बुधवार, 10 जनवरी 2018

आंख खुली चौराहे पाए

एक पांव राहों में धरता
सौ-सौ राहें ख़ुद ही फूटें,
अनुभव वाला मांझा लेकर
मेरी रोज़ पतंगे लूटें।

मुझको जाने क्यों भ्रम होता
छाती में आत्म अधीरा है,
जो ओझल जग रही सदा
वह रोती-गाती मीरा है।

मन के भ्रम को कमतर आंके
थोड़ा सा भीतर भी झांके
भय, विस्मय, निर्वेद, ग्लानि की
चादर कोई नियमित टांके।

चीखें सुन सब चुप हो जाते
कहीं दिखाने को रो जाते
जैसे-तैसे सिसक-सिसक कर
चिर निद्रा में ही सो जाते।

इतना मौन घोंटने पर भी
आहें नहीं मिला करती हैं,
आंख खुली चौराहे पाए
हम भी थोड़े से घबराए
लेकिन घबराने से सच है
राहें नहीं मिला करती हैं।।

(अगर मैं मुक्तिबोध होता....ख़ैर हो ही नहीं सकता)

- अभिषेक शुक्ल

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-01-2018) को "कुहरा चारों ओर" (चर्चा अंक-2846) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना सोमवार १२जनवरी २०१८ के ९१० वें अंक के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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