रविवार, 12 जुलाई 2015

आत्ममंथन



जब ज्ञान का दीपक बुझने लगे
जब तम की ऐसी आँधी हो,
जब विपद विपत् सा लगने लगे
मन ही मन का अपराधी हो,
तब बंद कपाटों को खोलो
और रश्मि धरा पर आने दो,
जो तिमिर उठे अंतर्मन में
उनका अस्तित्व मिटाने दो।

निशा घेर ले जिस मन को
उसे शान्ति कहाँ मिल पाती है?
दिशा हीन सा मन भटके
पर मुक्ति नहीं मिल पाती है;
सुख दुःख की रलमल सी झाँकी
नयनो के आगे आती है,
मृगतृष्णा में घोर वितृष्णा
मन को सहज लुभाती है।

स्वायत्य सखे! तुम अब जागो
मन से तम की चादर खींचो
जीवन प्रतीत हो मरुस्थल
तो मन को सागर से सींचो,
सोचो! तुमसे अनभिज्ञ है क्या
ये धरा, गगन या दूर क्षितिज
मानव जब सद्संकल्प करे
यह जग कैसे न रहे विजित ??

(हरिद्वार गया था कुछ दिन पहले_ऐसे दर्शन तो यहाँ राह चलने वाले दे देते हैं)

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

गुज़ारिश

बहुत कुछ कहना चाहूँ पर
कहा कुछ भी नहीं जाए,
रब से ये गुज़ारिश है हलक के
पार कुछ आए
यूँ गुमसुम सा रहूँ कब तक
बता दे तू मेरे मौला!
कहीं तेरे बेरुख़ी से दिल
बेचारा हार न जाए।।

