बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कागज़


किताबों के दफ़्तर में रंगीन कागज़
रौशन है दुनिया जहाँ इनकी आमद,
सीखते ये दुनिया को सारे नज़ाकत
इन कागजों में गज़ब है हिमाकत।
इन्हीं काग़ज़ों से है रंगीन दुनिया
ये न हों तो लगती है संगीन दुनिया ,
ये हों तो मीठी है नमकीन दुनिया
ये न हों तो लगती है ग़मगीन दुनिया।
कहीं काग़ज़ों से है बिगड़ी तबियत
कहीं काग़ज़ों से हुई फिर फ़ज़ीहत,
कहीं काग़ज़ों से है गुमसुम अक़ीदत
कहीं काग़ज़ों से मिली फिर नसीहत।
कहीं काग़ज़ों में बनी है कहानी
कहीं कागजों की सुनी है जुबानी,
कहीं काग़ज़ों में हैं रस्में निभानी
कहीं काग़ज़ों में है उलझी जवानी।
-अभिषेक शुक्ल
(एक छोटी सी कोशिश कागज़ पर )

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

मेरी आँखों में उतरी 😊😊



मेरी आँखों में उतरी इश्क़ की ऐसी
वीरानी है
कि जैसे तुमको पाने की मेरी चाहत
पुरानी है !!
सुचिता के तूलिका से....

शनिवार, 30 जनवरी 2016

सुख का पेड़


कभी-कभी सोचता हूँ एक पेड़ लगाऊं सुख का और ईश्वर से वरदान मांगूं की जैसे -जैसे समय बढ़ता जाये वैसे -वैसे सुख का पेड़ और सघन हो जाये और एक दिन वह पेड़ इतना सघन हो जाये की समूचा आकाश भी उसे ढकने के लिए छोटा पड़ जाये. एक ऐसा पेड़ रोपूँ की जिसकी सघनता सुख का विस्तार करे ,समय जिसे जीर्ण न कर सके वरन समय भी उसके समृद्ध शाखाओं को को देख नतमस्तक हो जाये और सुख की छाँव में समय भी सुखी हो जाये.

मैं वर्षों से प्रयत्नशील हूँ कि सुख वृक्ष आरोपित करने के हेतु किन्तु इसका बीज कहीं मिला नहीं.
मुझसे पहले मेरे कई पूर्वजों ने सुख का पेड़ रोपना चाहा पर रोप न सके. संभवतः “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का अलाप उन्ही प्रयत्नों को सार्थक करने हेतु था किन्तु न जाने कैसा व्यवधान आन पड़ा कि वे विरत हो गए इस वृक्ष का बीज बोन से.
मेरे आदि पूर्वज मनु ने जब समाज की संकल्पना की,संस्कारों की बीज रोपा तभी उनसे एक भूल हो गयी थी .उन्होंने तभी सुख का भी बीज रोपा था जिसके लिए विधाता ने उन्हें वर दिया था. उन्होंने समाज, संस्कार,वर्ण की श्रृष्टि की किन्तु सुख का पेड़ रोप कर उसे सींचना भूल गए.समाज विस्तृत होता गया और सुख का पेड़ क्षीण होता रहा और धीरे-धीरे समय के साथ विलुप्त हो गया.
हमारे ऋषियों,मुनियों ने इस पेड़ को पुनः जीवित करने के लिए असंख्य मंत्र रचे, आह्वान किये,नए सूत्र दिए किन्तु समाज में मानवों ने स्वयं को अनेक ऐसे सघन वृक्षों की छाँव में घिरा पाया कि उनका ध्यान ही “सुख के पेड़” की ओर नहीं गया और यह पेड़ उपेक्षित होकर सूख गया.
लोभ, घृणा,ईर्ष्या,क्रोध,वितृष्णा, व्यभिचार आदि के इतने वृक्ष उगे कि “सुख का पेड़” उनमे कहीं खो गया. इन वृक्षों कि छाया इतनी सघन थी कि आनंद, उल्लास,सुख के पेड़ सूखते चले गए.
आह! मानव की तन्द्रा कभी टूटती ही नहीं है इन वृक्षों की छाया इतनी सघन हो गयी है कि लगता है मानव चिर निद्रा में सो गया है किसी कुत्सित वृक्ष के तले, जीवन की सुधि भूले…जड़वत..चेतना रहित…….मरणासन्न.

शनिवार, 16 जनवरी 2016

गालिब तेरे शहर में

उलझी सी ज़िंदगी है
रूठा सा रहनुमा है,
हैरान है तबीयत
किस बात का गुमाँ है?
एक सुर्ख़ हक़ीक़त है
गुमसुम सी आकिबत है,
इस दिल के मसले ऐसे
हर बात फ़ज़ीहत है;
क्या शायरी कहूँ मैं
क्यों क़ाफ़िया मिलाऊँ,
तेरे शहर में ग़ालिब
हर लफ्ज़ मुसीबत है।।
-अभिषेक शुक्ल

