शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

एक ख़त तुम्हारे नाम

कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे, कुछ सुनाना चाहता हूँ तुम्हे शायद मेरा बोझ हल्का हो जाए तुम्हे कुछ सुनाकर।
बातें तो ढेर सारी हैं सुनाया तो महीनों गुजर जायेंगे। जानता हूँ तुम अपने दुनिया में मसरूफ़ हो मुझे सुनने के लिए तुम्हारे पास वक्त कहाँ?
ख़ुशी है क़ि तुम्हारी मसरूफियत बढ़ रही है साथ ही साथ मुझसे अजनबियत भी।
सुना है क़ि वक़्त बहुत तेज़ी से बदलता है और वक्त का पीछा करते-करते कभी-कभी इंसान भी बदल जाते हैं। बदलाव कभी भी अप्रत्याशित नहीं होता बल्कि परिस्थितिजन्य होता है। तुम्हारी जगह अगर मैं भी होता तो शायद बदल गया होता पर क्या करूँ मुझे मेरे  हालात से मोहब्बत जो है बदलता कैसे?
तुम्हे देखकर एहसास होता है कि कामयाबी होती क्या है। तुमने मुझे कामयाब और नाकामयाब लोगों के "अपनों" का मतलब समझाया वरना अब तक इस बड़े फर्क से मैं अनजान रह जाता।
एक कामयाब इंसान के लिए "अपनों" का मतलब माँ-बाप, पत्नी और बच्चों तक सिमटा होता है वहीं नाकामयाब इंसान पूरी दुनिया को अपना मानता है और शायद यही वजह है उम्मीदों के टूटने का। हर कोई अपना तो नहीं हो सकता न? खैर ग़लतफ़हमी की कुछ तो सजा मिलनी चाहिए।
इंसान की एक फितरत होती है कि उसे परेशानी में अपने कुछ ज्यादा ही याद आते हैं। बात खुद के परेशानी की हो तो तो किसी के मदद की जरुरत नहीं पड़ती, मुसीबतों से उबरने का हुनर इंसान सीख कर पैदा होता है पर जब बात किसी 'अपने' के जिंदगी की हो तो डर लगता है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। इंसान  डरता है तो सिर्फ अपनों की वजह से वरना गुरुर तो पुरखों की धरोहर होती है।
हम मदद उसी से मांगते हैं जिसे खुद से बेहतर पाते हैं तुम्हे बेहतर मानना मेरे जिंदगी की बड़ी गलती थी। तुम्हारे बेहतर कामयाबी के वजह की वज़ह नहीं जानी।
शुक्रिया! इस तल्ख़ हक़ीक़त से रूबरू कराने के लिए कि " कामयाबी मिलने पर 'अपनों' की परिभाषा सीमित और नाकामयाब होने पर व्यापक हो जाती है।"
परेशानियां किसके जिंदगी में नहीं आतीं? इस दौर से कभी तुम भी गुजरे हो, हज़ारों जख़्म तुम्हे भी लगे हैं...अवसाद में तुम भी पागल हुए हो जहाँ तक मैं तुम्हे जानता हूँ।
अतीत को टटोलो तो शायद तुम्हे मेरे आज का एहसास हो जाए।
तुम्हारे संघर्ष के दिनों में भेजी गयी चिट्ठियों को मैंने आज भी सहेज कर रखा है जब अवसाद तुम पर हावी था और तुम असहाय बन वक़्त को कोस रहे थे, तुम्हारा कन्धा थपथपाने वालों में शायद सबसे करीब मैं था।
आज मुझे तुम्हारी जरुरत थी और तुमने मुझे सुनना तक ठीक नहीं समझा।
तुमसे क्या कहूँ तुम तो व्याख्याता हो। तुम्हारे दृष्टान्त तो सजीव प्रतीत होते हैं लोग खो जाते हैं तुम्हारे शब्दों के सम्मोहन में; तुम्हारी तुलना में मैं तो कहीं नहीं ठहरता  पर तुम्हे एक राय देना चाहता हूँ सुन लेना अगर मन करे तो। मेरे लिए बोलना मुश्किल है आख्यान कहाँ दे पाऊंगा फिर भी कोशिश कर रहा हूँ।
जानते हो, "जब सूरज तपता है तो  ढलता है।" विधाता का शाश्वत नियम है 'उत्थान और पतन।' सीधे शब्दों में जो उठता है वो गिरता जरूर है और जो गिरता है उसका उठना भी तय है। जीवन उत्थान और पतन का समुच्चय है, महत्वपूर्ण है उत्थान और पतन का समन्वयन। नीति कहती है कि अहंकार पतन का हेतु है। अहंकार मत आने दो भले ही सफलता के सर्वोच्च शिखर पर कदम हों,सही मायने में तब सही समय होता है अपने कदम और मज़बूती से जमाने का, स्थिर होने का क्योंकि जो शिखर से गिरता है वो गर्त में जाता है। शिखर पर होना बहुत आम बात है। कोई भी परिश्रम करके वहां पहुँच सकता है, ख़ास बात है शिखर पर टिकना-शिखर का पर्याय हो जाना।
सफलता सहेजी जाती है सहेजना ही सफलता को अमरत्व देती है। इस अमरत्व की औषधि क्या है पता है?? "विनम्रता"।
जो विनम्र नहीं उसकी सफलता छड़िक होती है तुम्हे तो ऊपर जाना था फिर यह ओछी हरकत क्यों??
शायद तुम मुझे ये कहो कि "लोग अपनी कमियों को छिपाने के लिए दर्शन का सहारा लेते हैं"। ऐसा मत सोचना ये दर्शन नहीं यथार्थ है।
तुम मेरे नितांत अपने हो, अगाध प्रेम है तुमसे। हाँ! तुम मुझे अपना मानो ऐसी प्रत्याशा नहीं है मेरी। चाहता हूँ तुम सफलता के पर्याय बनो पर तुम्हारा व्यवहार मुझे शशंकित करता है।आगे तुम्हारी इच्छा।
     ये निरर्थक बातें मैं तुमसे न कहता तो मन पर एक बोझ रहता आज कह कर थोड़ी राहत मिली है।
एक एहसान है तुम्हारा मुझ पर। तुमने मुझे हकीकत से रूबरू कराया, मुझे मेरी औकात दिखाई शायद तुम मेरे काम आते तो मैं निष्क्रिय रह जाता। अब तो चोट लगी है मरहम खुद ही लगाना है।
हो सकता था कि मैं परिजीवी बन जाता पर अब आत्मनिर्भर होने की धुन सवार है मुझ पर। विश्व के आश्रयदाता तो  भगवान हैं उनके अलावा किसी और के होने का सवाल ही नहीं पैदा होता, सोच रहा हूँ इस पुनीत कार्य का माध्यम बन जाऊँ।
हाँ! तुम्हारा एहसान मुझे याद है आज ही निभा दिया तो कृतघ्नता होगी और मैं कृतज्ञ बनना चाहता हूँ कृतघ्न नहीं।
जब तुम्हे मेरी जरुरत होगी मैं नरक से भी दौड़ा आऊँगा आख़िर तुम मेरे अपने जो हो।
शुक्रिया! मुझे आईना दिखाने के लिए।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