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

विद्वता और अहंकार

कुछ व्यक्ति जन्मजात विद्वान होते हैं।विद्वान तो छोटा शब्द है कुछ व्यक्ति विद्वता की पराकाष्ठा होते हैं। कभी स्वघोषित तो कभी एक वर्ग विशेष द्वारा मान्यता प्राप्त। इन्हें अपनी साधना पर इतना अहंकार होता है कि जैसे ये विशेष हों और बाकी अवशेष हों।
इन विद्वानों के कुछ सिद्धान्त होते हैं और कुछ आदर्श सामान्यतः अपने ही वंश के किसी महापुरुष की बातों को सिद्धान्त मानते हैं और उन्हीं के सिद्धान्तों पर चलने की बात
करते हैं, किन्तु यथार्थ इससे बहुत भिन्न होता है। वास्तव में सिद्धान्त नितांत गोपनीय विषय है जिसे आचरण में उतरा जाता है न कि उनका ढिंढोरा पीटा जाता है। व्यक्ति के आचरण से उसके सिद्धान्त परिलक्षित होते हैं न कि उनका स्वांग भरने से।
हर व्यक्ति में वंश विषयक अहंकार होता है, अपने पूर्वजों के सद्कृत्यों पर गर्व होता है, अपने पिता पर अभिमान होता है। ऐसी भावनाएं बुरी नहीं हैं किन्तु जिन आदर्शों पर चलकर
पूर्वज महान कहलाये उन्हें अनुचित विधि से व्याख्यायित करना अपराध है।
जितने भी प्रसिद्ध और महान लोग हुए हैं उनके शिष्य उतने महान और प्रसिद्ध नहीं हो सके क्योंकि उन्होंने अपने गुरुदेव के उपदेश तो सुने पर उन आचरण करने की जगह उन वक्तव्यों के व्याख्याता बन गए। व्याख्याता बनते ही सृजनता समाप्त, उन्नति समाप्त। जो विषय आचरण के हों उन्हें व्याख्यायित और प्रचारित करने लगे तो स्वयं बृहस्पति भी यशहीन हो जाएँ फिर सामान्य मानव की बात ही क्या है।
जिसने कहा कि- "मेरा ये सिद्धान्त है" वास्तव में उसका कोई सिद्धान्त नहीं होता है।
सिद्धान्त वादियों की एक विशेषता होती है, ये परिपक्व और पूर्ण केवल स्वयं को मानते हैं। कोई अन्य इनकी भांति कार्य नहीं कर सकता। इनके निर्णय विधि सम्मत होते हैं और
अन्य गलतियों के पोटली होते हैं।ये जो करते हैं वही उचित होता है और दूसरे केवल गलत होते हैं।हों भी क्यों न, विद्वता और बुद्धिमत्ता के परिचायक तो केवल यही हैं।
इनके कुछ चिर-परिचित कथन होते हैं-
मेरा ये सिद्धान्त है। मुझसे ज्यादा जानते
हो?
तुम क्या जानो? मुझसे अधिक उनके बारे में
जानोगे?
तुम्हें पता क्या है? मुझसे ज्यादा पढ़े हो? मुझसे
ज्यादा अनुभव है?
इत्यादि-इत्यादि।
अजीब लगता है न? किस बात का दम्भ, किस
हेतु अहँकार? ज्ञान की कोई सीमा होती है
क्या?
कभी-कभी इनकी बातें सुनकर श्रोताओं को लगता है कि कानों में इन्ही के सामने रूई ठूंस ले पर क्या करें औपचारिकता और शिष्टाचार भी कोई चीज़ है। इन व्यक्तियों का एक कथन होता है-"मुझे झूठ से सख़्त नफरत है।" कुछ भी कर लो पर मुझसे झूठ मत बोलो झूठे लोगों से मुझे नफरत है। वास्तव में एक झूठ तो ये दुनिया भी है। पढ़ा
नहीं अपने क्या 'ब्रम्ह सत्यम् जगत् मिथ्या?'
इस हिसाब से तो समस्त संसार घृणा के योग्य है क्योंकि जिसे हम संसार कहते हैं वास्तव में तो वो है ही नहीं।
सब सपना है, एक पल में सब हमारे आँखों के
सामने होते हैं अगले ही पल सब ओझल...ये संसार भ्रम नहीं, झूठ नहीं तो और क्या है? क्या नफरत है आपको इस झूठे ज़ीवन से? सत्य बहुत सुन्दर होता है किन्तु कुछ सत्य हमें
जानना भी नहीं चाहिए। ऐसे सत्य तो अकारण ही सबसे वितृष्णा पैदा करते हैं। जीवन झूठ और सच का संगम है, यहाँ विरले ही हरिश्चंद्र मिलते हैं और जो मिल जाते हैं वो