समाज पर गंभीर सवाल है घरलू हिंसा

भारत में घरेलू हिंसा बहुत सामान्य सी बात हैलगभग हर तबके में ऐसी कई दर्दनाक कहानियां देखने और सुनने को मिल जाती हैं जिनसे रूह काँप जाती हैकई बार ये छोटी छोटी लड़ाईयां इतनी विभत्स और हिंसक हो
जाती हैं कि सभ्य समाज पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है कि क्या वास्तव में समाज कहीं से भी सभ्य है

अनगिनत ऐसे चेहरे हैं जिनकी जिंदगी में पति से पिटना स्वाभाविक सी बात है है हर रात इस डर में कटती है की कहीं कोई अनहोनी न हो जाए कहने के लिए ये समाज पुरुष प्रधान है पर इस... भारत में घरेलू हिंसा बहुत सामान्य सी बात है.लगभग हर तबके में ऐसी कई दर्दनाक कहानियां देखने और सुनने को मिल जाती हैं जिनसे रूह काँप जाती है.कई बार ये छोटी-छोटी लड़ाईयां इतनी विभत्स और हिंसक हो जाती हैं कि सभ्य समाज पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है कि क्या वास्तव में समाज कहीं से भी सभ्य है ? अनगिनत ऐसे चेहरे हैं जिनकी जिंदगी में पति से पिटना स्वाभाविक सी बात है. है. हर रात इस डर में कटती है की कहीं कोई अनहोनी न हो जाए. कहने के लिए ये समाज पुरुष प्रधान है पर इस समाज में कापूरुषों की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा है.शराब पीकर अपनी पत्नी को पीटना कहीं से भी पुरुषोचित आचरण नहीं प्रतीत होता है. ऐसा करने वाले वहीं लोग हैं जो दुनिया में सबसे पिटते हैं लेकिन पत्नी को पीटकर खुद को मर्द समझते हैं.ऐसे नामर्दों से समाज भरा पड़ा है.ये कहने के लिए घरेलू हिंसा है पर शायद आपको न पता हो कि किसी भी प्रकार की हिंसा समाज के विरूद्ध होती है और जो हिंसा समाज के विरूद्ध हो उसके दमन के लिए समाज को आगे बढ़ कर आना चाहिए पर समाज तो इस हद तक आधुनिक हो गया है कि मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ चुकी हैं.पड़ोस में कौन पिट रहा है या कौन पीट रहा है इससे किसी को कोई मतलब नहीं है, शायद तभी तो भारत में घरेलू हिंसा की घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं.अनगिनत ऐसी महिलाएं हैं जिनकी जिंदगी इतनी बोझिल हो चुकी है कि उन्हें आत्महत्या करना जीने से ज्यादा आसान लगता है. पारिवारिक कलह झेलना, बच्चों को पालना, एकल मातृत्व का दर्द झेलना हर किसी के बस कि बात नहीं है लेकिन ऐसी जिंदगी जीने वाली महिलाओं की संख्या भारत में बहुत अधिक है. ऐसी लाखों महिलाएं हैं जो हर रोज़ पति से पिटती हैं जिनकी नींद पति के घूंसे-लात से खुलती है और जिन्हे नींद भी पति से पिटने के बाद आती है.वे सिर्फ इस उम्मीद में पूरी ज़िंदगी काट देती हैं कि कभी न कभी तो पति सुधरेगा और अगर उन्होंने विवाह विच्छेद कर लिया तो बच्चों कि परवरिश कौन करेगा? समाज में पुरुष कितने भी अधम कृत्य भले ही क्यों न करे वह सर्वथा पवित्र समझा जाता है और महिला अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध भी करना शुरू कर दे तो उसे दुश्चरित्र और कुलटा कहा जाता है. समाज की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि पति को भगवान का दर्ज़ा प्राप्त है पर पत्नी को समाज इंसान भी नहीं समझता. ये भगवान जब हैवानियत की हदें पार करता है तो भी घर अन्य सदस्यों को लगता है कि सारी गलती सिर्फ उस बहु की है जो अपने पति से पिट रही है.ससुराल से संवेदना कोई महिला कम ही पाती है क्योंकि इंसान ने अपनी आँखों पर अपने और पराये की इतनी मिटी चादर आँखों पर चढ़ा ली है कि उसे कुछ गलत या सही नहीं दिखता. देश में कई ऐसी महिलाएं हैं जो रोज़ अपने-अपने पतियों से पिटती हैं और करवाचौथ आने पर पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत भी रखती हैं. ये तो हर भारतीय नारी करती है क्योंकि उन्हें पति की हरकतों में अपने पूर्व जन्म का कर्म नज़र आता है. पुरुष एक दिन किसी से पिट जाये तो उसे इतनी ग्लानि होती है कि वह किसी का क़त्ल भी कर सकता है क्योंकि उसके स्वाभिमान को चोट लगती है, उन महिलाओं की दशा सोचिये जिनके स्वाभिमान पर हर दिन चोट पहुँचती है उनके मन में कितनी ग्लानि होती होगी, कितना विक्षोभ उन्हें होता होगा अपने आप को पिटता देखकर? इन हिंसाओं की सिर्फ एक वजह है कि महिलाएं अभी पुरुषों कि तुलना में जीविकोपार्जन की लिए कम आत्मनिर्भर हैं. जो आत्मनिर्भर हैं उन्हें कहीं न कहीं ये लगता है कि समाज क्या कहेगा? समाज तब क्यों कुछ नहीं कहता जब उनके साथ बलात्कार होता है? जब उनका दैहिक,मानसिक और सामाजिक शोषण होता है? अगर समाज को इनकी फिक्र नहीं है तो इन्हें समाज की फिक्र क्यों है? एक अनुरोध पूरे पुरुषों से है यदि आप सच में मर्द हैं तो औरतों की इज्जत करना सीखिये,उनकी सुरक्षा की लिए उनकी ढाल बनिये, उन्हें उन परिस्थितियों से बाहर निकालिये जिनमें उनके साथ क्रूरता की जाती हो. समाज का ढाल कानून होता है पर हर जगह कानून तो नहीं पहुँच सकता न?हर जगह पुलिस तो नहीं पहुँच सकती न? आप भी समाज में रहते हैं और आपकी समाज की प्रति कुछ जिम्मेदारी है, ऐसी क्रूरता न करें न करें न करने दें.पुरुष हैं तो पुरुषोचित आचरण भी करना सीखिये. क्या आपको अच्छा लगेगा जब आपकी बहिन, बेटी पर ऐसे अत्याचार हों? संवेदनाएं व्यक्ति को महापुरुष बनाती हैं आप पुरुष तो बन सकते हैं न ? एक अनुरोध उन महिलाओं से हैं जो घरेलू हिंसाओं की शिकार बनती हैं.जो इंसान आपको इंसान न समझता हो उसे आप भगवान तो न समझें. जो इंसान आप पर अत्याचार करे उसे आप सहन न करती रहें,जवाब देना सीखिये, अपने आप को सुरक्षित रखना भी आपका दायित्व है, अपने स्वाभिमान की रक्षा करना भी आपका दायित्व है और किसी को अपने स्वाभिमान को कुचलने का मौका न दें, जो आपके साथ जैसा व्यवहार करे वैसा ही व्यवहार आप भी उसके साथ भी करें.एक बार मैंने कहीं पढ़ा था कि अपराध सहना भी अपराध करने से अधिक गंभीर अपराध है इसलिए अपने प्रति अपराध न करें और न ही किसी को करने दें...इस कविता से बहार निकलने का हर सार्थक प्रयत्न कीजिये- "अबला तेरी यही कहानी, आँचल में दूध आँखों में पानी".



