गुरुवार, 3 नवंबर 2016

वो सच नहीं है।

मैं आपसे कभी बात नहीं करुंगी। हमेशा फोन मैं करती हूँ आप भूल कर भी कभी कॅाल नहीं करते हो। हर बार बिज़ी होने का बहाना होता है, हर बार मैं पूछती भी हूँ बिज़ी हो? आपका फिर वही रटा-रटाया जवाब नहीं! तुम्हारे लिए नहीं। 
आप सच में मुझे कभी याद करते हैं? कुछ वजूद है मेरा आपके लाइफ में?
अब तो हद हो गई। पिछले दस दिनों से आपने बात नहीं की। न फेसबुक न व्हाट्सप न स्टीकर्स, क्या हुआ है आपको? 
कोई और है क्या आपकी ज़िन्दगी में? 

मुझसे मन भर गया? क्यों खेल रहे हो मेरे जज्बातों के साथ? ख़त्म क्यों नहीं कर देते सब कुछ?
ख़ैर! इस रिलेशनशिप में तो मैं हमेशा अकेली ही थी, कभी आपकी साइड से कुछ था ही नहीं। प्यार नहीं! दोस्ती या कुछ दोस्ती से ज़्यादा? 

सुनो मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।कोई हो आपकी लाइफ में तो प्लीज़ बता देना मैं भूलकर भी याद नहीं करुंगी आपको। वैसे भी मेरे पास खुद के लिए वक्त कम है। मेरी शादी हो ही जाएगी कुछ दिनों में। कोई अजनबी ज़िंदगी भर के लिए मेरी किस्मत में मढ़ दिया जाएगा।जबरदस्ती का रिश्ता निभाना है मुझे उम्र भर के लिए। किसी ब्लैक एंड व्हाइट सेट के साथ मुझे ढकेल दिया जाएगा किसी कोने में हमेशा के लिए। मेरी सारी डिग्रियां मेरी ही तरह सड़ेंगी किसी कोने में। 

आप तब तक फेमस हो जाओगे। टीवी पर भी आप दिखोगे पर मैं चैनल बदल दूंगी।आपको कभी पलट कर नहीं देखूंगी। आपकी किताबें कभी नहीं पढ़ूगीं।अख़बारों में भी आपके आर्टिकल्स नहीं पढ़ूंगी। आपको सब चाहते हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं है, बहुत अकेली हूं मैं।आपसे बात करना चाहती हूँ पर आप बात तक नहीं करते।

आप मेरे साथ ऐसा करते हैं या सबके साथ?
लाइब्रेरी, क्लास, पढ़ने और लिखने के अलावा कुछ करते हैं आप?

कभी तो फ्री होते होंगे तब मुझसे बात क्यों नहीं करते? आई लव यू हद से ज्यादा। सॅारी आज मैंने आपको कुछ ज्यादा सुना दिया। मैं बहुत बुरी हूं हर बार आपको परेशान करती हूँ पर अब नहीं करूंगी। गुड बॅाय!
क्या हुआ? सॅारी यार! नेटवर्क नहीं है यहाँ। और अब तुम मेरे रिसेंट कॅाल लिस्ट में नहीं हो। मैंने सेट फार्मेट किया था तुम्हारा नंबर मिट गया। कहीं और नोट भी नहीं है।

तुम ऐसे क्यों कह रही हो? मैं ऐसा ही तो हूं।मुझे मां से बात किये हुए कई दिन बीत जाते हैं। मेरे सारे दोस्त मुझसे इसी वजह से नाराज ही रहते हैं। मैं किसी से बात नहीं करता।शायद फोन पे बात करना अच्छा नहीं लगता मुझे।

तुम कभी-कभी अजीब सी बातें क्यों करती हो? तुम सेल्फ डिपेन्डेंट हो, अच्छी सैलरी मिलती है। बालिग़ हो तो तुम क्यों किसी के साथ जबरदस्ती ब्याही जाओगी। मना कर देना सबको जब तक तुम्हारे पसंद का लड़का तुम्हें न मिले।

पसंद की तो बात मत करो आप।पसंद तो सिर्फ आप हो मुझे , मुझसे शादी करोगे?

यार प्लीज़! कोई और बात करें? जानती हो मैंने एक नयी कविता लिखी है सुनोगी?

रहने दो, ज़िन्दगी कविता हो गयी है अब कविताओं से चिढ़ होती है। कभी तो सीधा जवाब दे दिया करो..सॅारी यार! मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकता, मैं खुद के भी साथ नहीं हूं, किसी अनजान से रास्ते की ओर कदम बढ़ते चले जा रहे हैं। वक्त धीरे-धीरे मुझे मुझसे दूर करता जा रहा है। ऐसे में मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं दे सकता।

किसने कहा मुझे आपसे कोई उम्मीद है? अब इतना तो आपको समझ ही चुकी हूं। 
एक्चुअली जानते हैं आपकी प्रॅाब्लम क्या है?

आप न कभी किसी रिलेशनशिप को हां सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकि आपके साथ जो गुड ब्वाय वाला टैग लगा है न उसे खोने से डरते हैं। तभी शायद आपकी कोई गर्लफ्रैंड कभी थी नहीं न होगी,
बहुत मुश्किल से खुद को सम्हालती हूं । कोई इमोशन नाम की चीज़ है आपके दिल में?

ऐसा कुछ नहीं है....

बॅाय! अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी।
सुनो!
कहो!
जो तुम कह रही हो वो सच नहीं है।
तो सच क्या है?

कुछ नहीं। 'ब्रम्ह सत्यम् जगत मिथ्या'। 
बॅाय! अलविदा। 

रुको!
नहीं अब कोई फायदा नहीं है......

कॅाल डिस्कनेक्टेड....
कॅाल रिजेक्टेड....काश! मुझे आज सुन लेती....कुछ बताना था..लेकिन क्या बताना था....मुझे क्या पता...तब की तब देखते।


- अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

ईश का वरदान हो क्या?




सुन रहा हूँ आहटों को
 नींद आंखों से परे है,
सिसकियां दर्शन में उतरीं
 मौन होठों को धरे है,
इस अलग रणक्षेत्र में तुम
 काव्य का आह्वान हो क्या?
साधना की ही नहीं पर
 ईश का वरदान हो क्या??

