बुधवार, 5 सितंबर 2012

प्रश्न

क्यों दुःख होता है दुःख में ;
 क्यों सुख होता है सुख में;
 क्या यही भाग्य अवलोकन है?
 क्या यही विधाता का मन है?
क्यों दुःख होता है दुःख में ;
 क्यों सुख होता है सुख में;
 क्या यही भाग्य अवलोकन है?
 क्या यही विधाता का मन है?
 मैंने बस दुःख को जाना है ,
इक दुखद स्वप्न इसे माना है
 यह वैतरणी की धरा है ,
 इसे पार कर के कुछ पाना है.
 इस लघु जीवन में कष्ट बहुत हैं ,
 पग-पग पर बाधाएँ हैं ,
 जो तनिक मार्ग से भटक गए,
 मुंह खोले विपदाएं हैं ;
 सुख के साधन का पता नहीं ,
दुःख परछाईं जैसे चलता ,
अनुसन्धान करूँ कैसे ?
 जब मन में रही न समरसता ;
 अब बार- बार क्यों भटक रहा,
 क्या मार्ग मिलेगा मुझे कहीं?
 या चिर निद्रा में सो जाऊं?
 मिट जाएगा संताप वहीँ .....................

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें