गुरुवार, 31 अगस्त 2017

उसमें ठहर ठहर बीतूंगा


कठिन समय ने चाल चली है
उपहासों में हार पली है,
डगमग डगमग कदम पड़ रहे
तन की हाहाकार खली है।














जूए में हर दांव हार कर
उनकी लाखों बात मानकर,
चौसर के सब पासे पलटे
धोखे वाली बात जानकर।

फिर भी दिल मुझसे कहता है
सारी बाज़ी मैं जीतूंगा,
जिस नक्षत्र में जय ही जय हो
उसमें ठहर ठहर बीतूंगा।।

- अभिषेक शुक्ल 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-09-2017) को "सिर्फ खरीदार मिले" (चर्चा अंक 2715) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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