ख़्वाब

 कभी-कभी ख़्वाब भी 
  बिखरे पत्तों की 
 तरह होते हैं 
 कहीं भी-कभी भी 
 बहक जाते हैं 
 हवाओं से, 
 वजूद  तो है 
 पर 
  बेमतलब  
 खोटे सिक्के की तरह 
  जो होता तो है 
  पर 
 चलता नहीं 
 पत्तों का क्या है 
  इकठ्ठे  
 हो सकते हैं  
 लेकिन ख़्वाब? 
  हों भी कैसे 
 इतने टुकड़ों में  
 टूटतें हैं  
 कि 
 आवाज तक नहीं आती. 
 टूटे ख़्वाब  
 दुखते तो हैं  
 पर  
 जोड़ने की   
 हिम्मत नहीं होती 
 जाने क्यों 
 खुद की  
 बनाई हुई  
  कमज़ोरी 
 हावी हो जाती है  
 खुद पर, 
 ख़्वाब सहेजे   
 नही जाते  
 जिंदगी कैसे  
 सम्भले 
 हम इंसानों से?? 

प्रच्छन्न

 जब रहें हमको छोड़ चुकें 
 कदम थके और हारे हों, 
 जब अंतस में पीड़ा कौंधे  
 और जग प्रतिकूल हमारे हो,  
 तब मन प्रच्छन्न नास्तिकता की 
 मैली चादर को ढ़ोता है,  
 पीड़ा की सरिता बहती है 
 और हृदय अनवरत रोता है।। 

