शनिवार, 6 जुलाई 2019

पाले काका चले गए......

जून में अम्मा की वार्षिकी थी. मैं घर गया था. अम्मा को गए हुए 6 महीने बीत गए थे. पाले काका से मिलने उनके पास गया. काका, जीवन में पहली बार बीमार लगे थे. बहुत असहाय भी. इतने असहाय कि जैसे भगवान भी उनकी पीड़ा न हर सकें. उन पर रौब जंचता था, लेकिन काका डरे-डरे से लगे.

ऐसा लगा कि जैसे नियति ने जाने की तिथि तय कर दी है, और अब वे अपने आख़िरी दिन गिन रहे हैं. जैसे वक़्त ने चाल दिया हो बहुत भीतर तक, जहां से आत्मा आर-पार होने की स्थिति में पहुंच जाए. लग गया था कि अब काका का बुलावा आ गया है. फिर भी मन नहीं मान रहा था कि काका भी चले जाएंगे.

उनकी बातों से तो बिल्कुल भी नहीं लगा. वही रौब, वही अंदाज़ जिसे हम बचपन से देखते-सुनते आए हैं.

अच्छे वाले मन ने कहा कि काका ठीक हो जाएंगे. पहले की तरह ही जैसे वे घोड़ा टमटम टॉनिक पीने के बाद हो जाते थे.

कुछ ठीक नहीं हुआ. काका की तबियत खराब होती चली गई गई.

मुझे याद नहीं, काका एकादशी छोड़कर कोई व्रत रहे हों. मम्मी की ज़िद पर काका कभी-कभार जन्माष्टमी और एकादशी के दिन व्रत रख लेते थे. नहीं तो दोनों वक़्त भरपेट खाने वाले लोगों में से एक मेरे पाले काका भी थे. सुना कि काका ने 23 जून के बाद खाना ही नहीं खाया. कुछ खा ही नहीं पा रहे थे, शायद खाना ही नहीं चाह रहे थे.

जीवन भर का व्रत, जीवन के अंतिम दिनों में कर बैठे, भले विवशता से ही सही. व्रत पूरा हुआ, काका चले गए.

बचपन में काका से डर लगता था फिर भी काका बुरे नहीं लगते थे. बिलकुल बाबा की तरह, काका की भी डांट अच्छी लगती थी. कई बार डांट खाने के लिए ही सही, उन्हें हम लोग जानकर ग़ुस्सा दिलाते थे. कभी बहुत देर तक खेलते रहे तो काका का पारा चढ़ जाता था. कहते, अच्छा चलो, अब पढ़ो. बहुत खेल होइ गय. पढ़ना न लिखना, दिन्न भर उहै बैट.

बद्री, बलराम, परदेसी और बड्डू काका के डांट के बाद खिसक लेते थे, हम भी दबे मन से घर में स्टंप उठाकर चल देते थे. काका ने डांटा तो फ़ाइनल. गेंद-बल्ले का उठना तय.

फिर अगले ही दिन मौका मिलता खेलने को.

काका की डांट मुझे ही नहीं, भइया को भी पड़ी है. भइया की घर में न टिकने की आदत से दो लोग परेशान थे. अम्मा और काका. मम्मी को कुछ ख़ास फ़र्क़ पड़ता नहीं था. बाबा भी अपनी धुन में मस्त रहते थे. पापा देर से आते तो भइया घर में मिलते. लेकिन अम्मा और काका को बहुत दिक़्क़त थी भइया के घूमने से. काका जहां मिलते, सुनाकर भइया को घर ही भेजते. घर में घुसते ही अम्मा फ़ायर.
काका भ्रमणकारी थे. पांव नहीं टिकते थे उनके. गांव में घूमने निकलो तो कहीं न कहीं मिल जाते. जहां मिलते, वहीं टोकते. फिर घर वापस आना पड़ता.

भइया और मेरा पूरा बचपन 'पाले काका हो!' चिल्लाते बीता है. दरअसल काका दिन भर घर रहते थे, लेकिन जब खाने का वक़्त होता, काका निकल लेते थे. अम्मा किसी को खाना ले जाने नहीं देती, जब तक पाले काका खाना न खा लें. मजबूरन हमें चिल्लाना पड़ता. सुबह-शाम दोनों वक़्त. हमारे साथ पापा भी चिल्लाते थे. आस-पड़ोस में भी बच्चे मज़े लेकर चिल्लाते. सबको पता चल जाता कि घर में खाना बन गया है.

उस वक़्त मोबाइल वाला ज़माना नहीं था कि कॉल कर दें. जब मोबाइल वाला ज़माना आया, तब भी काका मोबाइल नहीं रखते, उन्हें ऐसे ही चिल्लाकर बुलाना पड़ता था. काका का फ़ोन, इंद्रजित ही चलाता, काका के हाथ में फोन नहीं रहा. तीन-चार बार काका ने ख़ुद के लिए फ़ोन ख़रीदा होगा. फिर ख़रीदना ही छोड़ दिया. इसलिए काका-काका चिल्लाना हमारी आदत में शुमार हो गया.

पापा चिल्लाते, पाले...पाले हो, ये पाले...
हमें भी हंसी आती. हम भी पापा का साथ देने आ जाते.
काका बस चाय के टाइम पर मौजूद रहते थे. शाम की चाय, उनके आने पर ही बनती थी.



पाले काका, अम्मा के सबसे ख़ास थे. कहां कौन सा खेत, कौन काट-बो रहा है, सबकी ख़बर काका ही रखते. किसे खेत बटइया पर देना है, किसे नहीं देना है, सब काका के हाथ में था. अम्मा का बस अप्रूवल होता था. अम्मा उन्हें बहुत मानती. शायद तभी, अम्मा के जाने के 6 महीने के भीतर काका भी वहीं पहुंच गए जहां अम्मा है. शायद वहां, अम्मा का राज-काज देखने वाला कोई सहयोगी नहीं पहुंचा था, जो भरोसेमंद हो. काका भी वहीं चले गए.

