सोमवार, 1 सितंबर 2014

माँ

मेरी दुनिया तुझ तक सिमटी,
बाकी सब लगता है सपना,
 माँ   तू   है   तो  दुनिया हैं ,
तेरे पास ही मुझको रहना.
बहुत दिनों से थका-थका हूँ
थपकी दे के सुला दे माँ,
तुझ से दूर रहा नहीं जाता
मुझको पास बुला ले माँ....

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

मेरा देश:विडम्बना और यथार्थ

भारत, मेरा भारत, मेरे सपनों का भारत, सुन कर कितना अच्छा लगता है कि हम विश्व के सबसे बड़े गणतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक हैं, सोने पे सुहागा ये है की संसार का श्रेष्ठतम मानव निर्मित  संविधान  हमारे देश  का है. संविधान निर्माताओं  ने  दुनिया   भर  का  संविधान पढ़ा, क़ानून  पढ़ा, जहा से जो अनुकरणीय लगा  उसे भारतीय संविधान का  हिस्सा  बनाया.आज सबसे समृद्ध संविधान हमारा ही है. बात चाहे ''राज्य के नीति निर्देशक तत्वों'' की हो या मौलिक अधिकारों की हर जगह हम अपने आपको सबसे बेहतर पाते हैं.इतनी आज़ादी दुनिया के किसी भी देश ने अपने नागरिकों को नहीं दिया है जितनी आज़ादी हमे मिली है. संविधान ने अवसर सबको दिया है कभी आरक्षण के रूप में तो कभी निर्देश के रूप में. भारत की धर्मनिरपेक्षता को सबने सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया है फिर चूक कहाँ हो रही है?

                             क्या संविधान में नीति और निर्देश लिख देने भर से देश में उन्नति हो जायेगी? क्या किताबों में लिखे अधिकारों से हम सच में समर्थ हो जायेंगे? नहीं कभी नहीं. नियम तो लाख हैं भारत में पर उनका नियमन और नियंत्रण करने के लिए सरकार की मशीन में ही जँग लग गयी है. ये जँग आज की नहीं है वर्षों  पुरानी है. आजादी   के तुरंत  बाद  से ही बुराइयां पैठ बनाने लगीं थीं.
क्या अपने कभी सोचा है की क्यों सबसे बड़े लोकतंत्र का तमगा लेकर हमारे देश में लोकतंत्र का तमाशा बनता है? मतलब क्या होता है बड़ा होने का? खजूर भी तो बहुत बड़ा होता  है पर किस काम का? ये लोक तंत्र है कि भीड़तंत्र? आम जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद भेजती है कि देश में विकास होगा, शांति होगी पर बदहाली के अलावा हमारे यहाँ है क्या?
    संसद में हमारे जन-प्रतिनिधि जनता से कितने वफादार हैं ये जनता भली-भांति जानती है फिर भी हर बार एक उम्मीद के साथ भेजती है कि अच्छे  दिन आएंगे पर जनता कि इस सोच को हर बार छाला जाता है क्योंकि संसद वाले जानते हैं कि भारतीय जनता को नचाया कैसे  जाता है.भारत में भ्रष्टाचार  के पीछे  तो सबसे बड़ा हाथ जनता का ही है...तो भला नेता क्यों न करे वो ठेंठ से ही बेईमान होते हैं.
                यदि पचास से अधिक एक्ट पास कर देने से कोई देश विकसित होता तो अब तक भारत अमेरिका से आगे चला गया  होता क्योंकि भारत में हर बात के एक्ट बन जाते हैं पर उनके नियमन और नियंत्रण  की तो कोई बात ही नहीं करता. जनता सरकार को कोसती है सरकार जनता को.हमारे देश में तो बस यही होता है. इस अव्यवस्था का परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है.
बात तंत्र के विफलता की हो रही है तो सबसे पहले बात करते हैं जनता की क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण इकाई जनता ही होती है---
                                                           ''काली करतूत''
                             अभी कुछ दिन पहले एक दिल दहला देने वाली घटना हुई है लखनऊ के मोहनलाल गंज इलाके में.एक ३२ वर्षीया महिला के साथ कुकृत्य और उसके बाद उसकी नृशंसता से हत्या. लखनऊ जहाँ उत्तर प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास, जब मुखिया के रहने पर ये हाल है तो न होते तो क्या होता? मुखिया जी के पास बहाना  है की कुकर्म  तो सरकार ने नहीं किया. किसी आम नागरिक ने ही किया है. सही बात है ये आम नागरिक ही ऐसे ख़ास काम कर सकता है और फिर सरकार को हिज़ड़ा बताता है. अगर बलात्कारियों को मृत्यु दंड दिया जाए तो सबसे पहले उनके घर वाले कहेंगे की एक गलती के लिए मेरे लाल को फ़ासी चढ़ा रही है सरकार, पर यही गलती उनके बेटी के साथ कोई कर दे  तो पहाड़  टूट  पड़ता है. क्या दोगलापन  है समाज में? बात अपने पर आती है तो व्यवहार ,विचार  सब बदल जाते हैं. बेटा है वो कुछ करे तो गलती है और उसे माफ़ी  पाने  का अधिकार  है पर जरा  बेटी की सोचिये, जिसका  बलात्कार  होता है उसका  कभी मीडिया  तो कभी सरकार तो कभी पुलिस  बलात्कार करती है, बार-बार और हर बार.
लखनऊ में हैवानियत  की शिकार  महिला की नग्न  फोटोज  भी मीडिया  में खूब  पब्लिश  हुए. हर अखबार  के ऑफिसियल  साइट  पर फोटो  डाला  गया था. कितनी  घिनौनी  हरकत  थी ये? क्या भारतीय महिला इसी के योग्य है? जीते जी जान चली गयी जिस इज्जत को छुपाने में वो अखबारों की सुर्खियां बनी? हम भारतीयता का दम्भ भरते  हैं और इतनी  गिरी हुई हरकत करते  हैं, नग्न फोटो डालने  तो सरकार  नहीं  आई  थी  न? ये कुकृत्य किसी आम नागरिक का ही था  न? एक मृत नग्न महिला को ढकने की जगह उसकी नंगी फोटो सोशल मीडिया में डाला जाता है ये कौन सी डेमोक्रेसी है?
   यही आम जनता बलात्कार करती है और फिर न्याय की मांग करती है..कैसी माँ  है जो एक बलात्कारी को अपना बीटा  कहती  है..पहली  सजा  अगर घर से मिले  तो शायद  बलात्कार के केसेज  काम  हो  जाएँ.
     बलात्कार के लिए हमारे यह क़ानून तो है पर १७६८ वाला. नया बना ही नहीं क्योंकि जनता भी १७६८ वाली  है..असहाय कमजोर  और नामर्द .
                    लाख स्वाधीनता दिवस मन लें हम पर ये हैवानियत की जो मानसिक  गुलामी  हम कर रहें  हैं ये मिटने वाली नहीं है...१५ अगस्त आने वाला है, स्वाधीनता मिले  एक अरसा  हो गया  पर महिलाओं की दशा देखो ..वो तब भी असुरक्षित थीं  आज भी हैं, और जिस तरह से लोगों  की निष्क्रियता  है भविष्य  में भी रहेगी.
         बंद करो कायरों जान-गण-मन या वन्दे मातरम का गान, अपने आश्रितों  को छत नहीं दे सकते तो भारतीय होने  का स्वांग क्यों रचते हो..अपने को आर्य कहते हो और कर्म इतने  निन्दित करते हो...ऐसा न हो की आने वाली संतति अपने आपको ''भारतीय'' होने के लिए कोसें..शायद हमारे कर्मों का वही सबसे सटीक प्रतिफल होगा.
(आज दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर मेरा आलेख प्रकाशित हुआ है, ''मेरे देश की विडम्बना'' शीर्षक से ''जागरणजंक्शन'' वाले कोने में. यूँ तो रात काफी हो चुकी है और अखबार आमतौर पर लोग सुबह ही पढ़ते हैं लेकिन आप रात में भी पढ़ लीजिये...मुझे ख़ुशी होगी.. शुरूआती दिन हैं तो ख़ुशी कुछ ज्यादा ही मिलती है अपना नाम अखबार में देखकर...आपको देर से इसलिए बता रहा हूँ कि मुझे भी देर से पता चला और जब पता चला तो नेटवर्क आंखमिचौली खेलने लगा...प्रतिलिपि अपलोड कर रहा हूँ, पूरे आलेख की बस दस पंक्तिया ही प्रकाशित कि गयीं हैं, पर पूरा लेख मेरे ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है, मेरे ब्लॉग का पता है- www.omjaijagdeesh.blogspot.com)

