शनिवार, 4 जून 2016

स्वभाव का विरूपण

अच्छाई विरूपता है और बुराई व्यक्ति का मूल स्वाभाव। अच्छाई सिखाई जाती है और बुराई जन्म से व्यक्ति में विद्यमान होती है। स्वाभाव से हर व्यक्ति उद्दण्ड होता है किन्तु विनम्रता ग्रहण या अनुकरण करने की विषय-वस्तु होती है।
विरूपता सीखी जाती है। वास्तव में किसी भी शिशु के व्यवहारिक विरूपण की प्रक्रिया उसके जन्म के समय से ही प्रारम्भ हो जाती है। परिवार के सभी सदस्य विरुपक होते हैं। सबका सामूहिक उद्देश्य होता है कि कैसे शिशु का आचरण मर्यादित हो,व्यवहारिक हो और बोधगम्य हो...ये सभी तत्त्व विरुपक तत्व हैं जिनको ग्रहण किया या कराया जाता है।


किसी नावजात शिशु को यदि समाज से पृथक रखा जाए और उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था से अनभिज्ञ रखा जाए(जैसे-सम्बन्ध,रिश्ते,भाषा,विज्ञान,प्रसन्न्ता,दुःख और व्यवहारिकता..इत्यादि) तो उसका स्वाभाव मानवीय आचरण के अनुरूप नहीं होगा। तब वह अपने मूल स्वाभाव में होगा। तब वह सृष्टि के आदिम छलावे से मुक्त होगा। जो होगा वही दिखेगा। उच्छश्रृंखल होगा और सभ्यता के आवरण को ओढ़ेगा भी नहीं।
फिर न उसे सम्मान का मोह होगा न अपमान का भय। वह इन सभी विरुपक तत्वों से भिन्न होगा।
किन्तु कहाँ इस जग को किसी भी व्यक्ति का मूल स्वाभाव स्वीकार्य होता है। सब विरूपता चाहते हैं। सब चाहते हैं कि व्यक्ति बदले। किन्तु क्यों बदले यह तर्क किसी के पास नहीं है।
मेरा एक मित्र है। बहुत सरल,सभ्य और संस्कारित है। विनम्रता उसकी विशिष्टता है। वह सबको अच्छा लगता है। एक दिन एक महाशय मिले। उन्हें उसमें भी
अनंत दोष दिखने लगे। उन्होंने मेरे मित्र के चरित्र-चित्रण में अपना जो बहुमूल्य समय गवांया उसमें उनके चिंतन का मुख्य बिन्दु केवल उसका सीधापन था। कहने लगे कि उसका सीधापन उसके प्रगति में बाधक है। उनके कहने का सार बस इतना सा था कि पागलपन और सीधापन एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं।
उनके कथनानुसार सीधा व्यक्ति समाज में जीवित रहने योग्य नहीं होता इस लिए चालाक बनो।
मेरे मित्र का मूल स्वाभाव उसकी सरलता है तो वह क्यों जटिल बने?क्यों कुटिलता सीखे? क्यों विरूपण स्वीकारे? यदि वह बदल भी जाये तो बदला हुआ रूप क्या उसके परिवार को स्वीकार होगा? क्या खुद को बदलकर वह अपने आपको झेल पाएगा?? जवाब शायद नहीं ही होगा।
एक मेरे परिचित हैं। बहुत चालाक हैं। उनकी चालाकी धूर्तता की सीमा लांघती है। बनावटी भाषा, और अभिनय देखकर चिढ़न भी होती है। कई बार बात करते हैं तो मैं अनसुना कर देता हूँ। कई बार बात भी नहीं सुनता बीच में ही उठकर चला जाता हूँ। उन्हें लगता है कि वो मुझे बेवकूफ़ बना रहे हैं और मैं बेवकूफ़ बन भी रहा हूँ।
मैं भी सोचता हूँ कि चलो भाई! ग़लतफ़हमी जरूरी है..उन्हें इसी में आनंद मिलता है तो ईश्वर करे सतत् इसी कार्य में वो लगे रहें...हाँ! अलग बात है कि महाशय दीन-प्रतिदिन अपना विश्वास खोते जा रहे हैं। कई बार जब वे सच बोलते हैं लेकिन मुझे विश्वास ही नहीं होता उनके किसी भी बात पर।
अगर ये महाशय तनिक सी विरूपता सीखें और सरल स्वाभाव के हो जाएं तो इन्हें सब विश्वास  और सम्मान की दृष्टि से देखेंगे...पर निःसंदेह उनका सरल होना उनके मूल स्वभाव को और बनावटी बना देगा।
तात्पर्य यह कि आप जैसे हैं वैसे ही रहिये। किसी के कहने पर मत बदलिए, लोगों की सुनेंगे तो सब आपको अपने हितों के अनुसार बदलने को कहेंगे।
किसी के लिए बदलना अपराध है। बदलाव तभी आ सकता है जब आपको लगे कि आप अव्यवहरिक हो रहे हैं। बदलाव अपने प्रकृति के अनुसार अपने आप में लाइये...ऐसा परिवर्तन जिसे आपका ह्रदय स्वीकार कर सके वह आपका मूल स्वाभाव होगा किन्तु यदि इससे इतर आप कोई परिवर्तन आप स्वयं में लाना चाहते हैं तो वह विशुद्ध विरूपण होगा।
विरूपित व्यक्तित्त्व को मन स्वीकार कर नहीं पाता।
पुष्प की शोभा केवल तभी तक है कि जबतक वह अपनी शाखा से संयुग्मित है, जैसे ही शाखा से विलगन होता है वह सूख जाती है...उसके विग्रह का विरूपण उसे स्वीकार नहीं होता और वह सूख जाता है....यही स्थिति व्यक्ति के साथ है। जब किसी को परिवर्तन के लिए बाध्य किया जाता है तब उसके स्वभाव में परिवर्तन नितांत कुण्ठा ही होती है।
 जो जैसा है वैसा ही रहे.....बाध्यकारी परिवर्तन विरूपण है....अनैसर्गिक है....और जो नैसर्गिक नहीं है वह अपनाने योग्य नहीं है....

- अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 24 मई 2016

तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई

प्रीत के मन्त्र सारे धरे रह गए
गीत आंसू बने नीर से बह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
गीत जितने लिखे सब तुम्हारे लिए
रात दिन हम तुम्हें गुनगुनाते रहे
चुप रहो मौन! हो विश्व ने यह कहा
सारे आघात सह तुमको गाते रहे
मन की पीड़ा सभी से छिपाते रहे
अश्रु मधुमय हुए पर खरे रह गए
गीत अधरों पे मेरे धरे रह गए
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
प्रीत तुमसे लगी जग ये विस्मृत हुआ
तृप्ति मुझको मिली मन ये हर्षित हुआ,
प्रेयसी तुम समझ से परे ही रही
चेतना त्यागकर मन समर्पित हुआ
किंतु तुम तो मलय सी विचरने लगी
हम हिमालय के जैसे खड़े रह गए
 कामना ने कहा,भावना ने किया
प्रीत कर हम ठगे के ठगे रह गए
हम निर्झर थे निर्झर बने रह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 13 मई 2016

इसलिए टकराती हैं पीढ़ियां




 पीढ़ियों का टकराना स्वाभाविक है। जहां अलग-अलग काल,खण्ड और परिस्थितियों के लोग एक ही छत के नीचे रहते हों और सबको अपने-अपने युग की धार में बहने की आदत हो वहां परस्पर अन्तर्द्वन्द्व का होना अप्रत्याशित नहीं है.

कभी-कभी वैचारिक समता के आभाव में सम्बन्धों में कटुता जन्म लेती है जिससे एक-दूसरे के प्रति केवल ऐसी धारणा बनती है जो परिवार को विखण्न की ओर ले जाती है।

युवता की अलग ही धार होती है। होनी भी चाहिए क्योंकि जो अपने युवा काल में स्वच्छंद नहीं रहा वह प्रौढ़ होकर भी स्वतंत्र निर्णय लेने से डरता है। उच्छृंखलता कभी-कभी शुभ फल देने वाली होती है।

किसी भी पिता कभी भी यह इच्छा नहीं होती है कि पुत्र साहसी बने। बच्चे के निर्भीक होने से हज़ार समस्याओं के आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

यदि कोई अपने पिता के वचनों का अक्षरशः पालन करे तो वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। हर बात मानी ही नहीं जाती और पिता को भी यह समझना चाहिए कि हर बात मनवाई नहीं जाती।

युवता ऐसी मन:स्थिति है जिसमें व्यक्ति स्वाभाव से ही क्रांतिकारी होता है। क्रांतिकारी नहीं विद्रोही सही शब्द है। परम्परा रुढ़ि लगती है, सीख स्वीकार्य नहीं होती है। ऐसी स्थिति में जो युवा करे, वही सही लगता है। सही लगना भी चाहिए। मैं उस व्यक्ति का धुर विरोधी हूं जिसकी यह धारणा होती है कि दूसरों की असफलताओं से सीखो। क्यों भाई? अपनी सफलता स्वीकार है, असफलता नहीं? बचपन से बताया जाता है कि आग छूओगे तो जलोगे, पानी में गहरे उतरोगे तो डूबोगे। मैं किसी और के जलने का अनुभव क्यों लू्ं? मुझे जलना भी खुद है और डूबना भी।

