रविवार, 22 जनवरी 2017
सोमवार, 2 जनवरी 2017
हमसफ़र में सफ़र
पहली तारीख की रात ट्रेन में कटी। एक टाइम का अघोषित उपवास रखना पड़ा। ट्रेन सात घंटे लेट है,
तो लग रहा है कि दिन में भी उपवास रखना पड़ेगा।
गोरखपुर से आज-कल एक ट्रेन चल रही है, हमसफ़र एक्सप्रेस।
ट्रेन के सारे डिब्बे वातानुकूलित हैं। देखने में भी यह किसी वर्ल्ड क्लास ट्रेन की तरह लगती है।
मेरे दोस्त अतहर ने नई-नई ट्रैवल एजेंसी खोली है।
उसी ने कहा कि भाई! हमसफ़र से जाओ। बेहतरीन ट्रेन है। आठ बजे तक दिल्ली रहोगे।
मैं भी खुश हो गया कि क्लास छूटेगी नहीं।
मेरी तरह जनरल डिब्बे में यात्रा करने वाले व्यक्ति का इस ट्रेन को स्वर्ग कहना भी कम है, इसे बैकुंठ धाम भी कहा जा सकता है
लेकिन इस ट्रेन ने मुझे नए साल की पहली रात को भूखा सुलाया। ट्रेन में चाय , पानी और अंडे वाले केक के अलावा कुछ भी खाने -पीने के लिए नहीं था।
मेरे जैसे शाकाहारी इंसान के लिए पानी पीकर सोने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था।
भूखा होना आम दिनों से ज़्यादा तब अखरता है जब आप घर से आ रहे हों। दिन में चार टाइम गले तक ठूंस के खाने के बाद जब एक टाइम के लिए पेट को आराम मिलता है तब वह आराम किसी वेदना से कम नहीं होता। रात में मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे।
गोरखपुर में खाना इसलिए नहीं खाया कि ट्रेन में खाना मिलेगा। ट्रेन ने उपवास करा दिया।
किसी-किसी को जनरल डिब्बा सूट करता है, वहां खाने-पीने का कार्यक्रम रात भर चलता है।
वहां धड़कनें बन्द हो सकती हैं लेकिन मुंह नहीं।
चाय-चाय की मधुर ध्वनि से नींद तोड़ने वाले इस डिब्बे के आस-पास नहीं फटक रहे।
हमसफ़र में, मैं सच में 'सफ़र' कर रहा हूँ ।
मुझे याद नहीं कि पिछली बार मैं कब रिजर्वेशन करवा के घर गया था। लोकल डिब्बे की खचाखच भीड़ से मुझे कोई ख़ास समस्या नहीं होती है।शौचालय के बगल में बैठ कर इत्र जैसी ख़ुशबू का नियमित महकना मुझे चमत्कृत नहीं करता।
लोगों के द्वारा छोड़े गए कुछ विशिष्ट अपशिष्ट पदार्थों के बीच प्राकृतिक पीड़ा से उबरना भी असाध्य नहीं लगता। लोकल डिब्बा से मुझे विशेष प्रेम है। वहीं बैठकर अपने देहाती होने का एहसास होता है।
कहते हैं न कि हर चीज़ हर किसी के लिए नहीं होती। मेरे लिए 'जो मिले वही ट्रेन पकड़ लो' वाला सिद्धांत ठीक है।
सात घंटे लेट ट्रेन में जनरल डिब्बे की चें-पों मिस कर रहा हूँ।
दुआ कीजिए ये ट्रेन और लेट न हो....बैलगाड़ी से रेलगाड़ी जैसी चाल पकड़े तो बात बने 😓।
तो लग रहा है कि दिन में भी उपवास रखना पड़ेगा।
गोरखपुर से आज-कल एक ट्रेन चल रही है, हमसफ़र एक्सप्रेस।
ट्रेन के सारे डिब्बे वातानुकूलित हैं। देखने में भी यह किसी वर्ल्ड क्लास ट्रेन की तरह लगती है।
मेरे दोस्त अतहर ने नई-नई ट्रैवल एजेंसी खोली है।
उसी ने कहा कि भाई! हमसफ़र से जाओ। बेहतरीन ट्रेन है। आठ बजे तक दिल्ली रहोगे।
मैं भी खुश हो गया कि क्लास छूटेगी नहीं।
मेरी तरह जनरल डिब्बे में यात्रा करने वाले व्यक्ति का इस ट्रेन को स्वर्ग कहना भी कम है, इसे बैकुंठ धाम भी कहा जा सकता है
लेकिन इस ट्रेन ने मुझे नए साल की पहली रात को भूखा सुलाया। ट्रेन में चाय , पानी और अंडे वाले केक के अलावा कुछ भी खाने -पीने के लिए नहीं था।
मेरे जैसे शाकाहारी इंसान के लिए पानी पीकर सोने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था।
भूखा होना आम दिनों से ज़्यादा तब अखरता है जब आप घर से आ रहे हों। दिन में चार टाइम गले तक ठूंस के खाने के बाद जब एक टाइम के लिए पेट को आराम मिलता है तब वह आराम किसी वेदना से कम नहीं होता। रात में मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे।
गोरखपुर में खाना इसलिए नहीं खाया कि ट्रेन में खाना मिलेगा। ट्रेन ने उपवास करा दिया।
किसी-किसी को जनरल डिब्बा सूट करता है, वहां खाने-पीने का कार्यक्रम रात भर चलता है।
वहां धड़कनें बन्द हो सकती हैं लेकिन मुंह नहीं।
चाय-चाय की मधुर ध्वनि से नींद तोड़ने वाले इस डिब्बे के आस-पास नहीं फटक रहे।
हमसफ़र में, मैं सच में 'सफ़र' कर रहा हूँ ।
मुझे याद नहीं कि पिछली बार मैं कब रिजर्वेशन करवा के घर गया था। लोकल डिब्बे की खचाखच भीड़ से मुझे कोई ख़ास समस्या नहीं होती है।शौचालय के बगल में बैठ कर इत्र जैसी ख़ुशबू का नियमित महकना मुझे चमत्कृत नहीं करता।