पापा की आदत है कि जब वे खेती करते हैं, तो केवल दो से तीन बार ही खेत जाते हैं. पहली बार जिस दिन बुवाई होती है. दूसरी बार जब फसल कटती है. कभी-कभार तब चले जाते हैं, जब खेत में पानी चल रहा हो. शेष दिनों में क्या हो रहा है, इससे ख़ास मतलब नहीं होता. सारी ज़िम्मेदारी पाले काका की होती थी फिर. भइया शाम को टहलने भले ही चले जाते हैं, खेत देखने के मक़सद से शायद ही कभी जाते हों. ऐसा इसलिए होता था, क्योंकि पाले काका थे. पापा जब कचहरी से लौटते थे, दिन भर की सारी बातें, वहीं आंगन में पापा से बताते. पापा हूं-हूं करके सुनते रहते.

कुछ पूछते जो काका को ख़राब लगता तो कहते, भै बाबू, तुहूं उहै मेर कहत हौ. यस नाहीं है. फिर काका अपनी कहानी बताने लगते.

सच बात थी, पापा भी उनका बहुत लिहाज़ करते थे. अम्मा, बड़ी बुआ के बाद, पापा ने शायद उन्हीं की सलाह मानी हो.

सुबह-शाम एक चक्कर खेत का मारे बिना काका को चैन नहीं. जाने से दो महीने पहले तक पाले काका की नियमित दिनचर्या में शामिल था खेत जाना. लेकिन फिर बीमार रहने लगे. उस तरीके से घूम नहीं पाते थे. भगवान नारद की तरह कभी एक जगह न बैठने का वरदान मिला था काका को. जाते वक़्त काका ने खाट पकड़ ली थी. उन्होंने घूमना कम कर दिया था. तभी अम्मा की वार्षिकी थी, और काका उस दिन घर नहीं आ सके. वे अपने घर पर ही लेटे रहे.

लग गया था कि काका अब ज़्यादा दिन के मेहमान नहीं हैं.

बचपन के हर क़िस्से में काका शामिल हैं. उनके अध्याय को छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. जीवन में पहली बार मेला घूमने काका के साथ ही गया हूं. काका मुझे और भइया को बहुत दिनों तक मेला दिखाने ले जाते. तब तक ले गए हैं, जब तक हम बहुत बड़े नहीं हो गए.

शोहरतगढ़, लेदवां, माधवपुर, काका जहां तक जा पाते, हमें मेला ले जाते. मेला में जलेबी, समोसा और उसके बाद गुब्बारा. हमारा इतना ही मेला होता था. फिर काका गट्टा खरीदते. वहीं से कुछ न कुछ सबके लिए काका खरीदकर लाते. अम्मा सबको मेला करने का पैसा बांटती थी. उसमें काका का भी हिस्सा होता था.

काका को दुनिया का कोई भी डॉक्टर दवा लिखकर दे दे, विश्वास नहीं होता. उनकी वैद्य मम्मी ही थी. मम्मी के बिना अप्रूवल के काका कोई दवा नहीं खाते. चाहे एमडी लिखे काका के लिए दवाई. कहते रुको दुलहिन के देखाय ली तब दवइया खाब न.

एक दिन मैं घर के बाहर क्रिकेट खेल रहा था. सामने गेंद चली गई, उठाने गया तो कुतिया ने काट लिया. ज़रा सा भी ख़ून नहीं निकला था लेकिन काका परेशान हो गए. गांव में ऐसी मान्यता है कि जिसे कुत्ते ने काटा हो, उसे कुआं झंका दिया जाए तो कुत्ते के काटने का प्रभाव कम हो जाता है. काका ने हाथ पकड़कर पूरे गांव का चक्कर लगवा दिया. 52 से ज़्यादा कुएं हैं मेरे गांव में. मैं चिल्लाता ही रहा कि कुत्ते ने नहीं काटा है, काका ने एक न सुनी. काका तो काका थे, उन्हें रोक कौन सकता था.

रिश्ते केवल ख़ून वाले ही सच नहीं होते. भावनाओं के रिश्ते भी उतने ही पवित्र होते हैं, उनकी भी निकटता वैसी ही होती है. कुछ भी अंतर नहीं होता. ऐसे में किसी अपने का चले जाना, बहुत दुखता है. कुछ टूटता है, बेहद भीतर तक.

कहा जा सकता है कि काका को असह्य पीड़ा से मुक्ति मिली, लेकिन मन किसी को भी मुक्त करना कहां चाहता है. अपनों को कौन खोना चाहता है.

काका से जुड़ी हुई कितनी यादें हैं. लेकिन अब वे सिर्फ़ यादें हैं. काका जा चुके हैं. हैं से थे होने की दूरी उन्होंने तय कर ली है.

काका अब स्मृति बन चुके हैं. घर जाने पर उनकी खाट दिख सकती है, जहां रहते थे, वो घर दिख सकता है, उनकी लाठी दिख सकती है, लेकिन काका नहीं दिख सकते. मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते.

कहीं वो आवाज़ सुनाई नहीं दे सकती कि, हो लाला, तू कब पंहुच्यौ. हम अगोरित रहेन न.

काका इस बार भी शायद इंतज़ार करते रह गए होंगे. लेकिन अब का. जब चले गए तो चले गए. जीवन के दूसरे छोर पर जहां समावर्तन के लिए राह नहीं होती. वहां जाने के पदचिन्ह मिलते हैं, और आने की स्मृतियां. इनके बीच कुछ भी शेष नहीं रहता. कुछ भी....