स्वघोषित हरिश्चंद्र होते हैं यथार्थ में उन्हें भी झूठ से प्रेम होता है तभी तो वे इतने महान पद(हरिश्चंद्र) पर होते हैं।
एक और ख़ास बात होती है इनमें,गुस्सा इनकी नाक पर होता है। कब किस बात बार भड़क जाएँ परमात्मा भी नहीं जानते। इनका मिज़ाज़ बड़ा गजब का होता है। खुश हों तो
सिर पे बिठा लें और नाराज़ हों पताल में भी जगह न दें। तात्पर्य यह कि इनका स्वाभाव बड़ा अव्यवस्थित होता है। कोई भी इनका कोपभाजन बन सकता है। ऋषि दुर्वासा के ये
अनुयायी हैं इन्हें खुश रखना भी कठिन काम है। इनसे जितनी दूरी रहे उतना ही अच्छा है क्योंकि यथार्थ में इनके मापदण्डों पर ये स्वयं भी खरे नहीं उतरते। ये किसी को भी अपमानित कर सकते हैं कहीं भी, कभी भी। आपके किसी अपने ने कोई गलती की हो भले ही उसकी गलती में
किञ्चिद मात्र आपका योगदान न हो, आपका कोई मतलब भी उससे न हो फिर भी ये आपको उसकी गलती के लिए सुनाएंगे। आपके दुखती रग पर हथौड़ा जरूर चलाएंगे,भले ही उस आग में स्वयं भी जलें पर त्वरित रूप से तो आप मानसिक आघात के लिए तैयार तो नहीं होते। ऐसे व्यक्ति बुरे नहीं होते इनके अंदर भी बहुत अच्छा इंसान होता है।बुरी होती है इनकी मनोवृत्ति जो इनके सारे किये कराये पर पानी फेर देती है। स्वघोषित लोकपाल वाली भ्रामक स्थिति इन्हें औरों की नज़र मेंबुरा बना देती है।
हम प्रायः देखते हैं कि हमें सुखद अनुभव कम याद
रहते हैं और बुरे अनुभव ज्यादा। यह मानवीय प्रवित्ति है कि किसी का स्नेह,प्रेम भूल जाता है और क्रोध आजीवन याद रहता है क्योंकि अकारण क्रोध किसी को सहजता से
स्वीकार्य नहीं होता। सारी सुकीर्ति,सुयश मिट्टी में मिल जाती
है पल भर के अमर्यादित आचरण से।विद्वता श्रेष्ठतम् वरदान है प्रकृति का। सफलता आपके तपस्या का परिणाम है किन्तु ये दोनों निरर्थक हैं यदि आप व्यवहारिक नहीं हैं। थोड़ी समझ और थोड़ी मेहनत करके कोई भी सफल हो सकता है। कुछ किताबें कुछ सत्संग करके तथाकथित ज्ञानी भी बन सकता है जिसे जनता विद्वता का नाम दे देती है
किन्तु व्यवहारिकता की कोई पाठशाला नहीं होती। इसे सीखने के लिए विनम्र होना पड़ता है। शून्य से सीखना पड़ता है। आपका गुरु आपके घर से कूड़ा उठाने वाले से लेकर सड़क पर भीख़ मांगने वाला छोटा बच्चा भी हो सकता है।
इसे सीखा नहीं आत्मसात किया जाता है।स्मरण रहे लोग आपसे आपके सफल होने की वजह से नहीं जुड़ते, सब सफल होते हैं अपनी-अपनी भूमिका में। आपकी व्यवहारिकता और
विनम्रता के कारण लोग आपसे जुड़ते हैं। कहीं से भी आपके वास्तविक स्वरुप का उन्हें ज्ञान हो जाये तो आपसे दूर होते उन्हें समय नहीं लगेगा। मानव होना अपने आप में एक वरदान है। विधाता के इस वरदान का अपमान न करें।
मानवता क्रोध,अहँकार,वितृष्णा,घृणा जैसी
भावनाओं का नाम नहीं केवल प्रेम, विनम्रता
और व्यवहारिकता का नाम है। इनसे अलग व्यक्ति सब कुछ हो सकता है परइंसान नहीं। कुत्सित मनोवृत्ति आपको
 जानवर बना सकती हैं इंसान नहीं।निर्णय आपको करना है कि आपको मानवता से प्रेम है या पैशाचिकता से? आपके सामने दो विकल्प हैं यह तो आपकी मनोवृत्ति ही जाने कौन
सा मार्ग आपको अभीष्ठ है।नीति कहती है कि निम्न मनोवृत्ति व्यक्ति के उत्थान में अवरोध उत्पन्न करती है.....आपको
पतन से स्नेह तो नहीं?