युवता से प्रौढ़ता की प्रत्याशा रखना किसी महापाप से कम नहीं है। किसी भी सोच को पुष्ट होने में समय लगता है। गम्भीरता एक उम्र के बाद स्वत: ही आती है ऐसे में किसी के अल्हड़पन को अवगुण समझना नैतिक अपराध है।

कोई ये प्रत्याशा करे कि में महत्वपूर्ण विषयों पर अपने पिता की भांति वैचारिक दृढ़ता दिखाऊँगा तो यह कहाँ सम्भव है? मैं समस्याओं का समाधान अपने पिता की तरह कुशलतापूर्वक कर ले जाऊँगा, यदि ऐसा कोई सोचता है तो केवल उसका मुझ पर अटूट विश्वास ही होगा अन्यथा मैं स्वयं को इतना सक्षम नहीं समझता कि मैं ऐसा कुछ कर पाऊंगा।

गम्भीरता,कुशलता,वैचारिक दृढ़ता और व्यवहारिकता अनुभव से आती है, जो कम उम्र में किसी ईश्वरीय प्रसाद से ही आ सकती है, जो कहीं से भी स्वाभाविक नहीं होगी.

बच्चों में जो प्रतिभा है उसे निखारा जाना सही है या जो उनमें दोष है उन पर सामूहिक परिचर्चा करना?



अच्छाई किसी को भी बुराई से दूर कर सकती है, बेहतर होगा कि अच्छाई की इतनी प्रशंसा हो कि बच्चा कुछ बुरा करते डरने लगे. उसे डर लगने लगे कि उसके इस कृत्य से उसकी छवि धूमिल हो सकती है।

हर मां बाप को अपने बच्चों से शिकायत होती है। कोई किसी की अपेक्षाओं पे खरा नहीं उतरता। मुझसे भी मेरे अभिभावकों को शिकायतें होंगी। मेरे पढ़ाई को लेकर, व्यवहार को लेकर, मैं कोशिश करता हूं कि सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतरूँ, पर नहीं हो पाता मुझसे। अब इसे लेकर मुझमें कुण्ठा हो या मेरे अभिभावकों को तो क्या यह उचित होगा?

अभिभावक अपने बच्चों में कुण्ठा न पनपने दें और बच्चे अपने अभिभावकों को कुण्ठित न होने दें तो परिवार खुशहाल रह सकता है, अन्यथा एक-दूसरे की कमियां देखने में परिवार कलह की भेंट चढ़ जाएगा और खुशियाँ चौखट पर आकर भी लौट जाएंगी, फिर पूरे परिवार में एक खास प्रकार का सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा, दर्शन का.....कभी दोष दर्शन तो कभी दरिद्र दर्शन।

ये दोनों स्थितियां घातक हैं. ये दोनों दर्शन घातक हैं बेहतर है इनसे बचा जाए. खुशियाँ तलाशनी पड़ती हैं, समेटनी पड़ती हैं, लेकिन आप को रोना ही अच्छा लगे तो आपको ईश्वर सदबुद्धि दें।



( प्रकाशित, दैनिक जागरण,२०/०५/२०१६)

-अभिषेक शुक्ल


(तस्वीर- www.lifeofdad.com)

मंगलवार, 10 मई 2016

एक तुम्हारे लिए!!



मुक्ति के द्वार पर दासता को लिए
प्रार्थना कर रहे
मित्र तुम किस लिए?
स्वर्ग से भी परे मोक्ष के मार्ग पर
अर्चना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
कंठ अवरूद्ध है
ईश क्यों क्रुद्ध है?
मन मेरा कह रहा
तन कहां बुद्ध है??
सांसों को त्यागकर वर्जना पार कर
साधना कर रहे
मित्र तुम किस लिए?
रुढ़ियां तोड़ कर सर्जना छोड़कर
याचना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
भावना गौण है
गर्जना मौन है
तुम बिना हे सखे!
अब व्यथित कौन है??
स्नेह का त्याग कर गेह परित्याग कर
कल्पना कर रहे
मित्र तुम किस लिए??
नित्य अह्वान कर प्रीत का गान कर
अल्पना कर रहे
एक तुम्हारे लिए।।
-अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 3 मई 2016

ध्वस्त धर्मध्वज

तोड़ दिया मैंने खाली पड़े
 खण्डहरों को
ध्वस्त इमारतों को
धर्मध्वजों को
क्योंकि
सब निष्प्रयोज्य थे;
गौरवशाली अतीत देखकर
अहंकार हो रहा था मुझे
किंतु
वर्तमान उन्माद की भेंट
चढ़ जाता था,
सनातन,चिरंतन, अद्वितीय
संस्कृति का स्वांग
धूमिल कर देता था
मेरे जीवन के प्रत्येक क्षण को,
आज! अद्भुत आह्लाद है
ह्रदय में
मिट्टी को मिट्टी में मिलाकर;
लाल,केसरिया,हरा,सफेद
ध्वजों को
रंग दिया मैंने एक रंग में
तोड़ दिया उन सभी स्तम्भों को जिनमें
लहरा रहे थे
परस्पर विद्वेष के कारक,
अब न कोई कोलाहल है
न ही अंर्तद्वन्द्व
एक शाश्वत शांति है
दशो दिशाओं में
दूर कहीं सुनाई पड़ रही है
रणभेरी
दासता पर स्वच्छंदता के
विजयनाद की।।
-अभिषेक