मंगलवार, 14 मई 2019

हम परागों के निषेचन में फंसे हैं



रूप के उपमान आकुल हो गए हैं
दर्प भी उन्माद जितना छा गया है,
हम परागों के निषेचन में फंसे हैं
फूल के प्राणों पे संकट आ गया है।

सूख जाना फूल की अन्तिम नियति है
पर भंवर को कब हुआ है भान इसका,
प्यास अधरों की रहे बुझती परस्पर
लालसा में सच कहो क्या दोष किसका?

जीविका है या गले की फांस है यह
रोज़ इच्छाओं को कसती जा रही है,
दास हूं मैं या तनिक स्वायत्तता है
मति इसी संशय में फंसती जा रही है।

वृक्ष था अब ठूंठ बनकर रह गया हूँ
सूखने के वक़्त शायद आ गया है
मोक्ष ने फिर से मुझे धोखा दिया है
क्षीण हो जाना मुझे भी भा गया है।

-अभिषेक शुक्ल

(तस्वीर- @Philippe Donn)

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

ईश्वर चाहता था कि वह मुक्त हो ईश्वरत्व से!



झरने इंतज़ार में थे
कोई उन्हें रुकने को कहेगा
बूंदें चाहती थीं
धरती पर न गिरें
सूरज स्वार्थी होना चाहता था
एक दिन के लिए
चांद चाहता था
उसे न मिले उधार की रोशनी,
पेड़ की बहुत इच्छा थी
कि
इक रोज़ वह अपना फल खाए
गाय अपना ही दूध पीने के लिए
कई दिनों से तड़प रही थी
नदियों की इच्छा थी
कि एक दिन के लिए वे तालाब हो जाएं
समंदर चाहता था
कि
कोई विजातीय धारा उसमें न गिरे,
फगुना की इच्छा थी
कि
एक दिन के लिए ही सही
वह सभी रिश्तों से पार पा ले
माई, बहिन, भौजाई, ननद, मेहरारू
के विशेषणों से इतर
एक दिन वह बस फगुना
ही रहे,
मजदूर चाहते थे
कि
वे ख़ुद अपने मालिक बन जाएं,
प्रथाएं चाहती थीं
कि
उनकी ओट में
किसी की
सिसकियां न सुनाई दें,
आसमान
एक दिन के लिए
सिकुड़ना चाहता था,
धरती चाहती थी
कि
उसकी गोद में
लुटेरों, डाकुओं, चोरों, और बलात्कारियों
को न ज़बरन दफ़नाया जाए,
चाहती तो
सुनरकी भी थी
ब्याह हो जाए बड़के बखरिया में
पर
चाहने से क्या होता है
तन से मनचाहा हमसफ़र तो नहीं मिलता
उसके लिए पैदा होना पड़ता है
कुलीन बनकर,
चाह तो भगवान भी रहा है
उसके सिर न मढ़े जाएं
होनी, अनहोनी करने और कराने के बेतुके कलंक
वह चाहता है कि
मानस की पंक्तियों से कोई मिटा दे
होइहि सोइ जो राम रचि राखा
वह चाहता है कि कोई झुठला दे
वृक्ष कबहु न फल भखें वाला दोहा
उसका भी मन करता है
धरती की तमाम प्रत्याशाओं, वर्जनाओं, कुंठाओं
और
महत्वाकांक्षाओं
के दोष उस पर न थोपे जाएं
लेकिन
चाह तो उसकी भी अधूरी है
विवश है वह
अपने निर्माताओं के रचे गए व्यूह में फंसकर,
एक दिन के लिए वह भी चाहता है
मुक्त होना
इस धारणा से
कि
वह ईश्वर है।

रविवार, 24 मार्च 2019

यार! अब मन न कहीं लगे

 

यार! अब मन न कहीं लगे।

अपलक देखूँ, व्योम निहारूँ,
आतुर होकर तुम्हें पुकारूँ;
अहो! हुए तुम इतने निष्ठुर,
तुम्हारी, चुप्पी क्यों न खले?

सारे वचन तोड़ बैठे हो,
अपने नयन फोड़ बैठे हो;
किसने प्रियतम मति है फेरी
अकिंचन, हम रह गए ठगे!

कल तक सब कुछ उत्सवमय था,
जीवन कितना सुमधुर लय था;
हुए पराये तुम पल भर में,
बरसों, आधी नींद जगे।

प्यार! अब मन न कहीं लगे।

बुधवार, 6 मार्च 2019

जिन्हें चम्बल में रहना था वे अब संसद में रहते हैं

जिन्हें चम्बल में रहना था वे अब संसद में रहते हैं।
किसी ने ठीक ही कहा है।

हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे हैं। इन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद और विधानसभा में भेजा है।
अब वक़्त आ गया है इन्हें जेल भेजा जाए। अपने-अपने कार्यों के अनुरूप। लोकतांत्रिक देश में ये आज़ाद घूमने लायक तो नहीं हैं।

संत कबीर नगर में जिला योजना की बैठक हो रही है।
बैठक के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सांसद शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के विधायक राकेश सिंह को जूतों से पीट डाला।

पहले बहस शुरू हुई, फिर हाथापाई। फिर गालियां और कुटाई साथ साथ।

और जनता इनसे उम्मीद करती है ये विकास करने के लिए बैठे हैं। ये क्रेडिटखोर लोग हैं, इन्हें बस क्रेडिट चाहिए सीवी मजबूत करने के लिए।

अगर बीजेपी में थोड़ी भी शर्म बची होगी तो इन दोनों महानुभावों को पार्टी से बाहर फेंक देगी। साथ ही दूसरी पार्टियों को भी इन्हें लपकने में उत्सुकता नहीं दिखाई जानी चाहिए।

लोकतंत्र के काले धब्बे हैं ऐसे नेता। इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिये।

(वीडियो सुनने से पहले हेडफोन इस्तेमाल करें, और बच्चे इस पोस्ट से दूर रहें।)

रविवार, 3 मार्च 2019

गुलामों में कभी कोई बुद्ध हुआ है क्या?