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

निष्पक्ष मीडिया की अनिवार्यता

एक लोकतान्त्रिक देश में लोकतंत्र के चार मुख्य  स्तम्भ कहे गए हैं, जो क्रमशः हैं- कार्यपालिका, न्यायपालिका(सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट,जिला अदालतें ), विधायिका तथा "मीडिया.'' यदि लोकतंत्र की चारो शक्तियां एक ही राग अलापने लगें तो राष्ट्र उन्नति  नहीं कर सकता, इसीलिए "शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त'' को राज्य की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने के लिए तथा शक्तियों के परस्पर समन्वयन के लिए प्रायः व्याख्यायित किया जाता है. इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की तीनो शक्तियों को अलग-अलग तथा सामान स्वतंत्रता प्रदान की जाती हैं जिससे कि यदि शासक भी निरंकुश होना  चाहे तो उस पर लगाम कसा जा सके. दुर्भाग्य से भारत में भारत की तीन स्तम्भ तो सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में पहले से हैं और चौथा स्तम्भ सरकार के गुणगान में व्यस्त है, सरकार क्या कहें केवल और केवल प्रधानमंत्री "नरेंद्र दामोदर दस मोदी'' जी के गुणगान में व्यस्त है.
व्यक्तिवादी मीडिया का होना गणतंत्र के हित में नहीं होता है, एक कुशल शासक को अपने गुणगान सुन कर निरंकुश होने में देर नहीं लगती, मीडिया का काम सरकार की नीतियों पे खुल कर बहस करने का है, क्या गलत है क्या सही है इस पर मंथन करने का काम है न कि प्रधान मंत्री के गुणगान का,  पर आज-कल तो मोदी-मोदी के अलावा कुछ और सुनाई नहीं देता. निःसंदेह मोदी जी एक आदर्श प्रधान मंत्री हैं, विदेशी नीतियों में  उनकी परिपक्वता जनता भली भांति समझ रही है पर परिणाम आने शेष  हैं. जिस तरह पूरी दुनिया में मोदी को दूसरा ओबामा(सिर्फ ओबामा ही नहीं अमेरिका का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष दुनिया का सबसे बड़ा डॉन होता  है) बनाकर पेश किया जाता है वह कहीं न कहीं हास्यपद लगता है.किसी भी क्षेत्र में हम चाइना या अमेरिका से आगे नहीं हैं और न ही इन राष्ट्रों  की कोई मज़बूरी है भारत के सामने झुकने की पर मीडिया में हंगामा कुछ इस तरह का है कि पूरी दुनिया शरणागत है भारतीय प्रधान मंत्री के आगे. दुसरे ग्रह से कुछ विध्वंसकारी शक्तियां आ गयी हैं और हमारे प्रधानमंत्री जी सुपर हीरो हैं बस धरती को विनाशकारी शक्तियों से ये ही बचा सकते हैं.
चाटूत्कारिता के लिए पहले राजा-महाराजा लोग दरबारी कवि रखते थे, रखें भी भला क्यों न भारत का विनाश जो करना था पर आज मामला उल्टा है. दरबारी कवि का काम मीडिया कर रही है. सिर्फ मीडिया ही नहीं इंटरनेट, ब्लॉग. फेसबुक, ट्विटर के महारथियों ने अकेले जिम्मेदारी उठाई है मोदी जी के यशगान  की वो भी बिलकुल मुफ्त, धन्य हो भारतीय वीरों.
साहित्यकारों को क्या कहा जाए उनका तो धर्म ही है, "जिसका खाना-उसका गाना''. निस्पक्ष पत्रकारिता की कमी खलती है. ऐसे पत्रकार हाशिये पर क्यों हैं जिनकी कलम सच्चाई की जुबान बोलती है. कोई युग द्रष्टा पत्रकार या साहित्यकार मिलता क्यों नहीं, कलम वही है जो यथार्थ लिखे, किसी की प्रशंसा करे तो अनुशंसा भी करे. किसी  की कमियां देखकर आँख मूँद लेना तो पक्षपात है न?  या होण लगी है एक ही राग अलापने की "हर-हर मोदी,घर-घर मोदी की.
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में देश की प्रगति और विकास के लिए राज्य के सभी स्तम्भों का समन्वयन जरूरी है, ईमानदारी जरूरी है. यदि ईमानदारी नहीं तो विकास नहीं. सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा  न करके यदि  मीडिया सरकार का ध्यान उन क्षेत्रों की तरफ ले जाए जहाँ आज भी गरीबी-भुखमरी और लाचारी है तो कितना बेहतर होगा.
शहरों में झुग्गी-झोपडी वालों की सरकार को सुधि नहीं हैं और देश में काशी को टोकियो और रेलवे लाइन पर बुलेट ट्रेन चलाने की बात हो रही है.एक बात समझ से पर है कि बुलेट ट्रेन में सफर कौन करेगा? किसी तरह माध्यम वर्ग के कुछ लोग या धनाढ्य व्यक्ति जो टिकट खरीदने की औकात रखते हैं. निम्नवर्ग का क्या? ये सुविधाएँ तो धर्मशास्त्रों में वर्णित कल्पित स्वर्ग की तरह हैं जहाँ जाने मरने के बाद ही होता है. किस्मत को कोसें, सरकार को या अपने पूर्वजों को जिनकी वजह से आज भी गरीबी से उबार नहीं पा रहे. गरीब, गरीब क्यों है? कहीं न कहीं वजह ये भी है की उसे अमीर होने का मौका  ही नहीं मिला. एक गरीब अपना पेट भर ले वही बहुत है मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने की उसकी औकात कहाँ? या तो सरकार अंधी है या निचले तबके को देश का हिस्सा नहीं मानती. वोट लेने का काम बस नेताओं का है पर इनके उत्थान के लिए किसी को फुर्सत नहीं है. हो भी भला क्यों न गरीबी की कुछ तो सजा भुगतनी पड़ती है.
एक निवेदन आप सबसे है कि निष्पक्ष लिखें, मीडिया से अनुरोध है की आप बेशक सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुचाएं पर जनता को ना भूल जाएँ. एक तबका आज भी है जो न हिन्दू है न मुसलमान है, न सिख है और न ईसाई है वो बस गरीब है, हाँ यही उसकी एक मात्र जाति है. १९४७ से लेकर अब तक देश ने लम्बा सफर तै किया है पर इस सफर में हमारे कुछ साथी  बहुत पीछे छूट गए हैं, उन्हें समाज की मुख्य धारा में लेन की कोशिश तो कीजिये. आजादी तो सबके लिए है न? सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, महात्मा गांधी और न जाने कितने अनगिनत नाम जिन्होंने अपना सब कुछ इस देश के लिए कुर्बान किया, भारतीयता के लिए लड़े उनके स्वप्न में आज का गरीब भारत तो नहीं था न ? उनके शहादत को बेकार जाने न दिया जाए तो बेहतर होगा अन्यथा कृतघ्नता का बोझ हमे जीने नहीं देगा.
दीपावली आ रही है,आइये मिलकर प्रयत्न करते हैं अँधेरा मिटने का....आइये बढ़ाते हैं एक कदम हमारे सपनों के भारत की ओर..फिर से दुहराते हैं "सर्वे भवन्तु सुखिनः का राग....भारतीयता का राग!!!

