मंगलवार, 8 जुलाई 2014
"प्रपंचमेव जयते”
भारत के पिछड़ेपन के पीछे प्रपंच का बड़ा योगदान है.आने वाली कई पीढ़ियां इसके लिए अपने पूर्वजों की आभारी रहेंगी.देश में कई आफतें आयीं कभी मुग़लों का आक्रमण कभी मंगोलों का, इतना भी कम नहीं था कि गोरे आ टपके , सारा भारतीय ढांचा बदल के रख दिया. बैल गाडी की जगह रेलगाड़ी ने ले ली सब कुछ बदल गया पर यथावत यदि कुछ रहा है तो वह है भ्रष्टाचार और प्रपंच. वैसे किसी अँगरेज़ महाशय ने कहा भी है कि ”भारतीय स्वाभाव से ही भ्रष्ट होते हैं.’ सच क्या है या झूठ क्या है इसे तो अब पूरी दुनिया जानती है, वफादार तो हम अपने देश के प्रति नहीं होते कर्त्तव्य के प्रति क्या होंगे.खैर बात प्रपंच की हो रही थी भ्रष्टाचार की बात बाद में कर लेंगे.
प्रपंच हमारे देश का ”राष्ट्रीय कार्य” है’, मैं प्रधान मंत्री बना तो अनुच्छेद ५१ अ ”मौलिक कर्तव्य” में एक और कर्तव्य जोडूंगा और इस अनुच्छेद में वर्णित कर्तव्य कुछ यूँ होगा,
भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह;- ”प्रपंच धर्म का पालन करे तथा प्रपंचियों के एकता तथा अखंडता की रक्षा करे और इस धर्म को अक्षुण्ण बनाये रखे.”
हर राष्ट्र का एक धर्म होता है.पुराणों में तो धर्म को राष्ट्र का पति कहा गया है, आज भले ही पुराण थोड़े अप्रासंगिक सिद्ध हो चुके हैं पर राष्ट्र धर्म की कमी खलती है.’पंथ निरपेक्ष ‘, ‘धर्म निरपेक्ष बस कहने में ही अच्छा लगता है. राष्ट्र का एक धर्म होना चाहिए. हिन्दू -मुस्लिम राष्ट्र नहीं क्योंकि भारत में ऐसी संकल्पना आधार हीन है और असंभव भी.
वह धर्म राष्ट्र धर्म बनने योग्य नहीं है जिसमे आस्था थोपी गयी हो. धर्म ऐसा हो जिसकी सदस्यता ऐच्छिक हो. भारत में सनातन धर्म के समकालीन ही एक और धर्म का अभ्युदय हुआ ”प्रपंच धर्म का, अब सनातन धर्म के प्राचीनता पे तो किसी को संदेह नहीं होना चाहिए. प्रपंच धर्म तो वर्षों से फल-फूल रहा है, मज़े की बात यह है इस धर्म के अनुयायी सारे भारतवासी हैं..शायद ही कोई स्त्री या पुरुष हो जिसे इस धर्म से परहेज़ हो, तीसरे तबके के बारे में क्या कहु ..उनसे ज़रा संवादहीनता की स्थिति है.
विश्व का कोई धर्म इतने बड़े पैमाने पर नहीं मनाया जाता यह गौरव सिर्फ प्रपंच धर्म को मिला है.इस धर्म के अनुयायी भारत के हर घर में मिलेंगे…संविधान से ”सेक्युलर” शब्द हटा कर प्रपंच शब्द जोड़ देना चाहिए भारतियों को इससे कोई आपत्ति नहीं होगी.
यह धर्म मनोरंजन भी करता है. शाम या सुबह जब भी वक्त मिले घर के बहार कुर्सी डाल कर बैठ जाइए ‘कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल ” देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बशर्ते आप थोड़े से मितभाषी हों.
व्यवसाय का उदाहरण तो आपको टी.वी खोलते ही दिखने लगेंगे, कभी कलर्स तो कभी स्टार प्लस…और सरे न्यूज़ चैनल तो प्रपंच की कमाई ही कहते हैं, बात चाहे ‘ आज तक ‘ की हो या न्यूज़ २४ की..सब का धंधा इसी से फलता-फूलता है.
भारतियों में तो इस धर्म का क्रेज़ है, मोहल्ले की बातें देखते -देखते कब पूरे गावं में फैलती हैं पता ही नहीं चलता . एक कान से दुसरे कान तक बाते कुछ ऐसे पहुचती हैं कि जैसे बातों की रफ़्तार मन से तेज़ हो..बात कोई भी हो बस होनी चाहिए. कभी -कभी तो वक्ता के कहने का आशय भी समझ में नहीं आता फिर भी लोग मज़े से सुनते हैं. काश ये एकाग्रता भगवान के लिए हो जाए तो तो स्वर्ग तो छोटी चीज़ है सायुज्य भी मिल जाए.
प्रपंच धर्म के अनुयायी ”प्रपंची ” कहलाते हैं.इनकी नज़रे बड़ी पैनी होती हैं.समसामयिक घटनाओं पर इनकी पकड़ तो काबिले तारीफ होती है.घटना किसी एक के सामने होती है पर देखते -देखते पूरा गावं सच से रूबरू हो जाता है, ख़ास बात ये है की इस धर्म का प्रत्येक सदस्य घटनाओं का कुछ ऐसा सजीव वर्णन करता है कि सुनने वाले को लगता है सब कुछ उसके सामने ही हो रहा है. एक्शन, इमोशन, ड्रामा और खूब सारा मसाला बस ढंग का कोई प्रपंची मिल जाए…वादा है दोपहर में सीरियल देखना छोड़ देंगे आप.