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

आत्ममुग्धता

आत्मप्रशंसा, आत्मश्लाघा और आत्ममुग्धता जीवन के अपरिहार्य अवयव हैं। इन तीनों तत्वों के अभाव में अवसाद जन्म लेता है, जो व्यक्ति को जीवित शव बनाता है।
 जैसे शक्तिहीन शिव शव के सामान हैं वैसे ही इन तत्वों के अभाव में व्यक्ति शव है।
 वह व्यक्ति निष्प्राण है जो इन तत्वों से विरत है।
 आत्मप्रशंसा हमें कई जघन्य कृत्यों से विलगित करता है। इससे हम प्रायः दूसरों की आलोचना, अनुशंसा और निंदा से बच जाते हैं। निंदा चाहे अपनी हो या अपनों की हो केवल विषाद को जन्म देती है। निंदा परिणामहीन पथ है जिस पर चलकर केवल वैमनस्य जन्म लेता है। वैमनस्य जहाँ भी जन्म लेता है वहाँ विनाश होता है…बुद्धि का सम्पूर्ण ह्रास होता है।
 जब हम आत्मप्रशंसा की राह थामते हैं तो इस महापाप से स्वतः बच जाते हैं अतः
 आत्मप्रशंसा अनिवार्य है।
 आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा से तनिक पृथक है। आत्मश्लाघा में व्यक्ति अपने सद्भावपूर्ण कृत्यों की प्रशंसा करता है। आपसे अनभिज्ञता में अथवा संज्ञान में कोई भी ऐसा सत्कर्म हो जाए जो समाज के लिए हितकर हो, अनुकरणीय हो तो उसे प्रचारित और प्रकाशित अवश्य करें…ऐसा करना नारायण की सहायता करने जैसा है।
 आत्ममुग्धता; संसार का श्रेष्ठतम तप है। आत्ममुग्धता तो परमतत्व को प्राप्त करने का साधन है। जब तक आप स्वयं से प्रेम करना नहीं सीखते आप प्रेम जानते ही नहीं। जो स्वयं से प्रेम करता है वह विश्व से प्रेम करता है। व्यक्तिवाद से ऊपर उठ अध्यात्मवाद की ओर चलता है, जहाँ न कोई जड़ है न कोई चेतन है।
 विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उनकी पहली और अंतिम साधना आत्ममुग्धता रही है। आत्ममुग्धता हीन भावना से नहीं उपजती, श्रेष्ठ कर्मों से उपजती है। कर्म ही कर्म को आकर्षित कर सकता है इसके लिए कर्मठ बनना पड़ता है…आत्ममुग्धता तब जन्म लेती है। स्मरण रहे आत्ममुग्धता अहंकार से पृथक तत्त्व है।
” एकोहम् द्वितीयो नास्ति न भूतो न भविष्यतिः” अहंकार है आत्ममुग्धता नहीं। अहं भाव तो सब दुखों का कारण है, यह ऐसी मनोवृत्ति है जिसका कोई उपचार नहीं है। जिसमे लेशमात्र भी यह गुण है वह मानव होते हुए भी अमानव है…उसके व्यथा का भी यही एक मात्र कारण है।
 जब व्यक्ति आत्ममुग्धता की ओर अग्रसर होता है तो उसका प्रतिद्वंदी ही नहीं रहता, यह व्यक्ति की सर्वोत्तम अवस्था होती है।
 आत्मप्रशंसा,आत्मश्लाघा और आत्ममुग्धता तीनों को पृथक न देखने पर एक ही भाव मन में उपजता है जिसे “प्रेम” कहा जाता है। प्रेम चाहे संसार के प्रति हो या स्वयं के प्रति प्रेम-प्रेम होता है। प्रेम का अर्थ ही कल्याण होता है।
 यह मानव का स्वभाव ही है कि वह बहुत शीघ्र निष्कर्ष तक पहुँच जाता है, भले ही निष्कर्ष कल्पित हो।
 अपने गुणों को(खूबियों को) संसार के सामने प्रकट करो, दुर्गुण (खामियां) तो संसार स्वतः खोज लेता है।
 मुझमे अनंत दोष हैं और दुर्गुण भी, यदि अपने दुर्गुणों को मैं सबसे बताता चलूँ तो मैं उनका प्रचार कर रहा हूँ उन्हें प्रोत्साहित कर रहा हूँ। हो सकता है किसी का मैं आदर्श हूँ, हो सकता है कोई मुझसे प्रभावित हो यदि वह मेरे अवगुणों को जानेगा तो उन्हें अपना सकता है क्योंकि प्रायः यही देखा गया है कि अवगुण, गुणों की अपेक्षा अधिक आकर्षक होते हैं…यदि मैं अपने अवगुण सबके सामने प्रकट करूँ तो ये किस तरह का कृत्य होगा?
यदि मैं सद् गुण को, अपने कला को संसार के सामने प्रकट करूँ तो हो सकता है कोई मार्ग से भटका व्यक्ति पुनः सन्मार्ग पर आ जाये।
 मानवता तो यही कहती है न कि सत्कर्मों को विश्व में फैलाओ…..कुकर्मों को नहीं।
 किसी महान विभूति ने कहा है कि “जब-तक हम अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर गर्व करना नहीं सीखते तब-तक हमारे जीवन में किसी बड़ी उपलब्धि का प्रस्फुटन नहीं होता।” गर्व करो…पर अहंकार युक्त नहीं आत्ममुग्धता युक्त।
 प्रयत्न तो यह हो कि अवगुणों से पृथक रहो उन्हें स्वयं पर हावी मत होने दो, दबा दो किन्तु यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो अवगुणों पर पर्दा डालो…उनसे मुक्त होने का प्रयत्न करो…अवगुणों का अधिवक्ता न बनो। उन्हें सुरक्षित रखना मेरे मति से महापाप है और जान-बूझ कर पाप करना उचित कैसे हो सकता है?
अपनी खूबियों को संसार के सामने लाओ बुराइयां तो लोग खुद ही ढूंढ लेंगे।
 पुरुष स्वाभाव से ही व्यभिचारी होता है, कुछ को अवसर मिलता है कुछ व्यभिचार न कर पाने की कुंठा में जीते हैं, कुछ अवसर तलाशते हैं और कुछ सदाचार से व्यभिचार को अस्तित्वहीन करते किंतु यह खामी हर इंसान में होती है तो क्या इसकी वकालत करते चलें? इसे सुरक्षा दें?
ऐसा करना सर्वथा अनुचित है।
 अपनी खामियों की चर्चा मत करो…उन्हें ख़त्म हो जाने दो…मिट जाने दो…तुम्हारी अच्छाइयों से दुनिया का और तुम्हारा भला होगा बुराइयों से नहीं।
 अपने खामियों की चर्चा करना वीरता नहीं भीरुता है..इतनी कमज़ोरी क्यों की अपने ही मनोदशा पर नियंत्रण न रहे?
जब माँ भारती के प्रांगण में जन्म ले ही लिया है जहाँ परोपकार संस्कार में मिलता है…वहाँ बिना सत्कर्मों का बीज बोए पलायन करना उचित तो नहीं?
आओ! इस जीवन यज्ञ में शुभ कर्मों का सन्धान करें….संसार को सन्मार्ग पर प्रेरित करें…भले ही हमारा यह प्रयत्न अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो…किन्तु अस्तित्वहीन तो न होगा?
 (मेरे भैया की कलम से .)

