शनिवार, 11 मई 2013

स्त्री तेरी यही कहानी


जिन तथ्यों से मैं अनभिज्ञ था विगत कुछ वर्षों से वही देख रहा हूँ. इतने समीप से कुछ न देखा था पर अब प्रायः  देखता हु, क्या कहूँ? भारत आदि काल से ऐसा था या अब हो गया है मेरी समझ से परे है, जिन आदर्शों का हम दंभ भरते हैं वह कहा हैं? किस कोने में?  मैं तो थक गया हूँ पर कहीं पद चिन्ह नहीं मिले उन आदर्श सिद्धांतों के जिन्हें हम विश्व समुदाय के सामने गर्व से कहते हैं.
                                                 क्या यह वही देश है जहाँ नारियों की पुजा होती थी, पर अब तो बलात्कार हो रहा है, मुझे नहीं लगता कि कभी नारी को उसका सम्मान मिला. अगर इतिहास में कभी हुआ हो तो द्रौपदी के साथ क्या हुआ था? क्या उस युग की महान विभूतियाँ दुर्योधन की सभा में द्रौपदी का सम्मान कर रहीं थीं?  अगर ये सम्मान है तो अपमान क्या था? वास्तविकता तो ये है की नारी कि जैसी दशा हजारों साल पहले थी वैसी ही अब भी है, फर्क इतना है की तब बहुत कम घटनाएं प्रकाश में आती थीं और अब अधिकतर घटनाएं संज्ञान में आ जाती हैं.
                 नारी युगों से शोषण  और उपेक्षा की विषय रही है, शरीर से शक्ति की अवधारणा केवल धर्म ग्रंथों में ही मिलती है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता अब भी जब पुरुष इकठे होते हैं तो स्त्री देह उनके चर्चा का मुख्या विषय होती है, उनकी धार्मिक परिचर्चा कब नारी चर्चा में बदलती है कुछ पता ही नहीं लगता, चर्चा शुरू होते ही जो धर्म कर्म कि बात करते हैं सबसे पहले उनके ही ज्ञान कि पोथी खुलती है, फिर क्या जिनके पावँ कबर में होते हैं वे भी कान उटेर के सुनते हैं क्योंकि भारतीय गप्पे मरने के अलावा कुछ नहीं करते, जो कर्मठी  होते हैं वे यहाँ टिकते ही नहीं.
                                            हम पश्चिम को अकारण ही व्यभिचार और वासना का जनक कहते हैं, कम से कम वो जो करते हैं उनके जीवन का सामान्य हिस्सा है पर हम वासना और व्यभिचार ढ़ोते हैं और तर्क देते हैं अपने गौरव शाली अतीत का, जिन्हें हम कब का रौंद चुके हैं. २१ साल कि युवती हो या ५ साल कि छोटी बच्ची, हमारे यहाँ कोई सुरक्षित नहीं है. हम कितने गर्व से कहते हैं कि सबसे पुरानी  सभ्यता हमारी है, ये क्यों नहीं कहते कि वो पुरानी सभ्यता अब असभ्यता में बदल गयी है, कोई थोडा भी जागरूक विदेशी हो तो हमसे यही कहेगा कि तुम उसी भारत के हो जहाँ बलात्कार नियमित होते हैं  और जनता तमाशा देखती है, और  बलात्कार होने के बाद सरकार पर गुस्सा जाहिर करती है, पर बदलाव का कोई वादा नहीं खुद से करती है. ''निकम्मी जनता-निकम्मी सरकार''.
                     किसी विदेशी इतिहासकार ने क्या खूब कहा है की ,'' भारतीय स्वाभाव से ही दब्बू और भ्रष्ट होते हैं''. पढ़ कर कुछ अजीब लगा पर जब सोचा तो लगा की हमने खुद को साबित किया है नहीं तो कोई विदेशी हमें  ऐसा क्यों कहता. क्यों हम ऐसे हैं? दोहरा चरित्र क्यों जीते हैं हम? मुखौटे लगा के हर इंसान बैठा है व्यक्ति का वास्तविक रूप क्या है कुछ पता ही नहीं चलता. अध्यात्म का चोगा पहन कर मुजरा देखना तो फितरत बन गयी है.
