गुरुवार, 9 जनवरी 2014

हैरत

थक गया  हूँ 
   जीवन के उतार-चढ़ाव 
देखकर,
खुशियों पर भारी
पड़ते
गम देखकर,
बिन बारिश के
जहाँ
नम देखकर,
हैवानों कि बस्ती  में
इंसान
कम देखकर,
खुशियों से लबरेज़
गम देखकर
   थक सा गया हुँ मैं.
क्या है होना?
क्या है न होना?
कुछ भी पता नहीं;
कौन अपना
      कौन पराया
अनुमान भी नहीं,
अपने ही अक्स
की
पहचान नहीं,
बीतते लम्हे
छूटते रिश्ते 
बेवजह के जज्बात
उलझते रास्ते,
 सब कुछ अनजाना
फिर भी 
सब कुछ 
खंगालने  की  कोशिश,
एक  कसक 
कुछ  न  कर  पाने  की.
हैरत  में  हूँ
ऐ जिंदगी तू ही बता 
   तू है क्या?

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

बीते लम्हे

बीते साल के कुछ खूबसूरत लम्हे जो अब बस स्मृतियों में हैं-
 न मैं कवी हूँ,न कवितायें
मुझे अब रास आती हैं;
मैं इनसे दूर जाता हूँ,
ये मेरे पास आती हैं,
हज़ारों चाहने वाले
पड़े हैं इनकी राहों में,
मगर कुछ ख़ास मुझमें है,
ये मेरे साथ आती हैं.



''कई चाहत दबी दिल में,
 जो अक्सर टीस भरती हैं,
 मेरे ख्यालों में आकर
 मुझी को भीच लेती हैं ,
 कई राहों से गुजरा हूँ
दिलों को तोड़कर अक्सर,
 मगर कुछ ख़ास है तुझ में,
 जो मुझको खींच लेती है.''
तुम्हारी आँख लगती है
तो आँखे बंद होती है,
तुम्हारी नींद खुलती है
तो साँसे मंद होती है,
अजब है हाल -ए-दिल मेरा
जुड़ा हूँ जब से मैं तुमसे,
मेरे अपने ही धड़कन से
मेरी ही जंग होती है.
मेरे ख्यालों से अब निकलो,
ये दुनिया भी तो खाली है,
है खुशियों का यहाँ मंज़र,
समझ लो कि दिवाली है,
मेरी अँधेरी दुनिया को
मेरे ही पास रहने दो,
उम्मीदों कि ये जो लौ है,
वो अब बुझने वाली है.
यहाँ जब भी हवा चलती
 तो आँखे नम सी होती हैँ,
तुम्हे जब सोचता हूँ मैँ तो
रातेँ कम सी होती हैँ,
अजब है गम का भी आलम
न कुछ कह के कह पाऊँ,
तुम्हारे बिन मेरी दुनिया
बड़ी बेदम सी होती है.

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

ख़ामोशी

रात के अँधेरे मेँ,
ख़ामोशी
कुछ इस कदर
पाँव
पसारती है
कि,
समझना
मुश्किल हो जाता है
कि
ख़ामोश हम हैँ
या रातेँ ?

अनजान राहोँ पर,
ड़गमगाते
कदमो के सहारे
मँजिल तलाशना
मक्कारी
लगता है
फिर भी
हर रोज निकलता हूँ
तलाश मेँ,
कभी गिरता हूँ
कभी
गिरा दिया जाता हूँ ,
मीलोँ भटकता हूँ
पर
अफसोस
मँजिल फिर भी दूर लगती है.

रोशनी मिलती नहीँ,
अधेरे मेँ
कुछ सूझता नहीँ
पर
ज़िद है फिजा मेँ
घुली हुई विरानियोँ
के सहारे,
मँजिल पाने की
जानता हूँ
खामोशियाँ कुछ नहीँ कहतीँ
पर
इक उम्मीद है
कि
इनके बिना कहे,
सुन लुँगा
मँजिल की पुकार.
                                      (चित्र गूगल से साभार )

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

थकान

मिला था तुमसे
कुछ
उलझनो की पोटली
लेकर,
सुनाया था तुम्हे
कुछ पुराने
बेमतलब जज्बातों को,
सोचा था
 सुलझा दोगे
अपने उलझनो की तरह,
पर तुम तो मुझे
सुन भी नहीं पाये.
क्या सुनोगे?
हर कोई अपनी शिकायतें
थक -हार कर
लाता है तुम्हारे पास,
इस थकान में
भूल जाते हो
तुम अपनी थकान.
रो भी नहीं सकते,
हस भी नहीं सकते.
तुम्हारी जिंदगी भी
गुजरती होगी
तकलीफें
सह-सह कर.