बुधवार, 10 जून 2015

शून्य होंगे जब सारे भाव एक होंगे दो धुर विपरीत





तुम्हारे मधुर गीत के बीच
लयों का आरोहण-अवरोह,
और तुमसे एकल संवाद
आह कैसे ना उपजे मोह ?

अधर से निकले प्यारे गीत 
ह्रदय को मेरे लेते मोह,
चाहता मन समीप्य का भाव 
तुम्हें इसकी क्या कोई टोह ?

वाद्य यंत्रो पर झूमे खूब 
यामिनी तेरे पावन पांव,
नयनों में अचरज रहा अलग 
कामिनी चल बैठी क्या दांव?

गिर रहे मेरे सारे अस्त्र 
अंग सुनते न मन की बात, 
अराजक हुआ कलम का वीर 
कहो! कब तक आएगी रात?

होगा सायुज्य वहीं तुमसे 
शून्य होंगे जब सारे भाव,
एक होंगे दो धुर विपरीत 
प्रेम बरसायेगा अनुभाव।

होगी जयकार धरा पर तब 
समय भी गायेगा गुणगान,
दिशाएं हो जाएँगी धन्य 
गढ़ेगी सृष्टि नए प्रतिमान।

- अभिषेक शुक्ल

(कामायनी पढ़ने के बाद ही लिखा था....प्रसाद इफ़ेक्ट भी कह सकते हैं.)

(तस्वीर- pexels.com)

सोमवार, 1 जून 2015

मंहगाई के अच्छे दिन


जैसे-जैसे आम आदमी की कमाई कम होती जा रही है मंहगाई उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। सरकार की नीतियों का सीधा प्रभाव तो समाज के निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग पर पड़ता है, तकलीफें तो इन्हें ही झेलनी होती हैं। एक तरफ कम आमदनी दूसरी तरफ मँहगे होते दैनिक दिनचर्या में शामिल सामान,एक आम आदमी किस तरह से घर चलाए? हर कदम पे टैक्स, हर उत्पाद पर मंहगाई से आमना- सामना तो आम आदमी का होता है,बड़े लोगों के जेब पे तो मंहगाई का कोई असर पड़ता ही नहीं।
हर आपदा सबसे पहले आम आदमी को चपेट में लेती है। आर्थिक सुधार  के नाम पर जिस तरह मोदी सरकार ने सर्विस टैक्स बढ़ाया है उसका सीधा असर तो आम जनता पर ही होना है, यही आम जनता जो सरकार बनाती है और सरकार इन्ही के लिए कब्रें खोदती है। आम आदमी जाए कहाँ? दैनिक उपयोग की वस्तुएं जब मंहगी होती है तो एक सामान्य व्यक्ति का किचन हिल जाता है। चायपत्ती से लेकर सरसों के तेल तक की मंहगाई और फिर एल.पी.जी का चक्कर कमाने वाले को दिन में तारे दिखने लगते हैं जब घर में समान की एक लम्बी लिस्ट बनती है। खाने-पीने के सामान में कोई कटौती भी करे तो भूखे मरे।
आम आदमी की ज़िन्दगी में बस एक किचन नहीं खर्चे और भी हैं। एक मध्यम वर्गीय परिवार में अब ईंधन से चलने वाले संसाधन आम हो गए हैं, जीवन का अपरिहार्य अंग बन गए हैं पर आज-कल की मंहगाई को देखकर लगता है कि ये अंग शीघ्र ही शिथिल होने वाले हैं। मोदी सरकार की नींव ही मंहगाई और भ्रष्टाचार विरोधी थी पर जाने क्यों न भ्रष्टाचार कम हुआ न मँहगाई। कांग्रेस के पतन में भी मँहगाई और भ्रष्टाचार दोनों का महत्वपूर्ण योगदान था। न जाने क्यों मोदी सरकार दोनों मुद्दों को गंभीरता से नहीं ले रही है?
पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दाम हर बार आम आदमी की कमर तोड़ते हैं, पर सरकार इन्हें मंहगा करती जा रही है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब भी कम ही हैं। कुछ प्रश्न जनता को कचोटते हैं। मोदी सरकार से जनता ने उम्मीदें कुछ ज्यादा पाल ली थीं तभी तो आज जनता व्यथित है। वादे आसमानों में किये जाते हैं और उन पर अमल धरती पर लेकिन सरकार के पावँ कहीं और ही जमे हुए हैं।
अच्छे दिनों की उम्मीद में मोदी सरकार बनी पर अच्छे दिन जाने कहाँ गुम हो गए हैं।
देश में एक बड़ी आबादी के सिर पर छत नहीं है। करोडों लोग बेघर हैं फुटपाथ पर सोते हैं। उनकी कोई पहचान नहीं है। कोई नहीं जनता उन्हें, कोई तीसरी दुनिया है उनकी। आज़ादी के बाद से आज तक सब कुछ बदल गया पर उनके हालात नहीं बदले। ये तब भी सड़क पर सोते थे और आज भी सड़क पर ही सोते हैं। जिस तरह की गरीबों को लेकर सरकार की नीतियाँ हैं कुछ बदलने वाला भी नहीं। क्या इनका बेघर होना ही अपराध है? क्या फूटपाथ पे मारना ही इनका भविष्य है?
भले ही इनके घरों में खाने के लाले पड़े हों पर मँहगाई की मार इन्हें भी झेलनी है। सबसे ज्यादा दलित-शोषित होने के बाद भी,खुले आसमान के नीचे सोने के बाद भी इन्हें सरकार कोई सब्सिडी नहीं देती,क्योंकि सरकार की नज़रों में ये तो हैं ही नहीं। जिनकी ज़िन्दगी सड़क से शुरू होती है उन्हें ख़त्म भी वहीँ होना होता है।
सरकार हर बार अमीरों की होती है। न मध्यम वर्ग, न निम्न वर्ग और न ही फुटपाथ वाले सरकार के निशाने पर होते हैं। वास्तव में सरकारें उद्दोगपतियों की होती हैं चाहे वो केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार।
कभी-कभी मन बहुत दुखी हो जाता है,जब सड़क पर सोए हुए लोग मिलते हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँच गए पर सर पे छत नहीं है। ये सरकारों की खोखली नीतियों का परिणाम है वर्ना सबके सिर पे छत होता। लोग सड़कों पर सोने के लिए बाध्य न होते।
बढ़ती मँहगाई को देखकर लग रहा है कि जिनके पास छत है भी उन्हें भी घर बेचना पड़ेगा क्योंकि अस्पताल से लेकर स्कूल तक की फीस बहुत मंहगी हो गयी है। दवाईयों के दाम आसमान पर,शिक्षा का दाम आसमान पर, गैस, पेट्रोल, डीज़ल सबके दाम आसमान पर,घरेलू सामानों के दाम आसमान पर, मेरे देश में सस्ता क्या है आम आदमी की जान? हाँ! लग तो यही रहा है।
किसान मर रहे हैं, ख़ुदकुशी कर रहे हैं, आम जनता त्रस्त है, गरीब दाने-दाने के लिए तरस रहा है,भ्रष्टाचार कदम-कदम पर काट खाने दौड़ रहा है, रेलवे का किराया आम आदमी की जेब खाली कर रहा है और सरकार सोच रही है अच्छे दिन आ गए।
अजीब हाल है देश का भी, यहाँ बातें बड़ी-बड़ी की जाती हैं और काम किये ही नहीं जाते। हर बार नए चेहरे मिलते हैं पर वे भी वर्षों पुरानी वंश परम्परा निभाते हैं।
भारतीय जनता वर्षों से प्रतीक्षारत है..अच्छे दिन कब आने वाले हैं?

