मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

राजनीतिक पार्टियों की व्यर्थ संवेदना समाज के लिए घातक नहीं बल्कि जहर है

किसी के आप सच्चे हितैषी हैं तो उसके साथ सहानुभूति न रखें. सहानुभूति और संवेदनाएं किसी के राहों का कांटा जरूर बन सकती हैं ग्लूकोज का काम कतई नहीं करने वाली. सहानुभूति की तुलना आप जहर से कर सकते हैं. मीठा जहर. आज कल लोग बहुत संवेदनशील हो गए हैं. सवा सौ करोड़ की आबादी में सारे संवेदनशील जीव किसी खास प्लेटफॉर्म पर आपको मिल जाएंगे.

किसी के लिए दो कदम भी न चलने वाले लोगों में और ज्यादा संवेदना पाई जाती है. औसत से ज्यादा. इनकी प्रवृत्ति इतनी खराब है कि इन्हें पढ़ लें तो आप खुद को अपराधी समझने लगेंगे. हाय! हमने समाज के लिए कुछ नहीं किया.

संवेदना और सहानुभूति किसी को भी निकम्मा बनाने के लिए कैटेलिस्ट का काम करती है. किसी को पंगु करना हो तो बस उसे एहसास दिलाते रहिए कि भाई आपके साथ बहुत गलत हुआ है, बहुत बुरा हुआ है. आपने जितना अत्याचार सहा है कोई और सहता तो मर जाता. देखो आपके साथ कितना भेदभाव लोग करते हैं. आप लड़िए साथी हम पीछे से आपको तक्का देंगे. आपको बहुत मजबूत करेंगे. आप पर लाठी पड़ेगी तो सबसे पहले हम झेलेंगे.

तहकीकात करेंगे तो पता लगेगा वक्त पर यही लोग सबसे पहले भागते हैं. सहानुभूति रखने वाले लोग वक्त पर काम नहीं आते.

समाज का बंटवारा मनु अपने जीवन काल में उतना नहीं कर पाए जितना सोशल मीडिया ने कर दिया है. कोई अगर अपना कल भूलकर आज में जीना भी चाहे तो उसे याद आ जाएगा कि ओह! कल मेरे साथ बहुत कुछ गलत हुआ था. मैं सताया गया हूं. कल को याद कर आज आगे बढ़ने की संभावनाएं खारिज होने लगती हैं.

बांटने वाले लोग दबे पांव अपना काम सलीके से कर रहे हैं. उम्मीद है आगे भी करते रहेंगे. गाना प्यार बांटते चलो पर बना था उसे अपनाया नफरत बांटते चलो के रूप में गया है.

बांटो, जितना हो सके बांट दो समाज को. किसी दिन समाज के दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण, हिंदू-मुसलमान समझदार जरूर होंगे. तब एक मस्त चिट्ठी लिखेंगे परिवार तोड़ने वाले लोगों के लिए.

उनका संबोधन होगा-
सेवा में,
प्रिय राजनीतिक पार्टियों!
एक बात कहने का मन कर रहा है.
हम आपकी व्यर्थ संवेदनाएं ले क्या करेंगे?
क्या करेंगे?

आपकी निरीह जनता,
जिन्हें आप केवल वोट बैंक समझते हैं.

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

छोड़ोगे जो गरल धरा पर क्या तुम नहीं जलोगे?




तनिक समय अनुकूल हुआ तो नाथ! दर्प क्यों इतना
नेह विसर्जित कर बैठे औ गरल सर्प के जितना?
छोड़ोगे जो गरल जगत में क्या तुम नहीं जलोगे?
तुमको भी रहना धरती पर कैसे यहां पलोगे?
किसी समय तुम अपने विष को खुद ही पी जाओगे
विषधर तुम अपना विष चख कर कैसे जी पाओगे?

मन का झूठा दर्प सहज ही जीवन में दुख बोता
अपनी बोई फसल काटकर मानव क्यों है रोता?
सम्मुख जो भी विपद उपस्थित वह कर्मों का फल है
जिसने समता को अपनाया मानव वही सफल है।

(दिनकर की याद में...शेष प्रवचन फिर कभी 😊)

- अभिषेक शुक्ल।

(15 अक्टूबर 2017 की रचना है.)