सोमवार, 4 अगस्त 2014

कुदरत


कुदरत ने मुस्कराने के मौके बहुत दिये हैँ,
जाने क्योँ मुस्कराहट मुझसे खफ़ा-खफ़ा है...

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

यादें



                                                 तुम्हारी आँख लगती है
                                                            तो आँखे बंद होती है,
                                                 तुम्हारी नींद खुलती है
                                                            तो साँसे मंद होती है,
                                                  अजब है हाल -ए-दिल मेरा
                                                           जुड़ा हूँ जब से मैं तुमसे,
                                                  मेरे अपने ही धड़कन से
                                                            मेरी ही जंग होती है.

बुधवार, 23 जुलाई 2014

माँ!



कुछ गलती मैँ कर देता हूँ

कुछ मुझसे हो जाती है,

इसके बाद ये जालिम दुनिया

ताने बहुत सुनाती है,

तू न होती तो मेरी माँ!

मुश्किल था जिँदा रहना,

जब दुनिया मुँह फेरे मुझसे

तब तू गले लगाती है॥

                                     ( a snap with my dadi amma)

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

'' संकल्प ''

झुरमुट की ओट में बैठकर
तुम्हारे आने का
बाट जोह रहा हूँ
और
तुम हो
कि
खिसकते जा रहे हो
मुझसे दूर- कोसों दूर.
रात-दिन
काल -समय
सब पीछे छूट गए,
बढ़ना चाहता हूँ
लक्ष्य विहीन पथ की ओर,
कहीं
किसी अज्ञात दिशा में
तुम्हे खोजने,
तुमसे
अगाध प्रेम जो है.
सुना है समय से मैंने
युग बीत गए
एक नहीं अनेक
पर तुम्हारी दशा
यथावत रही,
जग ने तुमसे प्रेम किया
और तुम
हाथ न आये किसी के.
मैं हठधर्मी हूं
पराजय सहज
स्वीकार नहीं,
प्रेम किया है
उनसे जो बंधनों
से उन्मुक्त हैं,
सुना है कि
”प्रबल प्रेम के आगे
सब विवश होते हैं”
शायद तुम भी
सब में आते हो…