                                              आज कल साधू -महात्मा भी कम नहीं हैं, आश्रमों की तलाशी ली जाए तो पता चलेगा कि ये साधू नहीं सवादु हैं और सारे अनैतिक कामों का  सबसे सुरक्षित अड्डा बाबाओं के पास ही है. न जाने कितने ढोंगी मंच पे नारी को माँ बुलाते हैं और प्रवचन के बाद उनका शोषण  करते हैं. फिर भी हाय! रे भारतीय जनता ढोंगियों को भी पलकों पे बिठा के रखती है.
     एक नारी जिन्दगी भर चीखती-बिलखती रहती है और पुरुष समाज कभी उसके देह से तो कभी भावना से खिलवाड़ करता है, अपने शैशव काल से ही दोयम दर्जे कि जिन्दगी जीती लड़की बड़ी होते ही घर वालों कि नज़रों में भले ही बच्ची रहे पर समाज उसे बड़ा कहना शुरू कर देता है, अपने खेलने खाने कि उम्र में भेड़ियों का या तो सिकार हो जाती है, या शादी करके ससुराल भेज दी जाती है. गरीब बाप में समाज  से लड़ने का दम नहीं होता और ससुराल में गुडिया को ढंग नहीं आता. दयनीय स्थिति तब होती है जब ससुराल में लड़की रुलाई जाती है कभी दहेज़ के लिए, तो कभी लड़की पैदा करने के लिए. नारी होना जिस समाज में अभिशाप हो उस समाज या राष्ट्र को महान कहना उचित है?
मैथिलि शरण गुप्त जी कि कविता बरबस याद आती है, ''अबला तेरी यही कहानी, अंचल में दूध आँखों में  पानी''. 
ये सत्य है कि एक औरत जिन्दगी भर रॊति बिलखती रहती है , पर पुरुष उसे निचा दिखाकर अपना पुरुषत्व सिद्ध करता है, इतना क्यों सहती है नारी? क्या महाकाली या चंडी माँ कि संकल्पना कॊरि कल्पना मात्र है? सहना  स्वाभाव है अथवा विवशता? 
''अबला तुझे समझना चाहा
पर 
समझ न सका, 
तेरे अनगिनत रूपों को देखा
पर एक को भी
पहचान न सका,
देख रहा हूँ सदियों से
तुझे पिसते, 
पर कभी 
नही देखा तुझे 
उफ़ तक करते.
बचपन में घर में 
भेदभाव,
समाज में 
भेड़ियों कि चुभती नज़रें,
सहती आई,
पर कोई प्रतिकार नहीं,
शांत समुद्र में भी
ज्वार और भाटा उठते हैं,
पर 
तू तो समुद्र होते हुए भी
चुप रहती है,
दोपहर में 
तपती धुप में
बर्तन धुलती 
आंगन में 
तू दिखती है, 
पाँव में पड़े छाले 
तुझे दुःख नहीं देते?
जो तू पगडंडियों 
पर पति के लिए ले जाती है
खाना,
वो खुद भी आ सकते थे,
पर तू उन्हें कैसे दुःख
दे सकती है,
जो तुझे आजीवन दुःख
देते हैं.
बच्चा बीमार हो तो तू,
ठीक हो जाती है,
पति कि मार सहती है,
पर
उसके लम्बी उम्र कि
कामना करती है,
माँ तू है क्या,
मैं न समझ सका
तू ही मुझे बता?''
क्या कहूँ एक नारी है जो सहती है, दबती है और एक पुरुष है जो भारत के अखंड गौरव को मिटने पर तुला है.
                               एक भारतीय होने के नाते मैं अंतिम दम तक भारत को महान कहूँगा पर एक इंसान होने के नाते मैं चाहूँगा कि मेरे देश में कुछ सुधार हो, और तब तक मैं इसे महान नहीं कहूँगा जब तक ये महान होगा नहीं, किसी देश कि जनता उस देश को महान बनती है, हम फिर क्यों अपने राष्ट्र कि अवमानना करने पर तुले हुए हैं?