(फोटो- pexels)

मंगलवार, 20 मार्च 2018

मेरी किताबें अब अलमारियां पढ़ती हैं




अब मैंने पढ़ना छोड़ दिया है। मेरी किताबें, अलमारियां रोज़ पढ़ती हैं। उनसे जो छूट जाता है, उन्हें मेरा बैग पढ़ता है। मेरे कमरे में अलमारी, बैग, रैक, दरी, चटाई, बेड सब पढ़ने वाले बन गए हैं। जबसे उन्होंने पढ़ना शुरू किया है, मेरा पढ़ने का मन ही नहीं करता।

कई बार सोचता हूं जब रूम में इतने पढ़ाकू हैं तो उनसे कुछ पूछ लिया जाए, घंटों पूछता हूं पर कुछ बोलते ही नहीं। मेरे घर में पड़े सामान बहुत ढीठ हो गए हैं।

उनकी चुप्पी बिलकुल मेरी तरह हो गई है। जैसे मेरा हाल गणित वाली घंटी में हो जाता था, चुप, सन्न, शांत; ठीक वैसे ही।

मेरे हाथ पर तो बेहया के डंडे पड़ते थे लेकिन इन्हें तो मैंने कभी मारा ही नहीं। न ही इनसे मेरा गुरु और शिष्य का संबंध है। इनकी चुप्पी मुझे बहुत अखरती है।

मुझे भरोसा है, किसी दिन मैं यह समझ जाऊंगा कि मुझमें और इनमें कुछ भी अंतर नहीं। इन्हें भी कुछ नहीं आता और मुझे भी कुछ नहीं आता। फिर उसी दिन हमारी कट्टी ख़त्म हो जाएगी और ये मुझसे कहेंगे "दाल, भात, मिट्ठी, कब्बो न कट्टी।"

-इनका अभिषेक।

(फोटो स्रोत- फ्लिकर)

शनिवार, 17 मार्च 2018

क्योंकि साहित्यकार पत्रकार नहीं है



जीवंत किरदारों से प्रेरणा लेना हर लेखक का सामान्य व्यवहार है लेकिन जब लेखक किसी जीवंत किरदार का पीछा करने लगता है तो वह अनभिज्ञता में ही सही, अपने लेखकीय धर्म को तिलांजलि दे रहा होता है। किरदारों का पीछा पत्रकार करते हैं, साहित्यकार नहीं। साहित्य पत्रकारिता नहीं है।

कार्यव्यवहार की दृष्टि से साहित्यकार का काम पात्र रचना है, प्रपंच रचना नहीं। प्राय: ऐसा होता है कि किसी वास्तविक जीवन के किरदार से प्रभावित होते हुए साहित्यकार उसका पीछा करने लगते हैं। किसी किरदार को वास्तविक बनाने के प्रयास में किरदार को ओढ़ने-बिछाने लगते हैं। वहीं साहित्य का उसके मूलधर्म से विलगन हो जाता है।

अनुगामी होकर सब कुछ रचा जा सकता है लेकिन साहित्य नहीं क्योंकि साहित्यकार किसी का अनुगामी नहीं होता, जो होता है वह कुछ और ही होता है, साहित्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता है।

वास्तविक जीवन के किरदारों से प्रभावित होकर किरदार गढ़े जाते हैं। ध्यान रहे, सिर्फ प्रभावित हुआ जाता है, किसी किरदार को अक्षरश: लिख नहीं दिया जाता है। कल्पना लेखक के लिए तूलिका की तरह है।
कोरे पन्नों पर छवि उकेरी जाती है। रंगमंच गढ़ा जाता है। कल्पित पात्र रचा जाता है। कल्पना को विस्तार दिया जाता है लेकिन किसी की जीवनी नहीं लिखते।