बुधवार, 30 दिसंबर 2015

शाख़ें उलझ रही हैं



मेरी कीर्ति फैली जग में मुझे
सब जानते हैं
सब छाँव लेते मुझसे मुझे सब
मानते हैं,
पर इन दिनों क्यों मेरी जड़ें
मुरझ रही हैं,
तनिक सघन हुआ क्या शाख़ें
उलझ रही हैं।।

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

एक और दामिनी



एक लड़की मैंने देखी है

जो दुनिया से अनदेखी है

दुनिया उससे अनजानी है

मेरी जानी-पहचानी है।

रहती है एक स्टेशन पर

कुछ फटे-पुराने कपड़ों में

कहते हैं सब वो ज़िंदा है

बिखरे-बिखरे से टुकड़ों में।

प्लेटफॉर्म ही घर उसका

वो चार बजे जग जाती है

न कोई संगी-साथी है

जाने किससे बतियाती है।

वो बात हवा से करती है

न जाने क्या-क्या कहती है

हाँ! एक स्टेशन पर देखा

एक पगली लड़की रहती है।

मैंने जब उसको देखा

वो डरी-सहमी सी सोयी थी

आँखें  उसकी थीं बता रहीं

कई रातों से वो रोई थी।

बैडरूम नहीं है कहीं उसका

वो पुल के नीचे सोती है,

ठंढी, गर्मी या बारिश हो

वो इसी ठिकाने होती है।

वो हंसती है वो रोती है

न जाने क्या-क्या करती है

जाने किस पीड़ा में  खोकर

सारी रात सिसकियाँ भरती है।

जाने किस कान्हा की वंशी

उसके कानों में बजती है

जाने किस प्रियतम की झाँकी

उसके आँखों में सजती है।

जाने किस धुन में खोकर

वो नृत्य राधा सी करती है

वो नहीं जानती कृष्ण कौन

पर बनकर मीरा भटकती है।

उसके चेहरे पर भाव मिले

उत्कण्ठा के उत्पीड़न के,

आशा न रही कोई जीने की

मन ही रूठा हो जब मन से।

है नहीं कहानी कुछ उसकी

पुरुषों की सताई नारी है

अमानुषों से भरे विश्व की

लाचारी पर वारी है।

वो पगली शोषण क्या जाने

भला-बुरा किसको माने

व्यभिचार से उसका रिश्ता क्या

जो वो व्यभिचारी को जाने?

वो  मेरे देश की बेटी है

जो सहम-सहम के जीती है

हर दिन उसकी इज्जत लुटती

वो केवल पीड़ा पीती है।

हर गली में हर चौराहे पर

दामिनी दोहरायी जाती है,

बुजुर्ग बाप के कन्धों से

फिर चिता उठायी जाती है।

कुछ लोग सहानुभूति लिए

धरने पर धरना देते हैं,

गली-नुक्कड़-चौराहों पर

बैठ प्रार्थना करते हैं,

पर ये बरसाती मेंढक

कहाँ सोये से रहते हैं

जब कहीं दामिनी मरती है

ये कहाँ खोये से रहते हैं।

खुद के आँखों पर पट्टी है

कानून को अँधा कहते हैं

अपने घड़ियाली आंसू से

जज्बात का धंधा करते हैं।

जाने क्यों बार-बार मुझको

वो पगली याद आती है,

कुछ घूँट आँसुओं के पीकर

जब अपना दिल बहलाती है।

उसकी चीखों का मतलब क्या

ये दुनिया कब कुछ सुनती है

यहाँ कदम-कदम पर खतरा है

यहाँ आग सुलगती रहती है।

हर चीख़ यहाँ बेमतलब है

हर इंसान यहाँ पर पापी है,

हर लड़की पगली लड़की है

पीड़ा की आपाधापी है।




शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

राधिका काकी

राधिका काकी नहीं रही। ये भी कोई जाने की उम्र होती है क्या? बमुश्किल अभी पैंतालीस-छियालीस साल ही तो उम्र रही होगी और इतने कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कहना कुछ हज़म नहीं हुआ। भले ही उम्र कम थी पर अपने तीन पोते देख कर गयी।भरा-पूरा परिवार छोड़ कर गयी।तीन बेटे और एक छोटी सी दस-बारह बरस की बेटी। गांव में कुछ हो न हो शादी पहले हो जाती है। लड़कियाँ बहु बनकर घर में आती हैं वो माँ बन कर आई थी। मौसी तो पहले से थी पर इस बार माँ बन कर आई। पवन कुमार की माई हाँ वो अपने ससुराल इसी पहचान के साथ आई। कुछ साल बाद परदेसी पैदा हुए। क़रीब दस साल बाद मक्कूऔर फिर बिक्की। यानि तीन लड़के और एक बेटी। भरा पूरा परिवार। बड़ी बहु आई। पोते हुए। जिस उम्र में बड़े घर की लड़कियों की शादी होती है उसी उम्र में वो दादी बनी। मज़ाल क्या बहु पोतों को डाँट दे। परदेसी की भी शादी हुई। अवध में गौने का रिवाज़ होता है। अभी इसी साल शादी हुई है पर गौना नहीं आया है। बहू के आने की तैयारियाँ चल रही थीं कि सारी की सारी तैयारियां धरी की धरी रह गईं। बेटे के गौने की तैयारी थी पर खुद ही दुनिया से विदा ले ली।
मेरे मीता (काकी के पति) की दो शादियाँ हुईं। पहली पत्नी बड़े बेटे के जन्म के कुछ साल बाद ही स्वर्ग सिधार गई। फिर दूसरी शादी राधिका काकी से हुई। मीता मेरे पापा से बड़े हैं पर हमारे घर के हर बच्चे के वो मीता(दोस्त) बन जाते हैं। मीता हैं बहुत ज़िंदादिल इंसान। अल्हड़......मस्त। पापा के कॉलेज के दिनों के अच्छे साथी रहे। फिर रोज़ी-रोटी की तलाश में मुम्बई यात्रा।फिर वहीं एक अलग दुनिया बनी। मीता के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये रहा कि वे न तो अपनी पहली पत्नी को अंतिम विदाई दे सके, न माँ को और न ही पिता को...और जाते-जाते काकी को भी न देख सके। कल भी वो मुम्बई में ही थे.....अब गांव जा रहे हैं। बड़ा बेटा पवन भी दिल्ली से निकल चुके हैं शायद घर पहुँच भी गए होंगे। आज ही अंतिम विदाई है।
दुनिया छोड़ने के आधे घण्टे पहले तक बिलकुल स्वस्थ थी। मधुमेह था पर नियंत्रण में था। अम्मा और मम्मी से घण्टों बातें की फिर अम्मा से कहा कि- "अम्मा अब हम जाइत है।"
घर गई फिर अचानक से दर्द उठा। बहू को बुलाकर कहा कि- "साँस नाहीं लै पाइत है। अब हम बचब नाहीं। लड़िकन के सम्हारे।"(अब मैं बचुँगी नहीं, बच्चों की देख-भाल ठीक से करना)।
अंतिम यात्रा तक यही कहानी थी। अभिनय पूरा हो चुका था...पटकथा में अब कोई संवाद बाक़ी नहीं रहा। पर्दा गिर गया। अंत्येष्टि की तैयारी हो रही है....बड़ा बेटा अब तक घर पहुँच चुका होगा।
मेरी बहिन ने मुझे मैसेज़ किया कि भैया पवन कुमार भइया की मम्मी मर गईं। सन्न रह गया। आंसू आ गए। हमारे परिवार से उसे बहुत प्यार था। हमें भी बहुत मानती थी। जब गांव पहुँचता था तो देखते ही खुश हो जाती थी। यही कहते हुए बुलाती- अरे हमार बाऊ! आइ गयो लाला।
आज दुःख हो रहा है। कल आंसू रोक नहीं सका। काकी अब नहीं है। दुःख सिर्फ इस बात का है कि अभी मक्कू और बिक्की बहुत छोटे हैं। माँ के बिना तो एक पल भी जीना मुश्किल होता है इन्हें तो माँ छोड़ कर चली गई। कल अम्मा काकी को देखने गई थी। मक्कू अम्मा के पैर पकड़ कर रोने लगा।अम्मा काँप उठी। घर फोन किया तो अम्मा ने उदास मन से सब कुछ कहा।
दो छोटे बच्चे जिन्होंने अभी दुनिया भी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी उनके लिए ये आघात सहना कितना वेदना पूर्ण है। माँ। बहुत दुःखी है।
अजीब सी ज़िन्दगी है कब ख़त्म हो जाये पता ही नहीं चलता।
रह जाती हैं तो बस यादें। बहुत धोखेबाज़ ज़िन्दगी है। कुछ भरोसा नहीं इसका....जो लम्हा सामने है वही सब कुछ है। अगल-बगल सब कुछ ख़्वाब। कुछ भी शाश्वत नहीं..... ज़िन्दगी भी किसी सपने की तरह है.....आँख खुली सपना टूटा.....पता नहीं क्या है ज़िन्दगी।
किसी शायर ने सच ही कहा है-