लेखक-
अनुराग
 अधिवक्ता,
चैम्बर नंबर २३,सिद्धार्थ बार एसोसिएशन
 सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश.

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

बौद्धिकता से परे भारतीय राजनीति

किसी भी विकासशील राष्ट्र के मूल समस्या में उस देश के धार्मिक,सांप्रदायिक अथवा जातीय विभेदों के नाम पर होने वाले संघर्ष शामिल नहीं होते न ही ऐसे विषय राष्ट्रीय चिंतन का केंद्र बिंदु बनने योग्य होते हैं किन्तु संयोग से भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय चिंतन के ये एकमात्र केंद्रबिंदु बन गए हैं.”असहिष्णुता, अमानवीयता और असंवेदनशीलता पूरे विश्व में समापन की ओर है किन्तु भारत में उत्थान की ओर” यह एक आम धारणा बन गयी है लगभग-लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों की जिनके मतभेद भारतीय जनता पार्टी से हैं.भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक दलों के नेताओं के बयान भी ऐसे अर्थहीन और अप्रासंगिक होते हैं जिनका उल्लेख करना भी किसी शिक्षित व्यक्ति की बौद्धिकता पर सवाल उठा सकता है.
कभी-कभी लगता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी ने लोगों को इतना अमर्यादित कर दिया है कि इस अधिकार के सामने देश की एकता और अखंडता की कोई कीमत नहीं रह गयी है.अभिव्यक्ति के नाम पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंडियन आर्मी मुर्दाबाद, और कश्मीर की आज़ादी तक जंग जारी रहेगी ‘ जैसे जुमले क्षमा योग्य हैं क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्र सबको मिली हुई है. वाह क्या अधिकार है अभिव्यक्ति का अधिकार भी. जिस राष्ट्र द्वारा संचालित विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उसी राष्ट्र कि गरिमा को तार-तार किया जा रहा है ऐसी सहिष्णुता विश्व में कहाँ मिलेगी?
देश का एक बड़ा तबका प्रगतिवादी सोच की भेंट चढ़ रहा है. ये प्रगतिवादी आचरण से नहीं हैं अपितु सोच से हैं. प्रगतिवाद की परिभाषा इन्होने नयी बनायीं है. प्रगतिवाद के दायरे में क्या-क्या आता है यह भी उल्लेखनीय है, जैसे- देश को गाली देना,सत्तारूढ़ सरकार को गाली देना, भारत मुर्दाबाद के नारे लगाना, महिषासुर जयंती मनाना, अफ़ज़ल,कसाब और याकूब की बरसी मनाना, तिरंगा फाड़ना ये सब प्रगतिवाद है.
भारत में विचारधाराओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़-छाड होती है. यहाँ हर महान व्यक्तित्त्व के नाम को भुनाया जाता है.हर विचारधारा पर चलने का एकमात्र उद्देश्य राजनीती की रोटी सेंकनी होती है.राजनीतिक पार्टियां और इन पार्टियों के नेताओं का एकमात्र उद्देश्य जनता के बीच मतभेद कराकर वोट बैंक तैयार करना है.जनता भी फायदेमंद खेती है, नफरत बो कर मलाई काटी जाती है.
रोहित वेमुला के आत्महत्या का जिस तरह से तमाशा खड़ा किया गया की जैसे लग रहा था सभी राजनीतिक पार्टियों में करुणा,दया, वात्सल्य और वीभत्स रस प्रदर्शित करने का दौर चल पड़ा हो. सभी संवेदनशील हो गए थे रोहित के लिए.कितनी असीम संवेदना उस मासूम के लिए सबके ह्रदय में थी. कोई पागल व्यक्ति भी इन राजनीतिक पार्टियों के ढोंग को भांप लेता पर भारतीय जनता और मिडिया दोनों को इन सबकी आदत बन गयी है. एक के आँख पर तो पट्टी पड़ी है और एक को तो हर न्यूज़ में मसाला मार के अपनी टी.आर.पी बढ़ानी है.
आत्महत्या पर प्राइम शो चलने का क्या मतलब होता है? आत्महत्या का भी विज्ञापन? लोगों में जीने की जिजीविषा पैदा करना साहित्यकारों,पत्रकारों का काम है पर ये लोग आत्महंता से भी सहानभूति रखने लगे? रोहित की मौत को सही ठहराने लगे..कैसी बौद्धिकता है इस देश की?