लोगों के द्वारा छोड़े गए कुछ विशिष्ट अपशिष्ट पदार्थों के बीच प्राकृतिक पीड़ा से उबरना भी असाध्य नहीं लगता। लोकल डिब्बा से मुझे विशेष प्रेम है। वहीं बैठकर अपने देहाती होने का एहसास होता है।
कहते हैं न कि हर चीज़ हर किसी के लिए नहीं होती। मेरे लिए 'जो मिले वही ट्रेन पकड़ लो' वाला सिद्धांत ठीक है।
सात घंटे लेट ट्रेन में जनरल डिब्बे की चें-पों मिस कर रहा हूँ।
दुआ कीजिए ये ट्रेन और लेट न हो....बैलगाड़ी से रेलगाड़ी जैसी चाल पकड़े तो बात बने 😓।
शनिवार, 24 दिसंबर 2016
हर हर महादेव
दिसम्बर के महीनें में जब, सुबह-सुबह रजाई स्वर्ग का सुख देती हो ऐसे में गंगा स्नान के लिए घने कुहरे की परवाह किए बिना १३४ किलोमीटर बाइक से हरिद्वार के लिए निकलना किसी एडवेंचर ट्रिप से कम न था। दस कदम दूर कुछ नहीं दिखाई पड़ता था। रास्ता सूंघ कर आगे बढ़ना पड़ रहा था।
बाइक चला रहे थे वीरु भइया, बीच में बैठा था अंकित और सबसे पीछे मैं। ट्रिपलिंग सवारी करना गैर कानूनी है लेकिन जब ड्राइवर, वकील हो तो उसके लिए ये सोचने का विषय नहीं होता। कोई न कोई प्रावधान पुलिस को समझा कर बचा जा सकता है।
ख़ैर हम सब कभी हिमालय नहीं गए हैं लेकिन आज बाइक पर साइबेरिया वाली फ़ीलिंग आ रही थी।
रास्ते भर कांपते रहे, एक जगह रुक कर हाथ की भी सिंकाई हुई।
सूरज भगवान समय से निकले। तब लगा कि शायद हमारी भक्ति देखकर भावुक हो गए हैं भगवान।
करीब ९ बजे तक गंगा मां में हम सब डुबकी मार चुके थे। रास्ते की सारी थकान रफूचक्कर। गंगा मां की धवलता और चंचलता यहीं देखने को मिलती है।
नहाने के बाद शांति कुंज , हरिद्वार में गायत्री मां के दर्शन और फिर भंडारे में भरपेट स्वादिष्ट भोजन 😋
फिर क्या भजन-भोजन के बाद मौसी के पास आ गए। अंकित अपने रूम पर, भइया गाज़ियाबाद, और मैं ट्रेन 🚄 के जनरल डिब्बे में।
घर 🏠 जा रहा हूँ। IIMC में पढ़ाई का पहला सत्र समाप्त। १०दिन की छुट्टी मिली है। पहले मैं घर नहीं जाने वाला था लेकिन
अम्मा(दादी) का भावुक फ़ोन आया दो दिन पहले। ख़ुद को रोक नहीं पाया। मामा से बिना पूछे निकल आया एक्साइटमेंट में।
२ जनवरी से नया सत्र शुरू होगा। १ तक दिल्ली वापस आना है ।
अभी ट्रेन धीरे-धीरे रेंग रही है, दुआ कीजिए टाइम से लखनऊ पहुंच जाए।
बाइक चला रहे थे वीरु भइया, बीच में बैठा था अंकित और सबसे पीछे मैं। ट्रिपलिंग सवारी करना गैर कानूनी है लेकिन जब ड्राइवर, वकील हो तो उसके लिए ये सोचने का विषय नहीं होता। कोई न कोई प्रावधान पुलिस को समझा कर बचा जा सकता है।
ख़ैर हम सब कभी हिमालय नहीं गए हैं लेकिन आज बाइक पर साइबेरिया वाली फ़ीलिंग आ रही थी।
रास्ते भर कांपते रहे, एक जगह रुक कर हाथ की भी सिंकाई हुई।
सूरज भगवान समय से निकले। तब लगा कि शायद हमारी भक्ति देखकर भावुक हो गए हैं भगवान।
करीब ९ बजे तक गंगा मां में हम सब डुबकी मार चुके थे। रास्ते की सारी थकान रफूचक्कर। गंगा मां की धवलता और चंचलता यहीं देखने को मिलती है।
नहाने के बाद शांति कुंज , हरिद्वार में गायत्री मां के दर्शन और फिर भंडारे में भरपेट स्वादिष्ट भोजन 😋
फिर क्या भजन-भोजन के बाद मौसी के पास आ गए। अंकित अपने रूम पर, भइया गाज़ियाबाद, और मैं ट्रेन 🚄 के जनरल डिब्बे में।
घर 🏠 जा रहा हूँ। IIMC में पढ़ाई का पहला सत्र समाप्त। १०दिन की छुट्टी मिली है। पहले मैं घर नहीं जाने वाला था लेकिन
अम्मा(दादी) का भावुक फ़ोन आया दो दिन पहले। ख़ुद को रोक नहीं पाया। मामा से बिना पूछे निकल आया एक्साइटमेंट में।
२ जनवरी से नया सत्र शुरू होगा। १ तक दिल्ली वापस आना है ।
अभी ट्रेन धीरे-धीरे रेंग रही है, दुआ कीजिए टाइम से लखनऊ पहुंच जाए।
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
मन बावला है
मन बावला है, मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
मुझको ख़बर है कि
ख़्वाहिश हुई है
कुछ तो मोहब्बत सी
साज़िश हुई है
कोई है गुम-सुम
ख़्यालों मे ख़ुद के
लगता है चाहत की
बारिश हुई है...
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
उसने कहा कुछ
मैंने सुना कुछ
सपने मे उसने
शायद बुना कुछ
फिर भी है गुम-सुम
ख़ुद में ही खोई
मिल के भी मुझसे
क्यों न कहा कुछ??
