शनिवार, 9 जुलाई 2016

जहां-जहां तक ये दृष्टि जाए वहां-वहां तक दिखेंगी राधा।।

भटक रहे हो मार्ग केशव! यहां से आगे
नहीं है राधा
मचा है मन में कैसा कलरव तुम्हारे
पथ में अनंत बाधा,
सहज से मन का मधुर सा भ्रम है कि तुम
सुपथ को कुपथ समझते
जहां-जहां तक ये दृष्टि जाए वहां-वहां
तक दिखेगी राधा।।
जो तुमको लगता है प्रेम सब कुछ तो प्रेम
सा कुछ नहीं है राधा
जगत का उपक्रम है योग केवल ये प्रेम
मानव के पथ की बाधा,
मैं मोक्ष लेकर भी क्या करुंगी मेरे तो
अधिपति हैं मेरे मोहन!
जो उनको ही मैं भूल बैठूं बताओ
कैसे रहूंगी राधा ??
- अभिषेक शुक्ल।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (11-07-2016) को "बच्चों का संसार निराला" (चर्चा अंक-2400) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत कुछ कह जाती है लिखनी ... राधा कृष्ण से आगे तो कुछ भी नहीं पर ...

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  3. मैं मोक्ष लेकर भी क्या करुंगी मेरे तो
    अधिपति हैं मेरे मोहन!
    जो उनको ही मैं भूल बैठूं बताओ
    कैसे रहूंगी राधा ??
    सुंदर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं