही जाने क्या था उसके पीछे का राज़।

अनिल और मेरा गांव एक ही है। इसलिए दोस्ती हो गई। अनिल अपने पूरे कुनबे के साथ आता था।

सूरज अब कहां है, नहीं पता। छठी क्लास में कहीं और पढ़ने चला गया था। अनिल भी छह पास होने के बाद कहीं चला गया था। उसके बारे में ज़्यादा पता नहीं, गांव जाकर ही उसकी ख़बर मिलती है। सूरज और अनिल दोनों फ़ेसबुक पर भी नहीं हैं।



सुमित के साथ एक क़िस्सा याद आता है। दूसरी या तीसरी में पढ़ रहे थे। गर्मी का महीना था। शायद अप्रैल-मई का। स्कूल की टाइमिंग बदल गई थी। सुबह आंख खुलते ही स्कूल भागना होता था और 1 बजे दोपहर में छुट्टी हो जाती थी।

शहर से बाहर घर के आधे रास्ते में एक दिन चप्पल का फीता टूट गया। आसपास किसी मोची की दुकान भी नहीं थी। तपती दोपहर में नंगे पैर लगभग तीन किलोमीटर पैदल जाना था मुझे।

हमारा स्कूल घर से क़रीब चार किलोमीटर की दूरी पर था। सुमित को खरगवार जाना होता था और मुझे परिगवां।

सुमित का रास्ता छतहरी से अलग हो जाता था। उसे भी लगभग इतनी ही दूरी तय करनी होती थी।

सुमित को जब पता कि मेरी चप्पल टूट गई है, उसने अपनी चप्पल उतार दी। मैंने मना किया तो वह ज़िद पर उतर आया। पहन के जाना ही है। उस वक़्त कट्टी का बहुत डर होता था। दोस्त अगर कट्टी ले ले तो पट्टी करने में अगले कई दिन ख़राब हो जाते थे।

सुमित को मुझसे कहीं ज़्यादा ख़राब रास्ते पर जाना होता था। उबड़-खाबड़ रास्ते पर। पर सुमित मानने वाला कहां था। कह दिया तो कह दिया।

डायलॉग अब भी याद है उसका, 'यार हमार तो आदत परा है, तू नाहीं चल पाइबा बाऊ।' मतलब मेरी तो आदत है, तुम नंगे पैर नहीं चल पाओगे।

हम पैदल ही जाते थे। ख़ूब सारे भाई बहन लेकिन संयोग से उस दिन मैं अकेला ही था, भाई-बहनों में कोई स्कूल नहीं आया था। वह दिन मुझे हमेशा याद रहेगा।
सुमित, सच में सु-मित है।

बड़ा होता गया, दोस्त बनते गए। सूरज और उपेंद्र भाई थे, दोस्त बन गए। कभी-कभी परेशान होता हूं तो इन्हें फ़ोन कर लेता हूं। पेनकिलर की तरह हैं दोनों।


सरस्वती संस्कार मंदिर में ही कुछ और दोस्त बने थे। विवेक, बलराम, रविन्द्र, अरविंद, अखिलेश, रहीम, शाहिद, शीबू, अजय, सुरेंद्र, अभिषेक। कुछ दोस्तों के नाम भी याद नहीं रहे। चेहरा सबका याद है।
इनमें से बहुत कम दोस्त संपर्क में हैं।

विवेक जहां 10 नम्बरी आदमी, बलराम वहीं बुद्धिमान और शांत। विवेक तो अब पूरी तरह बदल गया है, सौम्य ज़मीनी नेता बन गया है। मसीहा टाइप।

शीबू स्कूल में मेरा जूनियर रहा है पर बहुत अच्छा दोस्त है। स्कूल में ख़ूब गाना सुनाया है भाई ने। 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी...।'

लड़कियों में तो ज़्यादातर की शादी हो गई होगी। बचपन की बस एक ही दोस्त अब टच में है। फ़ेसबुक बाबा की कृपा से।