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

आज का रावण



विजय दशमी; पाप पर पुण्य की विजय गाथा जिसे भारतीय सदियों से मनाते चले रहें हैं हर साल बुराई के सबसे बड़े प्रतीक की प्रतिमा जलाई जाती है पर वह प्रतीक अमर है. कभी मरता ही  नहीं जैसे अजन्मा हो. हर साल रावण दहन होता है पर कलियुग में शायद रावण की प्रवित्ति बदल गयी है अथवा उसने स्वर्ग में जाकर रक्तबीज से संधि कर ली है कि जितने  व्यापक स्तर पर रावण का वध होता है उतने ही रावण उसे जलता देख तैयार होते हैं, रक्तबीज का तो रक्त धरती पर गिरता था तब नया रक्तबीज पैदा होता था पर कलियुग में तो मामला उल्टा है. यहाँ देखने मात्र से रावण जन्म लेते हैं. रावण भले ही विदेशी हो पर उसके अनुयायी शत -प्रतिशत स्वदेशी हैं. लंका में तो भारत से कम नारी उत्पीड़न के मामले सुनने को मिलते हैं मतलब साफ़  है कि वहां वाले रामभक्त बन गए हैं और भारतीय रावण. अगर आज के रावण की तुलना कल के रावण से की जाए तो आज वाले रावण में त्रेता युग के रावण से कहीं अधिक राक्षसता दिखती है. रावण के दस सर थे तब तो उसने एक सीता को हरा पर आज का रावण तो बस एक सर का है पर जाने कितनी सीताओं की अस्मिता हरी जाती है.तब एक रावण था और एक राम थे पर आज रावण ही रावण हैं और राम कहीं दिखते भी नहीं. आज का रावण इतना शक्तिशाली है की राम उसके भय से किसी अज्ञात  पर्वत पर किसी सुग्रीव की गुफा में शरणार्थी हैं.
     रामायण, रामचरित मानस दोनों ग्रंथों में कहीं भी रावण की अशुचिता नहीं दिखती, रावण का व्यभिचार भी कहीं नहीं दिखता, रावण वंचक तो अवश्य था पर बलात्कारी नहीं. आज के रावण में ये भी खूबी है. अभद्रता तो जन्मजात गुण है बाकी जो बचता है वह उपार्जित है. अब तो समाज के इन कलंकों की तुलना लंकाधिपति रावण से करने में भय लगता है कहीं रावण बुरा मान जाए कि; "मेरी तुलना इन पापियों से की जा रही है जबकि मैं इनसे बहुत पवित्र हूँ.'' आजकल राम, हनुमान,सुग्रीव, अंगद या जामवंत जन्मे या जन्मे पर रावण और  विभीषण हर घर में पैदा हो रहे हैं, पर रावण का पडला भरी देख उसी से चिपके रहते हैं. घर बनते हैं, परिवार टूटते हैं, छोटा भाई बड़े भाई को रावण कहता है पर राम  के काम नहीं आता. निःसंदेह यही तथ्य है जिसकी वजह से कोई अपने संतान का नाम विभीषण नहीं रखता.
      हनुमान जी को अमर कह जाता है.रामचरित मानस में अवधी में बड़ी सुन्दर चौपाई है जब अशोक वाटिका में माँ  सीता हनुमान जी से प्रभु श्री राम का कुशल-क्षेम पूछती हैं, और सब जानने के बाद हनुमान जी को वरदान देती हैं-
"अजर, अमर, गुणनिधि, सुत होहु' करहु बहुत रघुनायक छोहू''.
वरदान माँ सीता का है तो निष्फल होने का औचित्य  ही  नहीं है. राम भगवान भले ही महाप्रयाण कर चुके हों पर हनुमान जी तो धरती पर हैं फिर क्यों नहीं किसी सीता की अस्मिता बचाने आते हैं? क्या बस भगवान श्री राम के जीवन तक ही उनका शौर्य था? क्या महाबली भी अब शक्तिहीन हैं या समाज में राक्षसों के कृत्यों को  मूक दर्शक बन देखते रहना चाहते हैं? अथवा कलियुगी मानव कापियों से यह कहना चाहते हैं कि "उठो, अब तो अन्याय के विरूद्ध लड़ो, कब तक राम की प्रतीक्षा में कायर बने रहोगे, तब तो लंका की दिशा अनभिज्ञ थी पर अब तो गली -गली में लंका है, संगठित हो और विध्वंश कर दो रावण सहित लंका का.''
  हर शहर में जाने कितनी महिलाएं, युवतियां और जाने कितनी छोटी, मासूम बच्चियों को जबरन वेश्यालयों में बिठाया जाता है, धकेला जाता है उन्हें हवस के पुजारियों के आगे, चीखती हैं, पिसती हैं समाज के दरिंदों के हाथों में, पर कुछ दिन बाद वो शून्य हो जाती हैं.जिन्दा तो होती हैं पर एक अभिशाप की तरह. भले ही भारत में भारतीय दंड संहिता के धरा ३७२ और ३७३ में  वेश्यालय संचालकों  को और दलालों   को पकडे जाने पर "दस वर्ष के सश्रम कारावास की सजा'' हो पर हाथ कोई नहीं आता. पुलिस को मोटी-तगड़ी रकम मिलती है फिर कौन बोलने जाए. दुनिया की सबसे निकम्मी कौम भारतीय  पुलिस ही है. जिसके बारे में अक्सर देखने और सुनने को मिल जाता है.इन लंकाओं में फसी हुई लड़कियों के उद्धार के लिए कोई राम या हनुमान नहीं आते क्योंकि ये लड़कियां किसी राजा की पत्नी, बेटी या बहन नहीं होती, जनता को मतलब नहीं होता और प्रशासन दुःशासन का भाई है वह ऐसे काम क्यों करे उसे तो बस धन चाहिए.
  यदि आज कोई राम नहीं बन सकता, हनुमान के पदचिन्हों पर चल नहीं सकता तो बंद करो ये तमाशा. मत जलाओ रावण को, अगर रावण को राक्षस कहते हो तो उससे करोड़ गुनी राक्षसता तो तुम ढोते हो, फिर खुद को क्यों नहीं जलाते? रावण ने जो किया उसकी सजा उसे त्रेता युग में ही मिल गयी थी पर आप जो करते हो उसके बारे में कभी सोचा है?

