शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

किस ओर जा रहा है भारत में राष्ट्रवाद?

यदि आप स्वयं को भारतीय संस्कृति के रक्षक मानते हैं या आपको अपने घनघोर राष्ट्रवादी होने का अभिमान है अथवा आप भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय सदस्य हैं तो आपसे एक अनुरोध है कि आप फिर से उन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों का अध्ययन करें जिन्हें आपने बचपन में पढ़ा,सोचा या समझा है।
याद कीजिए जब आप घर से स्कूल के लिए निकलते थे तो स्कूल में आपको क्या-क्या सिखाया जाता था। कैसे प्रार्थना में आपको ये समझाया जाता था कि इस संसार में सब पूजनीय हैं, धरती माँ से लेकर पशु-पक्षी तक। किस तरह से आपको समझाया जाता था कि समाज समता मूलक है। दुनिया एक परिवार की भांति है जिसमें सबको परस्पर प्रेम और सहअस्तित्व की भावना को स्वीकार कर साथ-साथ रहना चाहिए।
कैसे समझाया जाता था कि दुनिया एक दर्पण की तरह है जैसा आपका आचरण होगा वैसा ही आपके साथ व्यवहार होगा।
 व्यवहार और आचरण की शुद्धता पर तो नैतिक शिक्षा की कक्षा ही लगाई जाती थी, जिसमें सिखाया जाता था कि शत्रु से भी मित्रवत् आचरण करो। शत्रुता अंततः प्रबल प्रेम के आगे हार जाती है। हर धर्म और विचारधारा का सम्मान करो। अपनी विचारधारा किसी पर थोपो मत। विचारधाराओं की लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई न बनाओ।
मृदुभाषिता, अहिंसा और भाषा की सौम्यता पर तो दर्जनों श्लोक पढ़ाए और समझाए जाते थे।उन सारे  श्लोकों से,शिक्षाओं से आपके व्यवहार का विपथन आपको नितांत अतार्किक और अप्रासंगिक ही बनाएगा। इनमें से तो कोई एक लक्षण आपमें नहीं दिख रहा है।
समझ में नहीं आता कि ये सारी व्यवहारिकता आप लोगों के आचरण से रूठ कर कहां चली गई है। क्या गोस्वामी जी की चौपाई को सही मान लें कि 'जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकि मति पहिले हर लीन्हा'? बीते कुछ दिनों से तो यही लग रहा है।
ग़ज़ब पागलपन सवार है कुछ लोगों पर।
किसी भी संगठन का विनाश उसके आलोचक या प्रतिद्वंद्वी नहीं करते हैं। वे चाहते हैं कि वो संगठन फले-फूले तभी तो दमदार प्रतिद्वंद्वी मिलेगा आलोचना करने को,  हराने को। लड़ाई तो बराबरी वालों से ही अच्छी होती है न?
लेकिन यहां तो संगठन के अंध समर्थक ही संगठन को मिटाने के लिए पर्याप्त  हैं।
इस विनाश के मूल छिपा  है कार्यकर्ताओं का व्यवहार। व्यक्ति का  व्यवहार सामान्यतः उसके पारिवारिक संस्कारों पर निर्भर करता है, कई बार आस-पास का माहौल और सामाजिक दशा पर भी, किन्तु यह ध्रुव सत्य नहीं है। व्यक्ति के अच्छे या बुरे व्यवहार के अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे संगति,स्वभाव, रुचि इत्यादि।
यही अंधसमर्थक कार्यकर्ता संगठन की फजीहत कराते हैं। इनका पढ़ा-लिखा होना भी किसी काम का नहीं होता क्योंकि ये अपने विवेक का इस्तेमाल शायद ही कभी करते हैं। इसे मार दो, इसे पीट दो, ये फालतू बोल रहा है, ये ऐसे कैसे बोल सकता है। चलो साथियों आज इनपे बजा देते हैं, हाथ-पैर तोड़ देते हैं बहुत अकड़ आ रही इसमें...इस चक्कर में सारा संगठन हाशिये पर चला जाता है।
सामान्यतः भारत में जन्म लेने वाला हर दर्शन इसी उन्माद की भेंट चढ़ता है। अंधअनुयायियों की एक फौज पूरी विचारधारा को ले डूबती है। इनकी ख़ास बात होती है कि ये लोग न तो उस दर्शन को पढ़ते हैं न ही समझने भर की बुद्धि होती है। इन्हें केवल ठोकने-पीटने से मतलब होता है। संगठन की सदस्यता ये उस दर्शन से प्रेम की वज़ह से नहीं लेते बल्कि भौकाल बढ़ाने के लिए लेते हैं।
हर संगठन और विचारधारा को ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए। मूढ, कुसंस्कारी और क्रोधी व्यक्ति कभी भी विश्वसनीय नहीं होता और किसी संस्था के लायक नहीं होता। इनसे किसी संस्था का रत्ती भर भी फायदा नहीं हो सकता। हां! इनसे होने वाले नुकसान पर तो महापुराण लिखा जा सकता है।
भारत की सांस्कृतिक विरासत पर यदि आपको अभिमान है, भारतीय मूल्यों पर आपको गर्व है तो ठीक है। होना चाहिए, मुझे भी गर्व है। लेकिन मेरा गर्व अहंकार की परिधि में नहीं आता है।
लाठी- डंडों से आप सबको नैतिकता नहीं सिखा सकते। यह कृत्य स्वयं ही अनैतिक है। भारतीय दर्शन हिंसा की बात तो नहीं करता। शांति, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द और सहअस्तित्व की भावना, भारत के मूल दर्शन का हिस्सा है। सोचिए कितने कटे हैं आप इससे। कितने भटके हुए हैं आप भारतीयता से। किस ओर ले जा रहे हैं आप समाज को?
असहिष्णुता, हिंसा और धार्मिक भेदभाव की ओर?
ये आपकी राष्ट्रभक्ति है? एक हाथ में शराब, दूसरे हाथ में डंडा और मुंह में मां-बहन की गाली। उसी बीच में भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा।
किस तरह के भारत का आप प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?
मेरी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा एक संघ समर्थित विद्यालय में हुई है। पहली क्लास लगने से पहले वंदे मातरम्, जन-गण-मन और सरस्वती वंदना होती थी। इंटरवल में लंच से पहले अन्नपूर्णा प्रार्थना होती थी और शाम को छु्ट्टी से पहले राम और वंदे मातरम् का उद्घोष होता था। लेकिन इन सबके बावजूद भी किसी धर्म के प्रति दुराग्रह का पाठ नहीं पढ़ाया जाता था। सब बच्चे साथ रहते थे, खेलते थे,पढ़ते थे। देश प्रेम समझाया जाता था।
मैं संघ पोषित स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को भी जानता हूँ। भारतीय दर्शन और व्यवहार पर जब ये छात्र बोलते थे तो मंत्रमुग्ध हो सुनने का मन करता था। वे सारे छात्र कहीं न कहीं स्थापित हो गए हैं। कोई पढ़ रहा है तो कोई पढ़ा रहा है। कोई प्रशासनिक सेवा में है, कोई सेना में है  तो कोई इंजीनियर है। कोई वकील है तो कोई डॅाक्टर है। सब कामयाब हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में नाम कर रहे हैं।
ये सारे वे लोग हैं जिन्होंने इन संस्थानों में पढ़ाई की है। संस्कारों को जिया है, सीखा है। ये लोग उन्मादी नहीं हैं।
अगर ये लोग उपर्युक्त संस्थानों में आ जाएं तो कितना अच्छा हो।
सावरकर को तो इन्होंने पढ़ा है, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को तो इन्होंने पढ़ा है। भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रवक्ता तो ऐसे लोग हैं फिर ये लोग संगठनों में क्यों नहीं हैं? और वो लोग जो कार्यकर्ता कम गुंडे ज़्यादा हैं कहां से आए हैं? क्या सच में ऐसे संस्थाओं के सदस्यता के लिए अधिनियमित आहर्ता में नया संशोधन किया गया है? अब ऐसे ही लोग सदस्य बन सकेंगे जिनमें उत्पात मचाने का हुनर होगा?
विरोधी विचारधारा को सुने बिना तलवारें तान लेना कहां तक सही है। ये कहां का भारतीय दर्शन है?
लोकतंत्र में विचारधाराओं के सहअस्तित्व की स्वीकार्यता तो होनी चाहिए न?
सुनते क्यों नहीं? आपके पास भी अवसर आएगा असहमति का। अपने तर्कों से उन्हें अतार्किक सिद्ध करें। यह आपका संवैधानिक अधिकार है।लेकिन उनके विनाश के लिए हवन करना न शुरू कीजिए। आप जनमेजय की तरह निस्पाप नहीं हैं।
 अगर सब आपके ही विचारधारा का अनुसरण करने लगे तो भारत नीरस हो जाएगा। आपका  संगठन ही कई धुरियों में बंट जाएगा। कुछ अच्छे लोग ये उत्पात सहन नहीं करेंगे। अगर वे सब आपके संगठन से निकल गए तो फिर किसी भी दिन आप पर पूर्णकालिक बैन लगाया जा सकता है। जनता सब जानती है। किसी को भी एक हद से ज्यादा अवसर नहीं देती।
और हां! एक भारत और श्रेष्ठ भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब आपका व्यवहार और आचरण संयमित हो। आप भारतीय मूल्यों को जानते हों, आप तार्किक होने के साथ-साथ बुद्धिमान और विनम्र भी हों , जिससे लोग आपको सुन सकें और आप लोगों को सुन सकें।
 लेकिन आपका अपने पथ से भटकाव देखकर नहीं लगता कि आपकी कोई ऐसी मंशा है। आप ही बताइये! कहां ले जाना चाहते हैं भारत को? भारत को छोड़िए आपकी वज़ह से भारत को कुछ नहीं होगा। बहुत लोग आए भारत को तहस-नहस करने  सब पता नहीं कहां चले गए।
आप अपने ही संगठन को कहां ले जा रहे हैं? क्या कोई भी बुद्धिजीवी आपके इन ओछी हरकतों को सहन करेगा?
यदि आप सच में चाहते हैं कि आपका संगठन आगे बढ़े, तो आपको दो काम जरुर करना चाहिए-
पहला- आप अपने संगठन से इस्तीफा दे दें। कुछ दिन आराम करें और फिर से संस्कार और अनुशासन सीख कर आएं। आत्मावलोकन करें, आपको आभास हो जाएगा कि आपको सिखाया क्या गया था पर आप कर क्या रहे हैं। अगर पता होने के बाद भी आपको ग्लानि नहीं हो रही है तो आप इन संस्थाओं के लायक नहीं हैं। पुनः सदस्यता लेने की सोचें भी मत।
कुछ और काम कर लीजिए। संगठन आपसे बरबाद ही होगा बनेगा नहीं।
दूसरा ये कि सुनना शुरू कर दीजिए। अगर आलोचना नहीं सुनेंगे तो सुधार नहीं आएगा। सुधार नहीं आएगा तो बिगड़े लोगों को समाज मुख्य धारा में कभी गिनता नहीं है। सुधार अपरिहार्य है। अपने प्रासंगिकता के लिए आपको सुधरना होगा।
ख़ैर, जो भी करना हो कीजिए लेकिन इतना उन्माद और अहंकार न पालें। कुछ भी यथावत नहीं रहता।
जानते हैं न अहंकार ईश्वर का भोजन है। भगवान ने कहा है तो सही ही होगा। न लगे तो ऐसे ही बने रहिए, आभास भी हो जाएगा। फिर खोजते रहिएगा भारत के भूगोल पर स्वयं को।
आपसे सहानुभूति है इसलिए इतना लंबा पुराण लिखा। अपने समय को आपके लिए खर्च किया वो भी नि:शुल्क। आगे सब आप की इच्छा।
जय हिंद! वंदे मातरम्।
-अभिषेक शुक्ल।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