जब संस्कार मंदिर छूटा तो कई दोस्त छूट गए। कुछ नए दोस्त बने भी। शिवपति इंटर कॉलेज। नौवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई यहीं से हुई। इस दौरान भी कई दोस्त बन पर ज़्यादातर ग़ायब हैं।

विनय, अमित(द्वितीय), अभिषेक(द्वितीय) और योगेश के अलावा कोई संपर्क में नहीं है।

अम्बरीष, पंकज, सर्वेश, अमित, अभिषेक, सुधीर, सुभाष और केसरी भी ग़ायब हैं इन दिनों। बहुत सारे दोस्त ग़ायब हैं। कहीं रिपोर्ट लिखवाने का सिस्टम हो तो कितना अच्छा हो।

बारहवीं के बाद बने सारे दोस्त सही सलामत और टच में हैं। मोबाइल ने काम आसान कर दिया है। IIMT से IIMC तक जितने दोस्त बने सब फ़ेसबुक पर हैं। अपने ज़िंदा होने का एहसास दिलाते रहते हैं।
बारहवीं के बाद वाले दोस्तों की बातें बाद में।

पढ़ाई से अलग फ़ेसबुक या ब्लॉग पर जिनसे दोस्ती हुई
उनकी भी दोस्ती कम ख़ूबसूरत नहीं। सारे दोस्त बेहद ख़ास हैं।

फेसबुक को मेरे बचपन में भी रहना था, कुछ दोस्त छूटते नहीं, खोजने से भी अब जो नहीं मिल रहे।

आज फ़्रेंडशिप डे है। वैसे मेरा मानना है जितना दिन आपका दोस्तों के साथ ख़राब होता है, फ़्रेंडशिप डे ही होता है। फिर भी, हैप्पी फ़्रेंडशिप डे दोस्तो!
ख़ुद के होने का एहसास दिलाते रहो।
ज़िंदा रहो।


- अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

अंग्रेज़ी में कहते हैं

जिस प्यार के होने का एहसास आपको साथ रहने पर न होता हो, छूटने पर वही प्यार सबसे ज़्यादा याद आता है।
ख़ालीपन में मोहब्बत की ज़रूरत इंसान को ज़्यादा होती है, जिसे किसी के साथ रहने पर समझना मुश्किल होता है।

बोलना, ख़ूबसूरत हुनर है। हमेशा नहीं, पर कभी-कभी तो ज़रूर।

उपेक्षा रिश्तों के लिए घुन की तरह है। किसी को एहसास हो जाए, तो गांठ का पड़ना तय है। फिर रिश्ते संभलते नहीं, बिखर जाते हैं।

जिन्हें रिश्तों को संभालना आता है, उन्हें कहना भी आता है।

अंग्रेज़ी में कहते हैं।
जो कहते हैं न 'उसे' देश की बड़ी आबादी कहने से कतराती है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि फ़ीलिंग नहीं है, बस हर डायरेक्ट बात को इनडायरेक्ट तरीक़े से कहने की आदत है। लोग ऐसा सोचकर चलते हैं कि सामने वाला समझता होगा। समझना हर बार सही तो नहीं होता?

अंग्रेज़ी तो ठहरी विदेशी भाषा, उसमें कौन मन की बात कहे, यहां तो हिंदी में भी कहना गुनाह है। ऐसा लगता है कि पुरखों ने मुंह पर 'अलीगढ़वा ताला' मार दिया है।

एक फ़िल्म है, जो हमारे आसपास की सच्चाई को दिखाती है। आम परिवारों की कहानी, जिसे हम रोज़ घटते हुए देखते हैं।



फ़िल्म का नाम है, 'अंग्रेज़ी में कहते हैं।'

 हीरो हैं संजय मिश्र। फ़िल्म में इनका नाम है यशवंत बत्रा।
हीरोइन एकावली खन्ना। इनके किरदार का नाम है किरण।

संजय की ख़ासियत है कि अपने किरदार को इतनी संजीदगी से निभाते हैं, पता नहीं चलता कि फ़िल्म देख रहे हैं या हक़ीक़त।