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मधुकर


मैंने देखा दिवा स्वप्न एक,
             जाने कौन कहाँ से आया?
कुछ पल ही नयनों में ठहरा
             फिर ओझल  हो गया पराया.
कहाँ  कोई यहाँ रुक पाता है?
              धर्मशाला ये हृदय नहीं है,
बड़े बड़े वीर लौटें हैं  
                सहज तनिक भी विजय नहीं है.
मैं ठहरा एक रमता जोगी
                 पल पल बनता नया बसेरा
सफ़र में ही रातें कट जातीं
                  मेरे लिए क्या सांझ सवेरा?

जितने मधुकर दीखते जग में
                          सब मेरे अनुयायी हैं
जिन जिन राहों से मैं गुजरा,
                    सारे पथ दुखदायी हैं.
बहुत दिनों की दीर्घ यात्रा
                     कदम कदम पीड़ा में गुजरा,
कहाँ कहाँ मधु मैंने खोजा,
                     अब तो मधुवन को भी खतरा.
बहुत प्रसून मिले मझे पथ पर
                      भौरे किन्तु थे बहुत प्रबल,
प्रयत्नों से व्यथित हो उठा
                        प्रतिद्वंदी  थे बहुत अटल.
आज फूलों ने मुझको घेरा,
                         अब मैं मधु ले आऊंगा,
कई मास कास्ट में बीते,
                         अब बैठे बैठे खाऊंगा.
मिल जाते सुन्दर प्रसून भी,
                           लगन रहे यदि पथ पर,
चाहे मैं जंगल में जाऊं,
                            मंडराता रहता कोई नभ पर.

बुधवार, 20 मार्च 2013

चूँ चूँ करती आई चिड़िया


एक पुरानी उक्ति है कि जैसे जैसे भौतिकता बढती जाती है हम नैसर्गिकता से दूर होते जाते हैं, फिर कश्मीर कि मनोरम घाटियाँ नहीं अपने वातानुकूलित कमरे अधिक मनोहर जान पड़ते हैं. विज्ञान ने हमे अनन्त सुख दिए हैं किन्तु कही न कही हमसे हमारे प्रकृति को छीन लिया है, प्लास्टिक कि चिड़िया हमारे गौरैया से अधिक अच्छी लगने लगती है, क्योंकि प्लास्टिक कि गौरैया हाथ आती है और असली गौरैया हमसे इतना डर गयी है कि हाथ नहीं आती और जो हाथ में नहीं उसका ध्यान इंसान क्यों रखे? आपने कहावत तो सुनी होगी न ''अंगूर खट्टे हैं''.