यहां जब भी हवा चलती

यहां जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैं
कभी जब सोचता तुमको
तो रातें कम सी होती हैं,
अज़ब है ग़म का भी आलम
न मैं कुछ कह के कह पाऊँ,
बिना तेरे मेरी सांसें
बड़ी बेदम सी होती हैं।।
फोटो - पीयूष कौशिक
(पुराने पन्नों से😊)

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ

चाहता हूँ आज तुमसे हार ख़ुद से जीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।

जो तुम्हारे प्यार में हर पल नया संगीत ढूंढे
चल सके हर पल परस्पर साथ वो मनमीत ढूंढे,
रोज तन्हाई में खुद के संग तेरा नाम जोड़े
बावरा मन हर जगह खोया सा तेरा प्रीत ढूंढे।
काश! काली रात सा मैं भी किसी पल बीत जाऊँ
मन कहे इक गीत गाऊँ।।
-अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

पुष्प के अभिलाषा का अंत




पुष्पों के मन की अभिलाषा
 नहीं थी कभी मनुज को ज्ञेय,
मौन विषयक मृदु भावों पर
 बुद्धि ने लिया नहीं कुछ श्रेय।
 पुष्प की नियति मृत्यु की भेंट
 मनुज उसे तोड़ बहाएगा,
है तो करकट ही राहों का
 पंकों को क्यों अपनाएगा।
 पुष्प का रूप उसका दुर्भाग्य
 तोड़ कर मानव देता फेंक,
स्वार्थ फिर उसी स्वार्थ का त्याग
 मनुज के अपराधों में एक।।
-अभिषेक शुक्ल

रविवार, 22 जनवरी 2017

शब्द कम पड़ रहे



शब्द कम पड़ रहे मैं सृजन क्या करुं
कोई समिधा नहीं फिर यजन क्या करुं,
ईश रूठा है मुझसे बिना बात ही
मैं भी रोते नयन से भजन क्या करूं?