विदेशी दर्शन और विदेशी विचारकों से प्रभावित होना भारतियों की एक और विशेषता है.कुछ अच्छी चीज़ें सीखें या न सीखें बुरी चीज़ें पहले सीख लेते हैं. भारत में प्रगतिवादियों के कुछ ख़ास चेहरे हैं जिनके पदचिन्हों पर चलना एक ख़ास बौद्धिक वर्ग को अधिक अभीप्सित है. उन चेहरों के नाम हैं- ”कार्ल मार्क्स, लेनिन,रूसो और माओत्से तुंग”.
ये सारे चेहरे परिस्थितिजन्य थे और अब ये कहीं से भी किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए प्रासंगिक नहीं रहे हैं.इनके रास्तों पे चलकर गृहयुद्ध,कलह और अराजकता के अतिरिक्त और कुछ हासिल नहीं किया जा सकता.जिन देशों में इन चेहरों का जन्म हुआ वहीँ ये विचारधाराएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं किंतु भारत में जूठन ढ़ोने की परंपरा रही है.
क्या चीन की मासूम जनता माओवाद से मुक्ति नहीं चाहती? क्या उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं चाहिए? क्या अभिजात्यवर्ग के सशन की अपेक्षा लोकतंत्र जनता को नहीं प्रिय होगा? हाँ! प्रिय है किन्तु जिन विचारधारों को भारतीय प्रगतिवादी ओढ़ रहे हैं उन्ही से चीन की मासूम जनता मुक्ति चाहती है. लेकिन भारतीय मार्क्सवादियों को ये कब समझ में आएगा…उन्हें तो बस अंधानुकरण की आदत है.
कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी मिले जिन्होंने ‘शहीद भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद’ तक को कम्युनिस्ट बता दिया.शायद उन्हें राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद के बीच का अंतर नहीं पता है.
जे.एन.यू में जो कुछ भी हुआ या एन.आई.टी.श्रीनगर में जो किया गया क्या यह भारतियों के मूल भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है? हाय! अब पाकिस्तान भी रहने योग्य हो गया…जय हो बौद्धिक आतंकवाद की.
इन दिनों भारतीय राजनीति में जो उथल-पुथल मची है उसे देख कर लग रहा है कि बहस के विषय बड़े संकीर्ण हो गए हैं.किसी को भी मुद्दों पर बात नहीं करनी है केवल बकवास पर सारा ध्यान केंद्रियत करना है.
किसी भी पार्टी या न्यूज़ चैनल वालों के बहस का विषय गरीबी,बेरोजगारी, भूखमरी, बीमारी, भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि मोहन भागवत, आदित्यनाथ, ओवैसी या दो चार और चिरकुट नेताओं ने क्या बयान दिए, कौन भारत माँ की जय नहीं बोला , कौन बोल रहा है या कौन नहीं बोलेगा? ये बहस का विषय है.
आज जितनी भटकी शैली मे मैंने लिखा है उससे कहीं ज्यादा भटकी भारतीय राजनीति है .राजनीती इतनी गन्दी हो गयी है कि सत्तापक्ष का विरोध करना विपक्ष का मौलिक कर्तव्य और विपक्ष की आलोचना करना सत्तारूढ़ पार्टी का मूल कर्तव्य हो गया है. इस तरह की विचारधारों से यदि देश बहार नहीं निकलता है तो भारत का भविष्य कभी भी स्वच्छ लोकतंत्र की ओर नहीं बढ़ सकता.
इन परिस्थितियों से उबरने के लिए जनता और मिडिया दोनों को पहल करनी होगी.जो ख़बरें धार्मिक,जातीय,सांप्रदायिक तनाव पैदा करें उनका प्रसारण न किया जाए.देश में और भी कई समस्याएं हैं उनपर ध्यान केंद्रित करना अधिक उचित होगा अपेक्षाकृत ”किसने क्या कहा?” इस पर शो बनाने से.
जनता को भी समझदारी दिखानी चाहिए की देश धर्म,जाती या संप्रदाय से परे होता है,यदि सब साथ मिलकर नहीं चलेंगे तो बिखर जाएंगे, फिर जो लोग इस देश के उज्जवल भविष्य का सपना लिए शहीद हुए उन्हें अपने बलिदान पर पश्चाताप होने लगेगा….कृतघ्न नहीं कृतज्ञ बनिए और संवैधानिक मूल्यों पर चल कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कीजिये…यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना हँसते-हँसते मौत को गले लगा लिया..आपके लिए..हमारे लिए..अपने सपनों के भारत के लिए…
जय हिन्द…वन्दे मातरम!
(दैनिक जागरण में सम्पादकीय पृष्ठ पर आज प्रकाशित)