रविवार, 28 सितंबर 2014

पुरस्कार

 कुछ देर पहले जागरण जंक्शन पे कुछ लिखने का मन हुआ,जब वेबसाइट खोला तो चौंक गया...वहाँ मेरा नाम   मेरे फोटो के साथ चमक रहा था,"अभिषेक शुक्ल- बेस्ट ऑफ़ द वीक'' खुश हूँ कि सैकड़ों लेखकों में मुझे चुना  गया जबकि उनके अनुभव और शब्द कभी-कभी मेरे समझ से पार जाते हैं, कुछ के नाम हैं तो कुछ बड़े नाम हैं जिन्हे लोग अक्सर सम्पादकीय पर चित्र सहित देखते हैं. यूँ तो कभी कोई अवार्ड अब तक नहीं जीता लग रहा है कि कई पुरस्कार एक साथ मिल गए हों. पर आज का दिन मेरे लिए बहुत ख़ास है..एक लिंक दे रहा हूँ ओपन कीजिये और मुझे वहां देखिये..मुझे ख़ुशी होगी..लिंक है www.jagranjunction.com

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

सुरक्षित भारत की असुरक्षित महिलायें

अब अखबार पढ़ने की हिम्मत  नहीं होती है, पहले  अखबार पढ़ा  जाता  था  देश -दुनिया के हाल  के लिए पर अब अख़बारों में तो बदहाल  दुनिया की ऐसी तस्वीरें दिखती हैं जिन्हे देख कर बस छुब्ध हुआ  जा  सकता  है. पूरा अखबार खंगालने पर बस कुछ घिसे-पिटे  शब्द दिखते हैं, ''बलात्कार'', दुष्कर्म और हत्या. सारे ख़बरों  का सार बस इन्ही शब्दों के इर्द-गिर्द घूमता है.इतनी  पुनरावृत्ति तो दैनिक जीवन  में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की नहीं होती जितनी की इन  ख़ास शब्दों   की होती है.संभ्रांत परिवारों  में हिंदी  अखबार बस ''सम्पादकीय पृष्ठ'' के लिए मंगाया जा रहा है बाकी के पन्ने घर के जिम्मेदार लोग पढ़ के फेंक देते हैं क्योंकि उन्हें भी अपने पाल्यों की चिंता है कि इन ख़बरों का उनके मासूम से मन पर क्या असर पड़ेगा. महज़ कुछ जघन्य  कृत्यों के वर्णन के अलावा क्षेत्रीय ख़बरों में होता क्या है? कभी पुलिस कि दबंगई तो कभी मनचलों कि पिटाई, कहीं किसी को ट्रक कुचलता है तो कहीं किसी को घर में घुस के गोली मारी जाती है, कभी स्कूल से आती छात्रा को अगवा कर उसके साथ कुकर्म किया जाता है तो कहीं किसी महिला के सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या होती है.समझ में नहीं आता कि लोग किस हद तक गिर चुकें हैं.
        इन-दिनों कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है, कभी भी कुछ भी हो सकता है. एक लड़की जो अपने घर से पढ़ने या जॉब करने के लिए निकलती है  उसे  इस बात का डर होता है कि कुछ अनहोनी न हो जाए. घर वाले कहीं भी अकेले बेटियों को बाहर भेजने से डरते हैं कि क्या पता कब क्या हो जाए.एक बेटी का बाप इतना डरा हुआ होता कि जैसे उसने कोई गलती कर दी हो बेटी पैदा करके.कहीं न कहीं उसकी चिंता जायज है. तथाकथित मर्दों(नर पिशाचों) की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है.हर महीने  मानवता को तार-तार करता कुछ न कुछ ऐसा कृत्य हो रहा है  जिसे सुन कर रूह तक काँप जाती है.यह  कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश है. बात चाहे  दिल्ली की हो या बदायूं या लखनऊ की हर जगह मानवता शर्मसार हुई है.