                           गौरैया बहुत ही व्यवहारिक पंछी है.जहा इंसानों कि बस्ती वहाँ गौरैया, पर अब इंसान ही नहीं रहे तो गौरैया कहाँ  से मिले? अभी कुछ साल पहले तक इनकी संख्या सामान्य थी पर पिछले कुछ वर्षों  से लुप्त होने के क़गार पर ये पहुँच चुकी हैं.पहले कच्चे घास फूस के मकानों में, खपड़े के घरों में, पुराने खंडहरों में बहुत दिखती थी. मुझे याद है जब मेरी छोटी बहन रोती थी तो मैं उसे लेकर आँगन में दौड़ पड़ता था गौरैया दीखाने, और गौरैया देखते ही वो चुप हो जाती थी क्योंकि उनकी लड़ाइयाँ  इतनी अच्छी लगती थी कि कोई भी  सब कुछ भूल कर  उन्हें देखने लग जाता था . मेरे घर आज भी गौरैया आती है क्योंकि गावों में आज भी शहरों कि अपेछा पर्यावरण अधिक स्वच्छ है.
     गौरैया के अचानक से विलुप्त होने के कई कारण हैं, उनमे से सबसे बड़ा कारण है कि पर्यावरण असंतुलन. शायद अन्य विलुप्तप्राय पंछियों कि तरह इसमें भी प्राकृत से संघर्ष करने कि छमता कम हो. बहुमंजिली इमारतें जिनमे चीटियों के रहने कि जगह होती नहीं है उनमे बेचारी गौरैया कहा से अटे? गावों में तो ये वर्षों तक यथावत रह सकती हैं क्योंकि सरकार आज भी गावों की उपेक्षा करती आ रही है, और कल भी करेगी जब भौतिकता नहीं, तो नैसर्गिकता तो रहनी ही चाहिए. दिल्ली सरकार ने तो शायद इसकी सुरक्षा के लिए इसे  राज्य पंछी घोषित कर दिया है, पर मुझे नहीं लगता जहाँ नारी सुरक्षित नहीं वहां  बेचारी गौरैया  सुरक्षित रहेगी?
                                   मानव इतना स्वार्थी हो गया है की अपने स्वार्थ और सुख  के लिए कुछ भी कर सकता है, भले ही ये सुख छणिक हो. कुछ उत्तेजक  दवा बनाने वाली कंपनियां इन छोटे पंछियों को मार कर उत्तेजक दवाएं बनती हैं जो कथित रूप से व्यक्ति की शारीरिक छमता बढ़ातीं हैं, इन दवाओं  की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत बहुत अधिक है, इंसान की फितरत है की वो पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है. छाणिक शारीरिक सुख के लिए किसी के जीवन का अंत कहाँ उचित  है? वैसे भी पुरुषार्थ बढ़ने कि दवा बाजारों में नहीं मिलती, व्यक्ति इसे लेकर पैदा होता है.
       जिनके साथ हमारा बचपन बीता हम जिनके साथ हम बड़े हुए उनके बिना ही बुढापा आएगा ये तो तय है, हमारी आने वाली पीढियां बस किताबों में पढ़ेंगी की गौरैया नाम की चिड़िया हुआ करती थी.खैर उनकी रूचि भी जीवित जंतुओं में नहीं होंगी क्योंकि तब तक विज्ञान अपने चरम पे होगा और कृत्रिमता का प्रभाव और व्यापक होगा. फिर प्लास्टिक प्रकृति पर भारी पड़ेगा, इतना भारी की शनैः शनैः नैसर्गिक वस्तुएं  अपना अस्तित्व  खो देंगी.
    '' जब विज्ञान अपने चरम पर होता है तो विध्वंस भी अपने चरम पर होता है.'' देखते हैं प्रकृति की जीत होती है या पुरुष की? भौगोलिक असंतुलन से कोई अपरिचित नहीं है पर्यावरण वैज्ञानिक काम तो कर रहे हैं पर कागजों में, अन्य देश तो अपने चहुमुखी विकास की ऒर ध्यान दे रहे हैं किन्तु भारत में केवल बात होता  है, काम नहीं. पर्यावरण मंत्रालय जिनके हाथ में है उनका इससे कुछ भी लेना - देना नहीं है, जिस जगह पे वैज्ञानिक होना चाहिए वहां सरकार ने नेता बैठा दिया है, भारत में मेरे ख्याल से मंत्रालय निलाम होता है जो जितना अधिक दाम दे मंत्रालय उसका.
                 कब हमारी सोच व्यक्तिवादी न होकर राष्ट्रवादी होगी? जब हम लुट चुके होंगे या भिखारी बन चुके होंगे? आज गौरैया लुप्त हो रही है भारत से , कल भारत लुप्त होगा दुनिया से जागो भारत वासियों, क्यों पड़ते हो नेताओं के झूठे चक्कर में? कभी साम्प्रदायिकता में फंसते हो तो कभी वादों में. देश जितना नेताओं का है उससे कही अधिक हमारा है हम अपने देश की रक्षा करने में सक्षम हैं, देश के दुश्मनों को एकजुट होकर निकलते हैं,क्योंकि यदि हम कुछ और दिन शांत रहे तो ये हमें सदा के लिए शांत कर देंगे.
     कुछ काम हम सरकार के सहयोग के बिना भी कर सकते हैं, जैसे खाली जगहों पर पेड़ लगाकर, अवैध पेड़ों के काटन पर रोक  लगाकर,और लोगों को जागरूक कर के कि यदि प्रकृति नहीं रहेगी तो हम भी नहीं रहेंगे, हरियाली रहेगी तो समृद्धि भी रहेगी, मानव जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ है कि वह कृत्रिमता से ऊब जाता है, जो सुख प्रकृति में निहित है वह कही और नहीं, हम अपने पर्यावरण कि रक्षा कर के अपने आने वाले पीढ़ियों को सब कुछ वास्तविक  देंगे कृत्रिम नहीं क्योंकि कृत्रिमता कभी स्थायी नहीं होती, और हम भारतियों को कुछ भी अस्थायी पसंद नहीं आता.
                                       गौरैया घर-घर में आये खरीदना न पड़े, वैसे भी चीजें बहुत मंहगी हो गयी हैं फैसला आप कीजिये, कि गौरैया खरीदेंगे या बुलायेंगे?