जाने क्यों मेरे जेहन में
कौंधते है कुछ सवाल
बिजली बनकर.

हर पल
हर वक्त
हर लम्हे,
तलाशता हूँ जवाब
पर
मिलती है सिर्फ बेचैनी.
समझ में नहीं आता
मेरी उलझने
सुलझती क्यों नहीं?
क्यों हारता हुँ
अक्सर अपनी परेशानियों से?
डर लगता है अब
अपने आप से,
किस ओर जा रहे है मेरे कदम?
बिना मेरी मर्ज़ी के....


शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

जलील (नारी उत्पीड़न पर कटाक्ष )

बात एक दशक पहले की है, तब हमारे गाँव में पक्की सड़क नहीं थी ईंट के खडंजे हुआ करते थे. बारिशों में चलना मुश्किल होता था. गाडी तो दूर लोग साइकिल भी गाँव में घुसाने से डरते थे. चलने के लिए कोई ख़ास मुश्किल नहीं थी बस कपडे गीली मिट्टी से लथपथ हो जाते थे. इन सबसे बचने का एक ही उपाय था कि किसी तरह नहर के बाँध पर चढ़े  फिर कीचड़ से सुरक्षा हो जाती थी.हाँ अलग बात है कि कीचड़ की  जगह सुअरा (एक तरह का खर जो कपड़ों में बुरी तरह चिपक जाता है) पैरों में लगते थे जिन्हे छुड़ाने में जान निकल आती थी. स्कूल से आने के बाद यही एक काम मैं लगन से करता था.
                                    सड़क के दोनों किनारे शीशम के बड़े -बड़े पेड़ हुआ करते थे जिन पर गिध्दों का एकाधिकार हुआ करता था. कुल मिलकर १० से१२ पेड़ थे पर पेड़ पर पत्ते कम और गिद्ध अधिक. गाँव में जब कोई जानवर मरता था तो उसे घसीट कर नहर के पास छोड़ दिया जाता था. अब गिद्ध तो गिद्ध  ठहरे  यूँ ही उन्हें प्राकृतिक अपमार्जक नहीं कहा जाता. मांस देखते ही पहुँच जाते थे हजम करने. माल देखते ही लूट शुरू, पर गिद्धों का सरदार बड़ा न्यायप्रिय था सबको बराबर माल बांटता था, अलग बात है इन गिद्धों कि बारात में कौवे मज़ा  लूट लेते थे.
  अब गिद्ध  तो रहे नहीं इंसान ही गिद्ध हो गएँ हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि गिद्ध सिर्फ मारा मांस खाते थे, इंसान दोनों तरह के मांस खाता  है बस कुछ न कुछ होना चाहिए.इंसानों कि क्षुधा सिर्फ इतने से नहीं भरती अपने संतृप्ति के नए आयाम इंसान हर दिन गढ़ता है.इन गिद्धों के बीच कुछ कौवे भी हैं  जिन्हे आप मीडिया कह सकते हैं. कभी लोकतंत्र का एक मज़बूत स्तम्भ कही जाने वाली संस्था अब विदूषकों जैसा आचरण कर रही है. घटिया और सस्ती खबरे परोसना वो भी नमक मिर्च के साथ इसका स्वभाव बन गया है.आज ये कौवा उद्द्योगपतियों और नेताओं का गुणगान करने में जरा भी नहीं चूकता जहाँ रोटी दिखी पहुँच जाता है, और जहाँ रोटी नही मिली वहाँ अपनी कांव-कावं  वाली अपनी आवाज शुरू कर देता है.
      अभी कुछ महीने पहले भारत के विश्वविख्यात संत, क्षमा चाहता हूँ  कुख्यात संत आसाराम के कुकृत्य के लिए जबसे उन्हें कृष्ण जन्म भूमि में भेजा गया तबसे उनके नियमित नए -नए कारनामे सामने आ रहे हैं खैर आने भी चाहिए भारत में अवसर सबको सामान रूप से मिलता है किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं है हमारे यहाँ. हम बचपन से सुनते आये हैं  कि कोई कितना भी हत्यारा, लुटेरा या बलात्कारी क्यों न हो उसके मन में यही इच्छा पुष्ट  होती है कि उसका बच्चा आज्ञाकारी, सत्कर्मी तथा धर्मनिष्ठ बने, किन्तु हमारे असंत शिरोमणि आसाराम के कुपुत्र नारायण साईं बिलकुल अपने पिता पर गए हैं. बेटे पर पिता के वरद हस्त का परिणाम दिख रहा है. पिता १० नंबरी तो बेटा  १०० नम्बरी. अनुवांशिक गुणों  का इतना स्पष्ट स्थानांतरण अब तक विज्ञान ने कहीं नहीं देखा था, विज्ञान अचंभित है इन दिनों.
                                      अपने आपको भगवान् कृष्ण का अनुयायी कहने वाला आसाराम भगवान् से भी अधिक योग्यता रखता है. भगवान् ने तो आठ वर्ष  की  अवस्था में ''रास'' रचा था पर आसाराम ने जीवन के सातवें दशक में ''रास'' रच कर इतिहास रच दिया, देख लो भैया पुरुषत्व का प्रभाव.क्या दर्शन है बाप बेटों का. खैर क्या कहा जाए भारतीय जनता को जो अब भी ''पतितपावन आसाराम '' के भजन गा रही है. असंत आसाराम के पुत्र ''नारायण स्वामी'' ने नारायण तक को नहीं छोड़ा, घसीट  उठे भगवान् भी इसके चक्कर में.मंच पर स्वयं को कृष्ण ही समझता था ये असंत पुत्र. 'यूट्यूब' पर कई विडियो मिल जायेंगे पिता-पुत्र की मूनवॉक करते हुए. इनके नृत्य के आगे तो प्रभुदेवा  भी बगलें झाकने लगे. क्या मस्त राच रचते थे बाप-बेटे मंच पर.