मंगलवार, 26 मई 2015

उफ़्फ़! ये रेलवे।

कभी-कभी थोड़ी सी लापरवाही बड़े परेशानी की वज़ह बनती है। गलती मेरी थी या सामने वाले की समझ में नहीं आ रहा है। ये तो मानवीय प्रकृति है कि खुद की गलती गले से नीचे नहीं उतरती, कोई खुद को गुनहगार नहीं मानता...चलो मैं मान लेता हूँ की गलती मेरी थी।
हुआ यूँ कि मेरठ आने के लिए मुझे दो टिकट लेने थे। मौसा, मौसी और दादी की कन्फर्म टिकट था 25 को सत्याग्रह एक्सप्रेस से, किसी कारणवश मौसा नहीं आ सके तो उनकी जगह मुझे चलना था। कुछ दिन बाद भइया ने बताया की मामी भी चलेंगी साथ में तो मैंने उसके अगले दिन ही दो  टिकट ले लिया। वेटिंग 82-83 रहा..सीट मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि बिहार से होकर आने वाली किसी भी ट्रेन में एक हफ्ते पहले रिजर्वेशन मिलना असंभव होता है, पर सुकून की बात ये थी कि हमारे पास तीन सीट थी....बड़े आराम से 6 लोग सो कर जाते..पर हम पाँच लोग ही थे।
मैं टिकट लेने शोहरतगढ़ गया तो वहां लंबी लाइन लगी थी। आगे बढ़ा तो पता लगा की महोदय खाना खाने गए हैं। आधे घंटे उबलती गर्मी में स्टेशन पर खड़ा रहना वो भी बुखार की हालत में किसी सजा से कम नहीं होता मैं किसी धैर्यवान व्यक्ति की तरह अपने पारी की प्रतीक्षा कर रहा था  पर महाशय थे कि हर फॉर्म को बीस-बीस मिनट दे रहे थे...उनकी तल्लीनता देख कर लग रहा था की अलग-अलग राइटिंग के प्रकृति पर वो शोध कर रहे थे। खैर  बुजुर्ग हैं दिखाई कम देता है उन्हें चश्मा बाहर-भीतर कर के तो टिकट दे रहे थे। कुछ लोग पीछे से उन्हें गाली भी दे रहे थे तो कुछ कह रहे थे की ये टिकट काट रहा है या सो रहा है? मैं रिजर्वेशन फॉर्म भरकर लाइन में लग गया।पीछे से अवाज़ आई इसका प्रमोशन इसकी सुस्ती की वजह से नहीं हो रहा है...लोग रोज़ शिकायत करते हैं पर इसे अपने गति से बहुत स्नेह है। मैं भी मुफ़्त के घटिया ज़ोक झेल रहा था। आधे घंटे बाद मेरी बारी आयी। पेपर पर मैंने पूरी डिटेल भर दी। बीस मिनट के घनघोर तहक़ीक़ात के बाद उसने टिकट दिया..चार बार नाम और उम्र पूछा..चार बार बताया भी। फिर टिकट का एक फ़ोटो लेकर वीरू भइया को भेजा। टिकट देखा नहीं सीधे पर्स में डाल कर बाइक स्टार्ट की और घर आ गया..घर आते ही पर्स बैग में रखा और सो गया। मैं घर जाऊं और बिना बुखार-खाँसी के मेरठ आ जाऊं ऐसा कम होता है। मेरे साथ मेरा छोटा भाई आदर्श भी रेलवे स्टेशन आया था...घर पहुँच के उसे भी बुखार हुआ और अगले दिन चेचक निकल गया। दाने बढ़ते गए...होम्योपैथिक इलाज भी हुआ। हमारे यहाँ ऐसी मान्यता है कि चेचक में अंग्रेजी दवा नहीं कराते माता जी का प्रकोप बढ़ जाता है। मैं भी डर रहा था..पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।
घर छोड़ना मुश्किल होता है हमेशा से मेरे लिए..इस बार आना और ख़राब लगा क्योंकि घर पे मेरे छोटे भाई-बहन आये थे। बहुत मुश्किल से तो हम मिलते हैं....बिना रोये 25 की सुबह घर से निकला,भइया ने स्टेशन छोड़ा...ट्रेन खचाखच भरी हुई थी..खड़े होकर गोरखपुर तक पहुँचा। मामी के पास गया..खाना खाया और सो गया..करीब दो बजे दोपहर में स्टेशन के लिए निकला..जैसे ही रुस्तमपुर ढ़ाले पर पहुँचा वीरू भइया ने फोन किया कि टिकट देखना 29 का है क्या? मैंने टिकट बिलकुल नहीं देखा था देखा तो पता चला कि टिकट सच में 29 का है। पहली बार किसी के लिए दिल से गाली निकली।
एक बात बताइये कि जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं इलाज के लिए तो जिन दवाइयों को लेने के लिए आपको कहा जाता है क्या आप उनके रासायनिक सूत्रों को पढ़ते हैं?
जब एक वकील ड्राफ्ट तैयार करता है तो कई बार सादे पेपर पर आपके हस्ताक्षर लेता है.....क्या कभी अपने अपने केस को ड्राफ्टिंग के दौरान पढ़ा है?
मैंने रिजर्वेशन फॉर्म को साफ़-साफ़ भरा था..तारीख़ लिखी थी पर महोदय 25 को 29 समझ लेंगे ये मैंने नहीं सोचा था। वैसे मैं कन्फर्म टिकट को चार बार चेक करता हूँ पर पता नहीं क्यों इस बार एक बार भी टिकट नहीं देखा।
इसके बाद की बात मत पूछिये...टाइम और बुखार साथ-साथ बढ़ रहे थे, दो जनरल टिकट लेकर स्टेशन की ओर चला...मामी और मौसी की साथ-साथ एंट्री हुई...मौसी तो भारी-भरकम सामान लेकर आई थी।सब खाने पीने का सामान था..हम सब के लिए ही, आचार-खटाई...
अगर फाइन कटता तो लगभग आठ सौ का चूना लगता...सोच लिया था की फाइन कटाने हैं। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं...ट्रेन में पहुँचने के बाद आराम मिला...वैसे कोई परेशानी नहीं हुई पर रास्ते भर टिकट बाबू के लिए दिल से आरती निकलती रही...मैं मेरठ पहुँच गया और मामी दिल्ली...पर अभी भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा हूँ की लापरवाही मेरी है या टिकट बाबू की...अब तो मुझे भी छाँछ फूँक-फूँक कर पीना है दूध का जला जो हूँ। लापरवाह.....किसे कहूँ खुद को या टिकट बाबू को....?

मंगलवार, 12 मई 2015

मेरी चाहत।


अजब सी चाहतें मेरी
अजब सा हाल है मेरा
मोहब्बत के सफ़र में
दिल-बेहाल है मेरा,

न  तुमको   वक़्त है कि
मुझे तुम याद कर पाओ,
मेरे ख्वाबों में बसकर तुम
कहीं मुझमे ही खो जाओ,
पलक झपके तो मेरा अक़्स
तुम्हारी आँख में उभरे
तुम्हारी बिखरी सी ज़ुल्फ़ें
हमारे हाथ से सवरें,
मैं सपने देखूं तुम उनको
ज़रा साकार कर देना,
उलझते रिश्तों को फिर से
नया आकार दे देना,
मोहब्बत की है मुझसे तो
मेरा इतना तो हक़ है ही,
उड़ें जब होश मेरे तो
मेरा उपचार कर देना,
तुम्हारे प्यार में मेरा
ठिकाना बन गया शायद,
मेरे हर ठिकाने पर
तुम अधिकार कर लेना।
(This sketch is made by my dear friend kanika jauhri. I am very thankful to her for this....actually penting is much more adorable than my poem but i tried to write something on the theme of the picture. May be my poem is childish but sketch is not....Thank you kanu...your sketch is awesome, and sorry i failed to write good poem on the theme of the picture.)