बिलकुल उस्ताद आदमी हैं।

एकावली खन्ना भी सधी हुई अभिनेत्री हैं। कौन कितने पानी में, बॉलीवुड डायरीज, डीयर डैड जैसी फ़िल्मों में झलक दिखला चुकी हैं लेकिन इस फ़िल्म में निखर आई हैं।

जो महिलाएं महसूस करती हैं, उन्होंने जिया है।

फ़िल्म देखते हुए आपको भी दीदी, भाभी, मौसी, मम्मी या बुआ याद आ सकती हैं।

कुछ लोग रिश्ते नहीं ज़िम्मेदारियां निभाते हैं। पत्नी से रिश्ता बस औपचारिक होता है।

सुबह नहाने के लिए तौलिया देना, चाय पिलाना, नाश्ता कराना और दफ्तर के टिफ़िन तैयार करके देना, पत्नी का यही प्यार है।

पत्नी दफ़्तर से घर आने के बाद पानी पिला देती है, रात में खाना बनाकर खिला देती है।
पति समझता है कि प्यार कम्प्लीट। ज़िम्मेदारियां निभाना ही प्यार है।

प्यार ज़िम्मेदारी नहीं है।

फ़िल्म में दो कहानी और भी है।

तीन लव स्टोरी है फ़िल्म में, एक-दूसरे से जुड़ी हुई। एक की वजह से यशवंत और किरण अलग होते हैं, दूसरी कहानी की वजह से जुड़ जाते हैं।

पंकज त्रिपाठी ब्रिजेन्द्र काला भी हैं फ़िल्म में। ब्रिजेन्द की कलाकारी औसत है, पर पंकज छोटी सी भूमिका में ही ग़ज़ब ढाए हैं।

पूरी कहानी नहीं लिख सकता, फ़िल्म की कहानी किसी से साझा करना क्राइम है।

वक़्त मिले तो देखिए। बेहद प्यारी कहानी है, शादीशुदा लोगों को अपनी ही कहानी लग सकती है। हालांकि फ़िल्म की कहानी ज़रा सी फ़िल्मी है। असल ज़िन्दगी में अपनी ग़लतियों का एहसास आदमी को कम ही हो पाता है। जिन्हें होता है, उनकी ज़िंदगी में गम के लिए जगह कम बचती है।

हां, फ़िल्म ज़रूर कुछ महीने पुरानी है। कहीं ऑनलाइन देखने का जुगाड़ कर लीजिए।

फ़िल्म देखने में ज़रा सुस्त सा आदमी हूं। कम देख पाता हूं। इसलिए ही इतने दिनों बाद इस फ़िल्म की याद आई। वक़्त मिले तो देखिएगा.....और हो सके तो यशवंत वाली ग़लती मत कीजिएगा, असली ज़िन्दगी में रिश्ते टूटते तो हैं लेकिन जुड़ने के मामले बेहद कम सामने आते हैं।

- अभिषेक शुक्ल।






शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

नाविकों के तन विवशता से मनुजता ढो रहे हैं














जिस प्रलय की धार में तुम यूं प्रफुल्लित हो रहे हो
जाल में उसकी उलझकर कुछ अभागे रो रहे हैं,
उम्रभर की सब कमाई आंसुओं में बह गई है
स्वप्न की कुटिया नयन के सामने वे खो रहे हैं।

पीर का विस्तार देखो हर तरफ जल ही भरा है
नाव के सौदागरों में कुछ थके हैं सो रहे हैं,
भार पतवारों पे इतना कि घिसटकर टूटते हैं 
नाविकों के तन विवशता से मनुजता ढो रहे हैं।


कौन सी मिट्टी तुम्हारे बुद्धि के तट पर पड़ी है
नाश की सारी क्रियाएं क्यों तुम्हें उल्लास लगतीं,
भावना को भस्म कर जो तुम जगत से खेलते हो
मृत्यु की सारी कलाएं क्यों तुम्हें परिहास लगतीं।

सत्य है जीवन क्षणिक है किंतु इसमें दीर्घता है
जीव के अस्तित्व को मन से कभी स्वीकार कर लो,
कुछ पलों का भ्रम समझकर मान लो तुम जी रहे हो
नाश के आभास में ही प्राण का विस्तार कर लो.  