       नारायण भी सोचते होंगे ऊपर से की क्या करूँ इनका, मेरा नाम धरातल पर बड़ा पवित्र समझा  जाता था. लोग अपने बच्चों के नाम मेरे नाम पर रखते थे पर अब लोग अपने बच्चों के नाम रावण, विभीषण, कुम्भकरण रख देंगे पर नारायण नहीं रखेंगे, खैर भगवान् की भी चिंता जायज है.
        इन बाप बेटों के कारनामे एक-एक करके खुलते गए, नारायण साईं पर दो बहनों के यौन शोषण का आरोप लगा, (५ वर्ष पूर्व का कृत्य) नारायण साईं ने खुद भी कबूला कि एक दासी का बेटा उसका खुद का बेटा है. और भी कई मामले सामने आये और धर्म से खिलवाड करने वाले जेल भी पहुचे. इन दिनों बड़ी नयी - नयी ख़बरें आ रही हैं पर ये समझ में नहीं आता इनका अत्याचार पिछले कई वर्षों से चल रहा था पर मीडिया खामोश क्यों थी?  क्या पांच साल पहले मीडिया, महिला आयोग, पुलिस, मानवाधिकार संगठन जैसी संस्थाएं नहीं थी क्या? या आसाराम के साम्राज्य में सर उठाने कि हिम्मत किसी में नहीं थी?
 पीड़िताओं के साथ जो पिछले कुछ वर्षों से हो रहा था वो क्या था? कोई साधना या आसाराम का सम्मोहन जो उसके जेल जाने के बाद टूटा? वजह का तो कुछ पता नहीं पर एक बात तो समझ में आ ही गयी कि पीड़िता ने थोड़ी सी हिम्मत दिखाई होती और मीडिया ने अपनी रूचि दिखायी होती तो नारायण साईं कब का अंदर हो चुका होता, समाज उसकी पूजा न करता. करतूतें तो इनकी बहुत दिनों से प्रकाश में आ रहीं थी पर शायद  मीडिया का पेट भरा जा रहा था, भाई पैसे किसको काटते हैं? पैसा बंद तो पूजा बंद. मीडिया को जब तक पैसे मिले तब तक खबरें सुर्ख़ियों में नहीं आयीं, पैसा न मिलते ही स्टिंग ऑपरेशन चालु हो गए.फिर क्या आसाराम ये आसाराम वो, टी.आर.पी के लिए हर दिन नए मसाले का जुगाड़.
  खैर आसाराम और नारायण साईं के गिरफ्तारी के बाद महिला संगठनों कि सक्रियता बढ़ी है, हालांकि यौन अपराधों की संख्या भी बढ़ी है.मीडिया का ये काम  अच्छा लगा कि अब थोड़ी सक्रियता आ गयी है या यों कहिए फुर्त हो गयी है. परिणामस्वरुप न्यायाधीश, वकील, लेखक, संपादक, पत्रकार और डॉक्टर सब नप गए हैं, जिनके भी खिलाफ  यौन उत्पीड़न  का मामला उठा सीधे जेल गए, और मीडिया भी पीछे पड़ गयी बिना किसी भेद भाव के. इतनी सक्रियता देखकर फख्र हो रहा है कि चलो इस अंधेर नगरी में किसी को न्याय तो मिला, वर्ना अन्याय देखने की तो हमे आदत पड़ गयी है.
           मीडिया के सक्रियता के चलते ही दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर लिया, शायद बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई. क्या था क्या नहीं ये तो राज ही रह गया पर अब कोई किसी लड़की की मदद करने से थोडा डरेगा कि क्या पता कब क्या आरोप लग जाए. विपद को कौन जनता है. एक आम आदमी होकर खुर्शीद अनवर में इतनी शर्म थी तो आसाराम और उसके बेटे में शर्म नदारद क्यों है? पतितों कि तरह अब भी जिन्दा हैं. क्या ये बाप-बेटे पैदाइशी  जलील हैं?
                               एक बात तो माननी पड़ेगी कि नारी सदियों से उपेक्षित और शोषित रही है; इसके लिए काफी हद तक नारी खुद जिम्मेदार है.मुंह में ताले और हाथों में बेडियाँ जकड़ी रहेंगी तो यही स्थिति वर्षों तक यथावत रहेगी. इंसानों को भी सोचना चाहिए कि वो इंसान हैं गिद्ध  नहीं, यदि खसोटना सीखेंगे तो विलुप्त हो जायेंगे, बेहतर होगा कुछ मानवीय गुण भी बचा के रखें. समाज को समझना चाहिए कि अधिकारों का उपयोग यदि उचित रूप से हो तो आसाराम जैसे लोग जेल में पहुँच जाते हैं और थोडा सा भी गलत तरीके से हो तो खुर्शीद अनवर जैसे लोगों से समाज भरा पड़ा है...