ज़िन्दगी क्या है?
फ़क़त मौत का टलते रहना।।

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने.





प्रिये तुम्हारे प्रेम-पाश ने इस हिय का अवकाश किया,

तुमने क्या जादू कर डाला धरती को अकाश किया।।

जब से जीवन में तुम आई जीवन-दर्शन समझ लिया

तुम्हें ही अपना सब कुछ माना तुमको दर्पण समझ लिया।

तुम मुझमे प्रतिविम्बित होती हर-पल ये आभास हुआ

तुम बिन बहुत अधूरा हूँ मैं अब मुझको आभास हुआ

प्रिये तुम्हारे.....

रातों में नींदों को तजकर मैंने तुम पर गीत लिखे

तुमको डच तो जग सोचा सर भूमि में प्रीत लिखे

चलते चलते खो जाता हूँ बैठे-बैठे सो जाता हूँ

कभी तुम्हारी सुधि जो आई हँसते-हँसते रो जाता हूँ

योगी बन मैं दर-दर भटका कान्हा पर विश्वास किया

प्रिये तुम्हारे....

प्रिये तुम्हारे सुन्दर मन ने मेरे मन को मोह लिया

जिस पथ से तुम आती-जाती उसी राह की टोह लिया,

जहाँ-जहाँ मेरे पग जाएँ वहां तुम्हारे चरण चिन्ह हों

तुम मेरी मैं बना तुम्हारा तुम मुझसे न तनिक भिन्न हो

मैं अँधेरे का प्रेमी था तुमने सहज प्रकाश किया

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने....




शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

माँ जब तू याद आती है

यहाँ जब रात होती है तो मैं अक्सर सिसकता हूँ
                                                माँ! जब तू याद आती है मैं दुनिया भूल जाता हूँ,
                                                  झुकी हैं नीम की शाख़ें मेरे कॉलेज की राहों में
                                                जिन्हें बाँहें समझ तेरी मैं अक्सर झूल जाता हूँ।।
                                                                                                             -अभिषेक