धन्य है भारत के नेता और नेत्रियां, काम पर तो इनके वर्षों से ताला लगा हुआ है काश मुहं पर लग  जाए तो लोकतंत्र  का कुछ कल्याण हो जाए. दुष्कर्मों के बढ़ते मामलों के लिए लड़कियों के पहनावे को जिम्मेदार ठहराने वाले लोगों को ये क्यों नहीं दिखता कि एक ६ साल  की बच्ची कौन से ऐसे कपडे पहन लेती है कि उसका दुष्कर्म होना अपरिहार्य हो जाता है? एक साठ वर्षीया महिला ऐसा कौन सा श्रृंगार कर सकती है जिससे कि दुष्कर्मियों को उत्प्रेरक मिल जाता है? यदि पहनावे के कारन दुष्कर्म होते तो अब तक अमेरिका में सबसे ज्यादा दुष्कर्म होते वहां तो लोग न्यूनतम कपडे पहनते हैं.वक्त कपडे नहीं विचार बदलने का है. जब विचार संकीर्ण होने लगें तो व्यक्ति को आत्महत्या कर लेना चाहिए इन नेताओं को कौन समझाए? एक तो दुष्कर्म करते हैं वहीँ दूसरे  उसे हवा देते हैं. समझ में नहीं आता की लोग इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं? क्या इन्हे तनिक भी भय नहीं की समाज इन्हे क्या कहेगा, खैर समाज क्या कहेगा ये दुष्कर्मी स्वर्ग से तो थोड़े ही आये हैं ये भी इसी समाज का हिस्सा हैं. जब हर तरफ भेड़िये ही भेड़िये हों तो मेमना जान किसके पास बचाने जाए.
    दुष्कर्म के लिए भारत में क़ानून १८६० वाला है संशोधन भी हुआ तो नाम मात्र का. कठोर कानून का और उसके अनुपालन की नितांत आवश्यकता है पर संसद में बैठे लोगों तक जनता की आवाज जाती कब है? साल दर साल दुष्कर्म की ख़बरें बढ़ती जा रही हैं, अपराधियों का उत्साह और बढ़ता जा रहा है पर सरकार मौन है. पीड़िता को तो दुष्कर्मियों से ज्यादा पुलिस और प्रेस का भय होता है, पूछ -ताछ के नाम पर ऐसे -ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जो पीड़िता को भीतर तक चाल देते हैं ऊपर से प्रेस  के हज़ार सवाल, सवाल भी बिना सर-पैर वाले.
                     अगर ऐसा ही हाल रहा तो लोग बेटियां पैदा करने से डरेंगे, उनके जन्मते ही उन्हें मार देंगे क्योंकि इससे पहले दरिंदों की नज़रें उनपर पड़ें उन्हें मुक्त करना ही परिवार वाले उचित समझेंगे. श्रुति कहती है की ''जहाँ नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है'', पर जाने क्यों हमारे भारत वर्ष में पिशाचों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है, पूजा तो दूर की बात है नारी मुक्त होकर आज़ाद ,होकर सांस तक नहीं ले सकती. हैवानियत लोगों के सर चढ़ के बोल रही है, नारी जिसकी वजह से जीवन है प्रेम है ममता है उसी की सबसे निरीह  दशा ? ऐसा कौन सा कारण है जिससे अपने ही जने बेटे  से माँ को डर लगता है?  क्या नारी की यही नियति है की वह पुरुष के क्रूरता का विषय बने? क्या पुरुषों का यह कर्तव्य नहीं की जिनसे जीवन है उनकी रक्षा करें?
    वह व्यक्ति पुरुष नहीं हो सकता जो नारी पर अत्याचार होने दे या खुद करें, हैवानों से दो हाथ करो चुप मत बैठो, कहीं ऐसा न हो कि पैशाचिकता   इस हद तक रक्त में समाहित हो जाए कि रक्त संबंधों में भी शुचिता का ख्याल न रहे, क्योंकि एक बार जिसके सर पर हैवानियत चढ़ती है उसे किसी रिश्ते का ख्याल नहीं होता भले ही रिश्ता चाहे माँ का हो या बहन का, हैवानियत से जंग लड़ने का वक्त है न की चुप बैठने का, इससे पहले की हर गली-मोहल्ले में दामिनी काण्ड  दुहराया जाए लोगों का जागना जरूरी है..सिर्फ जागना ही नहीं  है एक जुट होकर लड़ना भी है अन्यथा भारतीय संस्कृति जिसका हम दम्भ भरते हैं को ग्लानि में बदलते देर नहीं लगेगी.
(आज दैनिक जागरण के सम्पादकीय में मेरा आलेख प्रकशित हुआ है "असुरक्षित महिलाएं'' के शीर्षक से. अगर आपने अख़बार   न पढ़ा हो सबसे पहले सम्पादकीय पढ़िए मुझे ख़ुशी होगी.
१८ सितम्बर को मैंने एक लिंक शेयर किया था शायद आपने मेरे ब्लॉग पर पहले ही पढ़ लिया हो  वैसे भी घर वालों को सबकुछ सबसे पहले पता होना चाहिए.आज औसत से ज्यादा खुश हूँ १८ को लिखा २० को अखबार में प्रकाशित हो गया)