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन


शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन,
चिमनी भट्टी,शोर-शराबा कैंटीन में चौका बरतन ।।
दिनभर सारा काम करुं तो खाने भर को मिलजाता है,
कुछ पैसे मैं रख लेता हूँ कुछ मेरे घर भी जाता है।।
फटे हुए कपड़े मुन्नी के मां को नहीं दवाई मिलती
अपना भी तन मैं ढक पाऊँ इतनी कहाँ कमाई मिलती?
दिन-रात मैं मेहनत करता फिर भी पैसों की है तरसन,
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन।।

-अभिषेक

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

दशहरा, स्मृतियों के कोने से।

काश! ऐसा मुमकिन होता कि वैज्ञानिक कोई ऐसा टाइम मशीन बनाने में सफल हो जाते जिसमें बैठकर मैं अपने बचपन में पहुंच जाता। तब, जब मैं घर में खूब उत्पात मचाता था।उस वक़्त जब मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था। उस वक़्त जब दशहरे की छुट्टी दशहरे से चार-पांच दिन पहले ही हो जाती थी और हम लोग इन छुट्टियों में खूब मस्ती करते थे।
दशहरा का मेला नवरात्र के पहले दिन से ही शुरू हो जाता था। मेला शोहरतगढ़ में लगता था।
मैं मनाता था हे भगवान! जल्दी से छुट्टियां हो जाएं और हमें मेला देखने को मिले।
पहले जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे दिन में मेला दिखाने पाले काका ले जाते थे। काका पूरा मेला घुमाते थे। समोसा,जलेबी और खुरमा खिलाना फिक्स था। इसके बाद कोई एक खिलौना। काका से डर भी लगता था कोई डांट ना पड़ जाए कुछ जिद करने पे। सो जो मिलता बिना ना-नुकुर किये रख लेते थे। काका की उम्र ढली तो काका भीड़-भाड़ से परहेज़ करने लगे।
काका की जिम्मेदारी जब तक छूटी तब तक भइया बड़े हो गए थे। मैं भी ज्यादा चलने पर रोता नहीं था। पहले अम्मा केवल एक दिन मेला देखने देती थी लेकिन भइया के साथ ३दिन मेला घूमने की आजादी मिल जाती थी। शाम को कुछ खाकर भइया और मैं मेला देखने निकल जाते थे। शोहरतगढ़ तक पैदल जाना होता था। हम लोग अकेले ही नहीं जाते थे, पूरा गांव साथ जाता था।
खर्च करने को पैसा भी खूब मिलता।पहले दिन अम्मा से मिलता, दूसरे दिन मम्मी से मगर  एकमुश्त अच्छी-खासी रकम पापा ही देते थे।
भइया के साथ मेला घूमने का मतलब होता था मस्ती की लॅाटरी लगना। मतलब भरपेट जीभ की सेवा और खिलौनों से भी थैली भरी रहती।
भइया से कभी  रिमोट वाली कार की जिद करता तो कभी मैगजीन वाले पिस्टल की। कभी बड़ी सी प्लास्टिक वाली ए.के४७ तो कभी पटाखे वाले राइफल की।
इतने से मन थोड़े ही भरता था मेरा, अगले दिन नए खिलौनों की लिस्ट। मेरे पास अटैची भर के खिलौने रहते थे। भइया के पास जब कभी कुछ पैसे जमा हो जाते थे मेरे लिए खिलौने खरीद लाते थे।
वीडियो गेम, वाकमैन तो हर दो महीने खराब होता और नया मिलता।साल भर तक मैं खिलौना इकट्ठा करता और गर्मी की छुट्टी में सबको बांट देता।
मुझे खिलौनों से इतना प्यार था कि मम्मी जब कहीं पापा के साथ घूमने जाती थीं और मैं उनके साथ नहीं जा पाता था तो मेरे लिए घूस में खिलौना लाती थीं। बारहवीं तक मेरे पास खूब सारे खिलौने थे पर मेरठ जाने के बाद अचानक से एहसास हुआ कि अब मैं थोड़ा बड़ा हो गया हूँ।
सच कहूं तो ये खिलौने तभी तक अच्छे लगे जब तक भइया घर पर थे।भइया बाहर पढ़ने चले गए तो मेला छूट गया। हर बार इंतजार करता की भइया इस बार दशहरा की छुट्टी में घर आएंगे पर पूर्वी उत्तरप्रदेश में दशहरे की केवल एक दिन की छुट्टी होती। मेरा मन मेला देखने का करता ही नहीं तब। भला भइया बिना कोई मेला देखने की चीज़ होती है क्या?
जब मैं दसवीं में था तब भइया बाहर पढ़ने चले गए थे।मेला तब भी लगता था लेकिन मैं जाने से कतराता था। पता नहीं क्यों मेले के नाम से रुलाई छूट पड़ती।
कई बार उपेन्द्र जबरदस्ती ले जाता था। इमोशनल ड्रामा आज भी वो टॅाप क्लास का करता है।
इंटरमीडियट कम्प्लीट हुआ तो मेरठ पढ़ने आ गया। अजनबी शहर तो हर पल मेला लगता है।
( यहां नौचंदी मेला लगता है जिसमें हम भाई-बहन सब साथ में जाते थे..इसके बारे में फिर कभी लिखूंगा)
यहां कब नवरात्र लगता कब बीत जाता कुछ पता ही नहीं चलता था। दशहरे वाले दिन मेरठ में कंकड़खेरा में मेला लगता है। रावण का पुतला फूंका जाता है। यहां मेला दिखाने के लिए वीरु भइया थे। इस मेले में हम केवल धूलयुक्त गोलगप्पे खाते थे, फिर मीठा पान खाते थे।
दूसरे साल से राजेश भइया मिल गए, फिर अशोक भइया।चौथे साल तक तो पूरी फौज ही इकट्ठी हो गई थी। अंशू,अंकित और मनीष भी आ गए थे। मेरठ में आखिरी दशहरा याद है धमाकेदार मना था। मेले से लौटकर जब हमारी टोली वापस आई तो न जाने कैसे माइकल जैक्सन की आत्मा राजेश भइया में घुस गई थी। कभी लेट के तो कभी नागिन डांस तो कभी चारो तरफ से नाचते। अंशू और अशोक भाई भी रंग में थे लेकिन राजेश भइया के सामने कोई टिक ही नहीं पा रहा था।