शनिवार, 28 नवंबर 2015

भारत असहिष्णु राष्ट्र नहीं है

इन दिनों भारत में तथाकथित असहिष्णुता का माहौल बनाया जा रहा है। असहिष्णुता की विधिवत पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। साहित्यकारों का पुरस्कार लौटना, अभिनेताओं के बड़बोले और ऐसे बयान जिसे सुनकर हर भारतीय की आत्मा आहत होती है, धार्मिक प्रतिनिधियों के ऐसे वक्तव्य जिसे सुनकर लगता है कि भारत इतना असहिष्णु हो गया है कि पाकिस्तान भी सहिष्णु राष्ट्र लगने लगा है। भारत की असहिष्णुता साबित करने के लिए लोग युद्ध स्तर से इसी काम में लग गए हैं। असहिष्णुता का बीज बोया जा रहा है। भारत को असहिष्णु राष्ट्र घोषित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के कार्यकर्त्ता हैं न्यूज़ चैनल्स, राजनितिक पार्टियां, धार्मिक राजनीति की फसल काटने वाले ढोंगी लोग और सेलेब्रिटीज़ जिनकी बातों पर जनता को आँख मूँद कर विश्वास होता है।न्यूज़ चैनल्स पर वही दिखाया जा रहा है जिससे भारतीय जनमानस में कटुता पैदा हो, तलवारें खिंचे, रक्तपात और नरसंहार हो।
 जो वास्तव में बौद्धिक वर्ग हैं और सच्चे भारतीय हैं उन्हें तो कहीं असहिष्णुता नज़र नहीं आती। कुछ लोगों की तथाकथित समाजिकता ने देश की संस्कृति पर सवाल उठा दिया है। धर्म के दलालों ने तो देश में अराजकता का ऐसा बीज बोया है जो भले ही कभी उग सकने में सक्षम न हो  पर त्वरित रूप से तो अकारण ही कष्ट देता है। मन कहता है हाय! जल रहा है देश जबकि वास्तविकता यह है कि कुछ लोगों की लगायी गई आग है जिसे जनता कभी भी पानी फेंक कर बुझा सकती है।
असहिष्णुता का आशय ऐसी परिस्थिति से है जिसमें किसी भी विपरीत धर्मावलम्बी को हेय दृष्टि से देखा जाये, उन्हें आतंकित किया जाये, उनका उत्पीड़न किया जाये किन्तु भारत में तो ऐसी कोई परिस्थिति दूर-दूर तक नहीं दिखती। हाँ यह नितांत विचार सत्य है कि व्यक्तिगत झगड़ों को सांप्रदायिक दंगा घोषित करने की प्रवित्ति हो गयी है इन दिनों हर बुद्धिजीवी की। हर झगड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं होता।
एक भारतीय होने के कारण कुछ बातें चुभती हैं। मेरे देश पर असहिष्णुता का कलंक मढ़ा जा रहा है। मैं जरूर जानना चाहूँगा की भारत में असहिष्णुता कहाँ है?
अभी कुछ महीनों पहले भारत की एक अपूर्तनीय क्षति हुई। भारत के मिसाइल मैन कहे जाने वाले, युवाओं के आदर्श और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे.अब्दुल कलाम का निधन हुआ।कलाम साहब आधुनिक भारत के ऐसे सपूत है जिनका ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता।उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। जब उनका निधन हुआ तब पूरा देश रोया। रोने वालों में केवल मुसलमान नहीं थे बल्कि हर सच्चा भारतीय रोया था। भारत का हर युवक उन्हें आदर्श मानता है। हर बच्चा जिसे विज्ञान में रूचि है उसके घर में देवी-देवताओं के पोस्टर हों या न हों कलाम साहब के पोस्टर जरूर होते हैं। हर विद्यार्थी उनकी तरह बनना चाहता है। क्या भारत असहिष्णु राष्ट्र होता तो ऐसा होता?
अभी कुछ महीने ही हुए हैं मुहर्रम का त्यौहार बीते हुए।यह एक ऐसा त्यौहार है जिसे हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर मानते हैं। ताज़िया मुसलमानों से कहीं ज़्यादा हिंदुओं के घरों में बनता है। कर्बला पर जितनी संख्या में मुसलमान परिक्रमा नहीं करते उससे कहीं ज्यादा हिंदू करते हैं। मज़ारों पर माथा टेकते हैं, दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं।
मेरे गांव में केवल एक घर मुसलमान है। उसके यहाँ ताज़िया कई बार नहीं बनता पर हिंदुओं के यहाँ घर-घर में बनता है। ताज़िया जो बनवाता है वो क़ुरबानी की रात से अगले दिन शाम तक पानी तक नहीं पीता। क़ुरबानी के ग़म में मातम मनाता है।
मैं भारत में बौद्धिक आतंक फैलाने वाले असहिष्णु लोगों से पूछना चाहूँगा कि ऐसा किसी असहिष्णु राष्ट्र में हो सकता है क्या?
कौन सा ऐसा राष्ट्र है जहाँ के लोग विपरीत धर्म पर आस्था रखते हैं और दुसरे धर्म के आराध्य देव की उपासना करते हैं? ये केवल भारतवर्ष में संभव है जहाँ "सर्व धर्म समभाव" की परंपरा है।
भारत इकलौता ऐसा राष्ट्र है जहाँ सभी धर्मों के अनुयायी सुरक्षित अनुभूत करते हैं। जहाँ हर भारतवासी जानता है कि भले ही हमारी उपासना की पद्धतियाँ अलग हों किन्तु सब तो उसी परमेश्वर की संतान हैं और सारी प्रार्थनाएं उन्हीं को जाती हैं चाहे उपासना मंदिर में किया जाये या मस्जिद में या चर्च में।
भारत की आदि काल से यही सनातन संस्कृति रही है। जाने कौन से लोग हैं जिन्हें भारत असहिष्णु राष्ट्र लगता है।
कुछ राष्ट्रद्रोहियों के बयानों से भारत असहिष्णु हो जायेगा? कुछ व्यक्तिगत झगड़ों से भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं रह जायेगा। ये जनता भी भली-भांति समझती है कि ये राजनीति की चालें हैं। कोई भी राजनीति भारत की एकता,अखण्डता और सम्प्रभुता पर प्रभाव नहीं डाल सकती। ये राजनीति दो दिन में दफ़न हो जायेगी पर भारत की साझी संस्कृति युगों-युगों तक सलामत रहेगी।
हम भारतवासी हैं और भारतीयता हमारे रक्त में है। सनातन संस्कृति हमारे रक्त में है।क्रिसमस ईसाइयों का त्यौहार है पर लगभग-लगभग हर स्कूलों में मनाया जाता है।हमारे सपनों में भी सांता क्लाज़ आता है और खिलौने छोड़ जाता है। नया साल हम भी मानते हैं। मुहर्रम मनाया ही जाता है, पारसियों का त्यौहार नौरोज़ भी हम मानते हैं इससे ज्यादा साझा संस्कृति और भाई-चारे का उदाहरण क्या होगा? इतना मिल-जुलकर तो संसार में किसी भी देश के लोग नहीं रहते फिर भी भारत असहिष्णु है। भारत असहिष्णु नहीं है...असहिष्णु है उन सबकी रुग्ण मानसिकता जिन्हें भारत जितना उदार देश भी असहिष्णु दिखता है।आप भले ही कुछ भी कहें पर हम भारतीय हैं और हमारी संस्कृति हमें "विश्वबंधुत्व", "वसुधैव कुटुम्बकम्" और "सर्व धर्म समभाव" का पाठ पढ़ाती है.....हमने विश्व को सहिष्णुता का उपदेश दिया हम असहिष्णु कैसे हो सकते हैं?