शनिवार, 6 सितंबर 2014

कशिश!!

'' मेरे ख्यालों से अब निकलो,
        ये दुनिया भी तो खाली है,
है खुशियों का यहाँ मंज़र,
         समझ लो कि दिवाली है,
मेरी अँधेरी दुनिया को
         मेरे ही पास रहने दो,
उम्मीदों कि ये जो लौ है,
         वो अब बुझने वाली है.''

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

यादों के कोने से!


याद नहीं कि ज़िंदगी ने  करवटें ली  है
   माथे पे परेशानियों की आहटें दी हैं;
   हम तो जज्बात के मारे आशिक हैं
    मोहब्बत ने कितनी सिलवटें दी हैं.

सोमवार, 1 सितंबर 2014

माँ

मेरी दुनिया तुझ तक सिमटी,
बाकी सब लगता है सपना,
 माँ   तू   है   तो  दुनिया हैं ,
तेरे पास ही मुझको रहना.
बहुत दिनों से थका-थका हूँ
थपकी दे के सुला दे माँ,
तुझ से दूर रहा नहीं जाता
मुझको पास बुला ले माँ....

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

मेरा देश:विडम्बना और यथार्थ

भारत, मेरा भारत, मेरे सपनों का भारत, सुन कर कितना अच्छा लगता है कि हम विश्व के सबसे बड़े गणतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक हैं, सोने पे सुहागा ये है की संसार का श्रेष्ठतम मानव निर्मित  संविधान  हमारे देश  का है. संविधान निर्माताओं  ने  दुनिया   भर  का  संविधान पढ़ा, क़ानून  पढ़ा, जहा से जो अनुकरणीय लगा  उसे भारतीय संविधान का  हिस्सा  बनाया.आज सबसे समृद्ध संविधान हमारा ही है. बात चाहे ''राज्य के नीति निर्देशक तत्वों'' की हो या मौलिक अधिकारों की हर जगह हम अपने आपको सबसे बेहतर पाते हैं.इतनी आज़ादी दुनिया के किसी भी देश ने अपने नागरिकों को नहीं दिया है जितनी आज़ादी हमे मिली है. संविधान ने अवसर सबको दिया है कभी आरक्षण के रूप में तो कभी निर्देश के रूप में. भारत की धर्मनिरपेक्षता को सबने सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया है फिर चूक कहाँ हो रही है?