हमारा वक्त बिक चुका है. एक-एक पल किसी ने खरीद रखा है. किसी की आधीनता के बदले हमें कागज के कुछ टुकड़े मिलते हैं, जिनसे हमारी थोड़ी बहुत जरूरतें पूरी होती हैं. बस पेट पालने भर तक.

पेट सागर है....भर नहीं सकता. आजीवन रिक्त रहता है. ऐसा मैं नहीं 'कड़जाही काकी' कह के गई है.

कई बार लगता है कि भाग जाना चहिए हमें कहीं. अपने-अपने दायित्वों से. क्या ही कर लेंगे हम दुनिया में रहकर या दायित्व निभाकर.

पलायन इतना भी बुरा है क्या.

पर जिन्हें हम छोड़कर भागते हैं वे ज्यादा याद आते हैं. भागना थोड़ा मुश्किल भी है. हर कोई सिद्धार्थ तो है नहीं जिसे भागकर बोध हो जाएगा.

आनंद तो मिलेगा नहीं. मिलते ही नहीं.

भला बुद्ध का क्या होता अगर उन्हें आनंद मिला न होता.

दरअसल महत्ता तो बस आनंद की है. मैं आनंद खोज रहा हूं.

.....काश कह सकता.

आनंद की तलाश बिना स्वतंत्रता के. स्वतंत्रता क्या स्वायत्तता भी. गुलामों के ज्ञान पर भरोसा कौन करे.

कौन कहना है कि दास प्रथा खत्म हुई है. खत्म हो ही नहीं सकती. क्योंकि कुछ भी खत्म नहीं हो सकता. सब सतत् है. अवस्था परिवर्तन ही शाश्वत है. ऐसा मैं नहीं मानता, पर पुरखे मानते हैं.

पुरखे गलत हैं इसे मैं साबित नहीं कर सकता. सही हैं इसे भी.

मन यही कह रहा है कि गुलामों के पास कोई ज्ञान नहीं होता सिवाय दायित्व बोध के.

गले में पट्टा है.....ओखरी में मूड़ा है...पहरुआ गिनते रहो...जूझतो रहो....सवाल यही है कि गुलामों का क्या कोई आनंद हुआ है. अगर हुआ है तो जानने की उत्कंठा है.

कई बार यह भी लगता है कि बंधनों की गुलामी से भागे हुए लोग ही बुद्ध हुए हैं. पता नहीं. कौन जाने. सबकी अपनी-अपनी मंजिल. हमसे क्या.

जेकर मूड़ा ओखरी में हो, तेहि गिनै.

हमसे का.


(फोटो क्रेडिट- pixabay.com)




-अभिषेक शुक्ल.

सोमवार, 7 जनवरी 2019

अम्मा रे! ते काहें चलि गइले रे

अम्मा(दादी) वादा तोड़ गई। अम्मा ने कहा था कि अभी कहीं नहीं जाने वाली। जिस दिन अम्मा ने हमें छोड़ा उस दिन सुबह अम्मा से वीडियो चैट भी हुई थी। अम्मा ने कहा था, ' लाला ते परेशान न हो, हम कहूं जाब नाहीं। हमार तबियत बहुत ठीक है। घबरा न।' भाभी ने रात में मैसेज किया था कि अम्मा की तबियत खराब है लेकिन अम्मा से बात हुई तो मुझे लगा कि अम्मा फ़िट है। हमेशा की तरह।


उस दिन भी वही खनकती आवाज़ थी। कहीं से नहीं लगा कि अम्मा जाने के मूड में है लेकिन अम्मा चली गई। जब अम्मा गई तो भइया अम्मा के पांव सहला रहे थे।

पैर दबाते-दबाते अम्मा के पैर ठंडे पड़ गए। अम्मा ने अपना वादा तोड़ दिया था। जा चुकी थी, वहां जहां से कोई नहीं लौटता।

अम्मा ने कहा था कि अभी मेरा जनेऊ कराएगी। मेरे भतीजे-भतीजियों, भानजे-भानजियों को खिलाएगी। अम्मा ने झूठ बोला था। उसने जाने का ठान लिया था, चली भी गई, चुपके से। ऐसे कोई जाता है क्या।

शेखर के जाने के बाद आस्था टूटी थी, अम्मा ने हिम्मत तोड़ दी। एक सदमे से उबरने की कोशिश परिवार कर रहा था कि अम्मा चली गई। अम्मा ने झटका दिया है।

मुझे जब भी 3 दिन से ज़्यादा छुट्टी मिलती मैं घर भाग जाता था। वजह अम्मा थी। लॉ कर रहा था तब भी, IIMC गया तब भी। कई बार दोस्तों ने ज़ोर दिया कि कुछ दिनों के लिए कहीं ट्रिप पर चलते हैं। मुझे 2 दिन से ज़्यादा वक़्त ट्रिप पर ख़र्च करना अच्छा ही नहीं लगता। मुझे हर हाल में घर भागना होता था। अम्मा के पास।

दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत इंतज़ार छुट्टी का होता है, ख़ासकर तब जब अम्मा की गोदी में सर रखकर सोने को मिले। अफ़सोस अब ऐसा नहीं होगा। अम्मा जा चुकी है।

2018 ने परिवार को सदमा दिया है जिससे उबरना मुश्किल है। जब दुनिया न्यू ईयर मना रही थी तब 1 जनवरी को मैं गंगा में अम्मा की अस्थियां विसर्जित कर रहा था।