आज दशहरा है लेकिन आज फिर मैं मेला नहीं गया, आज वीरु भइया भी साथ नहीं थे। न जाने क्यों इस बार दशहरा बहुत खला।
सच कहूं तो बिना भाई-बहनों के कोई उत्सव, उत्सवमय लगता है क्या। जाने क्यों वही पुराने दिन याद आ रहे हैं। भइया के हाथों को पकड़े,नहर के किनारे वाली सड़क पर धीरे-धीरे चलना और भइया से कहानियां सुनते-सुनते घर तक पहुंच जाना..अम्मा का दरवाजा खोलना, उसे चहक कर नए खरीदे हुए खिलौने दिखाना,हफ्तों अपने खिलौनों पर इतराना....वो भी क्या दिन थे।
हर बार की तरह इस बार भी  दुकानें सजी होंगी।पल्टन के पल्टन पैदल ही लोग शोहरतगढ़ की ओर जा रहे होंगे। बूढ़े-बुजुर्ग सब तैयार होकर गांव से निकल गये होंगे।भौजाईयां सातो सिंगार कर के मेला की ओर बढ़ चुकी होंगी।मजनूँ बेचारा फिर पिटा होगा।पल्टहिया भौजी फिर उसे ५०रुपए मेला करने के लिए दी होगी। भला दस रुपए में क्या मिलता है? ढंग का खिलौना भी नहीं मिलता इतने में। जलेबी, समोसा तो पूछो ही मत।सबके भाव आसमान पर छाए रहते हैं मेले में,
लेकिन कौन समझाए भौजाई को हर मेले में बेचारा कूटा जाता है......मैं भी यहां खुद को कूट रहा हूँ, कुछ पुरानी स्मृतियों को, बीती कहानियों को..उकेर रहा हूँ यादों के कैनवास पर भावों की तूलिका से , शनैः-शनैः।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

नेह का सागर लाई नानी

अंतरिक्ष को पात्र बनाकर नेह का सागर लाई नानी
जिसमें सारी दुनिया तर हो वैसी ही गहराई नानी,

हमको हर-पल यही लगा की पग पग पर है साथ हमारे
कई दिनों से ढूंढ रहे हैं जाने कहाँ हेराई नानी?

आँखों में जब आँसू आते झट से विह्वल हो जाती थी
अब रो-रो कर बुरा हाल है कैसे हुई पराई नानी?



पल-पल क्षिन-क्षिन उन्हीं कहानी किस्सों की सुधि आती है
सावन की भीनी रातों में जिनको कभी सुनाई नानी,
सच है की नानी की गोदी गंगा से भी शीतल लगती
तभी हमें ये अक्सर लगता सब नदियों की माई नानी,
जब-जब नानी याद आती है आँखों से आँसू झरते हैं,
ऐसे छिपकर गुम होने की कैसी जुगत लगाई नानी?

-अभिषेक शुक्ल 

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

''आज़ादी और आदिवासी''-अमरेंद्र किशोर

बीते सप्ताह एक किताब हाथ लगी ''आज़ादी और आदिवासी''।
इस किताब के लेखक हैं पत्रकार अमरेंद्र किशोर। प्रकृति पुत्रों की बनैली संस्कृति और उनके भाग्य में मढ़ी गयी विसंगति तथा समाज के साथ उनके संघर्ष पर अब तक लिखी गई सबसे सटीक किताबों में से एक किताब आज़ादी और आदिवासी भी है।
आम तौर पर जब हम आंकड़े इकट्ठा करने के लिए कोई किताब पढ़ते हैं तो अपने काम का विषय पढ़ कर किताब वापस लाइब्रेरी में रख देते हैं, ऐसे ही मंशा लिए मैं भी पढ़ने गया था पर एक लाइन ने पूरी किताब पढ़ा डाली मुझसे।
वो लाइन थी-
''कोई भी समूह जब अपने मूल से कटता है तो कई प्रकार की विसंगतियां उसके भाग्य में मढ़ जाती हैं।'' ये सच है।
हर समुदाय का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है जिसमें किसी भी प्रकार का बाह्य हस्तक्षेप करने का अर्थ होता है उस समुदाय की मान्यताओं को ठेस पहुँचाना। कई बार हस्तक्षेप इतना घातक होता है कि लोग विद्रोह कर देते हैं समाज के प्रति|यह विद्रोह इतना घातक होता है कि समाज सशस्त्र क्रांति की ओर बढ़ जाता है। विद्रोह धीरे-धीरे वाद में बदल जाता है और फिर उस वाद का नामकरण कर दिया जाता है, जैसे - नक्सलवाद, माओवाद, जंगलवाद।
फिर शुरू होता है राज्य का अत्याचार उस समाज पर कालांतर में राज्य और समुदाय एक-दुसरे से उलझते रहते हैं.