बुधवार, 13 मार्च 2013

नारी…..एक वेदना


दिल्ली सरकार की निष्क्रियता और नपुंसकता में अधिक अंतर नहीं है, नपुंसकता व्यक्ति विशेष  की समस्या होती है किन्तु सरकार ने क़ानून को ही नपुंसक बना दिया है.न्याय , इन्साफ जैसे शब्द तो मात्र कल्पनाओं में रह गए हैं, कुछ दिन पहले दामिनी कांड ने देश को झकझोरा था, कुछ दिनों तक जनता और जनता में व्याप्त नरभक्षी चुप थे पर अभी कुछ दिनों से बलात्कार का सिलसिला थम ही नहीं रहा है, इंसान इस हद तक वहशी हो गया है की मासूमों तक को नहीं छोड़ रहा है.सरकार नपुंसक और जनता में पुरुषत्व का ह्रास और व्यभिचार की अधिकता. भारत का भाग्य लिख कौन रहा है?
               युग और सामाजिक परिस्थितियों  के अनुसार कानून बनाये जाते है किन्तु यहाँ तो क़ानून वर्षों पुराना है जो  वर्तमान परिवेश में अप्रासंगिक है,.कुछ और कठोर प्रावधानों की आवश्यकता है क्योंकि उन्नीसवीं  शताब्दी   की परिस्थितियां आज  से बहुत भिन्न थीं. भारत के जितने भी नियम क़ानून हैं सारे अंग्रेजों के ज़माने के हैं उनमें संशोधन  की आवश्यकता है.यह  कहना अनुचित नहीं है की भारत के अधिकतर क़ानून बासी हो गए हैं उन्हें संशोधित   कर कुछ कठोर क़ानून बनाने होंगे. '' जिस देश में अपराधियों के अपराध हेतु कठोर दंड न हो वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता.''
         देश का दुर्भाग्य तो देखिये इस देश में कोई देशभक्त नेता ही वर्षों से नहीं हुआ, जो देश के लिए कुछ करना चाहता है वो कुचल दिया जाता है और उसके अवसान में देश की जनता का सबसे बड़ा हाथ होता है. अब जनता अपने लिए अच्छा नहीं सोच सकती तो जिनकी रगों में बेईमानी भरी है वो क्या देश के लिए सोचेंगे. देश को रसातल में पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान नेताओं का है.
 हम नाम के गणतंत्र में रह रहे हैं, ये वास्विक गणतंत्र नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ के विधि को नियमित और नियंत्रित करने वालों में देश भक्ति जैसी कोई भावना नहीं है. हर व्यक्ति स्वार्थी और व्यभिचारी हो गया है. व्यभिचार तो इस हद तक बढ़ गया है कि मासूम बच्चियां तक नहीं छोड़ी जा रही हैं.घिन आती है अब अपने सरकार से. समझ में ये नहीं आता की हम उसी भारत में रह रहे हैं जहाँ के  कभी दर्शन और नीति विश्व के लिए अनुकर्णीय होता था?
 भूल गए हैं हम अपने संस्कारों को मर्यादा को. नारी आज भी शोषण की विषय बन के रह गयी है, चाहे वो घर हो, कार्यस्थल हो या सड़क बस महिलाओं के साथ , साथ होता है तो बस दुर्व्यवहार. उनकी नियति ही बन गयी है अवहेलना.
    यदि सरकार निष्क्रिय है तो नागरिकों को तो सक्रिय होना चाहिए. नारी का सम्मान तो कर सकते हैं, कैसे हम भूल जाते हैं किसी महिला पर भद्दी टिप्पणी  करते समय की हमारी भी माँ, बहन और बेटी है? उन पर कोई अश्लील टिप्पणी  करे तो कैसा लगेगा? जो हमारे लिए बुरी  हो वो किसी और के लिए अच्छी  कैसे हो सकती है? कब देंगे हम नारियों को उनका अधिकार?
                        हम सभ्य समाज में रहते हैं तो ये पशुवत व्यवहार क्यों? नारी भोग  की विषय वस्तु  नहीं है, नारी माँ  है, नारी से हमारा जीवन है कभी वो हमसफ़र बन हर कदम पर साथ होती है तो कभी माँ  के रूप में भगवन बन. फिर भी उसके हिस्से में ये अपमान क्यों? कुछ दिन पहले मैंने एक कविता लिखा था नारी को केंद्र में रख कर कविता कुछ यूँ है,
  ''दूर्वा हूँ, मै घास हूँ,
सदा से कुचली
जाती हूँ,
हर कोई  कुचल के
चला जाता है,
मैँ जीवन देने वाली
हूँ ,
पर मेरा जीवन
दासता मेँ बीतता है,
कभी पति की,
कभी सास की,
लोग ताने देते हैँ,
और मै सहती हूँ,
डर से नही
मेरा स्वभाव ही ऐसा है.
कष्ट मुझे तब होता है,
जब मेरा जन्मा बेटा ही,
 मुझे अपशब्द कहता है.
और मैँ बस
देखती रह जाती हूँ,
मुझे अब सहना बँद करना है,
क्योँकी सहने की एक सीमा होती है,
और उस सीमा को
पुरुष पार कर चुका है.
अब झुकी तो मिट जाऊँगी.''
                                      यदि हमे अपने पुरुषत्व पर इतना अहंकार है तो नारी से भय कैसा? हम उन्हें उनका अधिकार तो दे सकते हैं. कब तक संकीर्ण विचार धाराओं में सिमटे रहेंगे?