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

"प्रपंचमेव जयते”

भारत के पिछड़ेपन के पीछे प्रपंच का बड़ा योगदान है.आने वाली कई पीढ़ियां इसके लिए अपने पूर्वजों की आभारी रहेंगी.देश में कई आफतें आयीं कभी मुग़लों का आक्रमण कभी मंगोलों का, इतना भी कम नहीं था कि गोरे आ टपके , सारा भारतीय ढांचा बदल के रख दिया. बैल गाडी की जगह रेलगाड़ी ने ले ली सब कुछ बदल गया पर यथावत यदि कुछ रहा है तो वह है भ्रष्टाचार और प्रपंच. वैसे किसी अँगरेज़ महाशय ने कहा भी है कि ”भारतीय स्वाभाव से ही भ्रष्ट होते हैं.’ सच क्या है या झूठ क्या है इसे तो अब पूरी दुनिया जानती है, वफादार तो हम अपने देश के प्रति नहीं होते कर्त्तव्य के प्रति क्या होंगे.खैर बात प्रपंच की हो रही थी भ्रष्टाचार की बात बाद में कर लेंगे. प्रपंच हमारे देश का ”राष्ट्रीय कार्य” है’, मैं प्रधान मंत्री बना तो अनुच्छेद ५१ अ ”मौलिक कर्तव्य” में एक और कर्तव्य जोडूंगा और इस अनुच्छेद में वर्णित कर्तव्य कुछ यूँ होगा, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह;- ”प्रपंच धर्म का पालन करे तथा प्रपंचियों के एकता तथा अखंडता की रक्षा करे और इस धर्म को अक्षुण्ण बनाये रखे.” हर राष्ट्र का एक धर्म होता है.पुराणों में तो धर्म को राष्ट्र का पति कहा गया है, आज भले ही पुराण थोड़े अप्रासंगिक सिद्ध हो चुके हैं पर राष्ट्र धर्म की कमी खलती है.’पंथ निरपेक्ष ‘, ‘धर्म निरपेक्ष बस कहने में ही अच्छा लगता है. राष्ट्र का एक धर्म होना चाहिए. हिन्दू -मुस्लिम राष्ट्र नहीं क्योंकि भारत में ऐसी संकल्पना आधार हीन है और असंभव भी. वह धर्म राष्ट्र धर्म बनने योग्य नहीं है जिसमे आस्था थोपी गयी हो. धर्म ऐसा हो जिसकी सदस्यता ऐच्छिक हो. भारत में सनातन धर्म के समकालीन ही एक और धर्म का अभ्युदय हुआ ”प्रपंच धर्म का, अब सनातन धर्म के प्राचीनता पे तो किसी को संदेह नहीं होना चाहिए. प्रपंच धर्म तो वर्षों से फल-फूल रहा है, मज़े की बात यह है इस धर्म के अनुयायी सारे भारतवासी हैं..शायद ही कोई स्त्री या पुरुष हो जिसे इस धर्म से परहेज़ हो, तीसरे तबके के बारे में क्या कहु ..उनसे ज़रा संवादहीनता की स्थिति है.
विश्व का कोई धर्म इतने बड़े पैमाने पर नहीं मनाया जाता यह गौरव सिर्फ प्रपंच धर्म को मिला है.इस धर्म के अनुयायी भारत के हर घर में मिलेंगे…संविधान से ”सेक्युलर” शब्द हटा कर प्रपंच शब्द जोड़ देना चाहिए भारतियों को इससे कोई आपत्ति नहीं होगी. यह धर्म मनोरंजन भी करता है. शाम या सुबह जब भी वक्त मिले घर के बहार कुर्सी डाल कर बैठ जाइए ‘कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल ” देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बशर्ते आप थोड़े से मितभाषी हों. व्यवसाय का उदाहरण तो आपको टी.वी खोलते ही दिखने लगेंगे, कभी कलर्स तो कभी स्टार प्लस…और सरे न्यूज़ चैनल तो प्रपंच की कमाई ही कहते हैं, बात चाहे ‘ आज तक ‘ की हो या न्यूज़ २४ की..सब का धंधा इसी से फलता-फूलता है. भारतियों में तो इस धर्म का क्रेज़ है, मोहल्ले की बातें देखते -देखते कब पूरे गावं में फैलती हैं पता ही नहीं चलता . एक कान से दुसरे कान तक बाते कुछ ऐसे पहुचती हैं कि जैसे बातों की रफ़्तार मन से तेज़ हो..बात कोई भी हो बस होनी चाहिए. कभी -कभी तो वक्ता के कहने का आशय भी समझ में नहीं आता फिर भी लोग मज़े से सुनते हैं. काश ये एकाग्रता भगवान के लिए हो जाए तो तो स्वर्ग तो छोटी चीज़ है सायुज्य भी मिल जाए. प्रपंच धर्म के अनुयायी ”प्रपंची ” कहलाते हैं.इनकी नज़रे बड़ी पैनी होती हैं.समसामयिक घटनाओं पर इनकी पकड़ तो काबिले तारीफ होती है.घटना किसी एक के सामने होती है पर देखते -देखते पूरा गावं सच से रूबरू हो जाता है, ख़ास बात ये है की इस धर्म का प्रत्येक सदस्य घटनाओं का कुछ ऐसा सजीव वर्णन करता है कि सुनने वाले को लगता है सब कुछ उसके सामने ही हो रहा है. एक्शन, इमोशन, ड्रामा और खूब सारा मसाला बस ढंग का कोई प्रपंची मिल जाए…वादा है दोपहर में सीरियल देखना छोड़ देंगे आप. लोग झूठ में ही कहते हैं की प्रपंच बस महिलाओं का काम होता है.ये पुरुषों द्वारा महिलाओं के बारे में फैलाई गयी झूठी अफवाह है. हैं मेरे गावं के कुछ वयोवृद्ध व्यक्ति लोग जिनसे बात करते समय यही डर लगता है कि कब ये अपने जवानी के दिनों वाली हरकतें सुननी सुरु कर दें, कुछ तो उम्र का असर कुछ मानसिकता का बुढ़ापे में इंसान और प्रपंची हो जाता है, जवानी के जितने अरमान अधूरे रह जाते हैं सबको बुढ़ापे में पूरी करने की प्रबल इच्छा होती है पर क्या करें..बात के अलावा कुछ कर नहीं सकते. आज तो यह धर्म और आधुनिक हो गया है पर कल का पता नहीं..लोग शिक्षित हो रहे हैं और व्यस्त भी…सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं पर इनकी मस्ती इस धर्म के लिए खतरा है…जो व्यस्त हुआ वो प्रपंची नहीं रहा…सफलता इस धर्म की सदस्यता को निरस्त कर देती है….पर शायद भारत के ”अच्छे दिन’ की तरह इस धर्म के अंत का दिन कभी न आये….ये धर्म चिर पुरातन है और चिर नवीन भी…आशा है आने वाले दिनों में इसके अनुयायी बढ़ेंगे……तब तक के लिए..जय प्रपंच…जय भारत!!! (दैनिक जागरण वाकई सबसे अच्छा समाचार पत्र है, अच्छा इसलिए कि मेरे लेख को ये कचरे के डिब्बे में नहीं फेंकते...छाप देते हैं, खुश हूँ एक बार फिर सम्पादकीय पृष्ठ पर जगह मिली..कोने में ही सही...पर कहीं तो हूँ....देखता हुँ कि कब-तक मुझे छोटे कोने से ही संतोष करना पड़ेगा...कोशिश जारी है..दुआ कीजिये) published on dainik jagran..