सोमवार, 2 जनवरी 2017

हमसफ़र में सफ़र

पहली तारीख की रात ट्रेन में कटी। एक टाइम का अघोषित उपवास रखना पड़ा। ट्रेन सात घंटे लेट है,
तो लग रहा है कि दिन में भी उपवास रखना पड़ेगा।
गोरखपुर से आज-कल एक ट्रेन चल रही है, हमसफ़र एक्सप्रेस।

ट्रेन के सारे डिब्बे वातानुकूलित हैं। देखने में भी यह किसी वर्ल्ड क्लास ट्रेन की तरह लगती है।
मेरे दोस्त अतहर ने नई-नई ट्रैवल एजेंसी खोली है।
उसी ने कहा कि भाई! हमसफ़र से जाओ। बेहतरीन ट्रेन है। आठ बजे तक दिल्ली रहोगे।
मैं भी खुश हो गया कि क्लास छूटेगी नहीं।
मेरी तरह जनरल डिब्बे में यात्रा करने वाले व्यक्ति का इस ट्रेन को स्वर्ग कहना भी कम है, इसे बैकुंठ धाम भी कहा जा सकता है
लेकिन इस ट्रेन ने मुझे नए साल की पहली रात को भूखा सुलाया। ट्रेन में चाय , पानी और अंडे वाले केक के अलावा कुछ भी खाने -पीने के लिए नहीं था।
मेरे जैसे शाकाहारी इंसान के लिए पानी पीकर सोने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था।
भूखा होना आम दिनों से ज़्यादा तब अखरता है जब आप घर से आ रहे हों। दिन में चार टाइम गले तक ठूंस के खाने के बाद जब एक टाइम के लिए पेट को आराम मिलता है तब वह आराम किसी वेदना से कम नहीं होता। रात में मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे।
गोरखपुर में खाना इसलिए नहीं खाया कि ट्रेन में खाना मिलेगा। ट्रेन ने उपवास करा दिया।
किसी-किसी को जनरल डिब्बा सूट करता है, वहां खाने-पीने का कार्यक्रम रात भर चलता है।
वहां धड़कनें बन्द हो सकती हैं लेकिन मुंह नहीं।
चाय-चाय की मधुर ध्वनि से नींद तोड़ने वाले इस डिब्बे के आस-पास नहीं फटक रहे।
हमसफ़र में, मैं सच में 'सफ़र' कर रहा हूँ ।

मुझे याद नहीं कि पिछली बार मैं कब रिजर्वेशन करवा के घर गया था। लोकल डिब्बे की खचाखच भीड़ से मुझे कोई ख़ास समस्या नहीं होती है।शौचालय के बगल में बैठ कर इत्र जैसी ख़ुशबू का नियमित महकना मुझे चमत्कृत नहीं करता।
लोगों के द्वारा छोड़े गए कुछ विशिष्ट अपशिष्ट पदार्थों के बीच प्राकृतिक पीड़ा से उबरना भी असाध्य नहीं लगता। लोकल डिब्बा से मुझे विशेष प्रेम है। वहीं बैठकर अपने देहाती होने का एहसास होता है।
कहते हैं न कि हर चीज़ हर किसी के लिए नहीं होती। मेरे लिए 'जो मिले वही ट्रेन पकड़ लो' वाला सिद्धांत ठीक है।
सात घंटे लेट ट्रेन में जनरल डिब्बे की चें-पों मिस कर रहा हूँ।
दुआ कीजिए ये ट्रेन और लेट न हो....बैलगाड़ी से रेलगाड़ी जैसी चाल पकड़े तो बात बने 😓।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

हर हर महादेव

दिसम्बर के महीनें में जब, सुबह-सुबह रजाई स्वर्ग का सुख देती हो ऐसे में गंगा स्नान के लिए घने कुहरे की परवाह किए बिना १३४ किलोमीटर बाइक से हरिद्वार के लिए निकलना किसी एडवेंचर ट्रिप से कम न था। दस कदम दूर कुछ नहीं दिखाई पड़ता था। रास्ता सूंघ कर आगे बढ़ना पड़ रहा था।


बाइक चला रहे थे वीरु भइया, बीच में बैठा था अंकित और सबसे पीछे मैं। ट्रिपलिंग सवारी करना गैर कानूनी है लेकिन जब ड्राइवर, वकील हो तो उसके लिए ये सोचने का विषय नहीं होता। कोई न कोई प्रावधान पुलिस को समझा कर बचा जा सकता है।
ख़ैर हम सब कभी हिमालय नहीं गए हैं लेकिन आज बाइक पर साइबेरिया वाली फ़ीलिंग आ रही थी।
रास्ते भर कांपते रहे, एक जगह रुक कर हाथ की भी सिंकाई हुई।
सूरज भगवान समय से निकले। तब लगा कि शायद हमारी भक्ति देखकर भावुक हो गए हैं भगवान।

करीब ९ बजे तक गंगा मां में हम सब डुबकी मार चुके थे। रास्ते की सारी थकान रफूचक्कर। गंगा मां की धवलता और चंचलता यहीं देखने को मिलती है।
नहाने के बाद शांति कुंज , हरिद्वार में गायत्री मां के दर्शन और फिर भंडारे में भरपेट स्वादिष्ट भोजन 😋
फिर क्या भजन-भोजन के बाद मौसी के पास आ गए। अंकित अपने रूम पर, भइया गाज़ियाबाद, और मैं ट्रेन 🚄 के जनरल डिब्बे में।

