शुक्रवार, 29 जून 2018

अनुपम खेर वाली दुनिया में अमरीश पुरी क्यों बनते हैं बाप?

                                                          (तस्वीर: पुराना किला, दिल्ली)

एक लड़के ने कल रोते हुए फ़ोन किया था, "भइया मैं एक लड़की से प्यार करता हूं। मंदिर में हमने शादी कर ली है। लड़की दूसरी बिरादरी की है। घर वाले मान नहीं रहे हैं। भइया मैं उसके बिना मर जाऊंगा। लड़की के घर वाले तैयार हैं, मेरे घर वाले नहीं तैयार हैं। मुझे घर से बाहर नहीं जाने दे रहे, लॉक कर रखा है। मैं क्या करूं?"

लड़के की आवाज़ में बहुत मासूमियत थी। मैंने कहा कोर्ट मैरिज कर लो, उसने कहा घर वाले उस लड़की को कभी नहीं अपनाएंगे।

लड़का आर्मी की तैयारी कर रहा है। अच्छी कद-काठी है। गबरू जवान है। बॉर्डर पर गया तो दो-चार बिना हथियार के ही शहीद कर देगा लेकिन घरवालों के सामने सरेंडर बोल चुका है।

मंसूबा पस्त। जवान हार गया है। ऐसा नहीं है कि उस लड़के के बाप ने कभी प्यार नहीं किया होगा या कभी उनके मन में लव मैरिज जैसी कोई बात नहीं आई होगी, लेकिन उन्हें अपने बाप से हार मिली होगी जिसका बदला महाशय अपने बेटे से ले रहे हैं।

बाप बनने के बाद लोगों का प्यार से 36 का आंकड़ा क्यों सेट हो जाता है?

कोई किसी से प्यार करता है तो जाने दो न यार उसे उसके साथ। तांडव करना ज़रूरी है क्या? क्या पुरखे तभी तृप्त होंगे जब बाप की पसंद से बेटा शादी करे?

फिल्मों वाले सीन पर ताली, असली ज़िन्दगी में गाली? ठीक नहीं है दोस्त।

प्यार करो और करने दो।

अनुपम खेर वाली दुनिया में अमरीश पुरी बनने से क्या फ़ायदा। प्यार ही तो किया है, मर्डर तो नहीं। फिर यह रिश्ता-नाता तोड़ने वाला पनिशमेंट क्यों?

मर्डर और रेप करके आए हुए बेटे को जेल से बचाने की पूरी कोशिश करते हैं घरवाले लेकिन प्यार में घुट-घुट मरने वाले बच्चे पर दया नहीं आती।

सही है, रेपिस्ट बच्चा पसंद है लेकिन अपनी मर्ज़ी से शादी करने वाला नहीं। प्यार करने वाले अपराधी का तो देश निकाला बनता है। यही धर्म है। प्राण जाए पर धर्म न जाए। जान जाए पर जाति न जाए।

प्यार अभी समाज डकार नहीं पाया है। गिनती के कुछ परिवार हैं जिनके यहां लव मैरिज पर हंगामा नहीं होता। एक डायलॉग बहुत फ़ेमस है हिंदुस्तानियों के घरों में। बाप बेटे से बोलता है, "मैं तुम्हारे हिस्से की ज़मीन तुम्हारे नाम कर रहा हूं, बेचकर निकल जाओ। ज़िन्दगी भर चौखट पर क़दम मत रखना।"
मतलब प्यार करो तो घर से निकलो।

लड़कियों के लिए और भी मुश्किल। उन्हें अगर मोहब्बत हो जाए तो उनकी ज़िंदगी अपराधियों से बदतर हो जाती है। सच्चाई है। प्यार की इतनी ही कहानी है।

जब तक घर वाले न मानें, यहां आते रहिए।  ठिकाना है उन लोगों का जिन्हें छिपकर अपने 'उनसे' मिलना होता है। कभी वक़्त मिले तो यहां ज़रूर घूमिए। मोहब्बत का सबसे सुरक्षित ठिकाना है। शायद कपल्स पर यहां डंडे कम बरसते हैं। नहीं भी बरसते होंगे। मेरे किसी दोस्त ने यहां पिटने की सूचना कभी नहीं दी।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-07-2018) को "करना मत विश्राम" (चर्चा अंक-3018) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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