गुरुवार, 22 मई 2014

''विजय ''..आयोजन अथवा यत्न

बहुत सारी बातेँ विपद के गर्भ मेँ होती हैँ। उनका होना या न होना सब भविष्य के कपाट मेँ बंद होता है, हाँ अपने भविष्य मेँ झाँकने की इच्छा सबकी होती है मेरी भी है। दर्शक हूँ कुछ आयोजन नहीँ करुँगा क्योँकि दर्शक दीर्घा मेँ बैठने की एक बड़ी कीमत चुकायी है, आयोजन करुँ भी तो क्योँ करुँ? प्रसंगिकता क्या होगी मेरे यत्न की? पूर्वजोँ के सम्मिलित स्वर रहे हैँ-" विपद के लिए आयोजन कैसा?" जो हो रहा है उसे होने दो कोई आयोजन मत करो। दूसरोँ पर न सही पर अपने पर विश्वास करो। यदि परमशक्ति की सत्ता है तो तुम भी सर्मथ हो, कोई ऐसी बाधा नहीँ है जिसे मानव पार न कर सके। अवरोध आते हैँ पथ कितना भी सरल क्यो न हो; कभी छलाँग लगाना पड़ता है तो कभी राहेँ बनानी पड़ती हैँ। विपरीत परिस्थितियोँ मेँ भी जो अड़िग रहता है वही वीर है और ये दुनिया वीरोँ की है, वीर बनने के लिए यदि कभी कायर भी होना पड़े तो हो जाओ, भगवान राम ने भी कायरता को हथियार बनाया था और भगवान कृष्ण ने भी फिर हम तो सामान्य मानव हैँ, कायर बनने मेँ क्या हर्ज है। विजेता बनना अनिवार्य है चाहे आप को विजय रण छोड़ कर मिली हो या लड़कर। विजेता का बस वर्तमान होता है, उसके अतीत को कोई नहीँ कुरेदता। हाँ!, कुछ लोग होते हैँ जिनका काम ही होता है इधर-उधर झाँकना, पर उनकी ताक-झांक बस रंगमंच के विदुषक के स्तर की होती है जो बस लोगोँ का दिल बहलाती है। विजेता बनने का आयोजन मत करो बस यत्न करो, आयोजन वे करते हैँ जिन्हेँ बस जीवन को घसीटना होता है और यत्न वे करते हैँ जिन्हे नायक बनना होता है। लोग कहते हैँ कि मानव योनि विधाता की श्रेष्ठतम कृति है, फिर मानव होकर दु:ख कैसा-अवसाद कैसा? जीवन मेँ उतार-चढ़ाव आते हैँ। कभी-कभी तो सूर्य का रथ भी रुक जाता है, हर पथ पर विँध्य पर्वत अवरोध बन खड़ा है जिसे पार करना पड़ता है। आप मेँ दृढ़ इच्छा है तो चारोँ दिशाओँ मेँ आपके सहायतार्थ अगस्त्य ऋषि हैँ, जिनके एक आदेश से गिरिराज झुक जाते हैँ, और फिर कभी नहीँ उठते। आपके संकल्प ही अगस्त्य ऋषि हैँ और आप स्वयं सूर्य हैं, बाधाएं विंध्य पर्वत इनसे ऐसे पार पाइए की फिर कभी आपका मार्ग रोकने का साहस इनमे न रहे। कीर्ति-अपकीर्ती, यश-अपयश तो जीवित होने के साक्ष्य हैँ इनसे कैसा व्यथित होना? , इन्हे ही तो हरा कर जीतना है। कुछ भी असाध्य नहीं है, ''जहाँ चाह है वहीँ राह है।'' हमारे धर्म ग्रंथों में भी लिखा है- ''वीर भोग्या वसुंधरा'' ...लड़ो और जीतो.. दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो सत् संकल्पों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर पाये..जीवन का एक और सत्य- ''कभी कोई हारता या जीतता नहीं'', दोनों स्थितियां बस छडिक हैं..मज़ा लड़ाई में है हार या जीत में नहीं..जीवन के दो दशक मैंने देख लिए हैं थोड़ी सी समझ मुझमे अब आ गयी है, बस इस जिंदगी से इतना सीखा है कि, '' हारो तो हतोत्साहित न हो, और जीतो तो महत्वाकांक्षी न हो ''। परेशानियां परछाईं को भी न पता चले, गम को मुस्कराहट में दबाना सीखो, और खुशियां बिखेरने की कोशिश करो...मस्त रहो-व्यस्त रहो...खुशियों के खजाने की बस यही चाभी है......