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
अब तो मोहब्बत का
इज़हार कर दो
हो न मोहब्बत तो
इंकार कर दो
सब कुछ पता है
मासूम दिल को
ख़ुद को भी चाहत की
कुछ तो ख़बर दो।।
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
-अभिषेक शुक्ल
रविवार, 11 दिसंबर 2016
आभासी दुनिया के लड़ाके
भक्त भक्षकों और भक्त रक्षकों ने फेसबुक को नरक बना दिया है।दोनों ख़ुद को यमराज समझने लगे हैं।मौका मिलते ही दोनों एक-दूसरे पर ऐसे टूटते हैं कि जैसे बिना विरोधी मारे मोक्ष नहीं मिलेगा।
जो भक्षकों की विचारधारा का खंडन करे, उनसे असहमति जताए वो भक्त, संघी और अराजक है।
यही हाल रक्षकों का है। उनके नज़र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह है। आलोचक और आतंकवादी होना एक ही बात है।
दोनों प्रकार के लोग अपनी राहों से भटके हुए हैं।
उदारवादी लोग भी उतने ही अराजक और असभ्य हैं जितने कि इनके विरोधी रूढ़िवादी लोग।
वास्तव में दोनों विचारधाराओं के लोग अतिवादिता के मारे हुए लोग हैं।
इन दिनों स्वतंत्र चिंतन, विचार हीनता के धुंध में ओझल है। किसी को कहीं दिख जाए तो उसे ठीक पते पर पार्सल करना न भूलें। देश आपका आभारी रहेगा।
जो भक्षकों की विचारधारा का खंडन करे, उनसे असहमति जताए वो भक्त, संघी और अराजक है।
यही हाल रक्षकों का है। उनके नज़र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह है। आलोचक और आतंकवादी होना एक ही बात है।
दोनों प्रकार के लोग अपनी राहों से भटके हुए हैं।
उदारवादी लोग भी उतने ही अराजक और असभ्य हैं जितने कि इनके विरोधी रूढ़िवादी लोग।
वास्तव में दोनों विचारधाराओं के लोग अतिवादिता के मारे हुए लोग हैं।
इन दिनों स्वतंत्र चिंतन, विचार हीनता के धुंध में ओझल है। किसी को कहीं दिख जाए तो उसे ठीक पते पर पार्सल करना न भूलें। देश आपका आभारी रहेगा।
रविवार, 27 नवंबर 2016
परिवर्तन रैली के बहाने
प्रधानमंत्री ने कुशीनगर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि "हम भ्रष्टाचार और कालाधन बंद करने का काम कर रहे हैं, विपक्ष भारत बंद करने का।"
उनके कहने का आशय यह है कि
विपक्ष उनके साथ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा है।
नोटबंदी जैसा बड़ा परिवर्तन लाने के बाद अब मोदी जी उत्तर प्रदेश में परिवर्तन यात्रा पर हैं।
वैसे भी सबसे ज्यादा परिवर्तन की जरूरत यहीं है।
देखने वाली बात ये होगी कि यूपी की जनता भाजपा के विरुद्ध बाक़ी पार्टियों के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करती है या अपने देश भक्ति के प्रमाण पत्र को रद्द होने से बचाती है।
प्रधानमंत्री आधुनिक लेनिन हैं पूंजीपतियों को कंगाल करके मानेंगे। रैली में उन्होंने कहा कि मेरे इस कदम से ग़रीबों को छोटी मुश्किल होगी और अमीरों को ज्यादा, लेकिन अगर आप अम्बानी या बिड़ला हैं तो "यू डोंट हैव टू वरी अबाउट इट।"
वैसे भी हमारे कानून में एक कहावत है कि " ए किंग कैन डू नो रोंग" अर्थात राजा कभी गलत नहीं कर सकता।
मित्रों! सिर्फ़ पचास दिन की बात है, अभी तो बीस ही दिन बचे हैं।
भाई साहब! बीस दिन में कचूमर निकल गया , तीस दिन में क्या-क्या होना बाकी है?
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में आधे से ज्यादा लोग ऑनलाइन टिकट खरीद रहे हैं ।ऐसे में शायद कोई प्रधानमंत्री को ये बताने वाला नहीं है कि पाले काका या नकाही वाली काकी आनलाइन ट्रांजेक्सन नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनके पास न तो फोन है और न ही एटीएम कार्ड। अगर हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि वे निरक्षर हैं।
ऐसे ही देश की बड़ी आबादी निरक्षर है जिससे आनलाइन ट्रांजेक्सन करने की उम्मीद करना बेवकूफी है।
भारत गांवों में बसता है और वहां एटीएम की सुविधाएं तक नहीं है पेटिएम की क्या बात करें?
भुखमरी, गरीबी और बदनसीबी के दौर में भारत भले ही डिजिटल हो रहा हो पर एक बड़ी आबादी विकल है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री के अनुसार नोटबंदी सबसे उचित हथियार था देश के अंदर पांव पसारे काले धन के वध के लिए , इसे जनता ने स्वीकार किया है पर इसका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हुआ इसे प्रधानमंत्री जी को स्वीकार कर लेना चाहिए।
सत्तर साल के लूट की इनकम को मोदी जी गरीबों को स्कूल, गैस कनेक्शन, खेती के लिए ऋण, विकास आदि के कार्यों के रूप में जनता में बांट देंगे। अगर ये जुमला नहीं है तो ये स्वागत योग्य कदम है और अगर ये जुमला है तो सुन के खुश होने में क्या जाता है?
प्रधानमंत्री ने कहा कि कालाधन अब गोरा नहीं करने दिया जाएगा, भ्रष्टाचार के नकुना में नथेल कसी जाएगी।
ईमानदारी के यज्ञ में बेईमानी की समिधा पर भक्त जन यज्ञ कर उनकी पवित्र मंशा को पूरा करने के लिए सहयोग दें। यह राष्ट्रीय अपील है।
बिना पैसे के कारोबार जनता कैसे चलाए इस विषय पर विद्वानों से उन्होंने अपील की है कि जनता को डिजिटल ज्ञान सिखाएँ। जियो का सिम किस लिए लांच किया गया है।
गन्ना किसानों के खाते में सीधे पैसा दिया जाएगा जिससे उनके कर्ज़ की चुकाई बिना दलाली के हो जाए। योजना तो ठीक ही है, अगर ये खाली योजना ही न रहे तो।
प्रधानमंत्री ने पूरब को एम्स देकर काम ठीक किया है लेकिन जब ये बनकर तैयार हो तो "नेता पहले जनता बाद में" वाली व्यवस्था न रहे तब।
उन्होंने बताया कि किसानों को लिए सॉयल कार्ड बनाया है। ताकि उनकी जमीन का परीक्षण किया जा सके और उसके हिसाब से किसानी की जाए। ये काम अच्छा है इसके लिए उनका धन्यवाद।
फसलों की रक्षा करने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सरकार लेकर आई है अगर इससे जनता को लाभ मिलता है तो ये सरकार का साराहनीय काम है।
प्रधानमंत्री की यूपी में ये तीसरी रैली है. आगरा और गाज़ीपुर में परिवर्तन यात्रा हो चुकी है। देखते हैं वहां क्या परिवर्तन आएंगे।
प्रधानमंत्री पहली एयर कंडिशन्ड हमसफ़र ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई जो गोरखपुर से दिल्ली तक चलेगी, इस ट्रेन का टिकट जिन यात्रियों को मिल जाएगा उन्हें भाग्यशाली समझा जाएगा।
और चलते -चलते