व्यक्तिगत लेखन, लेखनी के लिए विष की तरह होता है। किसी पर व्यक्तिगत प्रहार यदि लेखक को सीधे तौर पर करना पड़ा तो उसे बौद्धिक रूप से अपंग ही कहा जाएगा।  कल्पना का विस्तार व्यक्ति को सार्वभौमिक बनाता है। किसी रचना को कालजयी बनाने की कला भी कल्पना शक्ति में ही निहित है, प्रपंच में नहीं।

पत्रकार जीवन भर लिखते हैं। सच लिखते हैं। यथार्थ भी। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर किसी को पत्रकारों के नाम याद नहीं रहते क्योंकि जाने-अनजाने में उन्हें भी वास्तविक किरदारों के पीछे भागना पड़ता है। किरदार तो वक़्त के साथ बदलते रहते हैं पर पत्रकार वहीं टिके रह जाते हैं। इसलिए इतिहास दोनों को भुला देता है।

पात्र बदलते रहते हैं। गतिशील जगत में भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी स्थाई नहीं है। जीवन-मृत्यु भी नहीं। जिसे विधि गढ़ती है उसके भी किरदार बदलते रहते हैं। लेकिन जिन किरदारों को व्यक्ति रचता है वह स्थाई हो जाते हैं।

सिनेमा, साहित्य, कला, रंगमंच सैकड़ों उदाहरण हैं जहां किरदार अमर रह जाते हैं। कोई उन्हें रच कर चला जाता है, कोई उनमें नई संभावनाएं तलाशता है। सृजन स्थाई है, कहानियां बार-बार पढ़ी जाती हैं, ख़बर दोबारा नहीं पढ़ी जाती जब तक प्रश्न आजीविका से न जुड़ा हो।



सत्य को प्रत्यक्ष रूप से भी कहा जा सकता है, परोक्ष रूप से भी। साहित्य में प्रत्यक्ष को भी परोक्ष रूप से कहने की परंपरा है। प्रेमचंद ने भी सत्य कहा है, प्रसाद ने भी। महादेवी, अज्ञेय और बच्चन ने भी। सबने भोगा हुआ यथार्थ लिखा है लेकिन सबके कहने का ढंग अलग था। पहले पात्र रचा, फिर बात कही। किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं लगाए। बच्चन का सत्य अज्ञेय या धर्मवीर भारती का सच नहीं है। उन्होंने यथार्थ लिखा। अपना यथार्थ, किसी और का नहीं।

अज्ञेय ने न जाने किसे लिखा, पर चरित्र रच दिया। सच कह दिया। बता दिया कि विरूपता ही असली मनोविज्ञान है। मानव, जिन संबंधों को पवित्र समझता है, उन्हें आदिम मानव कुछ और ही समझता। सामाजिक बंधन थोपे जाते हैं, स्वाभाविक नहीं होते। बच्चन ईमानदार थे। उनमें सच कहने की क्षमता थी लेकिन कल्पना के पुट के साथ। उनकी आत्मकथा को भोगा हुआ यथार्थ नहीं कहा जा सकता।

सृजन की राह पर चलने वाले पथिक यदि वास्तविक जीवन के किरदारों का पीछा करते हैं तो उन्हें अपयश के अतिरिक्त कुछ और हासिल नहीं होता। किरदारों के पीछे भागते-भागते प्रपंच मनोवृत्ति बन जाती है। सामान्य व्यक्ति के लिए प्रपंच उसकी ज़िंदगी का हिस्सा होता है लेकिन लेखक के लिए नहीं। बचना चाहिए। ऐसा यथार्थ क्यों लिखना जिसे पढ़कर खेद हो, क्लेश हो और लोग आहत हों। लेखक का अपराध बोध ह्रदय विदारक होता है। शनै: शनै: वह अवसादी बनने लगता है।

अवसाद ही मृत्यु है। हालांकि उसके अवसादी होने में भी समाज का हित छिपा होता है। लेखक जब अवसाद में होता है तो सृजनशीलता स्वत: बढ़ जाती है। उसका अवसाद जग के लिए मनोरंजक होता है।