घर 🏠 जा रहा हूँ। IIMC में पढ़ाई का पहला सत्र समाप्त। १०दिन की छुट्टी मिली है। पहले मैं घर नहीं जाने वाला था लेकिन
अम्मा(दादी) का भावुक फ़ोन आया दो दिन पहले। ख़ुद को रोक नहीं पाया। मामा से बिना पूछे निकल आया एक्साइटमेंट में।
२ जनवरी से नया सत्र शुरू होगा। १ तक दिल्ली वापस आना है ।

अभी ट्रेन धीरे-धीरे रेंग रही है, दुआ कीजिए टाइम से लखनऊ पहुंच जाए।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

मन बावला है



मन बावला है, मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
मुझको ख़बर है कि
ख़्वाहिश हुई है
कुछ तो मोहब्बत सी
साज़िश हुई है
कोई है गुम-सुम
ख़्यालों मे ख़ुद के
लगता है चाहत की
बारिश हुई है...
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
उसने कहा कुछ
मैंने सुना कुछ
सपने मे उसने
शायद बुना कुछ
फिर भी है गुम-सुम
ख़ुद में ही खोई
मिल के भी मुझसे
क्यों न कहा कुछ??
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
अब तो मोहब्बत का
इज़हार कर दो
हो न मोहब्बत तो
इंकार कर दो
सब कुछ पता है
मासूम दिल को
ख़ुद को भी चाहत की
कुछ तो ख़बर दो।।
मन बावला है,मन बावला है
अनचाही सी डगर क्यों चला है ?
-अभिषेक शुक्ल

रविवार, 11 दिसंबर 2016

आभासी दुनिया के लड़ाके

भक्त भक्षकों और भक्त रक्षकों ने फेसबुक को नरक बना दिया है।दोनों ख़ुद को यमराज समझने लगे हैं।मौका मिलते ही दोनों एक-दूसरे पर ऐसे टूटते हैं कि जैसे बिना विरोधी मारे मोक्ष नहीं मिलेगा।
जो भक्षकों की विचारधारा का खंडन करे, उनसे असहमति जताए वो भक्त, संघी और अराजक है।
यही हाल रक्षकों का है। उनके नज़र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह है। आलोचक और आतंकवादी होना एक ही बात है।
दोनों प्रकार के लोग अपनी राहों से भटके हुए हैं।
उदारवादी लोग भी उतने ही अराजक और असभ्य हैं जितने कि इनके विरोधी रूढ़िवादी लोग।
वास्तव में दोनों विचारधाराओं के लोग अतिवादिता के मारे हुए लोग हैं।
इन दिनों स्वतंत्र चिंतन, विचार हीनता के धुंध में ओझल है। किसी को कहीं दिख जाए तो उसे ठीक पते पर पार्सल करना न भूलें। देश आपका आभारी रहेगा।

