शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

अंग्रेज़ी में कहते हैं

जिस प्यार के होने का एहसास आपको साथ रहने पर न होता हो, छूटने पर वही प्यार सबसे ज़्यादा याद आता है।
ख़ालीपन में मोहब्बत की ज़रूरत इंसान को ज़्यादा होती है, जिसे किसी के साथ रहने पर समझना मुश्किल होता है।

बोलना, ख़ूबसूरत हुनर है। हमेशा नहीं, पर कभी-कभी तो ज़रूर।

उपेक्षा रिश्तों के लिए घुन की तरह है। किसी को एहसास हो जाए, तो गांठ का पड़ना तय है। फिर रिश्ते संभलते नहीं, बिखर जाते हैं।

जिन्हें रिश्तों को संभालना आता है, उन्हें कहना भी आता है।

अंग्रेज़ी में कहते हैं।
जो कहते हैं न 'उसे' देश की बड़ी आबादी कहने से कतराती है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि फ़ीलिंग नहीं है, बस हर डायरेक्ट बात को इनडायरेक्ट तरीक़े से कहने की आदत है। लोग ऐसा सोचकर चलते हैं कि सामने वाला समझता होगा। समझना हर बार सही तो नहीं होता?

अंग्रेज़ी तो ठहरी विदेशी भाषा, उसमें कौन मन की बात कहे, यहां तो हिंदी में भी कहना गुनाह है। ऐसा लगता है कि पुरखों ने मुंह पर 'अलीगढ़वा ताला' मार दिया है।

एक फ़िल्म है, जो हमारे आसपास की सच्चाई को दिखाती है। आम परिवारों की कहानी, जिसे हम रोज़ घटते हुए देखते हैं।



फ़िल्म का नाम है, 'अंग्रेज़ी में कहते हैं।'

 हीरो हैं संजय मिश्र। फ़िल्म में इनका नाम है यशवंत बत्रा।
हीरोइन एकावली खन्ना। इनके किरदार का नाम है किरण।

संजय की ख़ासियत है कि अपने किरदार को इतनी संजीदगी से निभाते हैं, पता नहीं चलता कि फ़िल्म देख रहे हैं या हक़ीक़त।

बिलकुल उस्ताद आदमी हैं।

एकावली खन्ना भी सधी हुई अभिनेत्री हैं। कौन कितने पानी में, बॉलीवुड डायरीज, डीयर डैड जैसी फ़िल्मों में झलक दिखला चुकी हैं लेकिन इस फ़िल्म में निखर आई हैं।

जो महिलाएं महसूस करती हैं, उन्होंने जिया है।

फ़िल्म देखते हुए आपको भी दीदी, भाभी, मौसी, मम्मी या बुआ याद आ सकती हैं।

कुछ लोग रिश्ते नहीं ज़िम्मेदारियां निभाते हैं। पत्नी से रिश्ता बस औपचारिक होता है।

सुबह नहाने के लिए तौलिया देना, चाय पिलाना, नाश्ता कराना और दफ्तर के टिफ़िन तैयार करके देना, पत्नी का यही प्यार है।

पत्नी दफ़्तर से घर आने के बाद पानी पिला देती है, रात में खाना बनाकर खिला देती है।
पति समझता है कि प्यार कम्प्लीट। ज़िम्मेदारियां निभाना ही प्यार है।

प्यार ज़िम्मेदारी नहीं है।

फ़िल्म में दो कहानी और भी है।

तीन लव स्टोरी है फ़िल्म में, एक-दूसरे से जुड़ी हुई। एक की वजह से यशवंत और किरण अलग होते हैं, दूसरी कहानी की वजह से जुड़ जाते हैं।

पंकज त्रिपाठी ब्रिजेन्द्र काला भी हैं फ़िल्म में। ब्रिजेन्द की कलाकारी औसत है, पर पंकज छोटी सी भूमिका में ही ग़ज़ब ढाए हैं।

पूरी कहानी नहीं लिख सकता, फ़िल्म की कहानी किसी से साझा करना क्राइम है।

वक़्त मिले तो देखिए। बेहद प्यारी कहानी है, शादीशुदा लोगों को अपनी ही कहानी लग सकती है। हालांकि फ़िल्म की कहानी ज़रा सी फ़िल्मी है। असल ज़िन्दगी में अपनी ग़लतियों का एहसास आदमी को कम ही हो पाता है। जिन्हें होता है, उनकी ज़िंदगी में गम के लिए जगह कम बचती है।

हां, फ़िल्म ज़रूर कुछ महीने पुरानी है। कहीं ऑनलाइन देखने का जुगाड़ कर लीजिए।

फ़िल्म देखने में ज़रा सुस्त सा आदमी हूं। कम देख पाता हूं। इसलिए ही इतने दिनों बाद इस फ़िल्म की याद आई। वक़्त मिले तो देखिएगा.....और हो सके तो यशवंत वाली ग़लती मत कीजिएगा, असली ज़िन्दगी में रिश्ते टूटते तो हैं लेकिन जुड़ने के मामले बेहद कम सामने आते हैं।

- अभिषेक शुक्ल।






8 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, चैन पाने का तरीका - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-08-2018) को "धोखा अपने साथ न कर" (चर्चा अंक-3054) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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