शनिवार, 3 मई 2014

चुनाव (एक उम्मीद )

आज-कल चुनावों का दौर है, भले ही यह महोत्सव अपने समापन की ओर बढ़ रहा हो लेकिन दर्शकों का उत्साह अपने चरम पर है. चुनाव के नतीजे का इंतज़ार सबको है. न्यूज़ चैनलों पर  नेताओं की वर्षों पुरानी घिसी-पिटी तस्वीरें रिपीट की जा रही हैं. कहीं राजनाथ सिंह तो कहीं सोनिया गांधी, बाकियों का तो नाम लेना भी गुनाह है. अरविन्द केजरीवाल भी कभी -कभी दिख जाते हैं. भला हो दिग्गविजय  सिंह जी का जिन्होंने मीडिया का ध्यान चुनाव से थोड़ा भटकाया. सिंह साहब कितने भले आदमी हैं ये तो देश की जनता जानती ही है. समय-समय पर बम फोड़ते रहते हैं. कांग्रेस जिस तरह से मीडिया से बाहर हुई थी दिग्गविजय जी ने फिर से ध्यान आकर्षित कराया और करें भी क्यों न पार्टी के स्वघोषित संकटमोचन जो हैं.
नेताओं की एक ख़ास बात है कि इनकी जनता से मिलने की इच्छा बलवती बस चुनावों में होती है, बाकी दिनों में विदेशी दौरों  से फुर्सत ही कब मिलती है जो ये जनता को याद करें. गलती नेताओं की नहीं है सत्ता पाकर देवराज इन्द्र भगवान को भूल जाते थे नेता तो स्वभाव से ही एहसान फरामोश होता है. चुनाव आते ही सारे नेता अपने-अपने कब्रों से भाग कर बहार आते हैं जनता की सेवा करने. भोली -भली जनता नेताओं को इतने दिनों बाद  देखकर पहचान नहीं पाती की ये वही नेता है जो पिछले चुनाव में ठग  के गया था और इस बार फिर आ गया है.
चुनाव में नेताओं के पर लग जाते हैं, धरती और आसमान एक लगता है इन्हे, फिर इनके लिए क्या कश्मीर क्या कन्याकुमारी? पालक झपकते ही मीलों की दूरियाँ पल भर में तय हो जाती हैं. इन्हे तो भाग-दौड़ से आराम मिलता है पर जनता तबाह हो जाती है इनके भाग-दौड़ से. कभी यहाँ सभा कभी वहां सभा. इन सभाओं के चक्कर में जनता घनचक्कर बन जाती है. मासूम जनता जो हर बार छलि जाती है, जिसका विश्वास हर बार टूटता है उसकी भी चुनाव से उम्मीद होती है कि इस बार परिवर्तन होगा. कोई नया चेहरा  देखने को मिलेगा पर अफ़सोस कि परिवर्तन की जगह पुनरावृत्ति होती है. पूरा  विश्व जानता है की भारतियों की प्रवित्ति ही ''पुनरावृत्ति''  है.
   सबसे बड़ी विडम्बना है की हम हमेशा उद्धारक खोजते हैं बनते नहीं. उद्धारक कभी कांग्रेस होती हैं तो कभी भारतीय जानता पार्टी. तीसरा मोर्चा इस लायक नहीं हैं कि उसे सत्ता दिया जाए. हर चुनाव का एक चेहरा होता हैं, और ये चेहरे बदलते रहते हैं. स्थिर होता हैं यदि कुछ तो वह है पार्टियों की  नीयत. कभी दुर्घटना से मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री बन जाते हैं तो  दुर्भाग्य से लाल कृष्ण आडवाणी जी ''पी.एम इन वेटिंग'' ही रह जाते हैं. खैर लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं.
 इस बार के चुनाव में कुछ नए चेहरे हैं. कांग्रेस तो खुद में एक नकाबपोश है जो चेहरा कभी दिखाती ही नहीं. सब कुछ इस पार्टी में दुर्घटना से होता है. भाजपा ने इस बार कुछ नया किया  है. नरेंद्र मोदी इस बार हर जगह दिख रहे हैं. गुजरात नरेश यूँ तो खुद को चाय बेचने वाला कहते हैं, ये भी उनकी अदा है जो इन दिनों खूब पसंद किया जा रही  है. जिस तरह से उनकी मार्केटिंग की गयी है लगता है की ''अबकी बार-मोदी सरकार''. मतलब साफ़ है कि इस बार सरकार भाजपा कि नहीं ''मोदी'' की बनेगी. विकास पुरुष से लेकर युगपुरुष तक सब कुछ जानता इन्हे  मान रही है. मोदी के नाम पर तो लाठियां तन जा रही है. मानो मोदी जी भगवान हों, और अधर्म का नाश करने के लिए संकल्पित हो गए हों. हांकने में तो इनसे बढ़कर कोई नहीं, ''वीर-गाथा'' काल के कवियों को भी इन्हे सुन के लज्जा आ जाए 'हाय! हम तो इनके सामने एक पल भी नहीं ठहर  सकते.
       कांग्रेस की बात की जाए तो इन्होने इतने घोटाले किये हैं कि जनता इन्हे कम से कम दस साल तो सत्ता में आने नहीं देगी. इनके अक्षमता से जनता कितनी व्यथित है यह कहने कि जरुरत नहीं है. ऊपर से मंहगाई, सरकार गिराने के लिए ये अकेले बहुत काफी है.
 जनता व्यथित हो जाए कहाँ? आम आदमी पार्टी बनी  थी, लोकतंत्र के लिए एक आशा की किरण बनकर आई, एक साल के भीतर बनी  पार्टी ने दिल्ली  में सरकार बना लिया, पर राजनीतिक अनुभवहीनता और पार्टी के सदस्यों का आपसी अंतरकलह  इस पार्टी को भी ले डूबा. अरविन्द केजरीवाल  व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छे  और ईमानदार छवि के  व्यक्ति हैं किन्तु इनके सहयोगियों के अल्पबुद्धिता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर इनका आना असंभव है. देश कैसे सुधारेंगे जब असली कचरा इनके पार्टी में है, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र और न जाने कितने नाम जिनके बोलने से इस पार्टी कि खूब थू-थू हुई पहले उन्हें सुधारें  फिर देश सुधारने  के लिए अग्रषर हों .
              जनता बेवक़ूफ़ नहीं है फिर भी बार-बार बेवक़ूफ़ बनती है, कभी मज़हब के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर यहाँ सरकार बनती है. समझ में ये नहीं आता कि भारतियों को गलत और सही क्यों नहीं दिखता? वोट डालते हैं या कोटा पूरा करते हैं? भविष्य से बहुत उम्मीदें हैं, देखते हैं कि हम गलतियां दोहराना बंद करते हैं या गलतियां अब हमारी मनोवृत्ति बन गयी हैं?