संबंध जोड़ने के लिए होते हैं। उन्हें तोड़ने का माध्यम न बनें। सृजक बनें, ध्वनिविस्तारक नहीं। लिखें, प्रपंची न बनें। आपके भविष्य के लिए ज़हर है, आपका प्रपंची होना। ख़बर लिखेंगे या ख़बर बनेंगे फ़ैसला आपका है। सृजन का वृक्ष बनना है या आभासी दुनिया में 300 शब्दों की छोटी सी ख़बर, जिसका प्रकाशन प्राथमिकता के हिसाब से तय होता है, ऐसी ख़बर जिसे लिखने वाला ही याद नहीं रख पाता।

अंत में,

व्यक्तित्व का विस्तार ही जीवन है। इसमें निर्बाध रूप से बहते रहें, आप का सृजन किसी के पांव का कांटा न बने। चुभे न। सृजन का आधार यही है। स्वांत: सुखाय रचना की नींव में बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय का मंत्र छिपा होता है। अदृश्य रूप से। इसकी अनुभूति तभी होगी जब आप सृजक बनेंगे, प्रपंची नहीं।

शुभमस्तु।

(भइया ने समझाया है, मैंने बस टाइप ही किया है)


(फोटो स्रोत: www.pexels.com)

शनिवार, 3 मार्च 2018

पर्दा है पर्दा, पर्दे के पीछे पर्दानशीं है



आवरण!
विरूपता को ढकने का आवरण. 
सहजता का बोध न होने देने का आवरण.
पर्दे के भीतर का कलाकार बाहरी दुनिया की दृष्टि से ओझल रहे, इस हेतु आवरण.
दुनिया को आवरण बहुत पसंद है क्योंकि आवरण, यथार्थ ढकने का साधन  है. भ्रम ही सही, किंतु कुछ क्षणों के लिए आवरण का भ्रम किसी को भी दुविधा में डाल सकता है.
अभिनेता भी यही आवरण ओढ़ते हैं क्योंकि आवरण ज्ञात को अज्ञात करने का साधन है. जब कोई अभिनय करता है तो उसके पूर्ववर्ती स्वरूप का ध्यान किसी को नहीं होता. उसकी सत्ता गौण हो जाती है, पटकथा का पात्र प्रासंगिक हो जाता है. अभिनेता की वृत्ति अभिनय है. अभिनय से परे  उसका व्यक्तित्व  होता है. स्वाभाविक, जैसा है वह, वैसा ही.

जिन्होंने अभिनय का ककहरा नहीं सीखा है वह अभिनेताओं से अच्छा अभिनय करते हैं. व्यक्तिगत जीवन में. क्योंकि दुनिया रंगमंच हो या न हो, दुनिया में अभिनेता बहुत हैं. जिनकी वृत्ति अभिनय है, उनका अभिनय क्षणिक है. जिनके लिए अभिनय वृत्ति नहीं है, उन्हें जीवन भर उसे ढोना पड़ता है. यथार्थ जीवन के अभिनेता  भीतर की प्रवृत्ति को बाहर के आचरण से नियंत्रित कर ले जाते हैं. उनका अभिनय स्वाभाविक लगता है. 

मुंशी प्रेमचंद ने कहा भी है, ''धूर्त व्यक्ति का अपनी भावनाओं पर जो नियंत्रण होता है वह किसी सिद्ध योगी के लिए भी कठिन है." ऐसे सिद्धयोगी दुर्लभ नहीं हमारे-आपके सामने घूम रहे हैं. मैं भी उनमें से एक हो सकता हूं, आप भी.

बुराइयों की  भनक किसी को नहीं लगेगी, अच्छाइयों के प्रचार के लिए पर्चे बांटे जा सकते हैं. बांटे भी जाते हैं क्योंकि जब आचरण का विज्ञापन किया जाता है तो रेट अच्छा लगता है. लाखों में. दूल्हा अच्छा बिकता है. लड़की का बाप अच्छा दामाद खरीदता है. राम जैसा.
अलग बात है, हर राम रावण है पर हर घोषित रावण का चरित्र उतना भी खराब नहीं होता जितना शोर मचाया जाता है. तात्पर्य यही कि पुण्यात्माओं से बड़ा पापी ढूंढने से नहीं मिलता. लड़का भी.