   
 

सोमवार, 11 मार्च 2013

अनजान

 ''चलते चलते कितनी दूर ,
   निकल आया मैं 
खुद से दूर,
पता ही नहीं चला,
की खुद को 
ख़ोज रहा हूँ  या मंजिल को।
   अनजान से सवाल 
बेमन से जवाब 
अधूरे रिश्ते 
और रिश्तों में अजीब सी 
बेचैनी,
जो न छुपा पता हूँ,
न बता पता हूँ।
शाम हो तो,
रात लगती है,
रात हो तो सुबह,
कैसे ये सिलसिले हैं ये,
जो ख़त्म ही नहीं होते, 
उलझता रहता हूँ कभी
खुद में,
कभी सवालों में।
दिल की बात,
दिल में ही रह जाती है, 
     बोलूँ  तो  डर  लगता  है,
छुपाऊं तो घुटन होती है, 
कैसी है ये मेरी 
बेचैनी?
जो हर पल 
उलझती ही जाती है।'' 

बुधवार, 23 जनवरी 2013

जीवन

''मैंने रातों में जग के देखा,  

 

             और दिनों में सो के देखा ,


दोनों में कुछ हम खोते हैं,

                  हँसते भी हैं रोते भी हैं।''

                    

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

गुमनाम

कितना अँधेरा है यहाँ ,
      राह चलते चेहरे गुम 
हो जाते हैं, 
 साथ चलने वाले 
 कब राह बदल दें ,
कुछ पता ही नहीं चलता ,
अँधेरा और बढ़ता जाता है, 
गुमनामी शुरू होती 
जाती है,
किसे अपना कहें , 
अपनी परछाईं साथ नहीं देती 
लोग तो फिर भी लोग हैं ...