गोस्वामी जी की एक बात सभी पत्रकारों को याद कर लेनी चाहिए कि-
"सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥"
तो सच बोलिए , देशभक्ति तो तभी हो सकती है जब देश के भलाई के लिए सत्ता को विवश करते रहें । सरकार का काम ही है जनता के लिए अच्छी योजनाएं बनाना, उन्हें लागू कराना। लेकिन जब आपको लगे कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है तो कलम चलाइए, सच कहिए नहीं तो सत्ता को निरंकुश होते वक्त नहीं लगता।
सोमवार, 14 नवंबर 2016
बुधवार, 9 नवंबर 2016
पापा! मुझे सब पढ़ेंगे।
पापा! मेरे नम्बर भले ही इस बार कम आए हों लेकिन मुझे एक दिन मेरे सारे टीचर्स पढ़ेंगे। हरिराम आचार्य जी ने इस लेटर में जो मेरी शिकायत लिखी है न एक दिन मेरी बड़ाई करेंगे, तब मैं उन्हें बिलकुल भी भाव नहीं दूंगा।
पापा हमेशा की तरह मेरी बात पर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते।
मुझे कभी नम्बर की वजह से डांट नहीं पड़ी। भइया थोड़े परेशान हो जाते थे इस बात पर। उन्हें लगता कहीं मैं औरों से कमजोर न पड़ जाऊँ।
ख़ैर थोड़ा बड़ा हुआ तो सब ठीक हो गया। पढ़ने वाले विषयों को कंठस्थ कर लेता। सारे विषयों के सैद्धांतिक पक्ष कंठस्थ रहते तो सहपाठियों को लगता बहुत पढ़ाकू हूं।मैं भी भरपूर ज्ञान बांटने में कोई विलंब नहीं करता, सबको शिक्षा बांटता।
ख़ैर मुझे पता था कि मुझे कुछ नहीं पता है।
बचपन में हरिराम आचार्य जी पता नहीं क्यों महीने में दो चार बार शिकायती पत्र लिख कर पापा के नाम भेज देते और मुझसे कहते हस्ताक्षर करा के लाओ। वो सोचते घर पे कुटाई होगी मेरी पर उनकी मंशा पर घर वाले पानी फेर देते।पढ़ाई को लेकर कभी कूटा नहीं गया।
स्कूल से ज़्यादा भइया ने मुझे पढ़ाया। गणित को छोड़कर सारे विषय मेरे ठीक-ठाक थे, भइया ने बेइज्जती न होने भर का गणित सिखा दिया था, जब कॅापी चेक होती तो पिटाई से बच जाता, बहुत दिनों तक इतना ही रिश्ता रहा मेरा गणित से।ग्यारहवीं में तो मैंने तलाक ही ले लिया गणित से। फिर कानून की पढ़ाई और अब पत्रकारिता की।
यकीन ही नहीं होता इन लम्हों को गुजरे हुए एक वक्त बीत गया।
मेरा साहित्य अब किशोर हो रहा है। टूटा-फूटा ही सही पर लिखते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया। लिखना आज भी नहीं आया।
आज मैंने पुरानी डायरियों को खोज निकाला। एक अटैची में सुरक्षित रखी हुईं मिलीं। बचपन आंखों के सामने तैरता हुआ नज़र आया। बीते कल को महसूस किया।
तब भाषाई अशु्द्धियां अधिक थीं पर भावनाएं निश्छल थीं। कृत्रिम व्याकरण का आवरण तब नहीं ओढ़ा था रचनाओं नें।
कितने ख़ूबसूरत दिन थे न? नहीं! मेरा आज भी बहुत खूबसूरत है।
मामा कहते हैं जिस पल में हम जीते हैं वही हमारे जीवन का सबसे सुनहरा पल होता है। जो बीत रहा है वो कभी नहीं आएगा।
इतने दिनों में अब तक अपना वादा नहीं पूरा कर पाया। पता नहीं मेरा कुछ लिखा हुआ मेरे गुरुजनों ने पढ़ा होगा या नहीं, ये भी नहीं पता कि मेरा वादा पापा को याद है या नहीं, पर लिखना थमा नहीं है। मुझे कितना वक्त लगेगा पापा से किया गया वादा पूरा करने में, नहीं जानता लेकिन जाने क्यों उन बातों के याद आने भर से ही मेरे हाथ कलम की ओर बढ़ जाते हैं और फिर मैं लिखने बैठ जाता हूँ कुछ कहे-अनकहे शब्द....उसी एक वादे के लिए।।
पापा हमेशा की तरह मेरी बात पर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते।
मुझे कभी नम्बर की वजह से डांट नहीं पड़ी। भइया थोड़े परेशान हो जाते थे इस बात पर। उन्हें लगता कहीं मैं औरों से कमजोर न पड़ जाऊँ।
ख़ैर थोड़ा बड़ा हुआ तो सब ठीक हो गया। पढ़ने वाले विषयों को कंठस्थ कर लेता। सारे विषयों के सैद्धांतिक पक्ष कंठस्थ रहते तो सहपाठियों को लगता बहुत पढ़ाकू हूं।मैं भी भरपूर ज्ञान बांटने में कोई विलंब नहीं करता, सबको शिक्षा बांटता।
ख़ैर मुझे पता था कि मुझे कुछ नहीं पता है।
बचपन में हरिराम आचार्य जी पता नहीं क्यों महीने में दो चार बार शिकायती पत्र लिख कर पापा के नाम भेज देते और मुझसे कहते हस्ताक्षर करा के लाओ। वो सोचते घर पे कुटाई होगी मेरी पर उनकी मंशा पर घर वाले पानी फेर देते।पढ़ाई को लेकर कभी कूटा नहीं गया।
स्कूल से ज़्यादा भइया ने मुझे पढ़ाया। गणित को छोड़कर सारे विषय मेरे ठीक-ठाक थे, भइया ने बेइज्जती न होने भर का गणित सिखा दिया था, जब कॅापी चेक होती तो पिटाई से बच जाता, बहुत दिनों तक इतना ही रिश्ता रहा मेरा गणित से।ग्यारहवीं में तो मैंने तलाक ही ले लिया गणित से। फिर कानून की पढ़ाई और अब पत्रकारिता की।
यकीन ही नहीं होता इन लम्हों को गुजरे हुए एक वक्त बीत गया।
मेरा साहित्य अब किशोर हो रहा है। टूटा-फूटा ही सही पर लिखते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया। लिखना आज भी नहीं आया।
आज मैंने पुरानी डायरियों को खोज निकाला। एक अटैची में सुरक्षित रखी हुईं मिलीं। बचपन आंखों के सामने तैरता हुआ नज़र आया। बीते कल को महसूस किया।
तब भाषाई अशु्द्धियां अधिक थीं पर भावनाएं निश्छल थीं। कृत्रिम व्याकरण का आवरण तब नहीं ओढ़ा था रचनाओं नें।
कितने ख़ूबसूरत दिन थे न? नहीं! मेरा आज भी बहुत खूबसूरत है।
मामा कहते हैं जिस पल में हम जीते हैं वही हमारे जीवन का सबसे सुनहरा पल होता है। जो बीत रहा है वो कभी नहीं आएगा।
इतने दिनों में अब तक अपना वादा नहीं पूरा कर पाया। पता नहीं मेरा कुछ लिखा हुआ मेरे गुरुजनों ने पढ़ा होगा या नहीं, ये भी नहीं पता कि मेरा वादा पापा को याद है या नहीं, पर लिखना थमा नहीं है। मुझे कितना वक्त लगेगा पापा से किया गया वादा पूरा करने में, नहीं जानता लेकिन जाने क्यों उन बातों के याद आने भर से ही मेरे हाथ कलम की ओर बढ़ जाते हैं और फिर मैं लिखने बैठ जाता हूँ कुछ कहे-अनकहे शब्द....उसी एक वादे के लिए।।
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
वो सच नहीं है।
मैं आपसे कभी बात नहीं करुंगी। हमेशा फोन मैं करती हूँ आप भूल कर भी कभी कॅाल नहीं करते हो। हर बार बिज़ी होने का बहाना होता है, हर बार मैं पूछती भी हूँ बिज़ी हो? आपका फिर वही रटा-रटाया जवाब नहीं! तुम्हारे लिए नहीं।
आप सच में मुझे कभी याद करते हैं? कुछ वजूद है मेरा आपके लाइफ में?