जंगल कटते जा रहे हैं और इन जंगलों में रहने वाले आदिवासी भी अपने जड़ों से कटते जा रहे हैं, जिस के कारण एक बड़ा तबका असन्तुष्ट है।
सरकार से असंतुष्ट लोगों को विद्रोही बनाना सबसे आसान काम होता है, उनके इसी मनः स्थिति का लाभ उठाने में चालाकी दिखाई नक्सलवादी संगठनों ने।
आदिवासी समाज का अस्तित्व जंगलों से है। आदिवासियों की संस्कृति निराली होती है, इतनी निराली जो शायद समाज के समझ में न आये।
आज़ादी मिलने से पहले आदिवासी अपने मूल स्वभाव में थे, यानी ब्रिटिश इंडिया से कटा-छटा। ब्रिटिश इंडिया में इनकी मूल स्थिति पर कभी प्रहार नहीं किया गया था। जंगलों से उनका रिश्ता भी शिकार तक सीमित रहा।
आज़ादी के उपलक्ष्य में जब पूरे भारत में जश्न मनाया जा रहा था तो आदिवासियों ने भी जश्न मनाया होगा। कुछ उम्मीदें भी रही होंगी , कुछ प्रत्याशाएं भी पर जैसे-जैसे समय बीतता गया उनकी उम्मीदें टूटने लगीं। सरकारों को जंगल काटने से मतलब था ,कच्चा माल लूटने से मतलब था आदिवासियों से नहीं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने पाँव पसारे। जंगल काटे जाने लगे, पहाड़ तोड़े जाने लगे।
आदिवासियों का वनों से एकाधिकार समाप्त होता गया और लालची दुनिया जंगलों में पांव पसारती गई। आदिवासियों और वनों की सुरक्षा के लिए सरकारों ने लाख कानून बनाये, पर वे इतने प्रभावी कभी नहीं रहे जो इन्हें सुरक्षा दे सकें।
जब सभ्य समाज असभ्यों के अरण्य में जाता है तो प्रलय मचता है। सफेदपोश लोगों ने जब जंगल की ओर रुख किया तो उनके काले कारनामों से वनपुत्रियां नहीं बच सकीं। बलात्कार से लेकर वेश्यावृत्ति तक सारी कुरीतियां जंगलों में आ गयीं।आदिवासियों का व्यक्तिगत जीवन कब सार्वजनिक हुआ ये उन्हे भी नहीं पता चला।दुनिया भर के फोटोग्राफर जंगलों में पहुँच गए। आदिवासियों के अंतरंग पल दुनिया भर की मैगज़ीनों में फीचर होने लगे।
बाजारवाद की एक महत्वपूर्ण शर्त होती है कि संसाधनों का अधिकतम दोहन करो। ये दोहन चलता रहा।कभी कुछ पैसे देकर तो कभी जबरदस्ती।
आदिवासियों का दैहिक, आर्थिक और मानसिक शोषण अब तक हो रहा है।सब जानते हैं उनकी संस्कृतियां नष्ट हो रही हैं, उत्पीड़न हो रहा है। ऐसे में कुछ मौका परस्त लोगों ने उनकी असंतुष्टि को खूब भुनाया है।
वैसे भी पीड़ित लोगों को बरगलाना सबसे आसान काम होता है। सरकार के खिलाफ हथियार पकड़ा दिए गए ,कुछ ने हथियार उठा लिए , कुछ ने मूक समर्थन दे दिया। नक्सली योद्धा तैयार हो गए।
भूखे इंसान का केवल एक मज़हब होता है भूख। भर पेट खाना जो दे वही देवता अच्छा। धर्मान्तरण के सबसे ज्यादा मामले आदिवासी क्षेत्रों से आते हैं। विदेशों से संचालित ईसाई मिशनरियां ईश्वर का डर दिखा कर आदिवासियों को शिवप्रसाद से शिवा अलेक्जेंडर बनाती हैं। लालच देकर धर्म परिवर्तन।नेता जैसे चुनावी वादे करते हैं वैसे ही ये मिशनरियां समृद्धि के सपने दिखाकर धर्मान्तरण कराती हैं.
आदिवासी विसंगतियों में जीते हैं. न अस्पताल हैं, न स्कूल हैं, न रोज़गार न सर पे छत। ऐसे में सरकार से इन्हें प्यार भी कैसे हो? सरकार जब कुछ करने जाती है नक्सलियों के सरगना विकास की धज़्ज़ियाँ उड़ा देते हैं।
जंगल काटे जा रहे हैं।, जमीन छीनी जा रही है , विद्रोह तो होगा ही, आग तो सुलगनी ही है।
अमरेंद्र किशोर जी ने सरल शब्दों में आदिवासियों की व्यथा लिखी है, बरबस मन पसीज जाता है। आदिवासी महिलाओं की दशा पढ़कर वितृष्णा होने लगती है तथाकथित सभ्य समाज से। लूटने ,खसोटने के अलावा समाज कुछ नहीं समझता उन्हें।बड़े वर्गों के लिए ये महिलाएं शोषण की विषय वस्तु हैं.
लाल सलाम ठोंकने वाले कार्ल मार्क्स के उत्तराधिकारियों को ज़मीन पे उतरकर कभी जंगल की हकीकत जाननी चाहिए। राजनीती की रोटी सेंकने से अच्छा है कभी उनसे मिला जाए जिन्हें रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिनके नाम पे राजनीति करके इनकी रातें रंगीन होती हैं कभी उनकी व्यथा महसूस करें, लेकिन कितने शर्म की बात है कि जो पूंजीवाद के सबसे बड़े विरोधी लोग हैं वही निचले तबके को पूँजी के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते, उनके साथ खड़े होने का दावा तो करते हैं पर सिर्फ दावा ही करते हैं , उनके लिए काम नहीं करते ।
आप भी पढ़िए इस किताब को.ज़मीन,जंगल और रोटी को लेकर आदिवासियों अन्तर्द्वन्द्व को जानने के लिए ,शायद आप भी उस दर्द को महसूस कर सकें जिसे एक वर्ग दशकों से झेल रहा है ।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

झोपड़ियों में बिखरता बचपन

शहर के तंग गलियों में टूटे हुए सपनों की एक लंबी कहानी है. एक अज़ीब सी कुंठा में लोग जीते हैं.कभी कई दिन भूखा रह जाने की कुंठा तो कभी दिहाड़ी न मिलने की कुंठा, कभी सभ्य समाज की गाली तो कभी दिन भर की कमाई को फूंकने से रोकने के लिए शराबी पति की मार, कभी पति का पत्नी को जुए में हार जाना तो कभी बच्चों का नशे की लत में डूब जाना. ये हालात किसी फिल्म की पटकथा नहीं हैं बल्कि सच्चाई है उन झुग्गी-झोपड़ियों की जहाँ हम जाने से कतराते हैं.
इन गलियों की तलाश में निकलने से पहले मैंने बस कहानियां पढ़ी थीं इनके बारे में . नज़दीक से कुछ देखा नहीं था.जब पास गया तो महसूस हुआ कि आज़ाद हुए भले ही दशकों बीत गए हों पर इनके हालात न तब बदले थे न अब बदले हैं. न जमीन का ठिकाना न आसमान का.सिर्फ इनकी ही नहीं इनके पूर्वजों की भी जिन्हें गुज़रे एक जमाना हो गया. आज यहाँ तो कल वहां .भटकना अब आदत सी बन गयी है…
कटी-फटी झोपड़ पट्टियां, बरसाती से तनी झोपड़ियों में रहने वाले लोग जिनका ठिकाना शायद उन्हें भी मालूम नहीं है.इनकी तरह इनके काम का भी कोई ठिकाना नहीं है. कभी कच्ची शराब तो कभी कचरे की तलाश , कभी भांग तो कभी गांजे की तस्करी..दिन भर रिक्शा चलाना तो शाम को पौवा चढ़ाना..हाँ! शायद ये तकलीफें कम करने का कोई सस्ता सा जुगाड़ लगता है इन्हें.कुछ ऐसी ही कहानियां हैं इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों की.
इनका आज जैसा है, कल भी वैसा ही रहेगा…क्योंकि इनकी गणना ही नहीं होती हमारे सभ्य समाज में, अपने-अपने स्वार्थ साधने में लगे लोगों को इतनी फुरसत कब है कि इनकी सुधि लें.
टहलते-टहलते कुछ बच्चे भी मिल गए. चॉकलेट-बिस्कुट देख कर सब दौड़े चले आये.फटे कपडे, किसी के पैर में चप्पल तो कोई नंगे पावं, ऐसे झपटे जैसे जन्मों से भूखे हों.मैंने एक से पूछा कि पढ़ने जाते हो? तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि नहीं..मैं तो पैसे मांगने जाता हूँ. मैंने पूछा कि स्कूल क्यों नहीं जाते तो उसने कहा कि स्कूल जाऊँगा तो बापू मारेगा.
गोलू,मोलू,चिनकू,छोटू और न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं जो कभी स्कूल नहीं जाते…इनकी पाठशाला शुरू होती है सड़क पर और ख़त्म भी वहीं होती है, बस इनके हिस्से इतवार नहीं आता.
जब भी कोई अजनबी मिलता है तो कहते हैं- भैया! भूख लगी है. कुछ खाने को दो.इनका पेट हमेशा खाली रहता है . कुछ खाने को दो तो भी पैसा मांगते हैं. पैसा मांगने की एक वजह ये भी है कि ये अपने मां-बाप के कमाई की मशीन हैं. ये बच्चे कभी किसी गैंग का शिकार बनते हैं तो कभी खुद का गैंग बनाते हैं. इनकी आँखों में न तो स्कूल के सपने हैं न ये स्कूल जाना चाहते हैं.
छः से आठ वर्ष तक की उम्र पूरी करते-करते इन्हें बीड़ी, सिगरेट, शराब या भांग की लत लग चुकी होती है…उम्र बढ़ती है तो साथ-साथ नशे की लत भी और हावी होती चली जाती है…फिर ये सिलसिला तब-तक नहीं थमता जब तक की मौत न हो जाए.
हम आधुनिक हो रहे हैं. वास्तविक दुनिया के सापेक्ष हमने एक आभासी दुनिया भी बना ली है.फिर भी हमारे समाज में ही एक बड़ी आबादी ऐसी जिंदगी जीती है.जीवन की अपरिहार्य आवश्यकताएं भी पूरी नहीं होतीं.रोटी के लिए रोज़ लड़ना पड़ता है,औरतों की सिसकियाँ..भूखे बच्चों का रोना..बीमारी से मरते हुए लोग..तिल-तिल मरते ख़्वाब..चैन से सोने नहीं देते.ऐसे में कई बार लगता है कि ये डिज़िटल इंडिया, वर्चुअल वर्ल्ड , इनक्रेडिबल इंडिया , मेक इन इंडिया के स्लोगन बेईमानी हैं समाज से…ये कैसा समाज है जहाँ समता नहीं है?
हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन जरूर आएगा जब परिस्थितियां बदलेंगी। जब सबका अपना घर होगा, जब कोई भूखा नहीं सोयेगा, जब सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी होंगी…
पर कब तक? शायद ये भागवान को भी नहीं पता होगा….