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

अज्ञात

प्रिय तुम मधु हो जीवन की,
तुम बिन कैसी मधुशाला?
जिसमे तुम न द्रवित हुए ,
किस काम की है ऐसी हाला?

तुम शब्द हो मेरे भावों के
तुम पर ही मैंने गीत लिखे,
तुमको सोचा तो जग सोचा,
और समर भूमि में प्रीत लिखे,

अवसाद तुम्ही, प्रमाद तुम्ही,
आशा और विश्वास तुम्ही ,
भावों के आपाधापी की
प्रशंसा और परिहास तुम्ही.

तुम्हे व्यक्त करूँ तो करूँ कैसे?
शब्द बड़े ही सीमित हैं,
किन भावों का उल्लेख करूँ?
जब भाव तुम्ही से निर्मित हैं.

तुम प्राण वायु तुम ही जीवन,
तुमको ही समर्पित तन-मन-धन,
जब -जब  भी तुम शून्य हुए
जीवन कितना निर्जन-निर्जन?





तुम व्यक्त, अव्यक्त या निर्गुण हो,
इसका मुझको अनुमान नहीं,
मेरे बिन खोजे ही  मिल जाना,
तुम बिन मेरी पहचान नहीं.

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

एहसास

बैठा था इंतज़ार में
पागलों कि तरह
 चुप चाप
तुम्हारी राहों में;
सोचा था
एक झलक मिल जायेगी
पर
दूर -दूर तक
तुम नजर नहीं आई
न तुम्हारी परछांई.
मेरे लिए
तुमसे होकर,
गुजरने वाली हवा ही
काफी थी;
पर
हवा ने भी मुझसे बेरुखी  कर ली,
अनजान से  ख्यालों में
खुद को खोता गया,
पर लोगों ने तो
मुझे
एक और नाम दे दिया
 ''पागल''
क्या करूँ?
किस से कहूँ
कि
ये पागलपन 
भी
खुदा कि नेअमत
है,
 तुमसे ,
 न रब से,
कोई शिकायत
नहीं;
जाने क्यों
    टुकड़ों  का प्यार
मुझे रास नहीं आता;
और
अधूरे कि आदत नहीं है.
तुम्हारी बेरुखी
भी
   तुम्हारी अदा लगती है,
और मेरी जिंदगी
भी
मुझे सजा लगती है.
   मेरे जज्बात
तो बस मेरे हैं,
 वो मुझे रुलाएं
या तड़पायें,
फर्क पड़ता क्या है?
मेरा क्या?
मझे अब
दर्द भी अपना लगता है,
खुशियां तो
तुम्हारे साथ
कब कि जा चुकी हैं,
अब है तो बस तन्हाई,
हर पल - हर लम्हा.
मेरे गम
और मेरी तन्हाई
हाँ बस यही है
मेरी जिंदगी.

आज एक अर्से के  बाद
सुकून मिला
जब किसी ने मुझसे कहा
कि
पत्थरों कि दुनिया में
रहते रहते
इंसान भी पत्थर
हो गए हैं.

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

अधूरी हसरत


जिनके याद में ताजमहल बना
उनकी रूह तो तड़पती होगी
संगमरमर की चट्टानों
के नीचे
जहा हवा भी आने से डरती है
वहां दो रूहें कैसे
एक साथ रहती होंगी ?
मुमताज को जीते जी तो कैद होना पड़ा
कंक्रीट की मोटी दीवारों में ,
सब कुछ तो था शायद
आजादी के अलावा ,
ख़ुशी के दो पल मिले हो या न मिले मिले हो
पर कैद तो जिन्दगी भर मिली

उन्हें आजाद कबूतरों को देख कर
उड़ने की चाहत तो थी
मगर सल्तनत की मल्लिका
सोने के पिंजड़े में
कैद थी .
शहंशाह ने उन्हें समझा तो एक खिलौना
उनसे खेला उन्हें चूमा ,
खिलौने के अलावा
कुछ और न थी
मुमताज बेगम ,
उनकी दीवानगी ही थी की
मौत को अपना हमसफ़र बना लिया
शायद मौत के आगोश में आजादी दामन थाम ले ,
शायद खुली हवा , और
प्रकृति के प्रेम का
सानिध्य मिले ,
पर हसरते कब पूरी होती हैं ?
दफ़न हुई तो वह पर भी
रूह तड़पती रह गयी

पथ्थरों नीचे

एक अधूरी टीस भारती ..........

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

प्रतिघात



मेरे मन में वेदना है
विस्मृत सी अर्चना है ;
आँखे ढकी हैं मेरी
मुझे विश्व देखना है.
नयनो पे है संकट
पलकें गिरी हुई हैं;
कुछ विम्ब भी न दिखता
दृष्टि बुझी- बुझी है.