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

करूँ मैं नयनों से अभिषेक

सखे! क्या स्मृति तुमको शेष
खुले थे स्वतः तुम्हारे केश
किया हमने एकांत में बात
आह वह संकल्पों की रात,
अरे वह गगन सुता का दृश्य
और उसमें स्वर्णिम सी नाव
प्रकाशित अन्तःमन का कक्ष
ब्रम्ह का अद्भुत अकथ प्रभाव,
बढे हम तीर्थाटन की ओर
नहीं लाख पाये कोई छोर
कहाँ थी दिशा कोई भी ज्ञात
तुम्हारी हर लीला अज्ञात
नहीं था कोई भी उद्देश्य
नहीं अनुमानित कोई विधेय
विश्व ने घोषित किया प्रमेय
सखे! तुम मानव से अज्ञेय,
एक सागर जो है तटहीन
सकल ब्रम्हांड उसी में लीन
वहीं पर कहा प्रणय के गीत
मित्र तुम पर अर्पित संगीत,
स्वरों का कौतूहल आह्लाद
लहरों में अद्भुत उठा प्रमाद
ध्वनित होती मधुरिम झंकार
मिला संसार का नीरव प्यार
तरंगों की गतियां उत्ताल
मूढ़मति होने लगा निहाल,
शब्दों के बंधन से उन्मुक्त
भावना स्वतः हुई अभियुक्त
सकल ब्रम्हाण्ड यदि हुआ सुप्त
स्वप्न का समय नहीं उपयुक्त,
सहसा मन को मिली फटकार
अभी तो हिय में शेष विकार
यदि कर्तव्य कर्म हों शेष
जीव को मिलता नहीं प्रवेश
द्वीप से मुड़े स्वतः ही पांव
नयनों से ओझल हुआ वो गांव,
छाने लगी उषा चिर काल
विश्व में व्यापित मायाजाल
खग-विहग लौटे अपने द्वीप
आने लगी निशा ज्यों समीप
जाने किसने फेंका था पाश
हुआ मति का मेरे अवकाश
और सम्यक दृष्टि से हीन
अहं में हुआ मेरा मन लीन,
यही पथ की बाधा थी मित्र!
धूमिल हुआ तुम्हारा चित्र,
नयनों पे कुहरे का है प्रभाव
कहीं तो भटक रही है नाव
नाव में हुआ है ऐसा छेद
डुबोता मेरे मन के भेद,
सुझाओ मुझको ऐसी राह
नाव को मिलती रहे प्रवाह,
विचरण करूँ सदा स्वछन्द
कभी न गति मेरी हो मंद,
मुझे बस वही दिशा मिल जाए
जहाँ दर्शन तेरा मिल जाए
कामना जहाँ गौण हो जाए
कौतूहल जहाँ मौन हो जाए,
अभीप्सित मुझे वही स्थान
जहाँ अवलोकित हों भगवान,
मेरी इच्छा है केवल एक
करूँ मैं नयनों से ''अभिषेक''।।
-अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 23 मार्च 2016