लोग झूठ में ही कहते हैं की प्रपंच बस महिलाओं का काम होता है.ये पुरुषों द्वारा महिलाओं के बारे में फैलाई गयी झूठी अफवाह है. हैं मेरे गावं के कुछ वयोवृद्ध व्यक्ति लोग जिनसे बात करते समय यही डर लगता है कि कब ये अपने जवानी के दिनों वाली हरकतें सुननी सुरु कर दें, कुछ तो उम्र का असर कुछ मानसिकता का बुढ़ापे में इंसान और प्रपंची हो जाता है, जवानी के जितने अरमान अधूरे रह जाते हैं सबको बुढ़ापे में पूरी करने की प्रबल इच्छा होती है पर क्या करें..बात के अलावा कुछ कर नहीं सकते.
आज तो यह धर्म और आधुनिक हो गया है पर कल का पता नहीं..लोग शिक्षित हो रहे हैं और व्यस्त भी…सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं पर इनकी मस्ती इस धर्म के लिए खतरा है…जो व्यस्त हुआ वो प्रपंची नहीं रहा…सफलता इस धर्म की सदस्यता को निरस्त कर देती है….पर शायद भारत के ”अच्छे दिन’ की तरह इस धर्म के अंत का दिन कभी न आये….ये धर्म चिर पुरातन है और चिर नवीन भी…आशा है आने वाले दिनों में इसके अनुयायी बढ़ेंगे……तब तक के लिए..जय प्रपंच…जय भारत!!!
(दैनिक जागरण वाकई सबसे अच्छा समाचार पत्र है, अच्छा इसलिए कि मेरे लेख को ये कचरे के डिब्बे में नहीं फेंकते...छाप देते हैं,
खुश हूँ एक बार फिर सम्पादकीय पृष्ठ पर जगह मिली..कोने में ही सही...पर कहीं तो हूँ....देखता हुँ कि कब-तक मुझे छोटे कोने से ही संतोष करना पड़ेगा...कोशिश जारी है..दुआ कीजिये) published on dainik jagran..
गुरुवार, 22 मई 2014
''विजय ''..आयोजन अथवा यत्न
बहुत सारी बातेँ विपद के गर्भ मेँ होती हैँ। उनका होना या न होना सब भविष्य के कपाट मेँ बंद होता है, हाँ अपने भविष्य मेँ झाँकने की इच्छा सबकी होती है मेरी भी है। दर्शक हूँ कुछ आयोजन नहीँ करुँगा क्योँकि दर्शक दीर्घा मेँ बैठने की एक बड़ी कीमत चुकायी है, आयोजन करुँ भी तो क्योँ करुँ? प्रसंगिकता क्या होगी मेरे यत्न की? पूर्वजोँ के सम्मिलित स्वर रहे हैँ-" विपद के लिए आयोजन कैसा?"
जो हो रहा है उसे होने दो कोई आयोजन मत करो। दूसरोँ पर न सही पर अपने पर विश्वास करो। यदि परमशक्ति की सत्ता है तो तुम भी सर्मथ हो, कोई ऐसी बाधा नहीँ है जिसे मानव पार न कर सके। अवरोध आते हैँ पथ कितना भी सरल क्यो न हो; कभी छलाँग लगाना पड़ता है तो कभी राहेँ बनानी पड़ती हैँ। विपरीत परिस्थितियोँ मेँ भी जो अड़िग रहता है वही वीर है और ये दुनिया वीरोँ की है, वीर बनने के लिए यदि कभी कायर भी होना पड़े तो हो जाओ, भगवान राम ने भी कायरता को हथियार बनाया था और भगवान कृष्ण ने भी फिर हम तो सामान्य मानव हैँ, कायर बनने मेँ क्या हर्ज है।
विजेता बनना अनिवार्य है चाहे आप को विजय रण छोड़ कर मिली हो या लड़कर। विजेता का बस वर्तमान होता है, उसके अतीत को कोई नहीँ कुरेदता। हाँ!, कुछ लोग होते हैँ जिनका काम ही होता है इधर-उधर झाँकना, पर उनकी ताक-झांक बस रंगमंच के विदुषक के स्तर की होती है जो बस लोगोँ का दिल बहलाती है।
विजेता बनने का आयोजन मत करो बस यत्न करो, आयोजन वे करते हैँ जिन्हेँ बस जीवन को घसीटना होता है और यत्न वे करते हैँ जिन्हे नायक बनना होता है। लोग कहते हैँ कि मानव योनि विधाता की श्रेष्ठतम कृति है, फिर मानव होकर दु:ख कैसा-अवसाद कैसा? जीवन मेँ उतार-चढ़ाव आते हैँ। कभी-कभी तो सूर्य का रथ भी रुक जाता है, हर पथ पर विँध्य पर्वत अवरोध बन खड़ा है जिसे पार करना पड़ता है। आप मेँ दृढ़ इच्छा है तो चारोँ दिशाओँ मेँ आपके सहायतार्थ अगस्त्य ऋषि हैँ, जिनके एक आदेश से गिरिराज झुक जाते हैँ, और फिर कभी नहीँ उठते। आपके संकल्प ही अगस्त्य ऋषि हैँ और आप स्वयं सूर्य हैं, बाधाएं विंध्य पर्वत इनसे ऐसे पार पाइए की फिर कभी आपका मार्ग रोकने का साहस इनमे न रहे।
कीर्ति-अपकीर्ती, यश-अपयश तो जीवित होने के साक्ष्य हैँ इनसे कैसा व्यथित होना? , इन्हे ही तो हरा कर जीतना है। कुछ भी असाध्य नहीं है, ''जहाँ चाह है वहीँ राह है।'' हमारे धर्म ग्रंथों में भी लिखा है- ''वीर भोग्या वसुंधरा'' ...लड़ो और जीतो.. दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो सत् संकल्पों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर पाये..जीवन का एक और सत्य- ''कभी कोई हारता या जीतता नहीं'', दोनों स्थितियां बस छडिक हैं..मज़ा लड़ाई में है हार या जीत में नहीं..जीवन के दो दशक मैंने देख लिए हैं थोड़ी सी समझ मुझमे अब आ गयी है, बस इस जिंदगी से इतना सीखा है कि, '' हारो तो हतोत्साहित न हो, और जीतो तो महत्वाकांक्षी न हो ''। परेशानियां परछाईं को भी न पता चले, गम को मुस्कराहट में दबाना सीखो, और खुशियां बिखेरने की कोशिश करो...मस्त रहो-व्यस्त रहो...खुशियों के खजाने की बस यही चाभी है......