संध्या भी बढ़ रही है
मुझे सूर्य रोकना है,
इस अन्धकार जग में,
नया तूर्य खोजना है.
नैराश्य की दिशा में ,
अब विश्व चल पड़ा है
नेत्र हीन होकर
बस युद्ध कर रहा है.
न मानव है कहीं पर
मानवता न शेष अब है,
आतंक के प्रहर में
भयभीत अब सब हैं.
कोई उपाय है जो
शान्ति को बचा ले?
भूले हुए पथिक को,
इक मार्ग फिर दिखा दे.
परिणाम हीन पथ पर
क्यों बढ़ रहे कदम कुछ?
ये विषाक्त मानव
क्या कर रहा नहीं कुछ?
भयाक्रांत हैं दिशाएँ
किसे दर्प हो रहा है?
किन स्वार्थों से मानव
अब सर्प हो रहा है?
मानव की बस्तियों में
विषधर कहाँ से आये?
सोये हुए शिशु को
चुपके से काट खाए?
क्या सीखें हम विपद से
असमय मृत्यु मरना?
या शक्तिहीन होकर,
असहाय हो तड़पना?
बिन लड़े मरे तो,
धिक्कार हम सुनेंगे,
कायर नहीं कभी थे,
तो आज क्यों रहेंगे?
हिंसा के पुजारी
हिंसा से ही डरेंगे,
प्रतिघात वो करेंगे,
संहार हम करेंगे.
.”प्रति हिंसा हिंसा न भवति” .

रविवार, 22 सितंबर 2013

फितरत



हम जीते हैं,
झूठे ख्वाबों के सहारे
जिन्दगी,
न कोई रास्ता
न कोई मंजिल
भटकना है,
अनजान राहों पर,

बसाना चाहते हैं,
इक नयी
दुनिया,
अपने
वजूद को मिटाकर ,
नफरत , धोका, फरेब,
घुटन सी होती है,
दुनिया को देखकर,
न वफ़ा ,
न सच्चाई,
हर तरफ,
नफरत, नफरत,
सिर्फ नफरत,
हैवानियत के आलम में,
पहचान खोती,
इंसानियत,
किश्तों में
दम तोड़ी ख्वाहिशें ,
अजीब सी बेचैनी,
जिन्दगी से
नफरत,
पर
बेपनाह मोहब्बत,
सुकून की तलाश,
पर मिलती ,
सिर्फ कशमकश,
कुछ होना

होने के जैसा है,
कैसी जिन्दगी है,
हम इंसानों की?

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

अज्ञात

रात होती तो ये लगता,
           नया होगा कुछ सवेरे ,
कर्म की प्रतिबद्धता में
            भाग्य लेगा पुनः फेरे,
यह सुहानी रात तो,
         हृदय तक आलस्य लाये
बंद कर पलकें हमारी,
            नित नए सपने दिखाए,
बंद आँखों से धरा की,
             जो गहन अनुभूति होती,
विधाता के राग-लाया में ,
              मानव की नेति-नेति,
वह विहंगम दृश्य  नभ का,
               निष्प्राण में भी प्राण लाये,
और बिन एक  शब्द बोले,
                शब्द अंतस तक समाये,
नमन है उस शक्ति को,
                 जिसने धरा पर प्राण फूकें,
जिनके अहैतुक कृपा से,
                  धरा निज उद्द्यान  सींचे.