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने



कुछ दिनों से सोच रहा था की अपने कविताओं की एक वीडियो अपलोड करूँ जिसे आप सब देखें...पर बस सोच ही रहा था...दीपावली पर मैंने इस बार एक कविता रेकॉर्ड किया...

"प्रिये तुम्हारे प्रेम पाश ने"....सबसे पहले इस गीत को घर में गाया...अम्मा,मम्मी,पापा और भइया...इन सबने सबसे पहले सुना...उन्होंने क्या कहा ये नहीं बताऊंगा....पर आप को कैसा लगा ये जरूर जानना चाहूँगा......इस वीडियो को record किया है आकाश ने...छोटा सा, प्यारा सा,मासूम सा बच्चा....जिसकी वजह से ये वीडियो बन सकी......आप भी सुनिए.....और मेरे साथ गुनगुनाइए.... आभार!  :)

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सोमवार, 2 नवंबर 2015

सीरिया संकट का वैश्वीकरण

सीरिया के गृह युद्ध ने विश्व को ऐसे रणक्षेत्र में लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ युद्ध के दर्शक भी वहां के सैनिकों एवं नागरिकों से कम असुरक्षित नहीं हैं भले ही युद्ध का प्रसारण उन तक दूरदर्शन के माध्यम से पहुँच रहा हो।
इस युद्ध का रक्तपात ही एक मात्र लक्ष्य है और इस हिंसक एवं बर्बर युद्ध के अंत का कोई मार्ग निकट भविष्य में भी नहीं दिख रहा है।
इस युद्ध के कारणों पर गौर करें तो प्रतीत होता है कि यह केवल सीरिया का गृह युद्ध नहीं है अपितु यह युद्ध दो परस्पर विरोधी वैश्विक गुटों का है जो शीत युद्ध के समाप्ति के बाद दर्शक दीर्घा में बैठे-बैठे सीरिया में व्याप्त अराजकता और गंभीर मानवीय संकट के उत्प्रेरक बने हुए हैं।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार एवं उनकी सैन्य शक्ति तथा विद्रोहियों के संगठन एवं उनकी सामूहिक सैन्य शक्ति दोनों में से कोई भी एक इस स्थिति में नहीं हैं कि युद्ध का परिणाम अपने पक्ष में करा सकें। ऐसी दशा में रक्तपात और अराजकता के अतिरिक्त किसी अन्य अवस्था की कल्पना भी आधारहीन है।
सरकार एवं विद्रोही संगठनों में कोई समझौता इसलिए भी होना असंभव है कि विद्रोहियों की मांग राष्ट्रपति बशर अल असद एवं उनके सरकार को अपदस्थ करने की है वहीं सरकार ऐसे किसी भी शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं है। कुछ दिनों से अमेरिका और रूस के संयुक्त प्रयासों के फलस्वरूप ऐसे आसार बन रहे हैं कि राष्ट्रपति अपना पद त्याग करेंगे, इस बार रूस सहमत भी हो गया है और आम चुनावों के लिए भी सहमति बन रही है किन्तु वास्तविकता की धरातल पर अभी ये बातें बचकानी लगती हैं।
सीरिया के विध्वंसक गृह युद्ध का एक और महत्वपूर्ण कारण जो दुर्भाग्य से अब आधे एशिया और यूरोप को अपने चपेट में ले रहा है  वह है जातीय एवं धार्मिक संघर्ष। सीरिया में धार्मिक एवं जातीय पहलुओं ने ही इस युद्ध को इतना जटिल एवम् अन्तहीन बनाया है।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद एवं उनके सत्ता के सभी सहयोगी वहां के अल्पसंख्यक शिया समुदाय(अलवाइट) से हैं वहीं विद्रोही दल बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय के सदस्य हैं। शिया और सुन्नी समुदाय में हिंसक तनाव कोई नया मसला नहीं है। मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों में अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा से ही बहुसंख्यक समुदाय के लोगों से शोषित होते हैं,  फलस्वरूप सामूहिक नरसंहार होते हैं किन्तु ऐसी घटनाएं मुस्लिम राष्ट्रों में शुरू हुए अचानक से जन आन्दोलन के कारण बहुत तेज़ी से बढ़ी हैं। सन् 2010 के बाद से ही ऐसे आन्दोलन खाड़ी राष्ट्रों में दिन-प्रतिदिन विध्वंसक होता जा रहा है। यह ज़िहाद अब धार्मिक न होकर नितांत जातीय एवम् सम्प्रदायिक हो गया है।
सीरिया के अस्थिर राजनीतिक संग्राम के कारणों का अध्यन करें तो वैश्विक महाशक्तियों का अनुचित हस्तक्षेप ही मुख्य कारण प्रतीत होता है।