-अभिषेक शुक्ल
भारतीय जनसंचार संसथान
नई दिल्ली। 

रविवार, 18 सितंबर 2016

धिक! धिक! जन-गण-मन नायक!

हा! भारत! हा! जन-गण-मन!
क्यों दग्ध ह्रदय को लिए फिरे?
क्या प्रत्यंचाएं टूट गईं
या गाण्डीव रह गए धरे?
धिक! धिक! जन गण मन नायक!
क्यों पुनः यही आभास हुआ
होकर मदान्ध तुम नहुष हुए
फिर भारत का उपहास हुआ।।
क्यों शर फिर सीना तान रहा?
क्यों सिमटा मेरा वितान रहा?
क्यों सहानुभूति उपजे मन में
जिन पर वर्षों अभिमान रहा?
छोड़ो दुख का जाप्य जयद
लेकर निषंग रण में उतरो,
जो विपदाएँ आएं पथ में
बन महादेव कण-कण कुतरो।

-अभिषेक शुक्ल
क्रमशः

सोमवार, 12 सितंबर 2016

जीत लो जग का निश्छल प्यार

नयन में उतर रहे कुछ स्वप्न
सार जिनका मुझसे अनभिज्ञ
आज और कल की ऊहापोह
अब कहाँ रहा मेरा मन विज्ञ ?


कई युग बीत गए हैं मित्र
यथावत रहा कहाँ संसार,
नित्य परिभाषाएं बदलीं
हुआ केवल मन का अभिसार.


यही है जीवित मन की शक्ति
यही मानव मन का उद्गार,
एक ही कर्म मनुज के योग्य
जीत लो जग का निश्छल प्यार .
-अभिषेक शुक्ल

सोमवार, 5 सितंबर 2016

अंगिका भाषा और आभासी दुनिया

लोक भाषाएँ लोक संस्कृतिओं की संवाहक होती है.विभिन्न प्रकार की लोक भाषाएँ और लोक संस्कृतियां भारत की विभिन्नता में एकरूपता की अवधारणा को पुष्ट करती हैं.भारत की यही विशिष्टता है विभिन्नता में एकरूपता.इन्हीं लोक भाषाओँ में एक सुमुधर और चिर पुरातन भाषा है अंगिका.