होली है


कितना भी तुम छिप लो राधा
तुम्हे रंगने आऊंगा
बरसाने से वृन्दावन तक तुमको
मैं दौड़ाऊँगा,
चाहे तुम कितना भी छिप लो रंग बिरंगी गलियों में
तुमको अपने प्रीत के रंग में भीतर तक रंग जाऊंगा।।
तुमसे न डरती हूँ कान्हा! तुम न मुझे
रँग पाओगे,
अपने रँग दिखा दूँ तुमको तो मुझसे
डर जाओगे,
चढ़ा हुआ है रँग प्यार का मेरे तो
मन मंदिर में
रँग-बिरंगी राधा को तुम कहाँ भला
रँग पाओगे??
- आप सबको अभिषेक की ओर से होली की बहुत-बहुत बधाई

गुरुवार, 17 मार्च 2016

बरस रहा है यूँ प्यार तेरा...

बरस रहा है यूँ प्यार तेरा कि जैसे आँखों में उमड़ा बादल
तरस रही हैं मेरी निगाहें तेरी ही ख़ातिर हुआ मैं पागल,
दीवाना तेरा हुआ हूँ जब से नहीं लगे मन किसी जगह पे
जो दिन ढले तो तू याद आये जो शाम हो तो तेरी वो पायल
कि जिसकी छन-छन में डूबा तन-मन
कि जिसकी आहट से नींद टूटे,
कहां है गुम-सुम वो प्यार तेरा किया था जिसने जिया को कायल
बहकते क़दमों ज़रा तो ठहरो हुआ है ख़्वाबों से इश्क़ मुझको,
न पीछे पड़ना, न संग चलना, न राह तकना न होना घायल।।

-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

भरत ने कही ह्रदय की बात




भरत ने कही ह्रदय की बात
चलो तुम आज अयोध्या तात,
अभी तो तनिक शेष है रात
तात! तुम स्वयं नवल प्रभात।।
नहीं कुछ कैकयी का दोष
कहाँ नारी को इतना होश
सकुचित हुआ ह्रदय का कोष
परमति प्रकट हुआ था रोष।।
मन्थरा का था मलिन प्रभाव
दे दिया अविनाशी सा घाव
न जाने कैसा था वह ताव
किया जो अधम दिशा को पांव।।


प्रसंग बताइये?
😊😊😊😊😊😊
(पूरा कुछ दिन बाद लिखूंगा)
-अभिषेक

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कागज़


किताबों के दफ़्तर में रंगीन कागज़
रौशन है दुनिया जहाँ इनकी आमद,
सीखते ये दुनिया को सारे नज़ाकत
इन कागजों में गज़ब है हिमाकत।
इन्हीं काग़ज़ों से है रंगीन दुनिया
ये न हों तो लगती है संगीन दुनिया ,
ये हों तो मीठी है नमकीन दुनिया
ये न हों तो लगती है ग़मगीन दुनिया।
कहीं काग़ज़ों से है बिगड़ी तबियत
कहीं काग़ज़ों से हुई फिर फ़ज़ीहत,
कहीं काग़ज़ों से है गुमसुम अक़ीदत
कहीं काग़ज़ों से मिली फिर नसीहत।
कहीं काग़ज़ों में बनी है कहानी
कहीं कागजों की सुनी है जुबानी,
कहीं काग़ज़ों में हैं रस्में निभानी
कहीं काग़ज़ों में है उलझी जवानी।
-अभिषेक शुक्ल
(एक छोटी सी कोशिश कागज़ पर )

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

मेरी आँखों में उतरी 😊😊



मेरी आँखों में उतरी इश्क़ की ऐसी
वीरानी है
कि जैसे तुमको पाने की मेरी चाहत
पुरानी है !!
सुचिता के तूलिका से....