(अभिषेक शुक्ल) 

(इमेज सोर्स- पीटीआई) 

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

वेदना का अंत बहुत सुखद होता है





वेदना का अंत बहुत सुखद होता है। प्रायः, हर बार नहीं। 



सुख मूल्य वसूलता है। कुछ का जीवन कइयों की मृत्यु की परिणति है।



हर दुख की वैतरणी को पार करने के लिए कोई न कोई ऐसी नाव मिल जाती है जो अंततः सुख के तट तक पहुंचा ही देती है।



कुछ दुखों का कोई उपचार नहीं, कुछ घटनाओं का भी। किसी कहानी के कुछ पत्रों की अपूर्ण गति यह कभी नहीं दर्शाती कि उनके साथ कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटित हुआ।



 सब स्वाभाविक है, सबका अपना-अपना प्रारब्ध है। सब किसी अंतहीन यात्रा की ओर आगे बढ़ रहे हैं शनैः शनैः। 

हर बलदेव विवश है, हर कालीचरण जूझ रहा है। हर तहसीलदार भीतर से टूट रहा है, कुछ बन रहा है, कुछ बिगड़ रहा है।  



बेतार अपना काम जारी रखे हुए है। हर कमली कुछ समय तक अभिशप्त है, मौसी की ममता हर जगह वेदना पा रही है। स्वजनों की व्याधि उसे डायन बना रही है। कोई कहीं छिपा बैठा है लाठी लेकर प्राण हतने हेतु। 



 प्रेम में सब कुछ पा लेना ही प्रेम नहीं, कुछ खो देना ही प्रेम नहीं...जूझते रहना ही प्रेम है।



दिन बहुरते हैं, जब तक न बहुरें प्रतीक्षा करने में नुकसान कुछ भी नहीं है।



'कहानी मैला आंचल की.'



नोट: तस्वीर, आत्ममुग्धता के चलते चिपकाई गई है।

शुक्रवार, 29 जून 2018

अनुपम खेर वाली दुनिया में अमरीश पुरी क्यों बनते हैं बाप?

                                                          (तस्वीर: पुराना किला, दिल्ली)

एक लड़के ने कल रोते हुए फ़ोन किया था, "भइया मैं एक लड़की से प्यार करता हूं। मंदिर में हमने शादी कर ली है। लड़की दूसरी बिरादरी की है। घर वाले मान नहीं रहे हैं। भइया मैं उसके बिना मर जाऊंगा। लड़की के घर वाले तैयार हैं, मेरे घर वाले नहीं तैयार हैं। मुझे घर से बाहर नहीं जाने दे रहे, लॉक कर रखा है। मैं क्या करूं?"

लड़के की आवाज़ में बहुत मासूमियत थी। मैंने कहा कोर्ट मैरिज कर लो, उसने कहा घर वाले उस लड़की को कभी नहीं अपनाएंगे।

लड़का आर्मी की तैयारी कर रहा है। अच्छी कद-काठी है। गबरू जवान है। बॉर्डर पर गया तो दो-चार बिना हथियार के ही शहीद कर देगा लेकिन घरवालों के सामने सरेंडर बोल चुका है।

मंसूबा पस्त। जवान हार गया है। ऐसा नहीं है कि उस लड़के के बाप ने कभी प्यार नहीं किया होगा या कभी उनके मन में लव मैरिज जैसी कोई बात नहीं आई होगी, लेकिन उन्हें अपने बाप से हार मिली होगी जिसका बदला महाशय अपने बेटे से ले रहे हैं।

बाप बनने के बाद लोगों का प्यार से 36 का आंकड़ा क्यों सेट हो जाता है?