अंगिका भाषा से मेरा परिचय अभी कुछ समय पूर्व ही हुआ है.मैं इस भाषा की विशिष्टता से अनभिज्ञ था. इसका एकमात्र कारण यह था कि अंगिका भाषा मैथिली भाषा के सामान ही प्रतीत होती है.दोनों भाषाओं में विभेद करना केवल उन्ही के सामर्थ्य की बात है जो या तो भाषाविद हैं अथवा जिनकी ये मातृ भाषा है.
आज के युग में हर भाषा अपनी विशिष्टता खो रही है. उदाहरणार्थ अवधी और भोजपुरी को ही देख लीजिए.अवधी कबीर, रहीम और तुलसी दास जी की भाषा रही है. एक से बढ़कर एक ग्रन्थ और दोहे इसमें रचे गए हैं.भारतीय जनमानस का सबसे प्रसिद्द ग्रन्थ “श्री राम चरित मानस ” भी अवधी में ही लिखा गया है.शायद ही कोई सनातन धर्मी हो जिसके घर में रामचरित मानस न मिले, किन्तु यह जिस भाषा में है उस भाषा को लोग भोजपुरी समझने लगे हैं. भोजपुरी हावी हो रही है अवधी पर क्योंकि उसे स्तरीय साहित्यकार नहीं मिल रहे हैं.संयोग से अंगिका भी इसी स्थिति से गुजर रही है.
अंगिका अंग प्रदेश की भाषा है. वही अंगराज कर्ण की भूमि.अंग प्रदेश सदैव से प्रासंगिक रहा है चाहे महाभारत काल की बात हो अथवा बुद्ध काल की। यह प्रदेश सदैव भारत राष्ट्र का गौरव रहा है, किन्तु यहाँ बोली जाने वाली भाषा अंगिका अपने अस्तित्त्व से संघर्ष कर रही है.
यूनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने तो इसे विलुप्त भाषाओं में चिन्हित किया है,इसका कारण एक मात्र यही है कि इस भाषा को अच्छे सृजक नहीं मिले.
अंगिका भाषा मिठास की भाषा है, ऐसी भाषा जो बहुत आसानी से सीखी जा सकती है.यूँ तो किसी भाषा का उत्थान या पतन उस भाषा को बोलने वालों की सामरिक आर्थिक,सामाजिक और वैयक्तिक क्षमता पर निर्भर करती है किन्तु कई बार कुछ समर्थ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो इन सभी परिस्थितियों की अभाव में भी अपनी भाषा और संस्कृति को आगे ले जा सकते हैं.
ऐसे ही कुछ समर्थ साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ जो अंगिका भाषा के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं.
आज बौद्धिक वर्ग एक ही दुनिया में दो तरह की दुनिया में खुद को जीता है. एक वास्तविक दुनिया और दूसरी आभासी दुनिया.
आभासी दुनिया अर्थात फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉग वाली दुनिया. ये आभासी दुनिया बौद्धिक वर्ग के लिए किसी वरदान की तरह है.
यदि साहित्यकार अपने भाषा और संस्कृति को जीवित रखना चाहता है तो उसे दोनों तरह की दुनिया में प्रासंगिक होना पड़ेगा.
अंगिका साहित्य को आभासी दुनिया से जोड़ने का श्रेय जाता है कुंदन अमिताभ जी को.इन्होने ही सबसे पहले अंगिका.कॉम नाम की एक वेबसाइट बनायीं और अंगिका से जुडी पुरातन और नवीन सामग्रियों को प्रकाशित करना शुरू किया.
कुंदन अमिताभ के इस पहल का परिणाम यह हुआ की अंगिका साहित्य से जुड़े बड़े नामों में से एक डॉक्टर अमरेंद्र, राहुल शिवाय और ऐसे ही अनेक साहित्यकारों ने इस विधा की रचनाओं को फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर साझा करना शुरू किया.धीरे -धीरे फेसबुक पर अंगिका समाज बना और दर्ज़नों साहित्यकार अंगिका में कवितायेँ लिखने लगे. अंगिका पुनः जीवित होने लगी.
कोई भी भाषा विश्वपटल पर छा सकती है बस उसे कुछ समर्पित लोग मिल जाएँ. ऐसे ही एक समर्पित युवा साहित्यकार हैं राहुल शिवाय. फरवरी २०१६ में अंगिका भाषा को कविता कोष से जोड़ने का कार्य किया राहुल शिवाय ने. कविता कोष भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी वेबसाइट है. कविता कोष में शामिल होने से अंगिका भाषा को एक बड़ा मंच मिला. देखते ही देखते कविता कोष में २००० से अधिक रचनाएँ और १०० से ज्यादा रचनाकार शामिल हुए.अंगिका दिन प्रतिदिन प्रसिद्द होने लगी.
जिस भाषा को यूनेस्को ने विलुप्तप्राय कहा था वही भाषा एक बार पुनः प्रासंगिक हो उठी. यदि इसी तरह साहित्यकार इस भाषा के उत्थान के लिए दृढ संकल्पित रहे तो इस भाषा का राष्ट्रीय पटल पर आना निश्चित है.
लोक भाषा लोक संस्कृतियों को बाँध कर रखती हैं और यही लोक संस्कृतियां भारत की विशेषता रही हैं. इनके जीवित रहने से ही भारतीयता की पहचान है इसलिए इनका संरक्षण अनिवार्य है….
- अभिषेक शुक्ल
लोक भाषाएँ लोक संस्कृतिओं की संवाहक होती है.विभिन्न प्रकार की लोक भाषाएँ और लोक संस्कृतियां भारत की विभिन्नता में एकरूपता की अवधारणा को पुष्ट करती हैं.भारत की यही विशिष्टता है विभिन्नता में एकरूपता.इन्हीं लोक भाषाओँ में एक सुमुधर और चिर पुरातन भाषा है अंगिका.
अंगिका भाषा से मेरा परिचय अभी कुछ समय पूर्व ही हुआ है.मैं इस भाषा की विशिष्टता से अनभिज्ञ था. इसका एकमात्र कारण यह था कि अंगिका भाषा मैथिली भाषा के सामान ही प्रतीत होती है.दोनों भाषाओं में विभेद करना केवल उन्ही के सामर्थ्य की बात है जो या तो भाषाविद हैं अथवा जिनकी ये मातृ भाषा है.
आज के युग में हर भाषा अपनी विशिष्टता खो रही है. उदाहरणार्थ अवधी और भोजपुरी को ही देख लीजिए.अवधी कबीर, रहीम और तुलसी दास जी की भाषा रही है. एक से बढ़कर एक ग्रन्थ और दोहे इसमें रचे गए हैं.भारतीय जनमानस का सबसे प्रसिद्द ग्रन्थ “श्री राम चरित मानस ” भी अवधी में ही लिखा गया है.शायद ही कोई सनातन धर्मी हो जिसके घर में रामचरित मानस न मिले, किन्तु यह जिस भाषा में है उस भाषा को लोग भोजपुरी समझने लगे हैं. भोजपुरी हावी हो रही है अवधी पर क्योंकि उसे स्तरीय साहित्यकार नहीं मिल रहे हैं.संयोग से अंगिका भी इसी स्थिति से गुजर रही है.
अंगिका अंग प्रदेश की भाषा है. वही अंगराज कर्ण की भूमि.अंग प्रदेश सदैव से प्रासंगिक रहा है चाहे महाभारत काल की बात हो अथवा बुद्ध काल की। यह प्रदेश सदैव भारत राष्ट्र का गौरव रहा है, किन्तु यहाँ बोली जाने वाली भाषा अंगिका अपने अस्तित्त्व से संघर्ष कर रही है.
यूनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने तो इसे विलुप्त भाषाओं में चिन्हित किया है,इसका कारण एक मात्र यही है कि इस भाषा को अच्छे सृजक नहीं मिले.
अंगिका भाषा मिठास की भाषा है, ऐसी भाषा जो बहुत आसानी से सीखी जा सकती है.यूँ तो किसी भाषा का उत्थान या पतन उस भाषा को बोलने वालों की सामरिक आर्थिक,सामाजिक और वैयक्तिक क्षमता पर निर्भर करती है किन्तु कई बार कुछ समर्थ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो इन सभी परिस्थितियों की अभाव में भी अपनी भाषा और संस्कृति को आगे ले जा सकते हैं.
ऐसे ही कुछ समर्थ साहित्यकारों से मेरा परिचय हुआ जो अंगिका भाषा के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं.
आज बौद्धिक वर्ग एक ही दुनिया में दो तरह की दुनिया में खुद को जीता है. एक वास्तविक दुनिया और दूसरी आभासी दुनिया.
आभासी दुनिया अर्थात फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉग वाली दुनिया. ये आभासी दुनिया बौद्धिक वर्ग के लिए किसी वरदान की तरह है.
यदि साहित्यकार अपने भाषा और संस्कृति को जीवित रखना चाहता है तो उसे दोनों तरह की दुनिया में प्रासंगिक होना पड़ेगा.
अंगिका साहित्य को आभासी दुनिया से जोड़ने का श्रेय जाता है कुंदन अमिताभ जी को.इन्होने ही सबसे पहले अंगिका.कॉम नाम की एक वेबसाइट बनायीं और अंगिका से जुडी पुरातन और नवीन सामग्रियों को प्रकाशित करना शुरू किया.
कुंदन अमिताभ के इस पहल का परिणाम यह हुआ की अंगिका साहित्य से जुड़े बड़े नामों में से एक डॉक्टर अमरेंद्र, राहुल शिवाय और ऐसे ही अनेक साहित्यकारों ने इस विधा की रचनाओं को फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर साझा करना शुरू किया.धीरे -धीरे फेसबुक पर अंगिका समाज बना और दर्ज़नों साहित्यकार अंगिका में कवितायेँ लिखने लगे. अंगिका पुनः जीवित होने लगी.
कोई भी भाषा विश्वपटल पर छा सकती है बस उसे कुछ समर्पित लोग मिल जाएँ. ऐसे ही एक समर्पित युवा साहित्यकार हैं राहुल शिवाय. फरवरी २०१६ में अंगिका भाषा को कविता कोष से जोड़ने का कार्य किया राहुल शिवाय ने. कविता कोष भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी वेबसाइट है. कविता कोष में शामिल होने से अंगिका भाषा को एक बड़ा मंच मिला. देखते ही देखते कविता कोष में २००० से अधिक रचनाएँ और १०० से ज्यादा रचनाकार शामिल हुए.अंगिका दिन प्रतिदिन प्रसिद्द होने लगी.
जिस भाषा को यूनेस्को ने विलुप्तप्राय कहा था वही भाषा एक बार पुनः प्रासंगिक हो उठी. यदि इसी तरह साहित्यकार इस भाषा के उत्थान के लिए दृढ संकल्पित रहे तो इस भाषा का राष्ट्रीय पटल पर आना निश्चित है.
लोक भाषा लोक संस्कृतियों को बाँध कर रखती हैं और यही लोक संस्कृतियां भारत की विशेषता रही हैं. इनके जीवित रहने से ही भारतीयता की पहचान है इसलिए इनका संरक्षण अनिवार्य है….
- अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

