रविवार, 3 मार्च 2019

गुलामों में कभी कोई बुद्ध हुआ है क्या?


हमारा वक्त बिक चुका है. एक-एक पल किसी ने खरीद रखा है. किसी की आधीनता के बदले हमें कागज के कुछ टुकड़े मिलते हैं, जिनसे हमारी थोड़ी बहुत जरूरतें पूरी होती हैं. बस पेट पालने भर तक.

पेट सागर है....भर नहीं सकता. आजीवन रिक्त रहता है. ऐसा मैं नहीं 'कड़जाही काकी' कह के गई है.

कई बार लगता है कि भाग जाना चहिए हमें कहीं. अपने-अपने दायित्वों से. क्या ही कर लेंगे हम दुनिया में रहकर या दायित्व निभाकर.

पलायन इतना भी बुरा है क्या.

पर जिन्हें हम छोड़कर भागते हैं वे ज्यादा याद आते हैं. भागना थोड़ा मुश्किल भी है. हर कोई सिद्धार्थ तो है नहीं जिसे भागकर बोध हो जाएगा.

आनंद तो मिलेगा नहीं. मिलते ही नहीं.

भला बुद्ध का क्या होता अगर उन्हें आनंद मिला न होता.

दरअसल महत्ता तो बस आनंद की है. मैं आनंद खोज रहा हूं.

.....काश कह सकता.

आनंद की तलाश बिना स्वतंत्रता के. स्वतंत्रता क्या स्वायत्तता भी. गुलामों के ज्ञान पर भरोसा कौन करे.

कौन कहना है कि दास प्रथा खत्म हुई है. खत्म हो ही नहीं सकती. क्योंकि कुछ भी खत्म नहीं हो सकता. सब सतत् है. अवस्था परिवर्तन ही शाश्वत है. ऐसा मैं नहीं मानता, पर पुरखे मानते हैं.

पुरखे गलत हैं इसे मैं साबित नहीं कर सकता. सही हैं इसे भी.

मन यही कह रहा है कि गुलामों के पास कोई ज्ञान नहीं होता सिवाय दायित्व बोध के.

गले में पट्टा है.....ओखरी में मूड़ा है...पहरुआ गिनते रहो...जूझतो रहो....सवाल यही है कि गुलामों का क्या कोई आनंद हुआ है. अगर हुआ है तो जानने की उत्कंठा है.

कई बार यह भी लगता है कि बंधनों की गुलामी से भागे हुए लोग ही बुद्ध हुए हैं. पता नहीं. कौन जाने. सबकी अपनी-अपनी मंजिल. हमसे क्या.

जेकर मूड़ा ओखरी में हो, तेहि गिनै.

हमसे का.


(फोटो क्रेडिट- pixabay.com)




-अभिषेक शुक्ल.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-03-2019) को "पथरीला पथ अपनाया है" (चर्चा अंक-3265) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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