मंगलवार, 5 मई 2015

पत्रकारिता पर सवाल

Electronic media के चटपटी ख़बरों की script लिखने वाले पत्रकारों से मुझे मिलना है,अगर आपका कोई जुगाड़ हो तो मुझे जरूर बताइएगा ।
मुझे उनसे पूछना है की आप सब इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? चटपटी ख़बरों और टी.आर.पी के चक्कर में किसी के सामाजिक जीवन का सत्यानाश कैसे कर लेते हैं.? क्या लिखते हैं आप?
बलात्कार की, यौन शोषण की घटनाओं का इतना जीवंत वर्णन, इतना मार्मिक रेखाचित्रण तो महादेवी वर्मा न कर पातीं जितना आप कर ले जाते हैं। भाई! दिल से बधाई के पात्र हैं आप।
पता है आपको, आपका धंधा लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। आप भी बधें हैं कानून से लेकिन इतना कानून तो अपराधी भी नहीं तोड़ते जितना की आप सब तोड़ते हैं। बड़ा नेक काम करते हैं आप।
भारतीय दंड संहिता की एक धारा है जिसका अक्सर आप लोग उल्लंघन करते हैं पढ़ लीजिये क्योंकि जानबूझ कर कानून तोड़ने में तो शिवत्व जैसा आनन्द है।
धारा है-
Section 228A in The Indian Penal Code-
Disclosure of identity of the victim
of certain offences etc.—
(1) Whoever prints or publishes the name
or any matter which may make known the
identity of any person against whom an
offence under section 376, section 376A,
section 376B, section 376C or section 376D
is alleged or found to have been committed
(hereafter in this section referred to as the
victim) shall be punished with
imprisonment of either description for a
term which may extend to two years and
shall also be liable to fine.
पर दुर्भाग्य से मिडिया पर कोई लगाम नहीं कसता क्योंकि ये अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी कह सकते हैं, कितने भी कानूनों का उल्लंघन कर सकते हैं क्योंकि पत्रकार जो ठहरे।
खैर लगाम कसे भी तो कौन भ्रष्ट नेता? उन्हें खुद लगाम की जरुरत है।
आज फेसबुक पे एक स्टेटस पढ़ा। बड़े वरिष्ठ साहित्यकार हैं, कुमार विश्वास की प्रसिद्धि के लिए उनके अवैध सम्बन्धों को वजह बता रहे थे, कल से कुछ ड्रामा चल रहा है न news channels पर,कुमार विश्वास को लेकर?
'होठों पर गंगा हो हाथों में तिरंगा हो', 'है नमन उनको'जैसी प्रसिद्द कवितायेँ जब उन्होंने लिखा तो वो देशभक्त थे, मेहमान की तरह होली,दीपावली,दशहरा पर बुलाये जाते थे पर आज-कल तो कोई और सीन चल रहा है। कतिपय ईर्ष्यालु तथाकथित साहित्यकारों और बिकाऊ पत्रकारों ने उन्हें व्यभिचारी भी बना दिया।
शर्म आती है ऐसे साहित्य के खिलाडियों पर जो बेतुके बयान देते रहते हैं। आप साहित्य को गन्दा ही करेंगे और आपके मित्र पत्रकारिता को। शर्म आती है आपके योग्यता पर। इस लायक लिखो कि लोग आपको पसंद करें, किसी के लोकप्रिय होने पर आपत्ति क्यों?
अरे हाँ! मैं तो पत्रकारिता की बात कर रहा था,लीक से भटक गया।
भाई! आप बेशक अपने channels पर adult entertainment चलायें पर उन्हें ज़रा आम खबरों से अलग रखा करें, हम विद्यार्थी हैं कभी-कभी समाचार देखना आवश्यक हो जाता है लेकिन हमें समाचार देखना होता है बलात्कार नहीं।
ऐसे मनोरंजक कार्यक्रम रात में चलाया करें 11बजे के बाद। जरूर पसंद किये जाएंगे, आपकी लोकप्रियता तो पक्का आपके घटिया सोच पर टिकी है...सोचते रहें।
बचपन से ही हमें अश्लील साहित्य से दूर रहने के निर्देश मिलते रहे हैं, बड़े हुए तो कुछ अच्छा पढ़ने की आदत हो गयी, पर मीडिया ने मस्त अश्लीलता सिखायी।
सोच रहा हूँ इस बार मनोरम कहानी, सरस सलिल, मदहोश कहानियाँ इत्यादि को subscribe कर लूँ ये ज्ञान सफलता दिलाने में सहयोग करेंगे।
ख़ैर, अभी पैसे नहीं हैं अगली बार..
जब भी किसी कवी/साहित्यकार पर चारित्रिक आरोप लगते हैं तो मन कचोटता है।पत्रकार तो बुद्धिजीवी वर्ग में गिने जाते हैं इनसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं होती है पर अपेक्षाओं का अंत यही होता है।
कुमार विश्वास यदि केवल कवि होते तो आहत हो वानप्रस्थ रखते किंतु अब वो नेता भी हैं..थोड़े ढीट हो गए हैं..तो ये सब आम बात है उनके लिए।
यह पवित्र व्यवसाय जब से धंधा बना तबसे लोकतंत्र भी पानी मांगने लगा।
खैर,तनिक स्तरीय लिखिए मित्र!
कब तक व्यभिचार को मिर्च-मसाला लगा कर पेश करेंगे? कब तक अभिव्यक्ति के नाम पर बदतमीज़ी परोसी जायेगी?
हद है।
आप लोगों की वजह से ही अच्छे पत्रकार हाशिये पर हैं या संघर्ष कर रहे हैं। न उन्हें कोई जानता है न जान पायेगा क्योंकि भारतीय मानसिकता ही कुत्सित हो चुकी है..सच के नाम पर कितनी भी बेहूदगी करो जायज है, पर स्तरीय साहित्य या पत्रकारिता गले के नीचे नहीं उतरती।
मुंशी प्रेमचन्द्र जी ने ठीक ही कहा है- "धूर्त व्यक्ति का अपनी भावनाओं पर जो नियंत्रण होता है वह किसी सिद्ध योगी के लिए भी कठिन है।"
धूर्त नहीं जानता किसे कहते हैं पर शायद आप लोगों से उनकी शक्लें मिलती होंगी।