मैंने कुछ स्तरीय पाप किए होंगे जिनके बारे में मेरे अलावा कोई नहीं जानता. कोई मेरे बारे में अगर अफवाह भी उड़ाए तो  किसी को विश्वास नहीं हो सकता. बच्चन जी की एक पंक्ति है  जो मुझ पर फ़िट बैठती है, "पाप हो या पुण्य हो कुछ नहीं, मैंने किया, कभी आधे ह्रदय से." सबके लिए मैं अच्छा बच्चा हूं. गुड ब्वॉय. संस्कारी. मेरा कुसंस्कार शायद मुझ तक सीमित है. किसी को  मेरी कमियों की ख़बर भी नहीं होगी. मुझे भी नहीं. हो भी नहीं सकता. भावुकता में सतर्कता के साथ समझौता टूटने नहीं पाया. टूट भी नहीं सकता. लेकिन इससे मेरे पाप तो कम नहीं होंगे. जो किया है उसे भोगना है. किसी भी रूप में. मेरा पाप यह है कि अभिनय मेरी वृत्ति का हिस्सा नहीं है लेकिन मैंने अभिनय किया है. संस्कारी बने रहने का अभिनय, संस्कार को तिलांजलि देने के बाद भी.


तथाकथित संस्कार. घरवालों के लिए राम, भीतर से रावण. दर्पण मुझे काटने दौड़ सकता है अगर कभी सामने पड़ गया तो. कब तक भागूंगा ख़ुद से. सामना तो होगा न कभी न कभी मेरा मुझसे.

प्यार! शरीर! आलिंगन! संबंध! विलगन! निष्कर्ष, चरित्र हनन.
मैं चरित्रवान, मेरे साथ किसी कार्य में जिसकी बराबर की संलिप्तता वह चरित्रहीन.
मैं पुरुष, वह स्त्री.
समाज के लिए मैं राम, वह सुपर्णखा.
मैं अपने घर की मर्यादा का  रक्षक, वह कुलटा.
मैं उत्तम चरित्र का पुरुष, वह वैश्या.
ऐसा क्यों?
मुझे पर मेरे घर को गर्व, मैं कुलदीपक!!
वह कलंकिनी.
महिलाएं कुलटा हैं. पुरुष चरित्रवान हैं.
यह आदिम संविधान द्वारा रची गई माया है. कई युग बीतेंगे इससे पार पाने में. सच यही है.


मेरी तरह लाखों संस्कारी बच्चे घूम रहे हैं. पवित्र. शाश्वत. पावक की तरह. सूर्य से भी अधिक ओजस्वी. दीपमान. संस्कारी तो राम से भी अधिक.
बच के रहिएगा. राम, रावण से ज़्यादा बुरे हैं. कलियुग वाले.
कुकर्म कोई बचा नहीं है. सत्कर्म का आवरण है. पीढ़ियां बीत जाएंगी उस आवरण का अनावरण करने में क्योंकि बहुसंख्यक समाज की अवधारणा अल्पसंख्यक समाज की नियति बन जाती है. न जाने क्यों. बनी-बनाई अवधारणाएं टूटती नही हैं. तोड़ भी नहीं सकते हैं.
मैं भी ग़लत हूं. आप भी ग़लत हैं. सामाज भी ग़लत है. सच पच नहीं पाता. आमाशय समाज का दुर्बल है.
आवरण की आदत लग गई है. लोग वल्कल वस्त्र पहन कर व्यभिचार करते हैं. मैं भी. बहुत प्यारा बच्चा हूं, सबकी नज़रों में. दुआ कीजिए मेरे आवरण का अनावरण न होने पाए.

-अभिषेक शुक्ल


(फोटो स्रोत: Heraldsun)

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

नागिन इतनी ख़ूबसूरत होती है क्या?




किसी शायर ने ठीक ही कहा है-
ज़िंदगी क्या है
फ़कत मौत का टलते रहना.

वक़्त कई बार इसका एहसास भी करा देता है. सांसे कब,  किसकी कितनी देर टिकी रहेंगी इसका अंदाज़ा न सांस लेने वाले को होता है न ही साथ रहने वाले को. क़ुदरत है, कुछ रहस्यों पर उसका एकाधिकार है जिसे सुलझाने का हक बस उसे ही है. कोई उसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता. डॉक्टर, वैद्य, वैज्ञानिक सब छलावा है.