रविवार, 27 नवंबर 2016

परिवर्तन रैली के बहाने


प्रधानमंत्री ने कुशीनगर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि "हम भ्रष्टाचार और कालाधन बंद करने का काम कर रहे हैं, विपक्ष भारत बंद करने का।"
उनके कहने का आशय यह है कि
विपक्ष  उनके साथ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा है।
नोटबंदी जैसा बड़ा परिवर्तन लाने के बाद अब मोदी जी उत्तर प्रदेश में परिवर्तन यात्रा पर हैं।
वैसे भी सबसे ज्यादा परिवर्तन की जरूरत यहीं है।
देखने वाली बात ये होगी कि यूपी की जनता भाजपा के विरुद्ध बाक़ी पार्टियों के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करती है या अपने देश भक्ति के प्रमाण पत्र को रद्द होने से  बचाती है।
प्रधानमंत्री आधुनिक लेनिन हैं पूंजीपतियों को कंगाल करके मानेंगे। रैली में उन्होंने कहा कि मेरे  इस कदम से ग़रीबों को छोटी मुश्किल होगी और अमीरों को ज्यादा, लेकिन अगर आप अम्बानी या बिड़ला हैं तो "यू डोंट हैव टू वरी अबाउट इट।"
वैसे भी हमारे कानून में एक कहावत है कि " ए किंग कैन डू नो रोंग" अर्थात राजा कभी गलत नहीं कर सकता।
मित्रों! सिर्फ़ पचास दिन की बात है, अभी तो बीस ही दिन बचे हैं।
भाई साहब! बीस दिन में कचूमर निकल गया , तीस दिन में क्या-क्या होना बाकी है?
प्रधानमंत्री  ने कहा कि देश में आधे से ज्यादा लोग ऑनलाइन टिकट खरीद रहे हैं ।ऐसे में शायद कोई प्रधानमंत्री को ये बताने वाला नहीं है कि पाले काका या नकाही वाली काकी आनलाइन ट्रांजेक्सन नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनके पास न तो फोन है और न ही एटीएम कार्ड। अगर हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि वे निरक्षर हैं।
ऐसे ही देश की बड़ी आबादी निरक्षर है जिससे आनलाइन ट्रांजेक्सन करने की उम्मीद करना बेवकूफी है।
भारत गांवों में बसता है और वहां एटीएम की सुविधाएं तक नहीं है पेटिएम की क्या बात करें?
भुखमरी, गरीबी और बदनसीबी के दौर में भारत भले ही डिजिटल हो रहा हो पर एक बड़ी आबादी विकल है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री के अनुसार नोटबंदी सबसे उचित हथियार था देश के अंदर पांव पसारे काले धन के वध के लिए , इसे जनता ने स्वीकार किया है पर इसका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हुआ इसे प्रधानमंत्री जी को स्वीकार कर लेना चाहिए।
सत्तर साल के लूट की इनकम को मोदी जी गरीबों को स्कूल, गैस कनेक्शन, खेती के लिए ऋण, विकास आदि के कार्यों के रूप में जनता में बांट देंगे। अगर ये जुमला नहीं है तो ये स्वागत योग्य कदम है और अगर ये जुमला है तो सुन के खुश होने में क्या जाता है?
प्रधानमंत्री ने कहा कि कालाधन अब गोरा नहीं करने दिया जाएगा, भ्रष्टाचार के नकुना में नथेल कसी जाएगी।
ईमानदारी के यज्ञ में बेईमानी की समिधा पर भक्त जन यज्ञ कर उनकी पवित्र मंशा को पूरा करने के लिए सहयोग दें। यह राष्ट्रीय अपील है।
बिना पैसे के कारोबार जनता कैसे चलाए इस विषय पर विद्वानों से उन्होंने अपील की है कि जनता को डिजिटल ज्ञान सिखाएँ। जियो का सिम किस लिए लांच किया गया है।
गन्ना किसानों के खाते में सीधे पैसा दिया जाएगा जिससे उनके कर्ज़ की चुकाई बिना दलाली के हो जाए। योजना तो ठीक ही है, अगर ये खाली योजना ही न रहे तो।
प्रधानमंत्री ने पूरब को एम्स देकर काम ठीक किया है लेकिन जब ये बनकर तैयार हो तो "नेता पहले जनता बाद में" वाली व्यवस्था न रहे तब।
उन्होंने बताया कि किसानों को लिए सॉयल कार्ड बनाया है। ताकि उनकी जमीन का परीक्षण किया जा सके और उसके हिसाब से किसानी की जाए। ये काम अच्छा है इसके लिए उनका धन्यवाद।
फसलों की रक्षा करने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सरकार लेकर आई है अगर इससे जनता को लाभ मिलता है तो ये सरकार का साराहनीय काम है।
 प्रधानमंत्री की यूपी में ये तीसरी रैली है. आगरा और गाज़ीपुर में परिवर्तन यात्रा हो चुकी है। देखते हैं वहां क्या परिवर्तन आएंगे।
प्रधानमंत्री पहली एयर कंडिशन्ड हमसफ़र ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई जो गोरखपुर से दिल्ली तक चलेगी, इस ट्रेन का टिकट जिन यात्रियों को मिल जाएगा उन्हें भाग्यशाली समझा जाएगा।
और चलते -चलते
गोस्वामी जी की एक बात सभी पत्रकारों को याद कर लेनी चाहिए कि-
"सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥"
तो सच बोलिए , देशभक्ति तो तभी हो सकती है जब देश के भलाई के लिए सत्ता को विवश करते रहें । सरकार का काम ही है जनता के लिए अच्छी योजनाएं बनाना, उन्हें लागू कराना। लेकिन जब आपको लगे कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है तो कलम चलाइए, सच कहिए नहीं तो सत्ता को निरंकुश होते वक्त नहीं लगता।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

तुम अलग युग की कहानी

तुम अलग युग की कहानी
हम अलग युग की कथा हैं,
व्यक्त जिनको कर न पाए
मूकवत मन की व्यथा हैं ।।
तुम किसी मरुभूमि में से
मेघ का संधान हो क्या?
साधना की ही नहीं पर
ईश का वरदान हो क्या??
- अभिषेक