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

हाय रे टोपी!

दुनिया में अकेला भारत ऐसा राष्ट्र है जहाँ टोपी की राजनीति होती है. चुनाव भर तो इसकी धूम मची रहती  है.आम आदमी की टोपी, ख़ास आदमी की टोपी और न जाने किस -किस आदमी की टोपी. जैसी हवा बही नेताओं  ने वैसी टोपी पहन ली.आम तौर पर हमेशा टोपी का रंग सफ़ेद होता था पर जब से मुलायम सिंह जी का राज आया  टोपी की परिभाषा बदल गयी. पहले लोगों के कच्छे लाल हुआ करते थे अब टोपी भी लाल होने लगी. भाई टोपी दूर  से दिखनी चाहिए क्योंकि सारा खेल टोपी का है. सफ़ेद टोपी पे धुल जम जाती है सो धूल -गर्दे से बचने के लिए रंगीन टोपी जरूरी है, अब करम भले ही काले हो पर टोपी लाल होनी  चाहिए.

यूँ तो लाल रंग खतरे का प्रतीक होता है पर इन दिनों उत्तर प्रदेश में समाजवाद का प्रतीक है. अगर कोई ट्रेन गलत रुट पे चली जाए और कोई जानकार आदमी उसे लाल कपडा दिखाए और आगे आने वाले खतरे से आगाह करना चाहे तो तो ड्राइवर गाडी नहीं रोकेगा बल्कि और स्पीड बढ़ा देगा क्योंकि उसे अंदेशा हो सकता है कि ये जरूर कोई समाजवादी है, वोट मांगना चाह रहा है यात्रियों से. इतनी बड़ी संख्या में लोग कहीं इकट्ठा मिलने से रहे तो चलो ट्रेन में ही दाँव  मार लेते हैं क्या पता कोई मुर्गा फंस जाए.
    देश में जब भी वीरता का ज़िक्र हो तो उत्तर प्रदेश वालों  का नाम जरूर लेना चाहिए क्योंकि ये ये खतरे के निशान को देखकर भी नहीं डरते और लाल टोपी वाले की सरकार बना देते है वो भी बहुमत से.खैर उत्तर प्रदेश में तो नीली टोपी भी चलती है पर दुर्भाग्यवश इन दिनों ट्रेंड से बाहर है.
बात टोपी की हो और आम आदमी पार्टी की बात न हो तो सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा. अरविन्द केजरीवाल की टोपी ने तो दिल्ली में तहलका मचा दिया. साल भर के अंदर एक आम आदमी ने पूरी सरकार हिला के रख दिया. संसद में मनमोहन सिंह और दश-जनपथ में सोनिया और राहुल गांधी जी की रातों की नींद हराम हो गयी.मनमोहन जी तो सदा के लिए मौन ही हो गए. ये आम आदमी की टोपी का ही करिश्मा था. आम आदमी पार्टी की एक ख़ास बात है की पार्टी वाले भले ही कच्छे में हों पर टोपी उनके सर पर जरूर रहेगी जैसे टोपी पहनना ही उनके जीवन का ध्येय हो.तेज़ हवा या आँधी में यदि उनकी टोपी उड़ जाए तो दिल्ली की सड़कों पर ''बिन टोपी सब  सून'' गाना गाते हुए पार्टी के एक दो सदस्य मिल जायेंगे आपको. केजरीवाल जी को टोपी कितनी प्यारी है ये तो पूरा  भारत जानता है. सर्दी में कभी-कभी जोर की  हवा चल पड़ती है तो टोपी उड़ने का खतरा होता है इसलिए केजरीवाल जी ने टोपी को कसकर मफलर से बंधा. भाई ''प्राण जाए पर टोपी न जाए''. देखो टोपी का दम और सच्चाई की ताकत मोदी की हवा होते हुए भी कूद पड़े वाराणसी में उनके खिलाफ. अरविन्द जी की टोपी नहीं सुदर्शन चक्र है जो भ्रष्टाचारियों की पहचान कर उन्हें सन्मार्ग पर लाती है. जय हो आम आदमी के टोपी की.