श्रीदेवी नहीं रहीं. ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के ज़माने में फिल्म देखना किसी त्योहार की तरह होता था. बैटरी और चिमटी के सहारे फिल्म देखने वाली पीढ़ी श्रीदेवी की फैन क्यों न हो?  इतनी खूबसूरत निगाहें उनके अलावा किसकी हो सकती हैं? टीवी पर श्रीदेवी की फिल्म आ रही हो तो सबके आंखों की चमक बढ़ जाती थी. महतो काका, गंगाराम काका, कपूर भाई या मुड़लाही काकी सबको श्रीदेवी ही पसंद थीं.

एक ज़माना आया जब सिनेमा हॉल घर-घर खुलने लगा. मतलब पर्दा वाला वीडियो. थिएटर का संसार, सीधे आपके द्वार. जनरेटर भले ही कितना खटर-पटर करे लेकिन पर्दे पर अगर श्रीदेवी हों तो जनरेटर की आवाज भी बांसुरी जैसी लगती थी.

पर्दे वाले वीडियो पर पहली फिल्म मैंने देखी थी निगाहें. रंगीन पर्दा था. श्रीदेवी थीं. उन्हें ही देखता रह गया बस. प्यार हो गया था तभी. खैर उसके बाद दो फिल्में और चली थीं, मीनाक्षी की नाचे नागिन गली-गली और माधुरी की हम आपके हैं कौन.

माधुरी, मीनाक्षी शेषाद्री और श्रीदेवी. तीनों से एक ही दिन प्यार हो गया था. अब तक प्यार है.  श्रीदेवी मुझे पूर्ण लगती थीं. ख़ूबसूरती की परिभाषाओं में न सिमटने वाली. अद्भुत, अद्वितीय. उनसा कोई न था न होगा.

उनकी आख़िरी फ़िल्म मैंने देखी थी इंग्लिश-विंग्लिश. पर्दे पर वापसी धमाकेदार थी. धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने वाली अभिनेत्री को इस फ़िल्म में देख कर लगा ही नहीं कि उसे अंग्रेज़ी आती भी होगी. लड्डू बनाने वाली घरेलू महिला, पति के अहंकार और अपमान के  बीच लटकती-झूलती श्रीदेवी. उनसे बेहतर कोई और इस फ़िल्म में शायद ही फ़िट होता.

मैं तेरी दुश्मन-दुश्मन तू मेरा. इसे देखने के बाद कुछ दिन तक मैं भी उन्हें इच्छाधारी नागिन ही समझता था. थीं भी वह कुछ रहस्यमयी सी.
उनकी अदाकारी कम देख पाया उन्हें ही देखता रहा. मेरे लिए उनकी ख़ूबसूरती अभिनय पर भारी पड़ गई थी.

श्रीदेवी अब नहीं हैं. यह सच है. ऑफ़िस आते वक़्त नेट ऑन किया तो सबसे पहले दिखा नहीं रहीं श्रीदेवी. ये ब्रेकिंग सिस्टम भी न अजीब सी चीज़ है. अफ़वाह से पहले सच की ख़बर मिल जाती है. सोचने का भी मौक़ा नहीं मिला कि यह ख़बर अफ़वाह है.

मौत भी अजीब सी मेहमान है. बिना बुलाए आ जाती है. मरने पर रोना-धोना कौन करे.  हैदर अली आतिश ने ठीक ही कहा है-
उठ गई हैं सामने से कैसी कैसी सूरतें
रोइए किस के लिए किस किस का मातम कीजिए.