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दँश



 कितना जर्जर ये लोकतँत्र है,
 इससे तो तानाशाही अच्छी,
केवल हम दँश झेलते हैँ,
 सरकार यहाँ है नरभक्षी.
 जब लोकतँत्र के मँदिर मे,
 भगवान भ्रष्ट हो बैठा है,
 करता जनता का शोषण,
 जाने किस बल पर ऐठा है,
 सच के लिये जो लडते हैँ,
उन पर चलती हैँ बन्दूकेँ
आजादी कि कोयल अब
 बोलो किस बल पर कूके?
 क्या सत्ता मेँ आकर शासक,
 मानवता को जाता भूल,
 या इनके कलुषित ह्रदयोँ मेँ
 चुभते रहते नियमित शूल.
 "पदच्युत हो जाते इन्द्र यहाँ,
 मानव कि औकात ही क्या,
 हमसे ही हमारा शासन है,
 फिर सत्ता कि सौगात हि क्या,?
 "अब होश मेँ आओ गद्दारोँ,
 भेजेँगे तुम्हे तड़ि पार,
 बचने कि उम्मीद न करना,
 जनता मारेगी बहुत मार."

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

अनुलग्नक


कभी कभी परिस्थितियां व्यक्ति को मूक बना देती हैं. चाह के भी कुछ कह पाना बड़ा मुश्किल होता है, विधाता कुछ लोगों को अद्भुत तर्क शक्ति से समृद्ध करके धरा पर भेजते हैं. ऐसे महान लोगों को न तो कोई कुछ समझा सकता है, न ये समझना चाहते हैं. क्योंकि जब इन्हें औसत बुद्धि का कोई मानव कुछ समझाना चाहता है तो ये उसे अपने अकाट्य तर्कों से चुप कर देते हैं. ये भी सत्य है की अधिक आत्मविश्वास अहंकार का कारण होता है. यह ध्रुव सत्य नहीं है की हम हमेशा सत्य ही होंगे, त्रुटियाँ सबसे होती हैं चाहे वो कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो. सदैव अपने निर्णय सर्वश्रेष्ठ नहीं होते औसत बुद्धि के लोग भी प्रकांड पंडितों से अधिक बुद्धिमानी का कार्य करते हैं. अपने विचारों को शाब्दिक अर्थ देना उचित है उस सीमा तक की जब तक शब्द किसी का अहित न करे , अथवा कष्ट न पहुचाये, शब्द जितने सरल होते हैं उनका प्रभाव उतना ही गहरा होता है, किन्तु कुछ अतिबुद्धिमान व्यक्ति अपना पांडित्य सिद्ध करने हेतु व्यंगार्थक, अथवा कुछ विशिष्ट शब्दों का चयन करते हैं जो श्रोता के मन में अकारण ही क्रोध उत्तपन करता है. रसायन शास्त्र में अनुलग्नक और पूर्वलाग्नक का बड़ा महत्व है, कुछ लोगो को सरल भाषा आती ही नहीं, उसमे अनायास ही पूर्व्लाग्नक और अनुलग्नक सम्मिलित करते है, फलतः अर्थ का अनर्थ हो उठता है . किसी भी प्रकार का अहंकार विषाद का कारण बनता है. अहंकार सदैव दुक्दायी होता है, और अहंकार ही व्यक्ति को अहंकार पतन की ओर ले जाता है... अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना उचित है किन्तु अहंकार करना सर्वथा अनुचित . कोई भी पूर्ण नहीं होता , हम मानव हैं भगवान नहीं, अहंकार से मानव जीवन के परम लक्ष्य अर्थात निर्वाण की प्राप्ति नहीं होती, अतः अहंकार से मुक्त रहो , भारतीयता के मार्ग पर निर्भीक होकर बढ़ो , पथ की सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का भय होता है, भय त्यागो...उन्मुक्त गगन में स्वछन्द उड़ान भरो..अन्तरिक्ष प्रतीक्षा में है ..........
छायांकन - श्वेता शुक्ला