अब तो हद हो गई। पिछले दस दिनों से आपने बात नहीं की। न फेसबुक न व्हाट्सप न स्टीकर्स, क्या हुआ है आपको?
कोई और है क्या आपकी ज़िन्दगी में?
मुझसे मन भर गया? क्यों खेल रहे हो मेरे जज्बातों के साथ? ख़त्म क्यों नहीं कर देते सब कुछ?
ख़ैर! इस रिलेशनशिप में तो मैं हमेशा अकेली ही थी, कभी आपकी साइड से कुछ था ही नहीं। प्यार नहीं! दोस्ती या कुछ दोस्ती से ज़्यादा?
सुनो मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।कोई हो आपकी लाइफ में तो प्लीज़ बता देना मैं भूलकर भी याद नहीं करुंगी आपको। वैसे भी मेरे पास खुद के लिए वक्त कम है। मेरी शादी हो ही जाएगी कुछ दिनों में। कोई अजनबी ज़िंदगी भर के लिए मेरी किस्मत में मढ़ दिया जाएगा।जबरदस्ती का रिश्ता निभाना है मुझे उम्र भर के लिए। किसी ब्लैक एंड व्हाइट सेट के साथ मुझे ढकेल दिया जाएगा किसी कोने में हमेशा के लिए। मेरी सारी डिग्रियां मेरी ही तरह सड़ेंगी किसी कोने में।
आप तब तक फेमस हो जाओगे। टीवी पर भी आप दिखोगे पर मैं चैनल बदल दूंगी।आपको कभी पलट कर नहीं देखूंगी। आपकी किताबें कभी नहीं पढ़ूगीं।अख़बारों में भी आपके आर्टिकल्स नहीं पढ़ूंगी। आपको सब चाहते हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं है, बहुत अकेली हूं मैं।आपसे बात करना चाहती हूँ पर आप बात तक नहीं करते।
आप मेरे साथ ऐसा करते हैं या सबके साथ?
लाइब्रेरी, क्लास, पढ़ने और लिखने के अलावा कुछ करते हैं आप?
कभी तो फ्री होते होंगे तब मुझसे बात क्यों नहीं करते? आई लव यू हद से ज्यादा। सॅारी आज मैंने आपको कुछ ज्यादा सुना दिया। मैं बहुत बुरी हूं हर बार आपको परेशान करती हूँ पर अब नहीं करूंगी। गुड बॅाय!
क्या हुआ? सॅारी यार! नेटवर्क नहीं है यहाँ। और अब तुम मेरे रिसेंट कॅाल लिस्ट में नहीं हो। मैंने सेट फार्मेट किया था तुम्हारा नंबर मिट गया। कहीं और नोट भी नहीं है।
तुम ऐसे क्यों कह रही हो? मैं ऐसा ही तो हूं।मुझे मां से बात किये हुए कई दिन बीत जाते हैं। मेरे सारे दोस्त मुझसे इसी वजह से नाराज ही रहते हैं। मैं किसी से बात नहीं करता।शायद फोन पे बात करना अच्छा नहीं लगता मुझे।
तुम कभी-कभी अजीब सी बातें क्यों करती हो? तुम सेल्फ डिपेन्डेंट हो, अच्छी सैलरी मिलती है। बालिग़ हो तो तुम क्यों किसी के साथ जबरदस्ती ब्याही जाओगी। मना कर देना सबको जब तक तुम्हारे पसंद का लड़का तुम्हें न मिले।
पसंद की तो बात मत करो आप।पसंद तो सिर्फ आप हो मुझे , मुझसे शादी करोगे?
यार प्लीज़! कोई और बात करें? जानती हो मैंने एक नयी कविता लिखी है सुनोगी?
रहने दो, ज़िन्दगी कविता हो गयी है अब कविताओं से चिढ़ होती है। कभी तो सीधा जवाब दे दिया करो..सॅारी यार! मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकता, मैं खुद के भी साथ नहीं हूं, किसी अनजान से रास्ते की ओर कदम बढ़ते चले जा रहे हैं। वक्त धीरे-धीरे मुझे मुझसे दूर करता जा रहा है। ऐसे में मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं दे सकता।
किसने कहा मुझे आपसे कोई उम्मीद है? अब इतना तो आपको समझ ही चुकी हूं।
एक्चुअली जानते हैं आपकी प्रॅाब्लम क्या है?
आप न कभी किसी रिलेशनशिप को हां सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकि आपके साथ जो गुड ब्वाय वाला टैग लगा है न उसे खोने से डरते हैं। तभी शायद आपकी कोई गर्लफ्रैंड कभी थी नहीं न होगी,
बहुत मुश्किल से खुद को सम्हालती हूं । कोई इमोशन नाम की चीज़ है आपके दिल में?
ऐसा कुछ नहीं है....
बॅाय! अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी।
सुनो!
कहो!
जो तुम कह रही हो वो सच नहीं है।
तो सच क्या है?
कुछ नहीं। 'ब्रम्ह सत्यम् जगत मिथ्या'।
बॅाय! अलविदा।
रुको!
नहीं अब कोई फायदा नहीं है......
कॅाल डिस्कनेक्टेड....
कॅाल रिजेक्टेड....काश! मुझे आज सुन लेती....कुछ बताना था..लेकिन क्या बताना था....मुझे क्या पता...तब की तब देखते।
- अभिषेक शुक्ल
आप सच में मुझे कभी याद करते हैं? कुछ वजूद है मेरा आपके लाइफ में?
अब तो हद हो गई। पिछले दस दिनों से आपने बात नहीं की। न फेसबुक न व्हाट्सप न स्टीकर्स, क्या हुआ है आपको?
कोई और है क्या आपकी ज़िन्दगी में?
मुझसे मन भर गया? क्यों खेल रहे हो मेरे जज्बातों के साथ? ख़त्म क्यों नहीं कर देते सब कुछ?
ख़ैर! इस रिलेशनशिप में तो मैं हमेशा अकेली ही थी, कभी आपकी साइड से कुछ था ही नहीं। प्यार नहीं! दोस्ती या कुछ दोस्ती से ज़्यादा?
सुनो मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।कोई हो आपकी लाइफ में तो प्लीज़ बता देना मैं भूलकर भी याद नहीं करुंगी आपको। वैसे भी मेरे पास खुद के लिए वक्त कम है। मेरी शादी हो ही जाएगी कुछ दिनों में। कोई अजनबी ज़िंदगी भर के लिए मेरी किस्मत में मढ़ दिया जाएगा।जबरदस्ती का रिश्ता निभाना है मुझे उम्र भर के लिए। किसी ब्लैक एंड व्हाइट सेट के साथ मुझे ढकेल दिया जाएगा किसी कोने में हमेशा के लिए। मेरी सारी डिग्रियां मेरी ही तरह सड़ेंगी किसी कोने में।
आप तब तक फेमस हो जाओगे। टीवी पर भी आप दिखोगे पर मैं चैनल बदल दूंगी।आपको कभी पलट कर नहीं देखूंगी। आपकी किताबें कभी नहीं पढ़ूगीं।अख़बारों में भी आपके आर्टिकल्स नहीं पढ़ूंगी। आपको सब चाहते हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं है, बहुत अकेली हूं मैं।आपसे बात करना चाहती हूँ पर आप बात तक नहीं करते।
आप मेरे साथ ऐसा करते हैं या सबके साथ?