- अभिषेक शुक्ल

शनिवार, 13 जनवरी 2018

गली के कुत्ते, गली के अंदर, बहुत ही तन कर, खड़े हुए हैं



गली के कुत्ते, गली के अंदर, बहुत ही तन कर, खड़े हुए हैं 
मैं आना चाहूं, गली के अंदर, पड़ी हैं पीछे, हज़ारों कुतियां 
ये भौंकती हैं, वे भौंकते हैं, ये भौंकते हैं, वे भौंकती हैं 
मैं भगना चाहूं, जिगर लगा कर, वे काट खाएं कि जैसे हडियां। 

संभल के चलना, रही है फ़ितरत, मगर लगे हैं, कई सौ टांके 
कई गली में में, मैं गिर के संभला, कई गली में, चुभी थी कटियां 
सिहर ही जाता, मैं याद करके, वो दस बजे का, अजब सा मंज़र 
वो लंबी जीभें, वो दांत तीखे, वो ख़ौफ़ आलम, सियाह रतियां।। 

(आज कुत्ता संघ के द्वारा दौड़ाए जाने के बाद, दिल से यही निकला...क्षमा सहित....आमिर ख़ुसरो…..आलोक श्रीवास्तव.....मेरे साथ वाले लड़के की मरम्मत संघ ने कर दी है, पांच इंजेक्शन उसे लग के रहेगा...मैं सुरक्षित हूं. ये वाला कुत्ता नहीं था...ये अच्छा वाला है...बेरसराय रहता है....IIMC में इसका आना-जाना है)

बुधवार, 10 जनवरी 2018

आंख खुली चौराहे पाए

एक पांव राहों में धरता
सौ-सौ राहें ख़ुद ही फूटें,
अनुभव वाला मांझा लेकर
मेरी रोज़ पतंगे लूटें।

मुझको जाने क्यों भ्रम होता
छाती में आत्म अधीरा है,
जो ओझल जग रही सदा
वह रोती-गाती मीरा है।

मन के भ्रम को कमतर आंके
थोड़ा सा भीतर भी झांके
भय, विस्मय, निर्वेद, ग्लानि की
चादर कोई नियमित टांके।

चीखें सुन सब चुप हो जाते
कहीं दिखाने को रो जाते
जैसे-तैसे सिसक-सिसक कर
चिर निद्रा में ही सो जाते।

इतना मौन घोंटने पर भी
आहें नहीं मिला करती हैं,
आंख खुली चौराहे पाए
हम भी थोड़े से घबराए
लेकिन घबराने से सच है
राहें नहीं मिला करती हैं।।

(अगर मैं मुक्तिबोध होता....ख़ैर हो ही नहीं सकता)

- अभिषेक शुक्ल

सोमवार, 1 जनवरी 2018

Happy New Year 2018: एक दिन, दिल्ली की गलियों में

मेरा भाई समन्वय। नए साल की शुरुआत भाई ने दिल्ली घुमाकर की. ये जो पीठ पर बैग लादे हीरो जैसा लड़का है, घुमक्कड़ बनने के लक्षण इसमें हैं. अगली बार भाई के साथ किसी अच्छी जगह  जाने का मूड बना है. कुछ दिन बाद, अभी नहीं. 
हां तो मैं बता रहा था कि ये हुमायूं का मक़बरा है. अब इस मक़बरे की कहानी मेरी ज़ुबानी तो अभी सुनेंगे नहीं आप, क्योंकि थोड़ा टाइम लगेगा लिखने में जो कि आज कम है.  हम हौज ख़ास विलेज भी गए थे. झील देखने. मक़बरा भी  वहीं ही है. किसकी है मैंने ध्यान नहीं दिया. 
आज तस्वीरें देख लीजिए, कभी बाद में कहानी भी विस्तार से लिखूंगा. हां तो फ़ोटो की शुरुआत भाई से ही करते हैं क्योंकि इस ट्रिप का हीरो तो भाई ही है. 






समन मस्त मूड में. 

ये मॉडलिंग बस समन के कहने पर. वरना मुझे तो फ़ोटो खिंचवाने ही कहां आता है.

हीरो बनाकर ही मानेगा भाई।

अली ईसा खाँ नियाज़ी के मक़बरे के पास. समन आराम करते हुए.



भाई! ऐसा पोज तो कभी मैंने दिया ही नहीं था।

समन की फ़ोटो दिव्य है.


बांछें खिलने ही वालीं थी कि रुक गईं.

सेल्फ़ी ही इस युग का युगधर्म है.