शनिवार, 3 मई 2014
चुनाव (एक उम्मीद )
आज-कल चुनावों का दौर है, भले ही यह महोत्सव अपने समापन की ओर बढ़ रहा हो लेकिन दर्शकों का उत्साह अपने चरम पर है. चुनाव के नतीजे का इंतज़ार सबको है. न्यूज़ चैनलों पर नेताओं की वर्षों पुरानी घिसी-पिटी तस्वीरें रिपीट की जा रही हैं. कहीं राजनाथ सिंह तो कहीं सोनिया गांधी, बाकियों का तो नाम लेना भी गुनाह है. अरविन्द केजरीवाल भी कभी -कभी दिख जाते हैं. भला हो दिग्गविजय सिंह जी का जिन्होंने मीडिया का ध्यान चुनाव से थोड़ा भटकाया. सिंह साहब कितने भले आदमी हैं ये तो देश की जनता जानती ही है. समय-समय पर बम फोड़ते रहते हैं. कांग्रेस जिस तरह से मीडिया से बाहर हुई थी दिग्गविजय जी ने फिर से ध्यान आकर्षित कराया और करें भी क्यों न पार्टी के स्वघोषित संकटमोचन जो हैं.
नेताओं की एक ख़ास बात है कि इनकी जनता से मिलने की इच्छा बलवती बस चुनावों में होती है, बाकी दिनों में विदेशी दौरों से फुर्सत ही कब मिलती है जो ये जनता को याद करें. गलती नेताओं की नहीं है सत्ता पाकर देवराज इन्द्र भगवान को भूल जाते थे नेता तो स्वभाव से ही एहसान फरामोश होता है. चुनाव आते ही सारे नेता अपने-अपने कब्रों से भाग कर बहार आते हैं जनता की सेवा करने. भोली -भली जनता नेताओं को इतने दिनों बाद देखकर पहचान नहीं पाती की ये वही नेता है जो पिछले चुनाव में ठग के गया था और इस बार फिर आ गया है.
चुनाव में नेताओं के पर लग जाते हैं, धरती और आसमान एक लगता है इन्हे, फिर इनके लिए क्या कश्मीर क्या कन्याकुमारी? पालक झपकते ही मीलों की दूरियाँ पल भर में तय हो जाती हैं. इन्हे तो भाग-दौड़ से आराम मिलता है पर जनता तबाह हो जाती है इनके भाग-दौड़ से. कभी यहाँ सभा कभी वहां सभा. इन सभाओं के चक्कर में जनता घनचक्कर बन जाती है. मासूम जनता जो हर बार छलि जाती है, जिसका विश्वास हर बार टूटता है उसकी भी चुनाव से उम्मीद होती है कि इस बार परिवर्तन होगा. कोई नया चेहरा देखने को मिलेगा पर अफ़सोस कि परिवर्तन की जगह पुनरावृत्ति होती है. पूरा विश्व जानता है की भारतियों की प्रवित्ति ही ''पुनरावृत्ति'' है.
सबसे बड़ी विडम्बना है की हम हमेशा उद्धारक खोजते हैं बनते नहीं. उद्धारक कभी कांग्रेस होती हैं तो कभी भारतीय जानता पार्टी. तीसरा मोर्चा इस लायक नहीं हैं कि उसे सत्ता दिया जाए. हर चुनाव का एक चेहरा होता हैं, और ये चेहरे बदलते रहते हैं. स्थिर होता हैं यदि कुछ तो वह है पार्टियों की नीयत. कभी दुर्घटना से मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री बन जाते हैं तो दुर्भाग्य से लाल कृष्ण आडवाणी जी ''पी.एम इन वेटिंग'' ही रह जाते हैं. खैर लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं.
इस बार के चुनाव में कुछ नए चेहरे हैं. कांग्रेस तो खुद में एक नकाबपोश है जो चेहरा कभी दिखाती ही नहीं. सब कुछ इस पार्टी में दुर्घटना से होता है. भाजपा ने इस बार कुछ नया किया है. नरेंद्र मोदी इस बार हर जगह दिख रहे हैं. गुजरात नरेश यूँ तो खुद को चाय बेचने वाला कहते हैं, ये भी उनकी अदा है जो इन दिनों खूब पसंद किया जा रही है. जिस तरह से उनकी मार्केटिंग की गयी है लगता है की ''अबकी बार-मोदी सरकार''. मतलब साफ़ है कि इस बार सरकार भाजपा कि नहीं ''मोदी'' की बनेगी. विकास पुरुष से लेकर युगपुरुष तक सब कुछ जानता इन्हे मान रही है. मोदी के नाम पर तो लाठियां तन जा रही है. मानो मोदी जी भगवान हों, और अधर्म का नाश करने के लिए संकल्पित हो गए हों. हांकने में तो इनसे बढ़कर कोई नहीं, ''वीर-गाथा'' काल के कवियों को भी इन्हे सुन के लज्जा आ जाए 'हाय! हम तो इनके सामने एक पल भी नहीं ठहर सकते.