उन हाथों में बर्तन है .

जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
बर्तन है
कैसे सबका कहना मानूँ दया जगत का
दर्शन है,
कुछ सपने मैंने भी देखे थे पढ़ने और
लिखने के
अब नसीब में मेरे केवल चौका,पोंछा
बर्तन है।
कुछ उम्मीदें दुनिया से हैं कुछ अधिकार
हमें भी दे दो,
सबको तो दुलराते रहते थोड़ा प्यार
हमें भी दे दो ,
मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता जो दुनिया
का दर्शन है ,
जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
                                                                         बर्तन है।                                                    -अभिषेक शुक्ल




फोटो क्रेडिट-समन्वय 

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

क्या लिखूँ??

क्या लिखूँ?? कुछ सूझ नहीं रहा है। कुछ दिनों से लिखना चाह रहा हूँ फिर भी नहीं लिख पा रहा। जब लिखने का मन होता है तब क्लास चलती है, क्लास के बाद लाइब्रेरी फिर मेट्रो। वहां धक्का-मुक्की में अंदर का साहित्यकार कभी राहुल सांकृत्यायन बनता है तो कभी निराला।इस चक्कर में अभिषेक कहीं खो सा जाता है। घर आता हूँ तो नींद जकड़ लेती है। पिछले कई दिनों से भीतर का कवि सो रहा है।
कभी लिखने-पढ़ने के मामले में अनियमित नहीं रहा, सोने से पहले एक-दो कविता,कहानी या आलेख लिखना आदत में शामिल रहा है। बचपन से ही पढ़ने-लिखने में मन लगता था। पाठ्यक्रम के विषय में नहीं,वे तो मुझे फूटी कौड़ी नहीं सुहाते थे। हां पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य विषयों में तो प्राण बसते थे मेरे।
कभी बूआ की किताब उठा कर भूगोल पढ़ता, तो कभी दीदी के अलमारी से विज्ञान। इन सबसे उबरता तो नंदन,चंपक,नन्हे सम्राट, कोबी-भेड़िया, नागराज,ध्रुव, और चाचा चौधरी को पढ़ने बैठ जाता था। कोर्स की किताबों को पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था।
सप्ताह में जब कभी भइया पढ़ाने बैठते थे तो मेरी पिटाई हो जाती थी। पढ़ने वाले विषयों का प्रवक्ता रहता था पर गणित में हाथ तंग थे।फिर जब भइया पुराने अभ्यास करने को देते थे कई बार मैं कर नहीं पाता था। फिर मेरी धुनाई हो जाती थी।
आठवीं कक्षा तक यही हाल रहा, इसके बाद पढ़ाई को लेकर मेरी दुर्भावना, सद्भावना में बदली और ठीक-ठाक विद्यार्थी हो गया।
भइया चाहते थे कि मैं सबसे अव्वल रहूँ, सबसे आगे रहूँ और मेरी समस्या रही कि मैं हमेशा धार के विपरीत बहा।
जो परिभाषाएं कक्षाओं में लिखवायी जाती थीं उन्हें कभी यथावत लिखा ही नहीं। बिना नई परिभाषा गढ़े मुझे पानी नहीं पचता था।इसी वजह से कभी मेरे बहुत अच्छे नम्बर नहीं आये।
मैं उन भाग्यशाली बच्चों में से एक हूँ जिनके अभिभावक बच्चों के परीक्षाओं में खराब प्रदर्शन पर उन्हें डांटते नहीं हैं बल्कि कहते हैं कि कोई ऐसी परिक्षा बनी ही नहीं जो तुम्हारी योग्यता का आकलन कर सके। तीन घंटे वाले आकलन को यथार्थ मानना सही नहीं है।
मैं भी खुश हो जाता इसीलिए पढ़ाई को कभी बोझ नहीं मान पाया। जब मन किया तब पढ़ा, जब खेलने का मन किया तो खेला। यहां तक कि परीक्षाओं में भी एक-दो कविता तो लिख लेता था।
आठवीं कक्षा तक आते-आते तो घर में सबको पता लग गया कि मैं लिखता हूं।
घर में लोग मेरी टूटी-फूटी कविताओं को पढ़कर खुश हो जाते, घर में जो आता वो मेरी डायरी जरूर पढ़ता।
बचपन से ही दर्शन मेरा प्रिय विषय रहा लिखने का, कारण कि बाबा को भारतीय दर्शन से विशेष प्रेम था, भइया और बाबा अक्सर शाम को दार्शनिक परिचर्चा करते रहते। मुझे उन्हें सुनना अच्छा लगता था।
फिर यही बातें मेरे साहित्य की नींव बनी। मैं दर्शन से आज तक उबर नहीं पाया हूँ।
मेरा एक साहित्यकार मित्र कहता है कि तुम आरंभ प्रेम से करते हो और समाप्त दर्शन पर करते हो।
दर्शन सबको पसंद नहीं आ सकता। दर्शन का एक सीमित दायरा है। मेरे साहित्यिक यात्रा की एक बड़ी बाधा मेरा ऐसा लिखना भी है।
एक गीत मैंने लिखा था वर्षों पहले गीत की पहली पंक्ति है -
प्रिय तुम मधु हो जीवन की
तुम बिन कैसी हो मधुशाला
जो तुम्हें तृप्त न कर पाए
किस काम की है ऐसी हाला?
और अंतिम पंक्तियां हैं -
व्यक्त,अव्यक्त या निर्गुण हो
इसका मुझको अनुमान नहीं,
मेरे बिन खोजे ही मिल जाना
तुम बिन मेरी पहचान नहीं।।