लाइब्रेरी, क्लास, पढ़ने और लिखने के अलावा कुछ करते हैं आप?
कभी तो फ्री होते होंगे तब मुझसे बात क्यों नहीं करते? आई लव यू हद से ज्यादा। सॅारी आज मैंने आपको कुछ ज्यादा सुना दिया। मैं बहुत बुरी हूं हर बार आपको परेशान करती हूँ पर अब नहीं करूंगी। गुड बॅाय!
क्या हुआ? सॅारी यार! नेटवर्क नहीं है यहाँ। और अब तुम मेरे रिसेंट कॅाल लिस्ट में नहीं हो। मैंने सेट फार्मेट किया था तुम्हारा नंबर मिट गया। कहीं और नोट भी नहीं है।
तुम ऐसे क्यों कह रही हो? मैं ऐसा ही तो हूं।मुझे मां से बात किये हुए कई दिन बीत जाते हैं। मेरे सारे दोस्त मुझसे इसी वजह से नाराज ही रहते हैं। मैं किसी से बात नहीं करता।शायद फोन पे बात करना अच्छा नहीं लगता मुझे।
तुम कभी-कभी अजीब सी बातें क्यों करती हो? तुम सेल्फ डिपेन्डेंट हो, अच्छी सैलरी मिलती है। बालिग़ हो तो तुम क्यों किसी के साथ जबरदस्ती ब्याही जाओगी। मना कर देना सबको जब तक तुम्हारे पसंद का लड़का तुम्हें न मिले।
पसंद की तो बात मत करो आप।पसंद तो सिर्फ आप हो मुझे , मुझसे शादी करोगे?
यार प्लीज़! कोई और बात करें? जानती हो मैंने एक नयी कविता लिखी है सुनोगी?
रहने दो, ज़िन्दगी कविता हो गयी है अब कविताओं से चिढ़ होती है। कभी तो सीधा जवाब दे दिया करो..सॅारी यार! मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकता, मैं खुद के भी साथ नहीं हूं, किसी अनजान से रास्ते की ओर कदम बढ़ते चले जा रहे हैं। वक्त धीरे-धीरे मुझे मुझसे दूर करता जा रहा है। ऐसे में मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं दे सकता।
किसने कहा मुझे आपसे कोई उम्मीद है? अब इतना तो आपको समझ ही चुकी हूं।
एक्चुअली जानते हैं आपकी प्रॅाब्लम क्या है?
आप न कभी किसी रिलेशनशिप को हां सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकि आपके साथ जो गुड ब्वाय वाला टैग लगा है न उसे खोने से डरते हैं। तभी शायद आपकी कोई गर्लफ्रैंड कभी थी नहीं न होगी,
बहुत मुश्किल से खुद को सम्हालती हूं । कोई इमोशन नाम की चीज़ है आपके दिल में?
ऐसा कुछ नहीं है....
बॅाय! अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी।
सुनो!
कहो!
जो तुम कह रही हो वो सच नहीं है।
तो सच क्या है?
कुछ नहीं। 'ब्रम्ह सत्यम् जगत मिथ्या'।
बॅाय! अलविदा।
रुको!
नहीं अब कोई फायदा नहीं है......
कॅाल डिस्कनेक्टेड....
कॅाल रिजेक्टेड....काश! मुझे आज सुन लेती....कुछ बताना था..लेकिन क्या बताना था....मुझे क्या पता...तब की तब देखते।
- अभिषेक शुक्ल
बुधवार, 26 अक्टूबर 2016
रविवार, 23 अक्टूबर 2016
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन,
चिमनी भट्टी,शोर-शराबा कैंटीन में चौका बरतन ।।
दिनभर सारा काम करुं तो खाने भर को मिलजाता है,
कुछ पैसे मैं रख लेता हूँ कुछ मेरे घर भी जाता है।।
फटे हुए कपड़े मुन्नी के मां को नहीं दवाई मिलती
अपना भी तन मैं ढक पाऊँ इतनी कहाँ कमाई मिलती?
दिन-रात मैं मेहनत करता फिर भी पैसों की है तरसन,
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन।।
-अभिषेक
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
दशहरा, स्मृतियों के कोने से।
काश! ऐसा मुमकिन होता कि वैज्ञानिक कोई ऐसा टाइम मशीन बनाने में सफल हो जाते जिसमें बैठकर मैं अपने बचपन में पहुंच जाता। तब, जब मैं घर में खूब उत्पात मचाता था।उस वक़्त जब मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था। उस वक़्त जब दशहरे की छुट्टी दशहरे से चार-पांच दिन पहले ही हो जाती थी और हम लोग इन छुट्टियों में खूब मस्ती करते थे।
दशहरा का मेला नवरात्र के पहले दिन से ही शुरू हो जाता था। मेला शोहरतगढ़ में लगता था।
मैं मनाता था हे भगवान! जल्दी से छुट्टियां हो जाएं और हमें मेला देखने को मिले।
पहले जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे दिन में मेला दिखाने पाले काका ले जाते थे। काका पूरा मेला घुमाते थे। समोसा,जलेबी और खुरमा खिलाना फिक्स था। इसके बाद कोई एक खिलौना। काका से डर भी लगता था कोई डांट ना पड़ जाए कुछ जिद करने पे। सो जो मिलता बिना ना-नुकुर किये रख लेते थे। काका की उम्र ढली तो काका भीड़-भाड़ से परहेज़ करने लगे।
काका की जिम्मेदारी जब तक छूटी तब तक भइया बड़े हो गए थे। मैं भी ज्यादा चलने पर रोता नहीं था। पहले अम्मा केवल एक दिन मेला देखने देती थी लेकिन भइया के साथ ३दिन मेला घूमने की आजादी मिल जाती थी। शाम को कुछ खाकर भइया और मैं मेला देखने निकल जाते थे। शोहरतगढ़ तक पैदल जाना होता था। हम लोग अकेले ही नहीं जाते थे, पूरा गांव साथ जाता था।
खर्च करने को पैसा भी खूब मिलता।पहले दिन अम्मा से मिलता, दूसरे दिन मम्मी से मगर एकमुश्त अच्छी-खासी रकम पापा ही देते थे।
भइया के साथ मेला घूमने का मतलब होता था मस्ती की लॅाटरी लगना। मतलब भरपेट जीभ की सेवा और खिलौनों से भी थैली भरी रहती।
भइया से कभी रिमोट वाली कार की जिद करता तो कभी मैगजीन वाले पिस्टल की। कभी बड़ी सी प्लास्टिक वाली ए.के४७ तो कभी पटाखे वाले राइफल की।
इतने से मन थोड़े ही भरता था मेरा, अगले दिन नए खिलौनों की लिस्ट। मेरे पास अटैची भर के खिलौने रहते थे। भइया के पास जब कभी कुछ पैसे जमा हो जाते थे मेरे लिए खिलौने खरीद लाते थे।
वीडियो गेम, वाकमैन तो हर दो महीने खराब होता और नया मिलता।साल भर तक मैं खिलौना इकट्ठा करता और गर्मी की छुट्टी में सबको बांट देता।
मुझे खिलौनों से इतना प्यार था कि मम्मी जब कहीं पापा के साथ घूमने जाती थीं और मैं उनके साथ नहीं जा पाता था तो मेरे लिए घूस में खिलौना लाती थीं। बारहवीं तक मेरे पास खूब सारे खिलौने थे पर मेरठ जाने के बाद अचानक से एहसास हुआ कि अब मैं थोड़ा बड़ा हो गया हूँ।
सच कहूं तो ये खिलौने तभी तक अच्छे लगे जब तक भइया घर पर थे।भइया बाहर पढ़ने चले गए तो मेला छूट गया। हर बार इंतजार करता की भइया इस बार दशहरा की छुट्टी में घर आएंगे पर पूर्वी उत्तरप्रदेश में दशहरे की केवल एक दिन की छुट्टी होती। मेरा मन मेला देखने का करता ही नहीं तब। भला भइया बिना कोई मेला देखने की चीज़ होती है क्या?