कांग्रेस की बात की जाए तो इन्होने इतने घोटाले किये हैं कि जनता इन्हे कम से कम दस साल तो सत्ता में आने नहीं देगी. इनके अक्षमता से जनता कितनी व्यथित है यह कहने कि जरुरत नहीं है. ऊपर से मंहगाई, सरकार गिराने के लिए ये अकेले बहुत काफी है.
जनता व्यथित हो जाए कहाँ? आम आदमी पार्टी बनी थी, लोकतंत्र के लिए एक आशा की किरण बनकर आई, एक साल के भीतर बनी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बना लिया, पर राजनीतिक अनुभवहीनता और पार्टी के सदस्यों का आपसी अंतरकलह इस पार्टी को भी ले डूबा. अरविन्द केजरीवाल व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छे और ईमानदार छवि के व्यक्ति हैं किन्तु इनके सहयोगियों के अल्पबुद्धिता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर इनका आना असंभव है. देश कैसे सुधारेंगे जब असली कचरा इनके पार्टी में है, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र और न जाने कितने नाम जिनके बोलने से इस पार्टी कि खूब थू-थू हुई पहले उन्हें सुधारें फिर देश सुधारने के लिए अग्रषर हों .
जनता बेवक़ूफ़ नहीं है फिर भी बार-बार बेवक़ूफ़ बनती है, कभी मज़हब के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर यहाँ सरकार बनती है. समझ में ये नहीं आता कि भारतियों को गलत और सही क्यों नहीं दिखता? वोट डालते हैं या कोटा पूरा करते हैं? भविष्य से बहुत उम्मीदें हैं, देखते हैं कि हम गलतियां दोहराना बंद करते हैं या गलतियां अब हमारी मनोवृत्ति बन गयी हैं?
नेताओं की एक ख़ास बात है कि इनकी जनता से मिलने की इच्छा बलवती बस चुनावों में होती है, बाकी दिनों में विदेशी दौरों से फुर्सत ही कब मिलती है जो ये जनता को याद करें. गलती नेताओं की नहीं है सत्ता पाकर देवराज इन्द्र भगवान को भूल जाते थे नेता तो स्वभाव से ही एहसान फरामोश होता है. चुनाव आते ही सारे नेता अपने-अपने कब्रों से भाग कर बहार आते हैं जनता की सेवा करने. भोली -भली जनता नेताओं को इतने दिनों बाद देखकर पहचान नहीं पाती की ये वही नेता है जो पिछले चुनाव में ठग के गया था और इस बार फिर आ गया है.
चुनाव में नेताओं के पर लग जाते हैं, धरती और आसमान एक लगता है इन्हे, फिर इनके लिए क्या कश्मीर क्या कन्याकुमारी? पालक झपकते ही मीलों की दूरियाँ पल भर में तय हो जाती हैं. इन्हे तो भाग-दौड़ से आराम मिलता है पर जनता तबाह हो जाती है इनके भाग-दौड़ से. कभी यहाँ सभा कभी वहां सभा. इन सभाओं के चक्कर में जनता घनचक्कर बन जाती है. मासूम जनता जो हर बार छलि जाती है, जिसका विश्वास हर बार टूटता है उसकी भी चुनाव से उम्मीद होती है कि इस बार परिवर्तन होगा. कोई नया चेहरा देखने को मिलेगा पर अफ़सोस कि परिवर्तन की जगह पुनरावृत्ति होती है. पूरा विश्व जानता है की भारतियों की प्रवित्ति ही ''पुनरावृत्ति'' है.
सबसे बड़ी विडम्बना है की हम हमेशा उद्धारक खोजते हैं बनते नहीं. उद्धारक कभी कांग्रेस होती हैं तो कभी भारतीय जानता पार्टी. तीसरा मोर्चा इस लायक नहीं हैं कि उसे सत्ता दिया जाए. हर चुनाव का एक चेहरा होता हैं, और ये चेहरे बदलते रहते हैं. स्थिर होता हैं यदि कुछ तो वह है पार्टियों की नीयत. कभी दुर्घटना से मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री बन जाते हैं तो दुर्भाग्य से लाल कृष्ण आडवाणी जी ''पी.एम इन वेटिंग'' ही रह जाते हैं. खैर लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं.
इस बार के चुनाव में कुछ नए चेहरे हैं. कांग्रेस तो खुद में एक नकाबपोश है जो चेहरा कभी दिखाती ही नहीं. सब कुछ इस पार्टी में दुर्घटना से होता है. भाजपा ने इस बार कुछ नया किया है. नरेंद्र मोदी इस बार हर जगह दिख रहे हैं. गुजरात नरेश यूँ तो खुद को चाय बेचने वाला कहते हैं, ये भी उनकी अदा है जो इन दिनों खूब पसंद किया जा रही है. जिस तरह से उनकी मार्केटिंग की गयी है लगता है की ''अबकी बार-मोदी सरकार''. मतलब साफ़ है कि इस बार सरकार भाजपा कि नहीं ''मोदी'' की बनेगी. विकास पुरुष से लेकर युगपुरुष तक सब कुछ जानता इन्हे मान रही है. मोदी के नाम पर तो लाठियां तन जा रही है. मानो मोदी जी भगवान हों, और अधर्म का नाश करने के लिए संकल्पित हो गए हों. हांकने में तो इनसे बढ़कर कोई नहीं, ''वीर-गाथा'' काल के कवियों को भी इन्हे सुन के लज्जा आ जाए 'हाय! हम तो इनके सामने एक पल भी नहीं ठहर सकते.