अम्मा बिना घर अजीब सा लग रहा है। सब कुछ सूना-सूना। ऐसा लग रहा है कि घर की रौनक चली गई है।

इतना उदास घर कभी नहीं लगा। अम्मा के जाने के बाद की रिक्तता भरी नहीं जा सकती।

अम्मा सबकी अम्मा थी। सुबह जब घर में चाय बनती थी तो जब तक पूरे टोले में अम्मा चाय बंटवा न दे उसे चैन नहीं मिलता। पड़ोस के छोटे-छोटे बच्चे जब कप लेकर घर दौड़ते तो अम्मा कई बार खाना उतरवाकर चाय बनवाती।

घर में कुछ अच्छा बन जाए तो टोले में किसी का घर छूटे न। सबको बुलवाकर अम्मा खाना बांटती।

गांव के पीछे एक गांव है अतरी। उसी से सटे हिस्से में हमारा खेत है। खेत बटइया पर दिया गया है। एक आदमी ने अम्मा से एक बटाईदार की शिकायत की। अम्मा से बताया कि खेत से बराबर पैदा नहीं आ रहा है। उसके घर में कोई मर्द है नहीं कि खेती कर पाए। उसका खेत छुड़वा दें।

अम्मा ने कहा, 'ओकरे घर में केहु है नाहीं। अकेल मेहरारु है, हम ओकरे जिए-खाए के आलंब नाहीं छीनब। जब तक ऊ खुद नाहीं कही कि मैय्या हम अब नाहीं खेती कइ पाइब तब तक ओकर खेत हम नाहीं छोड़ाइब।'

अम्मा ने कई परिवारों को पाला है। जाते-जाते आदेश देकर भी गई है कि इन्हें संभालना। गांव में जिनके अपने बच्चे बुढ़ापे में छोड़ते उन्हें अम्मा दोनों टाइम खाना खिलवाती। अम्मा ने कहा है 'अपने भरपेट खाई और दूसर केहु उपासै सूते। इ नाहीं होए पाई।'

कर्म के दिन खाने की तैयारियां जब हो रही थीं, छोटे-छोटे बच्चे काम में जुटे थे। कोई मटर छील रहा था तो कोई झाड़ू मार रहा था। इन बच्चों को किसी ने इकट्ठा नहीं किया था, ख़ुद ही काम पर भिड़े थे। उनमें से अधिकतर को नहीं पता है कि अम्मा अब लौट कर नहीं आने वाली है।

घर में अम्मा ही संविधान थी। जब पापा को कोई काम नहीं करना होता था तो वे यह कहकर टाल जाते थे कि अम्मा रिसियाई। अब पापा के पास कोई बहाना नहीं है।

कभी सोचा नहीं था कि अम्मा के बिन भी ज़िंदगी होगी।

साल भर पहले दिसंबर की ही बात है अम्मा को हल्की सी चोट लग गई थी। भइया जनरेटर ठीक करवा रहे थे, अम्मा ख़ुद रिंच देने आ गई। उसी दौरान अम्मा के पैर किसी चीज़ से टकरा गए तो खून निकल आया। भइया ने आसमान सिर पर उठा लिया था।

अम्मा के जाने के बाद चिता को जलाने के लिए लकड़ियां भी भइया इकठ्ठा कर रहे थे, घाट पर। कितना क्रूर होता है समय। जिसे खरोंच आ जाए तो इतनी बेचैनी होती थी, उसी को जलाने के इंतज़ाम में पूरा कुटुंब एक साथ खड़ा था।

अम्मा ने अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ा है। अम्मा उन चंद ख़ुशनसीब लोगों में से एक है जिन्होंने अपनी तीसरी पीढ़ी देखी है।

पनाती-पनातिनों की पूरी फौज है अम्मा के पीछे। अम्मा बंट गई है। किसी की आंख अम्मा की तरह है तो किसी नाक। कोई अम्मा की तरह सोचता है। लेकिन अब किसी एक में पूरी अम्मा का मिलना मुश्किल है।

पूरी तरह अम्मा कहां देखूं? अम्मा मिलेगी नहीं, ढूंढने से भी।

जाना ही नियति है। अंतिम सत्य भी।

सनातन परंपरा को मानने वाले गीता की उक्तियां जानते भी हैं। पूरी नहीं लेकिन आधी-आधूरी तो ज़रूर।

नैनम् छिंदंति शस्त्राणि नैनम् दाहति पावक:।

अच्छा श्लोक है लेकिन समझ से परे। जब कोई अपना जाता है न तो सारी कहानियां-कथाएं, पुराण-भागवत रास नहीं आते। ऐसा लगता है कि इन्हें किसी

उन्माद में रचा गया होगा। जब कोई इन्हें पढ़कर दिलासा देता है तो खीझ होती है। बहुत बकवास लगता है यह सब। सारे दर्शन लीपापोती से इतर कुछ और नज़र नहीं आते।

बीते दिनों में कई बार चीख़-चीख़कर रोने का मन कर रहा है। अम्मा चली गई है। मंदिर, देवता, चारोधाम सब अम्मा तक सिमटा था। अब अम्मा ही नहीं है, बिन अम्मा घर कैसा। सबके होते हुए भी घर अजीब सा लग रहा है।

अम्मा! कुछ साल और रुक जाते तो का बिगड़ि जात।

ते काहें चलि गए रे।

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

सांत्वना नागफनी है, गहरे भेदती है

कई बार भाग जाने का मन करता है। अकेलापन काटने दौड़ता है, किसी का साथ होना चुभता है।

लोग साथ हों तो बेचैनी, न हों तो अजीब सी चुभन। ठहाके हर बार अच्छे नहीं लगते, अपनी हंसी भी कई बार ख़राब लगती है।

ख़ुश होना चाहते हैं लेकिन हो नहीं पाते। सच है जो गया है उसे लाया नहीं सकता, फिर भी मन किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए रहता है।

इक उम्मीद कि जो बुरा सपना हम देख रहे हैं अचानक से टूट जाएगा। सब सपना है जिसे हम देखकर परेशान हो रहे हैं। आख़िर आंखें मूंदने पर हमारे आसपास दुनिया होती ही कहां है?

