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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

क्या लिखूँ??

क्या लिखूँ?? कुछ सूझ नहीं रहा है। कुछ दिनों से लिखना चाह रहा हूँ फिर भी नहीं लिख पा रहा। जब लिखने का मन होता है तब क्लास चलती है, क्लास के बाद लाइब्रेरी फिर मेट्रो। वहां धक्का-मुक्की में अंदर का साहित्यकार कभी राहुल सांकृत्यायन बनता है तो कभी निराला।इस चक्कर में अभिषेक कहीं खो सा जाता है। घर आता हूँ तो नींद जकड़ लेती है। पिछले कई दिनों से भीतर का कवि सो रहा है।
कभी लिखने-पढ़ने के मामले में अनियमित नहीं रहा, सोने से पहले एक-दो कविता,कहानी या आलेख लिखना आदत में शामिल रहा है। बचपन से ही पढ़ने-लिखने में मन लगता था। पाठ्यक्रम के विषय में नहीं,वे तो मुझे फूटी कौड़ी नहीं सुहाते थे। हां पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य विषयों में तो प्राण बसते थे मेरे।
कभी बूआ की किताब उठा कर भूगोल पढ़ता, तो कभी दीदी के अलमारी से विज्ञान। इन सबसे उबरता तो नंदन,चंपक,नन्हे सम्राट, कोबी-भेड़िया, नागराज,ध्रुव, और चाचा चौधरी को पढ़ने बैठ जाता था। कोर्स की किताबों को पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था।
सप्ताह में जब कभी भइया पढ़ाने बैठते थे तो मेरी पिटाई हो जाती थी। पढ़ने वाले विषयों का प्रवक्ता रहता था पर गणित में हाथ तंग थे।फिर जब भइया पुराने अभ्यास करने को देते थे कई बार मैं कर नहीं पाता था। फिर मेरी धुनाई हो जाती थी।
आठवीं कक्षा तक यही हाल रहा, इसके बाद पढ़ाई को लेकर मेरी दुर्भावना, सद्भावना में बदली और ठीक-ठाक विद्यार्थी हो गया।
भइया चाहते थे कि मैं सबसे अव्वल रहूँ, सबसे आगे रहूँ और मेरी समस्या रही कि मैं हमेशा धार के विपरीत बहा।
जो परिभाषाएं कक्षाओं में लिखवायी जाती थीं उन्हें कभी यथावत लिखा ही नहीं। बिना नई परिभाषा गढ़े मुझे पानी नहीं पचता था।इसी वजह से कभी मेरे बहुत अच्छे नम्बर नहीं आये।
मैं उन भाग्यशाली बच्चों में से एक हूँ जिनके अभिभावक बच्चों के परीक्षाओं में खराब प्रदर्शन पर उन्हें डांटते नहीं हैं बल्कि कहते हैं कि कोई ऐसी परिक्षा बनी ही नहीं जो तुम्हारी योग्यता का आकलन कर सके। तीन घंटे वाले आकलन को यथार्थ मानना सही नहीं है।
मैं भी खुश हो जाता इसीलिए पढ़ाई को कभी बोझ नहीं मान पाया। जब मन किया तब पढ़ा, जब खेलने का मन किया तो खेला। यहां तक कि परीक्षाओं में भी एक-दो कविता तो लिख लेता था।
आठवीं कक्षा तक आते-आते तो घर में सबको पता लग गया कि मैं लिखता हूं।
घर में लोग मेरी टूटी-फूटी कविताओं को पढ़कर खुश हो जाते, घर में जो आता वो मेरी डायरी जरूर पढ़ता।
बचपन से ही दर्शन मेरा प्रिय विषय रहा लिखने का, कारण कि बाबा को भारतीय दर्शन से विशेष प्रेम था, भइया और बाबा अक्सर शाम को दार्शनिक परिचर्चा करते रहते। मुझे उन्हें सुनना अच्छा लगता था।
फिर यही बातें मेरे साहित्य की नींव बनी। मैं दर्शन से आज तक उबर नहीं पाया हूँ।
मेरा एक साहित्यकार मित्र कहता है कि तुम आरंभ प्रेम से करते हो और समाप्त दर्शन पर करते हो।