खाड़ी के देश अथवा अरब विश्व अपने पेट्रोलियम एवम् तेल संसाधनों के लिए विख्यात है, ऐसे में विश्व के सभी ताक़तवर राष्ट्रों एवम् महाशक्तियों जैसे अमेरिका,रूस,ब्रिटेन तथा पश्चिमी राष्ट्र अपने-अपने हितों को साधने के लिए ऐसे राष्ट्रों पर अपनी गिद्ध दृष्टि बनाए रखते हैं। सीरिया के पड़ोसी राष्ट्र भी अपने सुरक्षित भविष्य के लिए इस युद्ध में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिकाओं में संलग्न हैं।
सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सरकार के विद्रोहियों के समर्थन में अमेरिका, ब्रिटेन,फ़्रांस जर्मनी, टर्की और सऊदी अरब जैसे राष्ट्र है तो समर्थन में रूस,चीन और ईरान हैं।
विश्व की लगभग सभी प्रमुख शक्तियों के हस्तक्षेप के कारण यह युद्ध केवल सीरिया का गृह युद्ध नहीं रह गया है वरन वैश्विक युद्ध हो गया है जिसकी लपटें भारत में भी सुलग रही हैं।
सीरिया के गृहयुद्ध और कलह के समाप्ति के आसार निकट भविष्य में भी नहीं दिख रहे हैं।
मार्च 2011 में सीरिया में व्याप्त राजनितिक भ्रष्टाचार के विरोध में शुरू हुआ जन आन्दोलन आज आज अपने विध्वंसक स्वरुप में है। कई ऐतिहासिक महत्त्व वाले शहर ध्वस्त हो गए। कितने मासूम मरे और अभी कितने ही और मरेंगे। इस भीषण नरसंहार और रक्तपात का कोई परिणाम नहीं है।
पिछले पाँच वर्षों में लाखों लोग मारे जा चुके हैं। लाखों लोग जेलों में बंद हैं। एक बड़ी जनसँख्या गुमशुदा है। 6.7 मिलियन नागरिक अव्यवस्थित जीवन जीने के लिए बाध्य हैं।4 मिलियन से अधिक सीरियन नागरिकों ने टर्की एवम् जॉर्डन के शरणार्थी शिविरों में शरण ली है। बड़ी संख्या में सीरियाई नागरिकों ने यूरोपीय देशों में वैध-अवैध प्रवेश किया है किन्तु यूरोपीय राष्ट्रों को अब मुस्लिम शरणर्थियों को शरण देने में भय लग रहा है क्योंकि जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों से वे भाग कर आये हैै, जिस तरह की विध्वंसक घटनाओं से वे पीड़ित हैं उन्हें देखकर यह कहना मुश्किल है कि वे वहां शालीनतापूर्ण आचरण करेंगी।
सीरिया में उत्पन्न हुए मानवीय संकट के लिए एक से अधिक राष्ट्र जिम्मेदार हैं।
23 मिलियन से अधिक आबादी वाले देश में आधे से अधिक लोग अत्यंत निर्धनता में जीवन यापन कर रहा हैं जहाँ दो वक़्त का पेट भर पाना भी किसी सपने से कम नहीं है।
शिक्षा एवम् स्वास्थ्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हैं किन्तु ऐसी बुनियादी सुविधाओं से भी सीरियाई नागरिक वंचित हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने इस गृह युद्ध के लिए कमर कसा है किन्तु वैश्विक स्तर पर जिन मुद्दों पर जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका भी शामिल हो वहाँ यह संस्था मूकवत और पक्षपात पूर्ण आचरण करती है। वैसे भी कोई संस्था युद्ध की स्थिति में कोई मदद नहीं कर सकती।राहत कार्यों का क्रियान्वयन तभी संभव है जब सरकार और विरोधी गुटों में संघर्ष वीराम हो।
सीरिया विवाद केवल तभी सुलझाया जा सकता है जब वहां की सरकार और विद्रोही गुटों में विध्वंसक युद्ध बंद हो तथा अमेरिका और रूस का आक्रामक हस्तक्षेप बंद हो।
सीरिया की बशर अल असद के नेतृत्व वाली अलोकतांत्रिक  सरकार और विद्रोही संगठन जब तक किसी स्थायी शांतिपूर्ण समझौते पर बहस करने के लिए तैयार नहीं होते और ऐसे राष्ट्र जिनकी वजह से सीरिया में  हिंसात्मक विध्वंस और अराजकता विद्यमान है जब तक निष्पक्षता से बिना अपना स्वार्थ साधे सीरिया की मदद नहीं करेंगे किसी भी शांति एवम् सौहार्दपूर्ण वातावरण की परिकल्पना भी कोरी कल्पना है। वर्तमान में सीरिया संकट का कोई समाधान दिख नहीं रहा है। भविष्य में या तो कोई चमत्कार हो अथवा ईश्वरीय कृपा तभी वहां कोई शान्ति स्थापित हो सकती है अन्यथा यह हिंसात्मक आग शनैः शनैः कई राष्ट्रों को झुलसएगा।
-अभिषेक शुक्ल