जगह बदलते ही उस जगह के होने का क्या प्रमाण रह जाता है।
शून्य, सब शून्य।

पर शून्य को मन मानता कहां है। थोड़ी सी चेतना मन पर भारी पड़ती है।

साहित्य हर बार दिलासा दे ज़रूरी नहीं, कई बार अवसाद भी देता है। गहरा।

कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि मन पर महादेवी का अधिग्रहण हो गया हो, तन निराला हो गया हो, जिसे कुछ भी सुधि नहीं।

कहानियां स्थिर मन से पढ़ी जा सकती हैं। कविताएं उद्विग्नता में नहीं समझ आतीं। दोनों स्थितियां जूझ रहीं हैं एक-दूसरे से।

मन कह रहा है सब बीत जाएगा। बुद्धि कह रही कि कुछ नहीं बीतता। जो बीत गया है, वह भूलता नहीं, जीवन बच्चन की कविता नहीं है, व्यवहार है।

धरातल पर आकर सिद्धांत बदल जाते हैं। टीस, पीर, मोह सच है, भूलना आदर्श स्थिति।
व्यवहार और आदर्श दो 'ध्रुव' हैं, जिन्हें कोई काल्पनिक रेखा नहीं मिला पाती।

......सांत्वना....दूसरों को देना कितना आसान है....ख़ुद के लिए नागफनी है। गहरे भेदती है।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

दुनिया को हादसों की आदत हो गई है!



हादसों की आदत हो गई है. हादसे हर बार आंखों में ढेर सारा आंसू देकर चले जाते हैं.

अमृतसर हादसे में जिन लोगों की मौत हुई है उनकी तस्वीरें देखकर दिल थमा सा जा रहा है.

इतनी विभत्स तस्वीरें शायद ही पिछले दिनों में देखने को मिली हों.

बहुत डरावनी तस्वीरें हैं भीतर से कंपकंपा देने वाली.

दशानन का दहन हो रहा था, कइयों के आनन छिन्न-भिन्न हो गए. विभत्स तस्वीरें आ रही हैं. जिन्हें देखने के लिए साहस चाहिए.

यह प्रकृति की मार नहीं थी. न ही किसी आतंकी संगठन की पूर्वनियोजित हत्या. यह हादसा कैसे हुआ इसका अंदाजा उन लोगों भी नहीं जिनकी मौत हो गई.

रावण का पुतला अपने साथ कई जीवित लोगों को लेकर चला गया.

हादसा हुआ पंजाब के अमृतसर के जोड़ा रेल फाटक के पास. ऐसी खबरें चल रही हैं कि कम से कम 58 लोगों की मौत हो गई है और 72 से अधिक लोग घायल हो गए हैं. आंकड़े और भी बड़े हो सकते हैं.

पठानकोट से अमृतसर जा रही डेमू ट्रेन की चपेट में इतने लोग आए और चले गए. रावण दहन के साथ-साथ इतने निर्दोष लोग भी जा चुके हैं.

मृत्यु के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया जा सकता. परिस्थितियों और प्रशासन को कोसा जा सकता है लेकिन किसी को वापस नहीं लाया जा सकता.

हे भगवान, मृतआत्माओं को शांति दें...मन बहुत उन्मन है.



-अभिषेक शुक्ल

(तस्वीर प्रतीकात्मक)

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

अंततः कवि के हिस्से रिक्तता आती है





वही कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं जो कवि के मन में पलती हैं। जिन्हें कोई और नहीं सुन पाता। जिनकी तारीफ़ कवि ख़ुद ही करता है, जिन्हें वह ख़ुद लिखकर मिटा देता है।

उसकी नज़रों में अपनी अनगढ़ कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं लेकिन दुनिया के लिए वह उन्हें छंदों की बेड़ियों में जकड़ता है, अलंकारों का तड़का लगाता है, आलम्ब खोजता है, समास जोड़ता है, संयोग तलाशता है, वियोग ख़ुद छलक जाता है।

दरअसल यह सब दिखावा है। कवि की जिन कविताओं को लोग पढ़ते हैं वे बनावटी होती हैं। असली कविताएं तो कवि के मन में पलती हैं, जिन्हें वह किसी से नहीं कहता। ख़ुद से भी नहीं।

अच्छी कविता की तलाश में हैं तो कवि को पढ़ें, उसकी रचनाओं को नहीं। बहुत बनावटी होते हैं किताबों के अक्षर।

कवि अपनी रचनाओं में उन्माद की हद तक काट-छांट करता है। ज़रा भी दयावान नहीं।

कवि को पता है कि उसकी रचनाएं उत्पाद नहीं हैं जिनके विनिमय से उसे कुछ मिले। कवि जानता है कि वह मूर्तिकार नहीं है, उसे पता है कि वह सुनार भी नहीं, फिर भी उसे कविताओं की काट-छांट बहुत प्यारी है। क्यों है, इसका जवाब उसे भी नहीं पता।

वह उलझता है, टूटता है, थकता है, बेचैन रहता है, कहते-कहते अटकता है क्योंकि कवि मन की कभी कह नहीं पाता।

अंततः कृत्रिमता उस पर बहुत भारी पड़ती है, जो उसे भीतर से ख़ाली कर देती है।

रिक्तता!
कवि की यही नियति है जो उसे बिन मांगे मिल जाती है, जिसमें वह कुछ रचने की संभावनाएं तलाशता है।


-अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हम भाषा के अपराधी हैं

सहज भाषा के नाम पर हमने, भाषा का वास्तविक सौंदर्य बोध खो दिया है।

नई पीढ़ी कितना कुछ क्लिष्ट कहकर अनदेखा कर देगी। कितने अध्याय अनछुए रह जाएंगे। 

भाषाई सरलीकरण के नाम पर कितने शब्दों की निर्मम हत्या हुई है। उन्हें याद रखने वाली पीढ़ी अंग्रेज़ी में भविष्य तलाश रही है। 

एक पूर्वाग्रह कि हिंदी में लिखा जो कुछ भी है, सब अपशिष्ट है; गहरे तक बैठ गया है। इसे पुष्ट करने वाले लोगों में कोई अपराधबोध नहीं है। उन्हें लगता है, उन्होंने भाषा को जनवादी बनाया है। 

जनवाद! 
भाषा पर बहस करने वाले ज़्यादातर लोगों के भीतर निपट आभिजात्य आत्मा है। स्वप्न या मद में भी इन्हें 'जन' की सुधि कहां?

समाचारों की भाषा साहित्य की भाषा बन गई है। संपादकों ने अपने 'वरिष्ठों' से सीखा है कि भाषा ऐसी हो, जिसे अनपढ़ भी समझ ले। किसी ने अनपढ़ को सुपढ़ बनाने में रुचि ही नहीं दिखाई, क्योंकि 'जन' की सुधि किसे?

यही वजह है कि अनपढ़ व्यक्ति को 'एक्सक्यूज़ मी' और 'प्लीज़' कहना आ गया लेकिन 'कृपया' अथवा 'क्षमा' कहना नहीं आया।

साहित्य वही नहीं है जिसे प्रेमचंद ने लिखा है, दिनकर, प्रसाद, अज्ञेय, महादेवी और भारतेंदु ने भी जो लिखा उसे भी साहित्य ही कहेंगे। बहुत नाम छूटे भी हैं इनमें। 

विश्वभर की तमाम भाषाएं लोग सीख रहे हैं। जिन लिपियों और भाषाओं से हमारा कोई परिचय नहीं, उन्हें हम सीख लेते हैं, लेकिन हिंदी?

शब्द क्लिष्ट नहीं होते, सहज होते हैं। क्लिष्ट कहकर उन्हें प्रचलन से बाहर कर दिया जाता है। वे किताबें जिनमें तथाकथित 'क्लिष्टता' का प्रयोग ज़्यादा है, वे निरर्थक नहीं, उन्हें पढ़ा और समझा जा सकता है। 

क्लिष्टता से जुड़ा हुआ एक प्रसंग याद आ रहा है। उन दिनों मैं दिनकर को पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा,

"गत्वर, गैरेय, सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर, 
थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर।"



मुझे गत्वर, गैरेय, सुघर और भूधर का अर्थ नहीं पता था। मुझे लगा कि ये शब्द मुझसे कह रहे हों कि 'दिनकर को समझना हो तो पढ़ो। तुम्हें समझ में नहीं आ रहे शब्द तो यह तुम्हारी जड़ता है, दिनकर इसके लिए दोषी नहीं हैं।'

हम सब शब्दों के अपराधी हैं। हमने शब्दों की उपेक्षा की है। सृजनशीलता की चौखट से शब्द अपमानित होकर लौटे हैं। शब्द निहार रहे हैं नई पीढ़ी को, मिल रही उपेक्षा से टूटते जा रहे हैं। 

जब किसी देश में नवीन राज व्यवस्था जन्मती है और वृद्ध राजा को अपदस्थ कर, नया राजा पदस्थ होता है तब वृद्ध राजा राजपाट, संन्यास या वानप्रस्थ नहीं चाहता। वह मृत्यु चाहता है।

कुछ शब्द वही चाह रहे हैं। नई पीढ़ी उनकी अंतिम इच्छा पूरी कर रही है.

शनैः शनैः।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

इश्क़ में मनमर्ज़ियां चलती कब हैं...

एक लड़की अपने प्यार के साथ भागने के लिए कैसे भी तैयार हो जाती है, बिना कुछ सोचे-समझे लेकिन लड़के बहुत सोचते हैं। उनके लिए बेड सेफ़ साइड है, लिव-इन या शादी मुश्किल। मां-बाप शादी के लिए तैयार भी हों तो भी, लड़के अकसर बचते हैं। वजह बेहतर की तलाश हो, या कुछ और लेकिन अकसर ऐसा होता है। प्रैक्टिकल में लड़कियां ज़्यादा सीरियस होती हैं रिश्तों को लेकर, लड़के भागना चाहते हैं रिश्तों से। अपवाद भी हैं।

कहानी मनमर्ज़ियां की...

अगर डायरेक्टर दमदार हो तो एक्टर की कायापलट करने में उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। अनुराग कश्यप ने वही किया है विकी कौशल के साथ। विकी कौशल शक्ल से बेहद मासूम नजर आते हैं। भोले-भाले स्मार्ट नौजवान टाइप; लेकिन मनमर्जियां में उनके कैरेक्टर को देखने के बाद विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे मसान, राज़ी, लस्ट स्टोरीज या संजू वाले विकी कौशल हैं।


मनमर्ज़ीयां में उन्होंने ख़ुद को पूरी तरह बदल लिया है।



तापसी पन्नू अच्छी एक्ट्रेस बनकर उभरी हैं। इस फ़िल्म में उनकी शुरुआती सनक देखने लायक है। कंगना याद आती हैं। थोड़ी सी सनकी टाइप।