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

बस यूँ ही :)

किसी की आँख में काजल
किसी की आँख है काजल
किसी के जुल्फ में  बादल
किसी की ज़ुल्फ़ है बादल
किसी के रुह में मैं हूँ
किसी का रुह हूँ अब मैं
दीवाने दिल की साजिश ने
किया मुझको बहुत पागल।।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

इंतज़ार!(लौट आओ न!)

उन अधूरी बातों का क्या
जो निकलते ही नहीं
हलक से,
कहीं तो-कभी तो
पूरी हों
ये हसरतें
न जाने क्यों
उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं;
तुम थे
वक्त ठहरा था
हवा, फ़िज़ा, बादल
सब साथ थे
तुम गए तो कुछ न रहा
साँस चलती है
किसी तरह
तुम्हारे बिन,
अगर ये ज़िन्दगी है
तो
समझ लो ज़िंदा हूँ;
इन अधूरी धड़कनों का क्या
जिस दिन भी
धड़कना बंद कर दें
फिर कौन तुम
 कौन हम?
सब कुछ स्थिर
शून्य
अड़िग,
न धड़कने रूकती है
न साँस
शायद इन्हें भी
इंतज़ार है
तुम्हारे आने का
कितने पागल हैं न हम
जो
इंतज़ार करते हैं।

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

अवसरवादी राजनीति

भारतीय राजनीति अवसरवादिता कीराजनीती है.यहाँ मुद्दों को भुनाने की कवायद चलती है.राजनीतिक पार्टियां जनता की नस पकड़ने में सिद्धहस्त हैं.विरोधियों के हर गतिविधि पर इनकी बड़ी पैनी नज़र होती है.इन दिनों सबसे ज्वलंत मुद्दा किसानो की दुर्दशा है.आम जनता की कोई पार्टी हितैषी नहीं है.चाहे वो भाजपा हो या कांग्रेस हो या अन्य प्रादेशिक पार्टियां हों. सबका बस एक मकसद होता है कि कैसे जनता को उल्लू बनाया जाए,बेवक़ूफ़ जनता हर बार उल्लू ही बनती है.राजनीतिक पार्टियों को पता है कि जनता को भावनाओं में कैसे बहाया जाता है उनसे कैसे सहानुभूति ली और दी जाती है?