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

संकल्प


कैसा यह मेरा जीवन है,
 अर्थवान भी अर्थहीन भी,
 बिन बूंदों के बादल जैसा,
 आवश्यक भी महत्वहीन भी ,
 जडवत हूँ चेतन भी हूँ,
 किन्तु चेतना सीमित है ,
जा सकता हूँ नभ पार अभी ,
 आशा भी अवलंबित है ,
 कई किरण हैं उस प्रकाश के ,
 जो जीवन का है गंतव्य ,
 किन्तु कही बाधा अटकी है,
 सीमित करती जो वक्तव्य ,
 मैं अक्सर डग-मग होता हूँ,
 नभ के उत्तेजित पवनों से,
 थक हार बैठता हूँ प्रायः,
 थल के दुखदाई वचनों से
 ये जग मेरे अनकूल नहीं ,
 मुझको अनुकूलन लाना है,
 सींचित यदि सत्य रहा मुझमें,
 तो जग को स्वर्ग बनाना है...

बुधवार, 26 सितंबर 2012

.........बचपन .......

'' जब मैं छोटा बच्चा था,
 बस्ते में किताबें होती थी,
 हम चलते चलते थकते थे ,
 राहें कंकर की होती थीं .
 टेढ़े मेढ़े रास्तों में हम
 अक्सर गिर जाते थे ,
सड़कों को पैर से मार मार कर,
 भैया दिल बहलाते थे ,
मैं तो रो पड़ता था हरदम,
 आग उगलती गर्मी से ,
भैया मुझको गोद उठता,
 मम्मी जैसी नरमी से ,
जिन राहों से हम आते थे,
 थे वह बंजारों के डेरे ,
जब हम उनको दिख जाते थे ;
 मोटी मोटी लाठी लेकर,
 आस पास मंडराते थे,
 तब जब पीछे से एकदम,
 भैया जब आ जाता था,
 सबको मार मार कर,
ताड़ी पार कर आता था ,
 मुझको अब भी याद आती हैं,
भूली बिसरी सारी बातें ,
 जाने क्यों चुप चाप कही से ,
 भर आती हैं मेरी आँखें ,
 आज बदल गया है सब कुछ ,
सब कुछ फीका फीका है,
 मतलब की दुनिया है यारों,
 कोई नहीं किसी का है ,
 अब भी पढ़ते हैं हम सब,  
सब कुछ बदला बदला है,
 कही धुप कही छावं है,
 कुछ भी नहीं सुनहरा है,
 सड़के पक्की हो गयी अब तो ,
 पर उनमें है खाली पन,
 मुझको अक्सर याद आता है,
अपना प्यरा प्यारा बचपन ......''

रविवार, 16 सितंबर 2012

कवी

इन दिनों कुछ अजीब सा लग रहा है, कुछ लिखना चाहता हूँ पर शब्द साथ ही नहीं देते जैसे मैंने इन्हें कोई छति पहुचाया हो -
 न मैं कवी हूँ,
   न कवितायें मुझे अब,
रास आती हैं,
मैं इनसे दूर जाता हूँ,
ये मेरे पास आती हैं,
हज़ारों चाहने वाले पड़े
हैं इनकी राहों में,
मगर कुछ ख़ास
मुझमें है,
ये मेरे साथ आती हैं.




''कई चाहत दबी दिल में,
 जो अक्सर टीस भरती हैं,
 मेरे ख्यालों में आकर.
 मुझी को भीच लेती हैं ,
 कई राहों से गुजरा हूँ ,
दिलों को तोड़कर अक्सर ,
 मगर कुछ ख़ास है तुझ में,
 जो मुझको खींच लेती है ...