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बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कागज़


किताबों के दफ़्तर में रंगीन कागज़
रौशन है दुनिया जहाँ इनकी आमद,
सीखते ये दुनिया को सारे नज़ाकत
इन कागजों में गज़ब है हिमाकत।
इन्हीं काग़ज़ों से है रंगीन दुनिया
ये न हों तो लगती है संगीन दुनिया ,
ये हों तो मीठी है नमकीन दुनिया
ये न हों तो लगती है ग़मगीन दुनिया।
कहीं काग़ज़ों से है बिगड़ी तबियत
कहीं काग़ज़ों से हुई फिर फ़ज़ीहत,
कहीं काग़ज़ों से है गुमसुम अक़ीदत
कहीं काग़ज़ों से मिली फिर नसीहत।
कहीं काग़ज़ों में बनी है कहानी
कहीं कागजों की सुनी है जुबानी,
कहीं काग़ज़ों में हैं रस्में निभानी
कहीं काग़ज़ों में है उलझी जवानी।
-अभिषेक शुक्ल
(एक छोटी सी कोशिश कागज़ पर )

3 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर शुक्ला जी।बहुत खूब।

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  2. अति सुन्दर शुक्ला जी।बहुत खूब।

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  3. वाह क्या बात है ... ये कागज़ न होंतो ये बातें भी न हों ... कागज़ की अहमियत आज भी है ...

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