शनिवार, 11 मई 2013

स्त्री तेरी यही कहानी


जिन तथ्यों से मैं अनभिज्ञ था विगत कुछ वर्षों से वही देख रहा हूँ. इतने समीप से कुछ न देखा था पर अब प्रायः  देखता हु, क्या कहूँ? भारत आदि काल से ऐसा था या अब हो गया है मेरी समझ से परे है, जिन आदर्शों का हम दंभ भरते हैं वह कहा हैं? किस कोने में?  मैं तो थक गया हूँ पर कहीं पद चिन्ह नहीं मिले उन आदर्श सिद्धांतों के जिन्हें हम विश्व समुदाय के सामने गर्व से कहते हैं.
                                                 क्या यह वही देश है जहाँ नारियों की पुजा होती थी, पर अब तो बलात्कार हो रहा है, मुझे नहीं लगता कि कभी नारी को उसका सम्मान मिला. अगर इतिहास में कभी हुआ हो तो द्रौपदी के साथ क्या हुआ था? क्या उस युग की महान विभूतियाँ दुर्योधन की सभा में द्रौपदी का सम्मान कर रहीं थीं?  अगर ये सम्मान है तो अपमान क्या था? वास्तविकता तो ये है की नारी कि जैसी दशा हजारों साल पहले थी वैसी ही अब भी है, फर्क इतना है की तब बहुत कम घटनाएं प्रकाश में आती थीं और अब अधिकतर घटनाएं संज्ञान में आ जाती हैं.
                 नारी युगों से शोषण  और उपेक्षा की विषय रही है, शरीर से शक्ति की अवधारणा केवल धर्म ग्रंथों में ही मिलती है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता अब भी जब पुरुष इकठे होते हैं तो स्त्री देह उनके चर्चा का मुख्या विषय होती है, उनकी धार्मिक परिचर्चा कब नारी चर्चा में बदलती है कुछ पता ही नहीं लगता, चर्चा शुरू होते ही जो धर्म कर्म कि बात करते हैं सबसे पहले उनके ही ज्ञान कि पोथी खुलती है, फिर क्या जिनके पावँ कबर में होते हैं वे भी कान उटेर के सुनते हैं क्योंकि भारतीय गप्पे मरने के अलावा कुछ नहीं करते, जो कर्मठी  होते हैं वे यहाँ टिकते ही नहीं.
                                            हम पश्चिम को अकारण ही व्यभिचार और वासना का जनक कहते हैं, कम से कम वो जो करते हैं उनके जीवन का सामान्य हिस्सा है पर हम वासना और व्यभिचार ढ़ोते हैं और तर्क देते हैं अपने गौरव शाली अतीत का, जिन्हें हम कब का रौंद चुके हैं. २१ साल कि युवती हो या ५ साल कि छोटी बच्ची, हमारे यहाँ कोई सुरक्षित नहीं है. हम कितने गर्व से कहते हैं कि सबसे पुरानी  सभ्यता हमारी है, ये क्यों नहीं कहते कि वो पुरानी सभ्यता अब असभ्यता में बदल गयी है, कोई थोडा भी जागरूक विदेशी हो तो हमसे यही कहेगा कि तुम उसी भारत के हो जहाँ बलात्कार नियमित होते हैं  और जनता तमाशा देखती है, और  बलात्कार होने के बाद सरकार पर गुस्सा जाहिर करती है, पर बदलाव का कोई वादा नहीं खुद से करती है. ''निकम्मी जनता-निकम्मी सरकार''.
                     किसी विदेशी इतिहासकार ने क्या खूब कहा है की ,'' भारतीय स्वाभाव से ही दब्बू और भ्रष्ट होते हैं''. पढ़ कर कुछ अजीब लगा पर जब सोचा तो लगा की हमने खुद को साबित किया है नहीं तो कोई विदेशी हमें  ऐसा क्यों कहता. क्यों हम ऐसे हैं? दोहरा चरित्र क्यों जीते हैं हम? मुखौटे लगा के हर इंसान बैठा है व्यक्ति का वास्तविक रूप क्या है कुछ पता ही नहीं चलता. अध्यात्म का चोगा पहन कर मुजरा देखना तो फितरत बन गयी है.