बुधवार, 9 नवंबर 2016

पापा! मुझे सब पढ़ेंगे।

पापा! मेरे नम्बर भले ही इस बार कम आए  हों लेकिन मुझे एक दिन मेरे सारे टीचर्स पढ़ेंगे। हरिराम आचार्य जी ने इस लेटर में जो मेरी शिकायत लिखी है न एक दिन मेरी बड़ाई करेंगे, तब मैं उन्हें बिलकुल भी भाव नहीं दूंगा।
पापा हमेशा की तरह मेरी बात पर मुस्कुराते हुए  आगे बढ़ जाते।
मुझे कभी नम्बर की वजह से डांट नहीं पड़ी। भइया थोड़े परेशान हो जाते थे इस बात पर। उन्हें लगता कहीं मैं औरों से कमजोर न पड़ जाऊँ।
ख़ैर थोड़ा बड़ा हुआ तो सब ठीक हो गया। पढ़ने वाले विषयों को कंठस्थ कर लेता। सारे विषयों के सैद्धांतिक पक्ष कंठस्थ रहते तो सहपाठियों को लगता बहुत पढ़ाकू हूं।मैं भी भरपूर ज्ञान बांटने में कोई विलंब नहीं करता, सबको शिक्षा बांटता।
ख़ैर मुझे पता था कि मुझे कुछ नहीं पता है।
बचपन में हरिराम आचार्य जी पता नहीं क्यों महीने में दो चार बार शिकायती पत्र लिख कर पापा के नाम भेज देते और मुझसे कहते हस्ताक्षर करा के लाओ। वो सोचते घर पे कुटाई होगी मेरी पर उनकी मंशा पर घर वाले पानी फेर देते।पढ़ाई को लेकर कभी कूटा नहीं गया।
स्कूल से ज़्यादा भइया ने मुझे पढ़ाया। गणित को छोड़कर सारे विषय मेरे ठीक-ठाक थे, भइया ने बेइज्जती न होने भर का गणित सिखा दिया था, जब कॅापी चेक होती तो पिटाई से बच जाता, बहुत दिनों तक इतना ही रिश्ता रहा मेरा गणित से।ग्यारहवीं में तो मैंने तलाक ही ले लिया गणित से। फिर कानून की पढ़ाई और अब पत्रकारिता की।
यकीन ही नहीं होता इन लम्हों को गुजरे हुए एक वक्त बीत गया।
मेरा साहित्य अब किशोर हो रहा है। टूटा-फूटा ही सही पर लिखते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया। लिखना आज भी नहीं आया।
आज मैंने पुरानी डायरियों को खोज निकाला। एक अटैची में सुरक्षित रखी हुईं मिलीं। बचपन आंखों के सामने तैरता हुआ नज़र आया। बीते कल को महसूस किया।
तब भाषाई अशु्द्धियां अधिक थीं पर  भावनाएं निश्छल थीं। कृत्रिम व्याकरण का आवरण तब नहीं ओढ़ा था रचनाओं नें।
कितने ख़ूबसूरत दिन थे न? नहीं! मेरा आज भी बहुत खूबसूरत है।
मामा कहते हैं जिस पल में हम जीते हैं वही हमारे जीवन का सबसे सुनहरा पल होता है। जो बीत रहा है वो कभी नहीं आएगा।
इतने दिनों में अब तक अपना वादा नहीं पूरा कर पाया। पता नहीं मेरा कुछ लिखा हुआ मेरे गुरुजनों ने पढ़ा होगा या नहीं, ये भी नहीं पता कि मेरा वादा पापा को याद है या नहीं, पर लिखना थमा नहीं है। मुझे कितना वक्त लगेगा पापा से किया गया वादा पूरा करने में, नहीं जानता लेकिन जाने क्यों उन बातों के याद आने भर से ही मेरे हाथ कलम की ओर बढ़ जाते हैं और फिर मैं लिखने बैठ जाता हूँ कुछ कहे-अनकहे शब्द....उसी एक वादे के लिए।।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

वो सच नहीं है।

मैं आपसे कभी बात नहीं करुंगी। हमेशा फोन मैं करती हूँ आप भूल कर भी कभी कॅाल नहीं करते हो। हर बार बिज़ी होने का बहाना होता है, हर बार मैं पूछती भी हूँ बिज़ी हो? आपका फिर वही रटा-रटाया जवाब नहीं! तुम्हारे लिए नहीं। 
आप सच में मुझे कभी याद करते हैं? कुछ वजूद है मेरा आपके लाइफ में?
अब तो हद हो गई। पिछले दस दिनों से आपने बात नहीं की। न फेसबुक न व्हाट्सप न स्टीकर्स, क्या हुआ है आपको? 
कोई और है क्या आपकी ज़िन्दगी में? 

मुझसे मन भर गया? क्यों खेल रहे हो मेरे जज्बातों के साथ? ख़त्म क्यों नहीं कर देते सब कुछ?
ख़ैर! इस रिलेशनशिप में तो मैं हमेशा अकेली ही थी, कभी आपकी साइड से कुछ था ही नहीं। प्यार नहीं! दोस्ती या कुछ दोस्ती से ज़्यादा? 