योग करते समन बाबू।


इतना ख़राब पोज मेरे अलावा कोई नहीं दे पाएगा। मैंने कॉपी राइट लगवा लिया है.

ये भी कम थोड़े ही है किसी से. 
ये है कमाल का फ़ोटो है भाई।


हौज ख़ास विलेज वाले झील में बत्तख. मेरे गांव में तो यही कहते हैं इन्हें यहां अंग्रेज़ी में कुछ कहते हों तो नहीं पता मुझे. 
हां तो कहना भूल गया. विश यू ऑल ए वेरी हैप्पी न्यू ईयर. मस्ती कीजिए, ख़ुश रहिए...मेरे साथ जुड़े रहिए...सुझाव देते रहिए.....शुभमस्तु! मिस यू...जल्द ही मिलते हैं कुछ नया लिखकर. 



                                                  

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अलविदा 2017. तुमसे कोई शिकायत नहीं



डायरी के कई पेज कोरे रह गए। कभी ऐसा होता नहीं था। जब लिखने के धंधे में नहीं था तो रोज़ लिखता था, जब से लिखना धंधा बना अपना लिखा हुआ कुछ भी पढ़ने का मन नहीं करता। ऐसा लगता है कि लिखना छूट गया है। अख़बार, पत्रिका सब से कनेक्शन कट गया है। पढ़ने से भी, छापने से भी। जब लिखने के पैसे नहीं मिलते थे तब सार्थक लिखता था। अब मामला थोड़ा अजीब है। कोशिश रहेगी पहले की तरह लिखना शुरू हो जाये। अब ब्लॉग ख़ाली नहीं रहेगा।
कमाने के चक्कर में जो गंवाया है उसकी वापसी हो जाये।
मिलते हैं........कुछ अच्छा लेकर।

2017.......ज़िंदाबाद।।

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

प्रेम इक अनसुलझी गुत्थी है

शब्दों ने अपने अर्थ
 खो दिए हैं
अब न तुम
अपने मन की कह पाती हो
न मैं
तुम्हारी भावनाएं समझ पाता हूं
क्योंकि
 दुनिया के किसी व्याकरण में
इतना सामर्थ्य नहीं
कि
सुलझा दे
हमारे नासमझी के द्वंद्व को.
अब न तुम कहो
न मुझे कुछ कहने दो
हमारे बीच
जो है
 उसे भ्रम कहते हैं
न तुम मुझे समझो
न मैं तुम्हें समझूं
शब्द, शब्द नहीं
भ्रम हैं.

#अधिकतम_मैं

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

मधुशाला में लॉक लगाओ भरो क्षीर से तुम प्याला




                                           मधुशाला में लॉक लगाओ भरो क्षीर से तुम प्याला
                                           औ उसमें हॉर्लिक्स मिलाकर पीते रहो जैसे हाला।
                                           बल बुद्धि विद्या तीनों बढ़ेंगी पर ये याद सदा रखना
                                          भारत माता की जय बोलो खुलवाओ तुम गौशाला।।


( सपने में बच्चन जी आए थे ये कहने कि दोस्त, मैंने मधुशाला लिखी है और तुमसे गौशाला भी लिखी नहीं जा रही...यहमा हमार कवनो दोष नाहीं है..सब बच्चन जी कहिन है सपना मा, औ हां! इ कप हमार नाहीं है)

सोमवार, 25 सितंबर 2017

हार से भय खा रहे हैं

जीत के उन्माद में क्यों, हार से भय खा रहे हैं
सत्य से इतनी वितृष्णा, गान मिथ्या गा रहे हैं,
किस विधाता ने रचा है, भ्रम की ऐसी गति अकिंचन
झूठ के रथ पर धरे पग, सत्य पथ को जा रहे हैं।




















युक्ति कोई आज कह दो, मुक्ति से दो हाथ कर लूं
प्राण जो अटके युगों से, आज उनसे होंठ तर लूं,
सृष्टि के हर यम नियम से, बैर अपना है सनातन
तुम कहो जीवन सुधा दूं तुम कहो तो प्राण हर लूं।।

- अभिषेक शुक्ल