यहां मैं चाह रहा था कि प्रेम लिखूँ पर नहीं लिख पाया। भटकाव इसे ही कहते हैं।
मुझे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से अनन्य प्रेम है। क्लिष्टता तो और अधिक प्रिय है मुझे। जब मैं अपने लिए लिखता हूं तो ऐसा ही लिखता हूं।
मुझे कई बार टोका भी गया है। हिंदी के एक अध्यापक ने मुझे कहा कि तुम इतने क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग मत किया करो तुम्हें पढ़ेगा कौन?
मैंने कहा कि गुरुदेव आप! और कौन?
साहित्यकार बनने का मेरा रह-रह के मन करता है। चाहता हूं कि अपने भार से अधिक पुस्तकें लिखूँ। कलम का साथ कभी न छूटे।मैं चाहता हूं मेरे भी उलझन में दुनिया सुलझे।
( कवि हूं! मेरी उलझन में दुनिया सुलझा करती है - हरिवंश राय बच्चन)।
पर सच कहूं तो मेरा प्रयत्न इस दिशा में नगण्य है। मुझे लिखना नहीं आता। व्याकरण की समझ नहीं है। साहित्य में मुझसे अधिक उच्छृंखल शायद ही कोई हो। लयबद्ध कविताओं में भी छंद दोष कर बैठता हूं। छंदबद्ध कभी-कभी लिखता हूं। दोहे-चौपाई तो साल भर में एक-दो बार।
साहित्य समर्पण मांगता है।साहित्य के साधक तपस्विता के लिए विख्यात होते हैं। न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं। न जाने कौन सी आंखें होती हैं उनके पास जो हम सब में नहीं होती। जिन्हें हम देख नहीं सकते,जिन संवेदनाओं को हम अनुभूत नहीं कर पाते वे उन पर ग्रंथ लिख बैठते हैं।
सत्य ही कहा गया है कि संवेदनाएं मानव को महामानव बनाती हैं।यह साहित्य के लिए अपरिहार्य अवयव है। साहित्यकार अपनी बौद्धिकता से लोगों को सम्मोहित करता है, उन्हें तरह-तरह के भ्रम जाल में फंसाता है। कभी प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर ले जाता है तो कभी अवसाद की।
भइया कहते हैं कि- "अवसाद वही लिख सकता है जो स्वयं परम सुखी हो। क्योंकि अवसाद से घिरा व्यक्ति कभी सृजन नहीं कर सकता। मन की अकुलाहट कभी उससे कुछ रचनात्मक नहीं करा सकती।"
यह कथन कितना सही है यह नहीं जानता किंतु मैंने जिन साहित्यकारों का अवसाद पढ़ा है वे व्यक्तिगत स्तर पर परम फक्कड़ी रहे। उन्हें अवसाद हो ही नहीं सकता था।
साहित्य धर्मिता यही है की पर पीड़ा की भी वैसे ही अनुभूति हो जैसे उक्त परिस्थितियां स्वयं पर पड़ी हों। संवेदना इसे ही कहते हैं और यही साहित्य की आत्मा है।
काश मुझे भी लिखना आए, संवेदना उपजे, साहित्य को समझने की समझ विकसित हो। अभी तो अपने पथ से भटका हुआ हूं, कोई राह मिले तो जीवन सार्थक हो।
अभी तो बस इसी कशमकश में हूं, क्या लिखूँ??

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

देश नहीं कहता तुमसे

देश नहीं कहता तुमसे तुम राष्ट्रवाद के प्रेत बनो
सम्प्रभुता के बागी बनकर उग्रवाद की भेंट चढ़ो,
वाद विवाद से हो सकता जो शासन का निपटारा
तो संसद का अधिपति होता लोकतंत्र का हत्यारा,
हथियारों की भाषा केवल सीमित है सीमाओं पर
लेकिन घर में हुई बगावत क्या गुजरेगी माँओं पर?
कितनों को तुम खत्म करोगे बन्दूकों हथगोलों से
देखो धरती सिसक रही है भारत के मंगोलों से,
नक्सलियों की हिंसा से तो अक्सर दिल्ली कांपी है
दुनिया से तो लड़ बैठे अब किससे लड़ना बाकी है,
गीता जिन्हें निरर्थक लगती माओ जिनके प्यारे हैं
रुसो,माओ,कार्ल मार्क्स के दर्शन नहीं हमारे हैं??
शांति, अहिंसा,प्रेम, समन्वय भारत की पहचान है
अपने दर्शन और संस्कृति पर हमको अभिमान है,
भारत तेरे टुकड़े होंगे जिनका राष्ट्रीय गीत है
उग्रवाद के अग्रदूत से जिनको अतिशय प्रीत है,
उनसे एक निवेदन है कि भारत से प्रस्थान करें
आस-पास स्थान बहुत हैं वहीं जा के संधान करें,
वहां करोड़ों मिल जाएंगे भारत से जलने वाले
यू एस ए और चीन के टुकड़ों पर पलने वाले,
उग्रवाद के प्रबल समर्थक अक्सर हमले करते हैं
सीमाओं पर जिनकी ख़ातिर लाखों सैनिक मरते हैं,
शिक्षा के मंदिर में भारत को दफनाया जाता है
लोकतंत्र में लोकतंत्र को आग लगाया जाता है।।
हिंसा वाले दर्शन का अब तो उपचार जरूरी है
उग्रवाद के मूलभाव का भी संहार जरूरी है।।
ऐसे दंगे नहीं रुके तो देश कैसे चल पाएगा ??
अंगारों पर चलने से तो लोकतंत्र जल जाएगा।।
फिर बौद्धिकता को लेकर के बहस उठेगी देश में
कैसे भारतीयता जी सकती है ऐसे परिवेश में??
हिंदू-मुस्लिम बंट जाएंगे अपने-अपने खेमें में,
कैसे फिर हम गर्व करेंगे अपने भारतीय होने में?
- अभिषेक शुक्ल