कोई किसी से प्यार करता है तो जाने दो न यार उसे उसके साथ। तांडव करना ज़रूरी है क्या? क्या पुरखे तभी तृप्त होंगे जब बाप की पसंद से बेटा शादी करे?

फिल्मों वाले सीन पर ताली, असली ज़िन्दगी में गाली? ठीक नहीं है दोस्त।

प्यार करो और करने दो।

अनुपम खेर वाली दुनिया में अमरीश पुरी बनने से क्या फ़ायदा। प्यार ही तो किया है, मर्डर तो नहीं। फिर यह रिश्ता-नाता तोड़ने वाला पनिशमेंट क्यों?

मर्डर और रेप करके आए हुए बेटे को जेल से बचाने की पूरी कोशिश करते हैं घरवाले लेकिन प्यार में घुट-घुट मरने वाले बच्चे पर दया नहीं आती।

सही है, रेपिस्ट बच्चा पसंद है लेकिन अपनी मर्ज़ी से शादी करने वाला नहीं। प्यार करने वाले अपराधी का तो देश निकाला बनता है। यही धर्म है। प्राण जाए पर धर्म न जाए। जान जाए पर जाति न जाए।

प्यार अभी समाज डकार नहीं पाया है। गिनती के कुछ परिवार हैं जिनके यहां लव मैरिज पर हंगामा नहीं होता। एक डायलॉग बहुत फ़ेमस है हिंदुस्तानियों के घरों में। बाप बेटे से बोलता है, "मैं तुम्हारे हिस्से की ज़मीन तुम्हारे नाम कर रहा हूं, बेचकर निकल जाओ। ज़िन्दगी भर चौखट पर क़दम मत रखना।"
मतलब प्यार करो तो घर से निकलो।

लड़कियों के लिए और भी मुश्किल। उन्हें अगर मोहब्बत हो जाए तो उनकी ज़िंदगी अपराधियों से बदतर हो जाती है। सच्चाई है। प्यार की इतनी ही कहानी है।

जब तक घर वाले न मानें, यहां आते रहिए।  ठिकाना है उन लोगों का जिन्हें छिपकर अपने 'उनसे' मिलना होता है। कभी वक़्त मिले तो यहां ज़रूर घूमिए। मोहब्बत का सबसे सुरक्षित ठिकाना है। शायद कपल्स पर यहां डंडे कम बरसते हैं। नहीं भी बरसते होंगे। मेरे किसी दोस्त ने यहां पिटने की सूचना कभी नहीं दी।

बुधवार, 20 जून 2018

क्योंकि कविताओं का पुनर्जन्म नहीं होता

पहाड़ जैसे मन से बहने वाली कविताएं, व्याकरण और छंदों की खाइयों में उलझकर प्रायः मृतप्राय हो जाती हैं। उनमें प्राण डालने की कितनी भी कोशिश क्यों न की जाए, जीवन का संचार नहीं दिख सकता। टूटे हाथ-पैरों की मरम्मत हो जाती है, वैद्य उन्हें जोड़ने में सक्षम हैं लेकिन कविताओं का इलाज करने वाला कोई वैद्य नहीं मिलता।

कोई इनका इलाज भी करे तो कविताएं दुरुस्त नहीं होतीं। अर्थ बदलते हैं, भाव बदल जाते हैं और काव्यगत सौंदर्य भी।



कबूतर के घोंसले से गिरे हुए अंडे को कोई अगर वापस घोंसले में डाल दे तो अंडे में से बच्चे नहीं निकलते। किसी की कविता को भी अगर कोई सुधारना या संरक्षित करना चाहे तो भी कविता संरक्षित नहीं होती। कविता, अकविता हो जाती है। मन का कोई व्याकरण नहीं होता, पर कविता?

खैर जो भी हो, कुछ कविताओं की नियति में विराट शून्य आता है। अनंत ब्रह्मांण्ड में कविताएं भी तैरती रहती हैं, खो जाती हैं। वापस लौटकर कभी नहों आतीं क्योंकि कविताओं का पुनर्जन्म नहीं होता।