कांग्रेस की बात की जाए तो इन्होने इतने घोटाले किये हैं कि जनता इन्हे कम से कम दस साल तो सत्ता में आने नहीं देगी. इनके अक्षमता से जनता कितनी व्यथित है यह कहने कि जरुरत नहीं है. ऊपर से मंहगाई, सरकार गिराने के लिए ये अकेले बहुत काफी है.
जनता व्यथित हो जाए कहाँ? आम आदमी पार्टी बनी थी, लोकतंत्र के लिए एक आशा की किरण बनकर आई, एक साल के भीतर बनी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बना लिया, पर राजनीतिक अनुभवहीनता और पार्टी के सदस्यों का आपसी अंतरकलह इस पार्टी को भी ले डूबा. अरविन्द केजरीवाल व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छे और ईमानदार छवि के व्यक्ति हैं किन्तु इनके सहयोगियों के अल्पबुद्धिता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर इनका आना असंभव है. देश कैसे सुधारेंगे जब असली कचरा इनके पार्टी में है, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र और न जाने कितने नाम जिनके बोलने से इस पार्टी कि खूब थू-थू हुई पहले उन्हें सुधारें फिर देश सुधारने के लिए अग्रषर हों .
जनता बेवक़ूफ़ नहीं है फिर भी बार-बार बेवक़ूफ़ बनती है, कभी मज़हब के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर यहाँ सरकार बनती है. समझ में ये नहीं आता कि भारतियों को गलत और सही क्यों नहीं दिखता? वोट डालते हैं या कोटा पूरा करते हैं? भविष्य से बहुत उम्मीदें हैं, देखते हैं कि हम गलतियां दोहराना बंद करते हैं या गलतियां अब हमारी मनोवृत्ति बन गयी हैं?
शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014
हाय रे टोपी!
दुनिया में अकेला भारत ऐसा राष्ट्र है जहाँ टोपी की राजनीति होती है. चुनाव भर तो इसकी धूम मची रहती है.आम आदमी की टोपी, ख़ास आदमी की टोपी और न जाने किस -किस आदमी की टोपी. जैसी हवा बही नेताओं ने वैसी टोपी पहन ली.आम तौर पर हमेशा टोपी का रंग सफ़ेद होता था पर जब से मुलायम सिंह जी का राज आया टोपी की परिभाषा बदल गयी. पहले लोगों के कच्छे लाल हुआ करते थे अब टोपी भी लाल होने लगी. भाई टोपी दूर से दिखनी चाहिए क्योंकि सारा खेल टोपी का है. सफ़ेद टोपी पे धुल जम जाती है सो धूल -गर्दे से बचने के लिए रंगीन टोपी जरूरी है, अब करम भले ही काले हो पर टोपी लाल होनी चाहिए.
यूँ तो लाल रंग खतरे का प्रतीक होता है पर इन दिनों उत्तर प्रदेश में समाजवाद का प्रतीक है. अगर कोई ट्रेन गलत रुट पे चली जाए और कोई जानकार आदमी उसे लाल कपडा दिखाए और आगे आने वाले खतरे से आगाह करना चाहे तो तो ड्राइवर गाडी नहीं रोकेगा बल्कि और स्पीड बढ़ा देगा क्योंकि उसे अंदेशा हो सकता है कि ये जरूर कोई समाजवादी है, वोट मांगना चाह रहा है यात्रियों से. इतनी बड़ी संख्या में लोग कहीं इकट्ठा मिलने से रहे तो चलो ट्रेन में ही दाँव मार लेते हैं क्या पता कोई मुर्गा फंस जाए.
देश में जब भी वीरता का ज़िक्र हो तो उत्तर प्रदेश वालों का नाम जरूर लेना चाहिए क्योंकि ये ये खतरे के निशान को देखकर भी नहीं डरते और लाल टोपी वाले की सरकार बना देते है वो भी बहुमत से.खैर उत्तर प्रदेश में तो नीली टोपी भी चलती है पर दुर्भाग्यवश इन दिनों ट्रेंड से बाहर है.
बात टोपी की हो और आम आदमी पार्टी की बात न हो तो सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा. अरविन्द केजरीवाल की टोपी ने तो दिल्ली में तहलका मचा दिया. साल भर के अंदर एक आम आदमी ने पूरी सरकार हिला के रख दिया. संसद में मनमोहन सिंह और दश-जनपथ में सोनिया और राहुल गांधी जी की रातों की नींद हराम हो गयी.मनमोहन जी तो सदा के लिए मौन ही हो गए. ये आम आदमी की टोपी का ही करिश्मा था. आम आदमी पार्टी की एक ख़ास बात है की पार्टी वाले भले ही कच्छे में हों पर टोपी उनके सर पर जरूर रहेगी जैसे टोपी पहनना ही उनके जीवन का ध्येय हो.तेज़ हवा या आँधी में यदि उनकी टोपी उड़ जाए तो दिल्ली की सड़कों पर ''बिन टोपी सब सून'' गाना गाते हुए पार्टी के एक दो सदस्य मिल जायेंगे आपको. केजरीवाल जी को टोपी कितनी प्यारी है ये तो पूरा भारत जानता है. सर्दी में कभी-कभी जोर की हवा चल पड़ती है तो टोपी उड़ने का खतरा होता है इसलिए केजरीवाल जी ने टोपी को कसकर मफलर से बंधा. भाई ''प्राण जाए पर टोपी न जाए''. देखो टोपी का दम और सच्चाई की ताकत मोदी की हवा होते हुए भी कूद पड़े वाराणसी में उनके खिलाफ. अरविन्द जी की टोपी नहीं सुदर्शन चक्र है जो भ्रष्टाचारियों की पहचान कर उन्हें सन्मार्ग पर लाती है. जय हो आम आदमी के टोपी की.