सुनो मैं बहुत प्यार करती हूँ आपसे।कोई हो आपकी लाइफ में तो प्लीज़ बता देना मैं भूलकर भी याद नहीं करुंगी आपको। वैसे भी मेरे पास खुद के लिए वक्त कम है। मेरी शादी हो ही जाएगी कुछ दिनों में। कोई अजनबी ज़िंदगी भर के लिए मेरी किस्मत में मढ़ दिया जाएगा।जबरदस्ती का रिश्ता निभाना है मुझे उम्र भर के लिए। किसी ब्लैक एंड व्हाइट सेट के साथ मुझे ढकेल दिया जाएगा किसी कोने में हमेशा के लिए। मेरी सारी डिग्रियां मेरी ही तरह सड़ेंगी किसी कोने में। 

आप तब तक फेमस हो जाओगे। टीवी पर भी आप दिखोगे पर मैं चैनल बदल दूंगी।आपको कभी पलट कर नहीं देखूंगी। आपकी किताबें कभी नहीं पढ़ूगीं।अख़बारों में भी आपके आर्टिकल्स नहीं पढ़ूंगी। आपको सब चाहते हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं है, बहुत अकेली हूं मैं।आपसे बात करना चाहती हूँ पर आप बात तक नहीं करते।

आप मेरे साथ ऐसा करते हैं या सबके साथ?
लाइब्रेरी, क्लास, पढ़ने और लिखने के अलावा कुछ करते हैं आप?

कभी तो फ्री होते होंगे तब मुझसे बात क्यों नहीं करते? आई लव यू हद से ज्यादा। सॅारी आज मैंने आपको कुछ ज्यादा सुना दिया। मैं बहुत बुरी हूं हर बार आपको परेशान करती हूँ पर अब नहीं करूंगी। गुड बॅाय!
क्या हुआ? सॅारी यार! नेटवर्क नहीं है यहाँ। और अब तुम मेरे रिसेंट कॅाल लिस्ट में नहीं हो। मैंने सेट फार्मेट किया था तुम्हारा नंबर मिट गया। कहीं और नोट भी नहीं है।

तुम ऐसे क्यों कह रही हो? मैं ऐसा ही तो हूं।मुझे मां से बात किये हुए कई दिन बीत जाते हैं। मेरे सारे दोस्त मुझसे इसी वजह से नाराज ही रहते हैं। मैं किसी से बात नहीं करता।शायद फोन पे बात करना अच्छा नहीं लगता मुझे।

तुम कभी-कभी अजीब सी बातें क्यों करती हो? तुम सेल्फ डिपेन्डेंट हो, अच्छी सैलरी मिलती है। बालिग़ हो तो तुम क्यों किसी के साथ जबरदस्ती ब्याही जाओगी। मना कर देना सबको जब तक तुम्हारे पसंद का लड़का तुम्हें न मिले।

पसंद की तो बात मत करो आप।पसंद तो सिर्फ आप हो मुझे , मुझसे शादी करोगे?

यार प्लीज़! कोई और बात करें? जानती हो मैंने एक नयी कविता लिखी है सुनोगी?

रहने दो, ज़िन्दगी कविता हो गयी है अब कविताओं से चिढ़ होती है। कभी तो सीधा जवाब दे दिया करो..सॅारी यार! मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकता, मैं खुद के भी साथ नहीं हूं, किसी अनजान से रास्ते की ओर कदम बढ़ते चले जा रहे हैं। वक्त धीरे-धीरे मुझे मुझसे दूर करता जा रहा है। ऐसे में मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं दे सकता।

किसने कहा मुझे आपसे कोई उम्मीद है? अब इतना तो आपको समझ ही चुकी हूं। 
एक्चुअली जानते हैं आपकी प्रॅाब्लम क्या है?

आप न कभी किसी रिलेशनशिप को हां सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकि आपके साथ जो गुड ब्वाय वाला टैग लगा है न उसे खोने से डरते हैं। तभी शायद आपकी कोई गर्लफ्रैंड कभी थी नहीं न होगी,
बहुत मुश्किल से खुद को सम्हालती हूं । कोई इमोशन नाम की चीज़ है आपके दिल में?

ऐसा कुछ नहीं है....

बॅाय! अब मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी।
सुनो!
कहो!
जो तुम कह रही हो वो सच नहीं है।
तो सच क्या है?

कुछ नहीं। 'ब्रम्ह सत्यम् जगत मिथ्या'। 
बॅाय! अलविदा। 

रुको!
नहीं अब कोई फायदा नहीं है......

कॅाल डिस्कनेक्टेड....
कॅाल रिजेक्टेड....काश! मुझे आज सुन लेती....कुछ बताना था..लेकिन क्या बताना था....मुझे क्या पता...तब की तब देखते।


- अभिषेक शुक्ल