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रविवार, 22 सितंबर 2013

फितरत



हम जीते हैं,
झूठे ख्वाबों के सहारे
जिन्दगी,
न कोई रास्ता
न कोई मंजिल
भटकना है,
अनजान राहों पर,

बसाना चाहते हैं,
इक नयी
दुनिया,
अपने
वजूद को मिटाकर ,
नफरत , धोका, फरेब,
घुटन सी होती है,
दुनिया को देखकर,
न वफ़ा ,
न सच्चाई,
हर तरफ,
नफरत, नफरत,
सिर्फ नफरत,
हैवानियत के आलम में,
पहचान खोती,
इंसानियत,
किश्तों में
दम तोड़ी ख्वाहिशें ,
अजीब सी बेचैनी,
जिन्दगी से
नफरत,
पर
बेपनाह मोहब्बत,
सुकून की तलाश,
पर मिलती ,
सिर्फ कशमकश,
कुछ होना

होने के जैसा है,
कैसी जिन्दगी है,
हम इंसानों की?

5 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन के कुछ कसमकस को प्रस्तुत करती रचना
    Latest post हे निराकार!
    latest post कानून और दंड

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  2. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (24--09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  3. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति. कमाल का शब्द सँयोजन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/

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  4. बहुत भावपूर्ण और संवेदनशील अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर

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