अन्ना की टोपी में भी दम था. रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ ने साबित कर दिया की सच्चाई की राह पर चलो तो आज भी आपके साथ लाखों लोग खड़े हो सकते हैं. अन्ना की टोपी गांधीवादी टोपी है, इस टोपी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. इतने बड़े जन समर्थन के बावजूद भी टोपी जस की तस बनी रही. अन्ना हज़ारे जी यदि राजनीति में आते तो मोदी जी की हवा कभी नहीं बन पाती.भले ही मोदी जी के समर्थक उन्हें रजनीकांत मानते हों पर अन्ना की टोपी के आगे ये दो दिन भी नहीं टिक पाते. अन्ना के आंदोलन में अरविन्द जी जिस कोने में बैठे थे वहां गंदगी सबसे ज्यादा थी इसलिए टोपी पर धूल जम गयी और अरविन्द जी को अन्ना का साथ मज़बूरी में छोड़ना पड़ा, सफाई जो करनी थी. अब सफाई का स्थायी चिन्ह झाडू उनके टोपी की शोभा बढ़ा रही है.अब भला गंदगी की हिमाकत कहाँ जो वो टोपी पे टिक पाये झाड़ू के रहते हुए.
क्या कहूँ? सवाल टोपी का नहीं नहीं है सवाल जनता के विश्वास का है. कभी संप्रदाय की आड़ में कभी वोट बैंक की राजनीति के लिए टोपी पहनी जाती है. नेताओं की इन ओछी हरकतों को देखकर भी जनता की आँख नहीं खुलती. कैसा ये लोकतंत्र है? हमारे प्रतिनिधि पहले टोपी पहनते हैं फिर टोपी फिरातें हैं और हम मूक दर्शक बन खड़े रहते हैं. किसी भी राजनीतिक पार्टी का कल्याण बिना टोपी पहने नहीं होता. हमें परेशानी टोपी से नहीं छल से हैं. क्यों पैदा करते हैं जनता में धार्मिक उन्माद चन्द वोटों के लिए? क्या जनता इतनी बेवकूफ़ है की इसे लिबास पहन कर बेवकूफ़ बनाया जा सके?
साम्प्रदायिकता कहाँ दिखती है? किस जगह? सिर्फ नेताओं का पैदा किया हुआ कीड़ा है धार्मिक उन्माद. अफ़सोस की बात ये है कि हम इन्हे सुनते हैं, और इनके टोपी फिराने पर मूक दर्शक बने रहते हैं, अगर हम बोलने लगे तो शायद कोई फिर हमे टोपी न फिरा पाये.
यूँ तो लाल रंग खतरे का प्रतीक होता है पर इन दिनों उत्तर प्रदेश में समाजवाद का प्रतीक है. अगर कोई ट्रेन गलत रुट पे चली जाए और कोई जानकार आदमी उसे लाल कपडा दिखाए और आगे आने वाले खतरे से आगाह करना चाहे तो तो ड्राइवर गाडी नहीं रोकेगा बल्कि और स्पीड बढ़ा देगा क्योंकि उसे अंदेशा हो सकता है कि ये जरूर कोई समाजवादी है, वोट मांगना चाह रहा है यात्रियों से. इतनी बड़ी संख्या में लोग कहीं इकट्ठा मिलने से रहे तो चलो ट्रेन में ही दाँव मार लेते हैं क्या पता कोई मुर्गा फंस जाए.
देश में जब भी वीरता का ज़िक्र हो तो उत्तर प्रदेश वालों का नाम जरूर लेना चाहिए क्योंकि ये ये खतरे के निशान को देखकर भी नहीं डरते और लाल टोपी वाले की सरकार बना देते है वो भी बहुमत से.खैर उत्तर प्रदेश में तो नीली टोपी भी चलती है पर दुर्भाग्यवश इन दिनों ट्रेंड से बाहर है.
बात टोपी की हो और आम आदमी पार्टी की बात न हो तो सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा. अरविन्द केजरीवाल की टोपी ने तो दिल्ली में तहलका मचा दिया. साल भर के अंदर एक आम आदमी ने पूरी सरकार हिला के रख दिया. संसद में मनमोहन सिंह और दश-जनपथ में सोनिया और राहुल गांधी जी की रातों की नींद हराम हो गयी.मनमोहन जी तो सदा के लिए मौन ही हो गए. ये आम आदमी की टोपी का ही करिश्मा था. आम आदमी पार्टी की एक ख़ास बात है की पार्टी वाले भले ही कच्छे में हों पर टोपी उनके सर पर जरूर रहेगी जैसे टोपी पहनना ही उनके जीवन का ध्येय हो.तेज़ हवा या आँधी में यदि उनकी टोपी उड़ जाए तो दिल्ली की सड़कों पर ''बिन टोपी सब सून'' गाना गाते हुए पार्टी के एक दो सदस्य मिल जायेंगे आपको. केजरीवाल जी को टोपी कितनी प्यारी है ये तो पूरा भारत जानता है. सर्दी में कभी-कभी जोर की हवा चल पड़ती है तो टोपी उड़ने का खतरा होता है इसलिए केजरीवाल जी ने टोपी को कसकर मफलर से बंधा. भाई ''प्राण जाए पर टोपी न जाए''. देखो टोपी का दम और सच्चाई की ताकत मोदी की हवा होते हुए भी कूद पड़े वाराणसी में उनके खिलाफ. अरविन्द जी की टोपी नहीं सुदर्शन चक्र है जो भ्रष्टाचारियों की पहचान कर उन्हें सन्मार्ग पर लाती है. जय हो आम आदमी के टोपी की.