                             क्या संविधान में नीति और निर्देश लिख देने भर से देश में उन्नति हो जायेगी? क्या किताबों में लिखे अधिकारों से हम सच में समर्थ हो जायेंगे? नहीं कभी नहीं. नियम तो लाख हैं भारत में पर उनका नियमन और नियंत्रण करने के लिए सरकार की मशीन में ही जँग लग गयी है. ये जँग आज की नहीं है वर्षों  पुरानी है. आजादी   के तुरंत  बाद  से ही बुराइयां पैठ बनाने लगीं थीं.
क्या अपने कभी सोचा है की क्यों सबसे बड़े लोकतंत्र का तमगा लेकर हमारे देश में लोकतंत्र का तमाशा बनता है? मतलब क्या होता है बड़ा होने का? खजूर भी तो बहुत बड़ा होता  है पर किस काम का? ये लोक तंत्र है कि भीड़तंत्र? आम जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद भेजती है कि देश में विकास होगा, शांति होगी पर बदहाली के अलावा हमारे यहाँ है क्या?
    संसद में हमारे जन-प्रतिनिधि जनता से कितने वफादार हैं ये जनता भली-भांति जानती है फिर भी हर बार एक उम्मीद के साथ भेजती है कि अच्छे  दिन आएंगे पर जनता कि इस सोच को हर बार छाला जाता है क्योंकि संसद वाले जानते हैं कि भारतीय जनता को नचाया कैसे  जाता है.भारत में भ्रष्टाचार  के पीछे  तो सबसे बड़ा हाथ जनता का ही है...तो भला नेता क्यों न करे वो ठेंठ से ही बेईमान होते हैं.
                यदि पचास से अधिक एक्ट पास कर देने से कोई देश विकसित होता तो अब तक भारत अमेरिका से आगे चला गया  होता क्योंकि भारत में हर बात के एक्ट बन जाते हैं पर उनके नियमन और नियंत्रण  की तो कोई बात ही नहीं करता. जनता सरकार को कोसती है सरकार जनता को.हमारे देश में तो बस यही होता है. इस अव्यवस्था का परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है.
बात तंत्र के विफलता की हो रही है तो सबसे पहले बात करते हैं जनता की क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण इकाई जनता ही होती है---
                                                           ''काली करतूत''
                             अभी कुछ दिन पहले एक दिल दहला देने वाली घटना हुई है लखनऊ के मोहनलाल गंज इलाके में.एक ३२ वर्षीया महिला के साथ कुकृत्य और उसके बाद उसकी नृशंसता से हत्या. लखनऊ जहाँ उत्तर प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास, जब मुखिया के रहने पर ये हाल है तो न होते तो क्या होता? मुखिया जी के पास बहाना  है की कुकर्म  तो सरकार ने नहीं किया. किसी आम नागरिक ने ही किया है. सही बात है ये आम नागरिक ही ऐसे ख़ास काम कर सकता है और फिर सरकार को हिज़ड़ा बताता है. अगर बलात्कारियों को मृत्यु दंड दिया जाए तो सबसे पहले उनके घर वाले कहेंगे की एक गलती के लिए मेरे लाल को फ़ासी चढ़ा रही है सरकार, पर यही गलती उनके बेटी के साथ कोई कर दे  तो पहाड़  टूट  पड़ता है. क्या दोगलापन  है समाज में? बात अपने पर आती है तो व्यवहार ,विचार  सब बदल जाते हैं. बेटा है वो कुछ करे तो गलती है और उसे माफ़ी  पाने  का अधिकार  है पर जरा  बेटी की सोचिये, जिसका  बलात्कार  होता है उसका  कभी मीडिया  तो कभी सरकार तो कभी पुलिस  बलात्कार करती है, बार-बार और हर बार.
लखनऊ में हैवानियत  की शिकार  महिला की नग्न  फोटोज  भी मीडिया  में खूब  पब्लिश  हुए. हर अखबार  के ऑफिसियल  साइट  पर फोटो  डाला  गया था. कितनी  घिनौनी  हरकत  थी ये? क्या भारतीय महिला इसी के योग्य है? जीते जी जान चली गयी जिस इज्जत को छुपाने में वो अखबारों की सुर्खियां बनी? हम भारतीयता का दम्भ भरते  हैं और इतनी  गिरी हुई हरकत करते  हैं, नग्न फोटो डालने  तो सरकार  नहीं  आई  थी  न? ये कुकृत्य किसी आम नागरिक का ही था  न? एक मृत नग्न महिला को ढकने की जगह उसकी नंगी फोटो सोशल मीडिया में डाला जाता है ये कौन सी डेमोक्रेसी है?
   यही आम जनता बलात्कार करती है और फिर न्याय की मांग करती है..कैसी माँ  है जो एक बलात्कारी को अपना बीटा  कहती  है..पहली  सजा  अगर घर से मिले  तो शायद  बलात्कार के केसेज  काम  हो  जाएँ.
     बलात्कार के लिए हमारे यह क़ानून तो है पर १७६८ वाला. नया बना ही नहीं क्योंकि जनता भी १७६८ वाली  है..असहाय कमजोर  और नामर्द .
                    लाख स्वाधीनता दिवस मन लें हम पर ये हैवानियत की जो मानसिक  गुलामी  हम कर रहें  हैं ये मिटने वाली नहीं है...१५ अगस्त आने वाला है, स्वाधीनता मिले  एक अरसा  हो गया  पर महिलाओं की दशा देखो ..वो तब भी असुरक्षित थीं  आज भी हैं, और जिस तरह से लोगों  की निष्क्रियता  है भविष्य  में भी रहेगी.
         बंद करो कायरों जान-गण-मन या वन्दे मातरम का गान, अपने आश्रितों  को छत नहीं दे सकते तो भारतीय होने  का स्वांग क्यों रचते हो..अपने को आर्य कहते हो और कर्म इतने  निन्दित करते हो...ऐसा न हो की आने वाली संतति अपने आपको ''भारतीय'' होने के लिए कोसें..शायद हमारे कर्मों का वही सबसे सटीक प्रतिफल होगा.
(आज दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर मेरा आलेख प्रकाशित हुआ है, ''मेरे देश की विडम्बना'' शीर्षक से ''जागरणजंक्शन'' वाले कोने में. यूँ तो रात काफी हो चुकी है और अखबार आमतौर पर लोग सुबह ही पढ़ते हैं लेकिन आप रात में भी पढ़ लीजिये...मुझे ख़ुशी होगी.. शुरूआती दिन हैं तो ख़ुशी कुछ ज्यादा ही मिलती है अपना नाम अखबार में देखकर...आपको देर से इसलिए बता रहा हूँ कि मुझे भी देर से पता चला और जब पता चला तो नेटवर्क आंखमिचौली खेलने लगा...प्रतिलिपि अपलोड कर रहा हूँ, पूरे आलेख की बस दस पंक्तिया ही प्रकाशित कि गयीं हैं, पर पूरा लेख मेरे ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है, मेरे ब्लॉग का पता है- www.omjaijagdeesh.blogspot.com)