                                              आज कल साधू -महात्मा भी कम नहीं हैं, आश्रमों की तलाशी ली जाए तो पता चलेगा कि ये साधू नहीं सवादु हैं और सारे अनैतिक कामों का  सबसे सुरक्षित अड्डा बाबाओं के पास ही है. न जाने कितने ढोंगी मंच पे नारी को माँ बुलाते हैं और प्रवचन के बाद उनका शोषण  करते हैं. फिर भी हाय! रे भारतीय जनता ढोंगियों को भी पलकों पे बिठा के रखती है.
     एक नारी जिन्दगी भर चीखती-बिलखती रहती है और पुरुष समाज कभी उसके देह से तो कभी भावना से खिलवाड़ करता है, अपने शैशव काल से ही दोयम दर्जे कि जिन्दगी जीती लड़की बड़ी होते ही घर वालों कि नज़रों में भले ही बच्ची रहे पर समाज उसे बड़ा कहना शुरू कर देता है, अपने खेलने खाने कि उम्र में भेड़ियों का या तो सिकार हो जाती है, या शादी करके ससुराल भेज दी जाती है. गरीब बाप में समाज  से लड़ने का दम नहीं होता और ससुराल में गुडिया को ढंग नहीं आता. दयनीय स्थिति तब होती है जब ससुराल में लड़की रुलाई जाती है कभी दहेज़ के लिए, तो कभी लड़की पैदा करने के लिए. नारी होना जिस समाज में अभिशाप हो उस समाज या राष्ट्र को महान कहना उचित है?
मैथिलि शरण गुप्त जी कि कविता बरबस याद आती है, ''अबला तेरी यही कहानी, अंचल में दूध आँखों में  पानी''. 
ये सत्य है कि एक औरत जिन्दगी भर रॊति बिलखती रहती है , पर पुरुष उसे निचा दिखाकर अपना पुरुषत्व सिद्ध करता है, इतना क्यों सहती है नारी? क्या महाकाली या चंडी माँ कि संकल्पना कॊरि कल्पना मात्र है? सहना  स्वाभाव है अथवा विवशता? 
''अबला तुझे समझना चाहा
पर 
समझ न सका, 
तेरे अनगिनत रूपों को देखा
पर एक को भी
पहचान न सका,
देख रहा हूँ सदियों से
तुझे पिसते, 
पर कभी 
नही देखा तुझे 
उफ़ तक करते.
बचपन में घर में 
भेदभाव,
समाज में 
भेड़ियों कि चुभती नज़रें,
सहती आई,
पर कोई प्रतिकार नहीं,
शांत समुद्र में भी
ज्वार और भाटा उठते हैं,
पर 
तू तो समुद्र होते हुए भी
चुप रहती है,
दोपहर में 
तपती धुप में
बर्तन धुलती 
आंगन में 
तू दिखती है, 
पाँव में पड़े छाले 
तुझे दुःख नहीं देते?
जो तू पगडंडियों 
पर पति के लिए ले जाती है
खाना,
वो खुद भी आ सकते थे,
पर तू उन्हें कैसे दुःख
दे सकती है,
जो तुझे आजीवन दुःख
देते हैं.
बच्चा बीमार हो तो तू,
ठीक हो जाती है,
पति कि मार सहती है,
पर
उसके लम्बी उम्र कि
कामना करती है,
माँ तू है क्या,
मैं न समझ सका
तू ही मुझे बता?''
क्या कहूँ एक नारी है जो सहती है, दबती है और एक पुरुष है जो भारत के अखंड गौरव को मिटने पर तुला है.
                               एक भारतीय होने के नाते मैं अंतिम दम तक भारत को महान कहूँगा पर एक इंसान होने के नाते मैं चाहूँगा कि मेरे देश में कुछ सुधार हो, और तब तक मैं इसे महान नहीं कहूँगा जब तक ये महान होगा नहीं, किसी देश कि जनता उस देश को महान बनती है, हम फिर क्यों अपने राष्ट्र कि अवमानना करने पर तुले हुए हैं?