कनिका ढिल्लन ने कहानी अच्छी लिखी है। हालांकि कहानी बिलकुल फ़िल्मी है। रूमी(तापसी) की तरह उदार पेरेंट्स शायद ही भारत में होते हों। अगर होते भी होंगे तो उन्हें विलुप्तप्राय जीव की श्रेणी में डालकर रेड लिस्ट में रखने लायक है।
फ़िल्म की कहानी जैसी भी है, अनुराग कश्यप ने उसे पर्दे पर ख़ूबसूरती से उतारा है। फ़िल्म के क्लाइमेक्स में आपको कई फिल्मों की कहानियां याद आ सकती हैं।

कौन-कौन सी, यह फ़िल्म देख लीजिए फिर बताइए।

फ़िल्म में असली ट्विस्ट मध्यांतर के बाद आता है। असली कहानी तभी शुरू होती है। अभिषेक बच्चन एक्टिंग में वापसी अरसे बाद हुई है। उनके करियर की बीते कई वर्षों में आई रिक्तता को भरने वाली फ़िल्म है यह।

फ़िल्म की शुरुआत में उनकी एक्टिंग ज़रा भी नहीं लुभाती लेकिन मध्यांतर के बाद असली हीरो वही हैं।

विकी कौशल विकी के ही किरदार में हैं। रूमी के किरदार में हैं तापसी। रॉबी बने हैं अभिषेक बच्चन।

विकी है लापरवाह प्रेमी, उसका प्यार बस बेड पर परवान चढ़ता है। प्यार कम और फ़्यार ज़्यादा करना होता है. प्यार भी उसका अलग की क़िस्म का है. ज़िद्दी आशिक़ टाइप। इमरान हाशमी याद आते हैं फ़िल्म में कई बार। मर्डर-2 के इमरान हाशमी का डायलॉग सूट करता है विकी के किरदार पर, 'तुम मेरी ज़रूरत हो।'
विकी की ज़रूरत लगी है रूमी।

अभिषेक बिलकुल मर्यादा के अवतार लगे हैं। भूत ही समझिए, होते तो हैं, दिखते नहीं ऐसे पुरूष। इतना शालीन, मर्यादा वाला लड़का आसपास में मैंने नहीं देखा, अगर आपने देखा हो तो फ़ौरन चरण गहो, देवता है वह आदमी.

फ़िल्म में दो लड़कियां आती-जाती रहती हैं. जब भी कहानी में नया मोड़ आना होता है दोनों दिख जाती हैं. पहले लगता है कि इनका भी कोई किरदार होगा लेकिन ये बस होती हैं.

फिल्म के कुछ गाने बेहद अच्छे हैं. दरया, चोंच लड़ियां, सच्ची मोहब्बत. अमित त्रिवेदी म्यूजिक डायरेक्शन कई जगह बहुत कर्कश लगा है लेकिन ओवरऑल ठीक है.

वक़्त निकालिए, अरसे बाद कोई मूवी आई है जिसे देखा जा सकता है. देखकर यही कहेंगे-
इश्क़ में मनमर्ज़ियां चलती नहीं, बस मोहब्बत होनी होती है, हो जाती है।

रविवार, 26 अगस्त 2018

राखी के दिन सूनी कलाई

राखी वाले दिन कलाई का सूना रह जाना अखरता है। बेहद ज़्यादा। तब और भी जब आपके पास ढेर सारी बहनें हों, जिनके पास जाने के लिए आपको कम दूरी तय करनी हो।

मन लाख समझाए कि बहनों का आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है भले ही वे कलाई पर राखी बांधे या न बांधे लेकिन दिल नहीं मानता। तब तक, जब तक कि वे राखी बांध न दें।

बचपन से लेकर अब तक कोई साल ऐसा नहीं बीता जब कलाई सूनी रही हो। कलाइयां भर जाती थीं राखी वाले दिन। गांव रहा तो वहां भी खूब सारी राखी। कुछ बड़ी बहनें और छोटी बहनें वहां थीं। कोई न कोई तो ज़रूर रहता था। मीना दीदी, बबली दीदी, रश्मि दीदी, प्रसन्ना दीदी, नीरू दीदी, रुचि दीदी, ऋचा दीदी, पल्लवी, वर्षा, बेटू, सोनल, शिवांगी, छोटी, बिन्नी, इशिता और भी बहुत सारी बहनें। कुछ के तो नाम भी छूट गए होंगे।



गांव वाली बहनों से राखी बंधवा मम्मी-पापा के साथ सुबह ही चेतियां, मदनपुर(बुआ का घर) और बरवां(नानी यहां) के लिए निकलता था। पापा अपनी बहनों से राखी बंधवाते और मैं अपनी।

गांव से बाहर गया तो वहां भी बहनें थीं। रुचि दीदी, दीप्ति दीदी, हिमानी। कुछ साल बाद नीरू दीदी भी आ गई थी। दिल्ली या मेरठ में जमवाड़ा होता था इस दिन।

रुचि दीदी तो ज़रूर रहती थी। इस बार रुचि दीदी भी नहीं थी। बेंगलुरु चली गई बड़े भइया के पास। इस दिन मुंह नहीं बंद रहता था। रुचि दीदी दिन भर खिलाती रहती। मिस कर रहा हूं दीदी तुम्हें।

नौकरी सच में नौकरी है। नौकर बना देती है। आज मेरठ जाना था। दफ़्तर से मुझे छुट्टी मिली नहीं, मैं वहां जा नहीं पाया।

बहुत ज़्यादा बहनों को मिस कर रहा हूं। सबकी बहुत याद आ रही है।

मिस यू ऑल। अगली बार सब राखी ज़रूर भेजना। इस साल की तरह मुझे कोरी नहीं रखनी अपनी कलाई।

लव यू ऑल।

और इस फ़ोटो में सच में मुस्कान झूठी है। कलाई सूनी है।

- अभिषेक शुक्ल।