अन्ना की टोपी में भी दम था. रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ ने साबित कर दिया की सच्चाई की राह पर चलो तो आज भी आपके साथ लाखों लोग खड़े हो सकते हैं. अन्ना की टोपी गांधीवादी टोपी है, इस टोपी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. इतने बड़े जन समर्थन के बावजूद भी टोपी जस की तस बनी रही. अन्ना हज़ारे जी यदि राजनीति में आते तो मोदी जी की हवा कभी नहीं बन पाती.भले ही मोदी जी के समर्थक उन्हें रजनीकांत मानते हों पर अन्ना की टोपी के आगे ये दो दिन भी नहीं टिक पाते. अन्ना के आंदोलन में अरविन्द जी जिस कोने में बैठे थे वहां गंदगी सबसे ज्यादा थी इसलिए टोपी पर धूल जम गयी और अरविन्द जी को अन्ना का साथ मज़बूरी में छोड़ना पड़ा, सफाई जो करनी थी. अब सफाई का स्थायी चिन्ह झाडू उनके टोपी की शोभा बढ़ा रही है.अब भला गंदगी की हिमाकत कहाँ जो वो टोपी पे टिक पाये झाड़ू के रहते हुए.
क्या कहूँ? सवाल टोपी का नहीं नहीं है सवाल जनता के विश्वास का है. कभी संप्रदाय की आड़ में कभी वोट बैंक की राजनीति के लिए टोपी पहनी जाती है. नेताओं की इन ओछी हरकतों को देखकर भी जनता की आँख नहीं खुलती. कैसा ये लोकतंत्र है? हमारे प्रतिनिधि पहले टोपी पहनते हैं फिर टोपी फिरातें हैं और हम मूक दर्शक बन खड़े रहते हैं. किसी भी राजनीतिक पार्टी का कल्याण बिना टोपी पहने नहीं होता. हमें परेशानी टोपी से नहीं छल से हैं. क्यों पैदा करते हैं जनता में धार्मिक उन्माद चन्द वोटों के लिए? क्या जनता इतनी बेवकूफ़ है की इसे लिबास पहन कर बेवकूफ़ बनाया जा सके?
साम्प्रदायिकता कहाँ दिखती है? किस जगह? सिर्फ नेताओं का पैदा किया हुआ कीड़ा है धार्मिक उन्माद. अफ़सोस की बात ये है कि हम इन्हे सुनते हैं, और इनके टोपी फिराने पर मूक दर्शक बने रहते हैं, अगर हम बोलने लगे तो शायद कोई फिर हमे टोपी न फिरा पाये.
शुक्रवार, 28 मार्च 2014
दिमाग की बत्ती
पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न कौंध रहा है सही और गलत के परिभाषा को लेकर. सही क्या है और गलत क्या है इसके अतरिक्त कुछ सोच नहीं पा रहा हूँ. कभी तर्क साथ छोड़ रहा है तो कभी बुद्धि सौतेला व्यवहार क़र रही है.बुद्धि और तर्क दोनों का ताल-मेल विगत कुछ दिनों से असंतुलित है. क्या कहुँ मेरा मस्तिष्क दो परस्पर विपरीत दिशा में काम क़र रहा है, एक वाला सही खोजने में जुटा है वहीँ दूसरा न जाने कहाँ से खोज-खोज क़र गलतियाँ ला रहा है. दिमाग की बत्ती जो पहले थोड़ी सांस भर रही थी अब बुझने के कगार पे है. भ्रम से उपजे भावों ने मुझे विवेक शून्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
मैंने बुद्धिजीवियों से संपर्क किया समाधान की प्रत्याशा लिए ; पर ऐसे कठिन उत्तर मिले कि उन्हें न समझना ही मुझे बेहतर लगा . मैं तो समाधान कि आस लिए गया था पर ज्ञान की ऐसी गठरी मेरे ऊपर फेंकी गयी कि मैं संभाल नहीं पाया. क्या करूँ मेरे समझने की क्षमता बड़ी सीमित है.बढ़ाने का प्रयत्न क़र रहा हूँ पर समझ मुझसे दूर भाग रही है.
ऐसा अक्सर होता है जब हम किसी बुद्धिमान व्यक्ति से अपने समस्या का समाधान चाहते हैं तो एक हज़ार सलाह और मशवरे मुफ्त में मिल जाते हैं जो कहीं से भी प्रासंगिक नहीं कहे जा सकते, पर ज्ञानियों को समझाए कौन? उनका कहना जनता के लिए'' वेद-वाक्य''. वैसे भी ज्ञानियों की हाँ में हाँ मिलाने से हम निरर्थक बहस से बच जाते हैं. एक व्यथित व्यक्ति बहस करके और दुःख भला क्यों मोल ले?
मैंने अपने बड़ों से सुन रखा है कि समय के पास हर प्रश्न का समाधान होता है मैं भी प्रतीक्षा में हूँ कि कब मेरा समय आये और लगे हाथ कुछ सवाल करूँ ''समय'' से. समय के पास समय रहा तो जरूर बतायेगा अन्यथा ठेंगा दिखा के निकल लेगा.
मेरे एक वरिष्ठ मित्र हैं उन्होंने मुझे समझाया जिसे मैं अक्षरशः नीचे लिख रहा हूँ. इनका जवाब मुझे काफी अच्छा लगा -'' यूँ तो सही कभी-कभी गलत लगता है और गलत कभी-कभी सही लगता है, सब समय का रचा चक्र है और इस चक्र को जो छीनी-हथौड़ी से गढ़ने बैठ जाते हैं उनका बेडा पार हो जाता है और जिन्हे छीनी-हथौड़ी से परहेज होता है वो किनारे पे चक्कर मारते हैं कि इस बार चक्र पर चढ़ जाऊँगा पर अफ़सोस औधें मुंह गिरते हैं. कूदने वाले को गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि उतावलापन इंसानी फितरत है और फितरत की बात ही निराली है.''