जब मैं दसवीं में था तब भइया बाहर पढ़ने चले गए थे।मेला तब भी लगता था लेकिन मैं जाने से कतराता था। पता नहीं क्यों मेले के नाम से रुलाई छूट पड़ती।
कई बार उपेन्द्र जबरदस्ती ले जाता था। इमोशनल ड्रामा आज भी वो टॅाप क्लास का करता है।
इंटरमीडियट कम्प्लीट हुआ तो मेरठ पढ़ने आ गया। अजनबी शहर तो हर पल मेला लगता है।
( यहां नौचंदी मेला लगता है जिसमें हम भाई-बहन सब साथ में जाते थे..इसके बारे में फिर कभी लिखूंगा)
यहां कब नवरात्र लगता कब बीत जाता कुछ पता ही नहीं चलता था। दशहरे वाले दिन मेरठ में कंकड़खेरा में मेला लगता है। रावण का पुतला फूंका जाता है। यहां मेला दिखाने के लिए वीरु भइया थे। इस मेले में हम केवल धूलयुक्त गोलगप्पे खाते थे, फिर मीठा पान खाते थे।
दूसरे साल से राजेश भइया मिल गए, फिर अशोक भइया।चौथे साल तक तो पूरी फौज ही इकट्ठी हो गई थी। अंशू,अंकित और मनीष भी आ गए थे। मेरठ में आखिरी दशहरा याद है धमाकेदार मना था। मेले से लौटकर जब हमारी टोली वापस आई तो न जाने कैसे माइकल जैक्सन की आत्मा राजेश भइया में घुस गई थी। कभी लेट के तो कभी नागिन डांस तो कभी चारो तरफ से नाचते। अंशू और अशोक भाई भी रंग में थे लेकिन राजेश भइया के सामने कोई टिक ही नहीं पा रहा था।
आज दशहरा है लेकिन आज फिर मैं मेला नहीं गया, आज वीरु भइया भी साथ नहीं थे। न जाने क्यों इस बार दशहरा बहुत खला।
सच कहूं तो बिना भाई-बहनों के कोई उत्सव, उत्सवमय लगता है क्या। जाने क्यों वही पुराने दिन याद आ रहे हैं। भइया के हाथों को पकड़े,नहर के किनारे वाली सड़क पर धीरे-धीरे चलना और भइया से कहानियां सुनते-सुनते घर तक पहुंच जाना..अम्मा का दरवाजा खोलना, उसे चहक कर नए खरीदे हुए खिलौने दिखाना,हफ्तों अपने खिलौनों पर इतराना....वो भी क्या दिन थे।
हर बार की तरह इस बार भी दुकानें सजी होंगी।पल्टन के पल्टन पैदल ही लोग शोहरतगढ़ की ओर जा रहे होंगे। बूढ़े-बुजुर्ग सब तैयार होकर गांव से निकल गये होंगे।भौजाईयां सातो सिंगार कर के मेला की ओर बढ़ चुकी होंगी।मजनूँ बेचारा फिर पिटा होगा।पल्टहिया भौजी फिर उसे ५०रुपए मेला करने के लिए दी होगी। भला दस रुपए में क्या मिलता है? ढंग का खिलौना भी नहीं मिलता इतने में। जलेबी, समोसा तो पूछो ही मत।सबके भाव आसमान पर छाए रहते हैं मेले में,
लेकिन कौन समझाए भौजाई को हर मेले में बेचारा कूटा जाता है......मैं भी यहां खुद को कूट रहा हूँ, कुछ पुरानी स्मृतियों को, बीती कहानियों को..उकेर रहा हूँ यादों के कैनवास पर भावों की तूलिका से , शनैः-शनैः।
दशहरा का मेला नवरात्र के पहले दिन से ही शुरू हो जाता था। मेला शोहरतगढ़ में लगता था।
मैं मनाता था हे भगवान! जल्दी से छुट्टियां हो जाएं और हमें मेला देखने को मिले।
पहले जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे दिन में मेला दिखाने पाले काका ले जाते थे। काका पूरा मेला घुमाते थे। समोसा,जलेबी और खुरमा खिलाना फिक्स था। इसके बाद कोई एक खिलौना। काका से डर भी लगता था कोई डांट ना पड़ जाए कुछ जिद करने पे। सो जो मिलता बिना ना-नुकुर किये रख लेते थे। काका की उम्र ढली तो काका भीड़-भाड़ से परहेज़ करने लगे।
काका की जिम्मेदारी जब तक छूटी तब तक भइया बड़े हो गए थे। मैं भी ज्यादा चलने पर रोता नहीं था। पहले अम्मा केवल एक दिन मेला देखने देती थी लेकिन भइया के साथ ३दिन मेला घूमने की आजादी मिल जाती थी। शाम को कुछ खाकर भइया और मैं मेला देखने निकल जाते थे। शोहरतगढ़ तक पैदल जाना होता था। हम लोग अकेले ही नहीं जाते थे, पूरा गांव साथ जाता था।
खर्च करने को पैसा भी खूब मिलता।पहले दिन अम्मा से मिलता, दूसरे दिन मम्मी से मगर एकमुश्त अच्छी-खासी रकम पापा ही देते थे।
भइया के साथ मेला घूमने का मतलब होता था मस्ती की लॅाटरी लगना। मतलब भरपेट जीभ की सेवा और खिलौनों से भी थैली भरी रहती।
भइया से कभी रिमोट वाली कार की जिद करता तो कभी मैगजीन वाले पिस्टल की। कभी बड़ी सी प्लास्टिक वाली ए.के४७ तो कभी पटाखे वाले राइफल की।
इतने से मन थोड़े ही भरता था मेरा, अगले दिन नए खिलौनों की लिस्ट। मेरे पास अटैची भर के खिलौने रहते थे। भइया के पास जब कभी कुछ पैसे जमा हो जाते थे मेरे लिए खिलौने खरीद लाते थे।
वीडियो गेम, वाकमैन तो हर दो महीने खराब होता और नया मिलता।साल भर तक मैं खिलौना इकट्ठा करता और गर्मी की छुट्टी में सबको बांट देता।
मुझे खिलौनों से इतना प्यार था कि मम्मी जब कहीं पापा के साथ घूमने जाती थीं और मैं उनके साथ नहीं जा पाता था तो मेरे लिए घूस में खिलौना लाती थीं। बारहवीं तक मेरे पास खूब सारे खिलौने थे पर मेरठ जाने के बाद अचानक से एहसास हुआ कि अब मैं थोड़ा बड़ा हो गया हूँ।
सच कहूं तो ये खिलौने तभी तक अच्छे लगे जब तक भइया घर पर थे।भइया बाहर पढ़ने चले गए तो मेला छूट गया। हर बार इंतजार करता की भइया इस बार दशहरा की छुट्टी में घर आएंगे पर पूर्वी उत्तरप्रदेश में दशहरे की केवल एक दिन की छुट्टी होती। मेरा मन मेला देखने का करता ही नहीं तब। भला भइया बिना कोई मेला देखने की चीज़ होती है क्या?