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मधुकर


मैंने देखा दिवा स्वप्न एक,
             जाने कौन कहाँ से आया?
कुछ पल ही नयनों में ठहरा
             फिर ओझल  हो गया पराया.
कहाँ  कोई यहाँ रुक पाता है?
              धर्मशाला ये हृदय नहीं है,
बड़े बड़े वीर लौटें हैं  
                सहज तनिक भी विजय नहीं है.
मैं ठहरा एक रमता जोगी
                 पल पल बनता नया बसेरा
सफ़र में ही रातें कट जातीं
                  मेरे लिए क्या सांझ सवेरा?

जितने मधुकर दीखते जग में
                          सब मेरे अनुयायी हैं
जिन जिन राहों से मैं गुजरा,
                    सारे पथ दुखदायी हैं.
बहुत दिनों की दीर्घ यात्रा
                     कदम कदम पीड़ा में गुजरा,
कहाँ कहाँ मधु मैंने खोजा,
                     अब तो मधुवन को भी खतरा.
बहुत प्रसून मिले मझे पथ पर
                      भौरे किन्तु थे बहुत प्रबल,
प्रयत्नों से व्यथित हो उठा
                        प्रतिद्वंदी  थे बहुत अटल.
आज फूलों ने मुझको घेरा,
                         अब मैं मधु ले आऊंगा,
कई मास कास्ट में बीते,
                         अब बैठे बैठे खाऊंगा.
मिल जाते सुन्दर प्रसून भी,
                           लगन रहे यदि पथ पर,
चाहे मैं जंगल में जाऊं,
                            मंडराता रहता कोई नभ पर.