दर्शन सबको पसंद नहीं आ सकता। दर्शन का एक सीमित दायरा है। मेरे साहित्यिक यात्रा की एक बड़ी बाधा मेरा ऐसा लिखना भी है।
एक गीत मैंने लिखा था वर्षों पहले गीत की पहली पंक्ति है -
प्रिय तुम मधु हो जीवन की
तुम बिन कैसी हो मधुशाला
जो तुम्हें तृप्त न कर पाए
किस काम की है ऐसी हाला?
और अंतिम पंक्तियां हैं -
व्यक्त,अव्यक्त या निर्गुण हो
इसका मुझको अनुमान नहीं,
मेरे बिन खोजे ही मिल जाना
तुम बिन मेरी पहचान नहीं।।
यहां मैं चाह रहा था कि प्रेम लिखूँ पर नहीं लिख पाया। भटकाव इसे ही कहते हैं।
मुझे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से अनन्य प्रेम है। क्लिष्टता तो और अधिक प्रिय है मुझे। जब मैं अपने लिए लिखता हूं तो ऐसा ही लिखता हूं।
मुझे कई बार टोका भी गया है। हिंदी के एक अध्यापक ने मुझे कहा कि तुम इतने क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग मत किया करो तुम्हें पढ़ेगा कौन?
मैंने कहा कि गुरुदेव आप! और कौन?
साहित्यकार बनने का मेरा रह-रह के मन करता है। चाहता हूं कि अपने भार से अधिक पुस्तकें लिखूँ। कलम का साथ कभी न छूटे।मैं चाहता हूं मेरे भी उलझन में दुनिया सुलझे।
( कवि हूं! मेरी उलझन में दुनिया सुलझा करती है - हरिवंश राय बच्चन)।
पर सच कहूं तो मेरा प्रयत्न इस दिशा में नगण्य है। मुझे लिखना नहीं आता। व्याकरण की समझ नहीं है। साहित्य में मुझसे अधिक उच्छृंखल शायद ही कोई हो। लयबद्ध कविताओं में भी छंद दोष कर बैठता हूं। छंदबद्ध कभी-कभी लिखता हूं। दोहे-चौपाई तो साल भर में एक-दो बार।
साहित्य समर्पण मांगता है।साहित्य के साधक तपस्विता के लिए विख्यात होते हैं। न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं। न जाने कौन सी आंखें होती हैं उनके पास जो हम सब में नहीं होती। जिन्हें हम देख नहीं सकते,जिन संवेदनाओं को हम अनुभूत नहीं कर पाते वे उन पर ग्रंथ लिख बैठते हैं।
सत्य ही कहा गया है कि संवेदनाएं मानव को महामानव बनाती हैं।यह साहित्य के लिए अपरिहार्य अवयव है। साहित्यकार अपनी बौद्धिकता से लोगों को सम्मोहित करता है, उन्हें तरह-तरह के भ्रम जाल में फंसाता है। कभी प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर ले जाता है तो कभी अवसाद की।
भइया कहते हैं कि- "अवसाद वही लिख सकता है जो स्वयं परम सुखी हो। क्योंकि अवसाद से घिरा व्यक्ति कभी सृजन नहीं कर सकता। मन की अकुलाहट कभी उससे कुछ रचनात्मक नहीं करा सकती।"
यह कथन कितना सही है यह नहीं जानता किंतु मैंने जिन साहित्यकारों का अवसाद पढ़ा है वे व्यक्तिगत स्तर पर परम फक्कड़ी रहे। उन्हें अवसाद हो ही नहीं सकता था।
साहित्य धर्मिता यही है की पर पीड़ा की भी वैसे ही अनुभूति हो जैसे उक्त परिस्थितियां स्वयं पर पड़ी हों। संवेदना इसे ही कहते हैं और यही साहित्य की आत्मा है।
काश मुझे भी लिखना आए, संवेदना उपजे, साहित्य को समझने की समझ विकसित हो। अभी तो अपने पथ से भटका हुआ हूं, कोई राह मिले तो जीवन सार्थक हो।
अभी तो बस इसी कशमकश में हूं, क्या लिखूँ??

1 टिप्पणी:

  1. ना लिखते हुए भी इतना कुछ लिख लेने की कला .... वाह ... बहुत खूब ... अच्छी पोस्ट है ...

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