       अन्ना की टोपी में भी दम था. रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ ने साबित कर दिया की सच्चाई की राह पर चलो तो आज भी आपके साथ लाखों लोग खड़े हो सकते हैं. अन्ना की टोपी गांधीवादी टोपी है, इस टोपी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. इतने बड़े जन समर्थन  के बावजूद भी टोपी जस की तस बनी रही. अन्ना हज़ारे जी  यदि राजनीति में आते तो मोदी जी की हवा कभी नहीं बन  पाती.भले ही मोदी जी के समर्थक उन्हें रजनीकांत मानते हों पर अन्ना की टोपी के आगे ये दो दिन भी नहीं टिक पाते. अन्ना के आंदोलन में अरविन्द जी जिस कोने में बैठे थे वहां गंदगी सबसे ज्यादा थी इसलिए टोपी पर धूल जम गयी और अरविन्द जी को अन्ना का साथ मज़बूरी में छोड़ना पड़ा, सफाई जो करनी थी. अब सफाई का स्थायी चिन्ह झाडू उनके टोपी की शोभा बढ़ा रही है.अब भला गंदगी की हिमाकत कहाँ जो वो टोपी पे टिक पाये झाड़ू के रहते हुए.
                                क्या कहूँ? सवाल टोपी का नहीं नहीं है सवाल जनता के विश्वास का है. कभी संप्रदाय की आड़ में कभी वोट बैंक की राजनीति के लिए टोपी पहनी जाती है. नेताओं  की इन ओछी हरकतों को देखकर भी जनता की आँख नहीं खुलती. कैसा ये लोकतंत्र है?  हमारे प्रतिनिधि पहले टोपी पहनते हैं फिर टोपी फिरातें हैं और हम मूक दर्शक बन खड़े रहते हैं. किसी भी राजनीतिक पार्टी का कल्याण बिना टोपी पहने नहीं होता. हमें परेशानी टोपी से नहीं छल से हैं. क्यों पैदा करते हैं जनता में धार्मिक उन्माद चन्द वोटों के लिए? क्या जनता इतनी बेवकूफ़ है की इसे लिबास पहन कर बेवकूफ़ बनाया  जा सके?
साम्प्रदायिकता कहाँ दिखती है? किस जगह? सिर्फ नेताओं का पैदा किया हुआ  कीड़ा है धार्मिक उन्माद. अफ़सोस की बात ये है कि  हम इन्हे सुनते हैं, और इनके टोपी फिराने पर मूक दर्शक बने रहते हैं, अगर हम बोलने लगे तो शायद कोई फिर हमे टोपी न फिरा पाये.

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

दिमाग की बत्ती

पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न कौंध रहा है  सही और गलत के परिभाषा को लेकर. सही क्या है और गलत क्या है इसके अतरिक्त  कुछ सोच नहीं पा रहा हूँ. कभी तर्क साथ छोड़ रहा है तो कभी बुद्धि सौतेला व्यवहार क़र रही है.बुद्धि और तर्क दोनों का ताल-मेल विगत कुछ दिनों से असंतुलित है. क्या कहुँ मेरा मस्तिष्क दो परस्पर विपरीत दिशा में काम क़र रहा है, एक वाला सही  खोजने में जुटा है वहीँ  दूसरा न जाने कहाँ से खोज-खोज क़र गलतियाँ ला रहा है. दिमाग की बत्ती जो पहले थोड़ी सांस भर रही थी अब बुझने के कगार पे  है. भ्रम से उपजे भावों ने मुझे विवेक शून्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
                मैंने बुद्धिजीवियों से संपर्क किया समाधान की प्रत्याशा लिए ; पर ऐसे कठिन उत्तर मिले कि उन्हें न समझना ही मुझे बेहतर लगा . मैं तो समाधान कि आस लिए गया था पर ज्ञान की ऐसी गठरी मेरे ऊपर फेंकी गयी कि मैं  संभाल नहीं पाया. क्या करूँ मेरे  समझने की क्षमता बड़ी सीमित है.बढ़ाने का प्रयत्न क़र रहा हूँ पर समझ मुझसे दूर भाग रही है.
ऐसा अक्सर होता है जब हम किसी बुद्धिमान व्यक्ति से अपने समस्या का समाधान चाहते हैं तो एक हज़ार सलाह और मशवरे  मुफ्त में मिल जाते हैं जो कहीं से भी प्रासंगिक नहीं कहे जा सकते, पर ज्ञानियों को समझाए कौन? उनका कहना जनता के लिए'' वेद-वाक्य''. वैसे भी ज्ञानियों की हाँ में हाँ मिलाने से हम निरर्थक बहस से बच जाते हैं. एक व्यथित व्यक्ति बहस करके और दुःख भला क्यों मोल ले?

