शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

व्यथा

जब परिस्थितियां परिहास करें तो जाने क्यों दुःख होता है . यह हर कोई जनता है की प्रारब्ध में जो लिखा होता है वही होता है किन्तु यह जानते हुए हम दोष विधि को देते हैं ; इसमें हमारी गलती नहीं , मानव स्वाभाव ही ऐसा होता है. एक कहावत मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ की बकरी की माँ कब तक खैर मनाएगी? एक न एक दिन तो उसे काटना ही है. कब तक हम अपने प्रारब्ध से बचेंगे ? आज सुबह सुबह मैं सीढियों से उतर रहा था की अचानक सीढियों से पैर फिसला और मैं निचे पहुच गया . चोट बहुत आई और दर्द असहनीय है, किन्तु विवशता देखिये पीड़ा को आनंद में बदलना पद रहा है . विगत कई दिन से मैं अवसाद में हूँ जनता नहीं क्यों पर हर पल घुटन भरा होता है. किसी ने क्या खूब कहा है '' अगर आप शांति चाहतें है तो युद्ध के लिए तैयार रहें.'' मैं भगवन से प्रार्थना करता हूँ की सब कुछ ठीक हो पर कुछ ठीक नहीं होता . भगवन भी बड़े विवश और लचर हैं , किस किस की सुने ? सुनाने वाले हज़ार और सुनने वाला कोई नहीं .एक पक्षीय वार्तालाप करे तो किस से ? भक्त तो सभी हैं पर परम प्रिय भक्त तो कुछ एक ही होते हैं . मैं भागवान पर पक्षपात का आरोप नहीं लगा रहा पर कुछ तो अनुचित है जो मुझे वेदना में खीच रहा है. मेरी स्थिति कुछ ऐसी है
 '' किसी की जिन्दगी मैं जी रहा हूँ ,
हमारी मौत कोई मर रहा है. ''

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