जिस जनता के भरोसे सत्ता हासिल होती है सत्ता में आते ही उसी जनता को भूलना हर पार्टी अपना राजधर्म
मानती है. राहुल गांधी जी का महीनो के गुमनाम प्रवास के बाद अचानक से किसानों के हमदर्द बनकर रामलीला मैदान में जनसभा करना कितनी सोची समझी रणनीति लगती है? उनके प्रवास से पहले ही केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून पर अपना रुख साफ़ कर दिया था तब कांग्रेस पार्टी चुप क्यों थी? कई महीनो के आत्ममंथन के बाद राहुल गांधी को किसानों की पीड़ा दिखी? तब मौन क्यों थे? धरना क्यों नहीं दिए? क्या इतने महीने गायब रहने के बाद किसी एक्टिंग स्कूल से एक्टिंग सीख कर भारतीय जनता के सामने अपने अभिनय की कला दिखाने आये हैं? महीनो से सोयी पड़ी कांग्रेस पार्टी मुद्दे भुनाने की ताक में लगी है, राम लीला मैदान में उमड़ी अथाह भीड़ इस बात इस साक्षी है की जनता मोदी सरकार से चोट खायी हुई है और अब अपना उद्धारक कांग्रेस में देखने की हिम्मत कर रही है. दिल्ली में रामलीला मैदान का दृश्य बड़ा हास्यास्पद रहा.जिन्होंने सपने में भी खेत नहीं देखा है उनके कन्धों पर हल देखकर जनता असमंजस में पड़ गयी कहीं कांग्रेस के युवराज राजनीति से सन्यास लेकर किसानी तो नहीं करने जा रहे? खैर कुछ देर बाद उन्होंने खुद ही हल को बैकग्राउंड में भेज दिया और किसानों को संकेत भी दिया कि सत्ता में लौटते ही हमकिसानों को बिलकुल भारतीय जनता पार्टी की तरह बैकग्राउंड में भेजेंगे.क्या शानदार वापसी है कांग्रेस पार्टी की.मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, सोनिया गांधी सारे शिखर के नेता जमीन पर जनता केसाथ, क्या अद्भुत सयोंग था. कांग्रेस पार्टी
का ये सियासी ड्रामा हफ़्तों चैनलों की टी.आर.पी बढ़ाएगा.अख़बारों में सुर्खीयों में
राहुल गांधी कुछ दिन तक रहेंगे. जनता की नब्ज़ पकड़ना इसे कहते हैं.सत्ताधारी पार्टी कितनी भी विनम्रता से अपनी बात भले ही क्यों न कहे पर विपक्ष की कड़वी बात भी जनता को सत्ताधारी पार्टी की बातों के
अपेक्षा मीठी लगती है.मोदी सरकार से जनता के रूठने की वजह सिर्फ यही नहीं है की वादे पूरे नहीं किये गए तथ्य यह है कि किसानो की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए.किसानों की आत्महत्याएं नहीं रुकीं, बैंकों ने उन्हें कोई राहत नहीं दी फिर काहे की सरकार? जिन उम्मीदों के लिए जनता ने मोदी को चुना उन्ही उम्मीदों का गला घुटते जनता देख रही है.विपक्ष में बैठी हर पार्टी स्वयं को किसानों का सच्चा हमदर्द कहती है, जब तक विपक्ष में बैठती है तबतक जनता की सेवा राजधर्म होता है किन्तु सत्ता हथियाते ही किसान विपक्ष के विषय हो जाते हैं. भारतीय जनता ऊब कर वोटर करती है. एक से मार खाती है तो दुसरे को गले लगाती है. चुनाव उम्मीदों का गला घोटने के लिए कराये जाते हैं.इस राजनीति ने जनता को हर बार छला है.क्या छला जाना ही भारतीय जनता की नियति है? मोदी सरकार की आम जनता के प्रति भावनाएं दिख रही हैं, मेक इन इंडिया का नारा गले के निचे नहीं उतर रहा है.ये निःसंदेह उद्योगपतियों की सरकार है. राहुल गांधी का अचानक से ह्रदय परिवर्तन हो किसान प्रेमी होना कुछ जम नहीं रहा है. एक बड़ा तबका उन्हें आज भी युवराज सम्बोधित करता है तो फिर भला प्रजातंत्र में राजशाही का क्या काम? केंद्र सरकार को पग यात्रा की
धमकी देकर डराना जनता को छलना ही है,जनभावना भाषणों से अर्जित नहीं की जा सकती, कांग्रेस पहले जनता की पसंद बने फिर प्रतिनिधि बनने की कोशिश करे नहीं तो परिणाम फिर शून्य के आसपास हो तो कुछ
भी अप्रत्याशित नहीं होगा. मोदी सरकार अच्छे दिनों का राग अलाप रही है बेहतर होगा अपने राजनीतिक एजेंडे में सुधार करे नहीं तो जनता अगले चुनाव में विपक्ष की राह भारतीय जनता पार्टी को दिखाने में देर नहीं लगाएगी.

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

पागलपन

साँसों में बसी हो तुम इसका इकरार
क्या करना?
मोहब्बत हो गयी तुमसे तो अब इनकार क्या
करना?
जमाना कह रहा मुझको दिवाना क्या
तुम्हे मालुम?
दीवानेपन की हालत में भला इज़हार
क्या करना?

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

a slap on the god.

Administration is most retractable thing in india specially for educational institutions.
They became an institution for minting money rather than a temple of knowledge.
In every educational institutions there is a need of strict administration to resolve problems which are often arises by ruffian students and local mobsters.
In every institution a group of disturbing elements always present to create hindrances for those students who are Innocent or outsiders.they are compelled to tolerate hooligans to keep their study well.
In our nation regionalism is one of the main social problem. Some time regionalism become a cause of quarrel. A person who is outsider has to face all discrimination and
Satires on linguistic bases.
Zonary students think that they have blessed with special privileges by mother earth to dominate extraneous. Police always boost them for doning so instead take appropriate action against them.
In my college a student slapped a teacher when he was scolded in class room, how much it was humiliating for him?
My college's disciplinary Committee didn't took any strict action againest the culprit. He regularly attend the college and my college allowed him to attain the classes.
The director of my college complained to disciplinary Committee for suspension of the offender but management always needs money rather than discipline. Management haven't any intention to punish perversity.
This is very common in every educational institutions. Teachers are disobeyed, they have lost their respect and reputation.
Girls are the nation maker's but they are abused, many students outrage their modesty, mobster who's direct approach with management often passed obscene comment on them.
College became open place for battle, quarrels are normal in college campus.
Security guards feel fear to do any action because of their own security, they Know very well what will consequences if they beats Zonary students.
I am very curious to Know which kind of heroics is to slap a teacher or To beat an Innocent student or to beat an outsider student and to do outrageous activities towards a college going girl?
Our college authorities can mint money easily but never earn respect from students who are victims of tolerance.
Making shirdi temple in college campus wouldn't help you to achieve a safe space in heaven.
In hindu methodology it is to be believed that a teacher is a guide of the path of the god that's why he deserve much more respect than god. A teacher is most respectable person on the earth but in my college situations are adverse.
If a teacher is slapped then god will automatically slapped. There is no need of temple so please vandalize it.
After spending four years in Meerut i came to realize educational institutions are established only for minting money, education is a mere breach of dreams of students who believes that college will make their future bright. College can frustrate you but nothing else.
shame on you culprits! You are the culprits of future of india.