मैंने अपने बड़ों से सुन रखा है कि समय के पास हर प्रश्न का समाधान होता है मैं भी प्रतीक्षा में हूँ कि कब मेरा समय आये और लगे हाथ कुछ सवाल करूँ ''समय'' से. समय के पास समय रहा तो जरूर बतायेगा अन्यथा ठेंगा दिखा के निकल लेगा.
 मेरे एक वरिष्ठ मित्र हैं उन्होंने   मुझे समझाया जिसे मैं अक्षरशः नीचे लिख रहा हूँ. इनका जवाब मुझे काफी अच्छा लगा   -'' यूँ तो सही कभी-कभी गलत लगता है और गलत कभी-कभी सही लगता है, सब समय का रचा चक्र है और इस चक्र को  जो छीनी-हथौड़ी से गढ़ने बैठ जाते हैं उनका बेडा पार हो जाता है और जिन्हे  छीनी-हथौड़ी से परहेज होता है वो किनारे पे चक्कर मारते हैं कि इस बार चक्र पर  चढ़ जाऊँगा पर अफ़सोस औधें मुंह गिरते हैं. कूदने वाले को गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि उतावलापन इंसानी फितरत है और फितरत की बात ही निराली है.''
   इतनी बातें सुन कर मेरे दिमाग की बत्ती तो गुल हो गयी जलाने की कोशिश क़र रहा हूँ पर हवा तेज़ है, बत्ती बुझ जा रही है, आप जलाये रखिये! उम्मीद है फिर मिलेंगे, शायद तब तक मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल जाए...


     

गुरुवार, 13 मार्च 2014

ग्लानि

इतिहास के पन्नों पर
उकेरे गए
कुछ तथ्यहीन
सत्य,
भय लगता है
 जिनके
 स्मरण से ही
वे अक्सर सामने आते हैं.


कभी प्रथा बनकर
तो
कभी रूढ़ि बनकर,
कहीं दहेज़
तो
कहीं अंतरजातीय  
विवाह के विरोध के
मुखरित स्वर बन कर.
खून बहते हैं
पानी की तरह,
मानवता
बस ''शब्द'' मालूम
पड़ता है
दबा-कुचला
किताबों के फटे पन्नों में.
प्रेम है आज भी सहज कब?
वर्जनाएं
पग-पग पर हैं
 इस पथ पर,
आहत हो जाता है
आत्मसम्मान
अभिभावकों का
प्रेम से,
जैसे सबसे जघन्य अपराध
प्रेम ही हो.
कुरीतियां जो व्याप्त हैं
समाज में
उनपर
पर्दा डालना ''इज्जत''
बचाना है,
और
अमानवीय परंपरा तोडना
अपराध है
जिसके लिए
मृत्युदंड  भी कम है.
बेटा गलती करे
तो उसकी माफ़ी है
पर
बेटी को मारने
की
परिपाटी है.
हाय रे समाज!
कितनी रूढ़ियाँ हैं
पग-पग पर.
बेड़ियां हैं
कभी रस्म बनकर
कभी रिवाज़ बनकर.
जलायी जाती हैं
निर्दोषों की चिताएं .
मानव की बस्तियों में
पिशाचों
की संख्या
इतनी अधिक कैसे
कहीं
मानव  
विलुप्त तो नहीं हो गया?
प्रथा की शक्ल में
कुरीति
रूढ़ियाँ
जिन्हे हम धो रहे हैं
बुजुर्गों की थाती की तरह
पीढ़ी दर पीढ़ी;
जिन
प्रथाओं  ने  मानवता  को
दूषित किया
उन्हें हमने
परंपरा कहा,
क्या सभ्यता है
परित्यक्त को अंगीकार कर
गौरवान्वित
होते हैं.
बुराइयों पर गर्व
ढोंग का शंखनाद
कैसी सभ्यता है
हम भारतियों की?
                           (चित्र गूगल से साभार)





मंगलवार, 4 मार्च 2014

उलझन

यूँ तो ख़ामोश हूँ मैं
पर
आती है आवाज़ कहीं से
मेरी ही
रह-रह कर;

घबराहट होती है
अपनी आवाज सुनकर,
तड़पता  हूँ अक्सर 
अपने दर्द से,
चोट भी मुझे लगती है
और चीख भी
मेरी निकलती है.
घुट रहा हूँ
पर
हस  -हस कर.
क्या कहुँ?
रोना मक्कारी लगता है
हंसना
मुमकिन  नहीं
टूटते रिश्तों को
जोड़ना  मुश्किल है
और
तोडना और भी मुश्किल.
क्या करूँ ?
हसूँ
तो दुनिया,
रोऊँ तो दुनिया।