जब मैं दसवीं में था तब भइया बाहर पढ़ने चले गए थे।मेला तब भी लगता था लेकिन मैं जाने से कतराता था। पता नहीं क्यों मेले के नाम से रुलाई छूट पड़ती।
कई बार उपेन्द्र जबरदस्ती ले जाता था। इमोशनल ड्रामा आज भी वो टॅाप क्लास का करता है।
इंटरमीडियट कम्प्लीट हुआ तो मेरठ पढ़ने आ गया। अजनबी शहर तो हर पल मेला लगता है।
( यहां नौचंदी मेला लगता है जिसमें हम भाई-बहन सब साथ में जाते थे..इसके बारे में फिर कभी लिखूंगा)
यहां कब नवरात्र लगता कब बीत जाता कुछ पता ही नहीं चलता था। दशहरे वाले दिन मेरठ में कंकड़खेरा में मेला लगता है। रावण का पुतला फूंका जाता है। यहां मेला दिखाने के लिए वीरु भइया थे। इस मेले में हम केवल धूलयुक्त गोलगप्पे खाते थे, फिर मीठा पान खाते थे।
दूसरे साल से राजेश भइया मिल गए, फिर अशोक भइया।चौथे साल तक तो पूरी फौज ही इकट्ठी हो गई थी। अंशू,अंकित और मनीष भी आ गए थे। मेरठ में आखिरी दशहरा याद है धमाकेदार मना था। मेले से लौटकर जब हमारी टोली वापस आई तो न जाने कैसे माइकल जैक्सन की आत्मा राजेश भइया में घुस गई थी। कभी लेट के तो कभी नागिन डांस तो कभी चारो तरफ से नाचते। अंशू और अशोक भाई भी रंग में थे लेकिन राजेश भइया के सामने कोई टिक ही नहीं पा रहा था।
आज दशहरा है लेकिन आज फिर मैं मेला नहीं गया, आज वीरु भइया भी साथ नहीं थे। न जाने क्यों इस बार दशहरा बहुत खला।
सच कहूं तो बिना भाई-बहनों के कोई उत्सव, उत्सवमय लगता है क्या। जाने क्यों वही पुराने दिन याद आ रहे हैं। भइया के हाथों को पकड़े,नहर के किनारे वाली सड़क पर धीरे-धीरे चलना और भइया से कहानियां सुनते-सुनते घर तक पहुंच जाना..अम्मा का दरवाजा खोलना, उसे चहक कर नए खरीदे हुए खिलौने दिखाना,हफ्तों अपने खिलौनों पर इतराना....वो भी क्या दिन थे।
हर बार की तरह इस बार भी दुकानें सजी होंगी।पल्टन के पल्टन पैदल ही लोग शोहरतगढ़ की ओर जा रहे होंगे। बूढ़े-बुजुर्ग सब तैयार होकर गांव से निकल गये होंगे।भौजाईयां सातो सिंगार कर के मेला की ओर बढ़ चुकी होंगी।मजनूँ बेचारा फिर पिटा होगा।पल्टहिया भौजी फिर उसे ५०रुपए मेला करने के लिए दी होगी। भला दस रुपए में क्या मिलता है? ढंग का खिलौना भी नहीं मिलता इतने में। जलेबी, समोसा तो पूछो ही मत।सबके भाव आसमान पर छाए रहते हैं मेले में,
लेकिन कौन समझाए भौजाई को हर मेले में बेचारा कूटा जाता है......मैं भी यहां खुद को कूट रहा हूँ, कुछ पुरानी स्मृतियों को, बीती कहानियों को..उकेर रहा हूँ यादों के कैनवास पर भावों की तूलिका से , शनैः-शनैः।
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016
नेह का सागर लाई नानी
अंतरिक्ष को पात्र बनाकर नेह का सागर लाई नानी
जिसमें सारी दुनिया तर हो वैसी ही गहराई नानी,
हमको हर-पल यही लगा की पग पग पर है साथ हमारे
कई दिनों से ढूंढ रहे हैं जाने कहाँ हेराई नानी?
आँखों में जब आँसू आते झट से विह्वल हो जाती थी
अब रो-रो कर बुरा हाल है कैसे हुई पराई नानी?

पल-पल क्षिन-क्षिन उन्हीं कहानी किस्सों की सुधि आती है
सावन की भीनी रातों में जिनको कभी सुनाई नानी,
सच है की नानी की गोदी गंगा से भी शीतल लगती
तभी हमें ये अक्सर लगता सब नदियों की माई नानी,
जब-जब नानी याद आती है आँखों से आँसू झरते हैं,
ऐसे छिपकर गुम होने की कैसी जुगत लगाई नानी?
-अभिषेक शुक्ल
जिसमें सारी दुनिया तर हो वैसी ही गहराई नानी,
हमको हर-पल यही लगा की पग पग पर है साथ हमारे
कई दिनों से ढूंढ रहे हैं जाने कहाँ हेराई नानी?
आँखों में जब आँसू आते झट से विह्वल हो जाती थी
अब रो-रो कर बुरा हाल है कैसे हुई पराई नानी?

पल-पल क्षिन-क्षिन उन्हीं कहानी किस्सों की सुधि आती है
सावन की भीनी रातों में जिनको कभी सुनाई नानी,
सच है की नानी की गोदी गंगा से भी शीतल लगती
तभी हमें ये अक्सर लगता सब नदियों की माई नानी,
जब-जब नानी याद आती है आँखों से आँसू झरते हैं,
ऐसे छिपकर गुम होने की कैसी जुगत लगाई नानी?
-अभिषेक शुक्ल
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