इतनी बातें सुन कर मेरे दिमाग की बत्ती तो गुल हो गयी जलाने की कोशिश क़र रहा हूँ पर हवा तेज़ है, बत्ती बुझ जा रही है, आप जलाये रखिये! उम्मीद है फिर मिलेंगे, शायद तब तक मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल जाए...
मैंने बुद्धिजीवियों से संपर्क किया समाधान की प्रत्याशा लिए ; पर ऐसे कठिन उत्तर मिले कि उन्हें न समझना ही मुझे बेहतर लगा . मैं तो समाधान कि आस लिए गया था पर ज्ञान की ऐसी गठरी मेरे ऊपर फेंकी गयी कि मैं संभाल नहीं पाया. क्या करूँ मेरे समझने की क्षमता बड़ी सीमित है.बढ़ाने का प्रयत्न क़र रहा हूँ पर समझ मुझसे दूर भाग रही है.
ऐसा अक्सर होता है जब हम किसी बुद्धिमान व्यक्ति से अपने समस्या का समाधान चाहते हैं तो एक हज़ार सलाह और मशवरे मुफ्त में मिल जाते हैं जो कहीं से भी प्रासंगिक नहीं कहे जा सकते, पर ज्ञानियों को समझाए कौन? उनका कहना जनता के लिए'' वेद-वाक्य''. वैसे भी ज्ञानियों की हाँ में हाँ मिलाने से हम निरर्थक बहस से बच जाते हैं. एक व्यथित व्यक्ति बहस करके और दुःख भला क्यों मोल ले?
मैंने अपने बड़ों से सुन रखा है कि समय के पास हर प्रश्न का समाधान होता है मैं भी प्रतीक्षा में हूँ कि कब मेरा समय आये और लगे हाथ कुछ सवाल करूँ ''समय'' से. समय के पास समय रहा तो जरूर बतायेगा अन्यथा ठेंगा दिखा के निकल लेगा.
मेरे एक वरिष्ठ मित्र हैं उन्होंने मुझे समझाया जिसे मैं अक्षरशः नीचे लिख रहा हूँ. इनका जवाब मुझे काफी अच्छा लगा -'' यूँ तो सही कभी-कभी गलत लगता है और गलत कभी-कभी सही लगता है, सब समय का रचा चक्र है और इस चक्र को जो छीनी-हथौड़ी से गढ़ने बैठ जाते हैं उनका बेडा पार हो जाता है और जिन्हे छीनी-हथौड़ी से परहेज होता है वो किनारे पे चक्कर मारते हैं कि इस बार चक्र पर चढ़ जाऊँगा पर अफ़सोस औधें मुंह गिरते हैं. कूदने वाले को गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि उतावलापन इंसानी फितरत है और फितरत की बात ही निराली है.''
इतनी बातें सुन कर मेरे दिमाग की बत्ती तो गुल हो गयी जलाने की कोशिश क़र रहा हूँ पर हवा तेज़ है, बत्ती बुझ जा रही है, आप जलाये रखिये! उम्मीद है फिर मिलेंगे, शायद तब तक मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल जाए...
गुरुवार, 13 मार्च 2014
ग्लानि
इतिहास के पन्नों पर
उकेरे गए
कुछ तथ्यहीन
सत्य,
भय लगता है
जिनके
स्मरण से ही
वे अक्सर सामने आते हैं.
कभी प्रथा बनकर
तो
कभी रूढ़ि बनकर,
कहीं दहेज़
तो
कहीं अंतरजातीय
विवाह के विरोध के
मुखरित स्वर बन कर.
खून बहते हैं
पानी की तरह,
मानवता
बस ''शब्द'' मालूम
पड़ता है
दबा-कुचला
किताबों के फटे पन्नों में.
प्रेम है आज भी सहज कब?
वर्जनाएं
पग-पग पर हैं
इस पथ पर,
आहत हो जाता है
आत्मसम्मान
अभिभावकों का
प्रेम से,
जैसे सबसे जघन्य अपराध
प्रेम ही हो.
कुरीतियां जो व्याप्त हैं
समाज में
उनपर
पर्दा डालना ''इज्जत''
बचाना है,
और
अमानवीय परंपरा तोडना
अपराध है
जिसके लिए
मृत्युदंड भी कम है.
बेटा गलती करे
तो उसकी माफ़ी है
पर
बेटी को मारने
की
परिपाटी है.
हाय रे समाज!
कितनी रूढ़ियाँ हैं
पग-पग पर.
बेड़ियां हैं
कभी रस्म बनकर
कभी रिवाज़ बनकर.
जलायी जाती हैं
निर्दोषों की चिताएं .
मानव की बस्तियों में
पिशाचों
की संख्या
इतनी अधिक कैसे
कहीं
मानव
विलुप्त तो नहीं हो गया?
प्रथा की शक्ल में
कुरीति
रूढ़ियाँ
जिन्हे हम धो रहे हैं
बुजुर्गों की थाती की तरह
पीढ़ी दर पीढ़ी;
जिन
प्रथाओं ने मानवता को
दूषित किया
उन्हें हमने
परंपरा कहा,
क्या सभ्यता है
परित्यक्त को अंगीकार कर
गौरवान्वित
होते हैं.
बुराइयों पर गर्व
ढोंग का शंखनाद
कैसी सभ्यता है
हम भारतियों की?
(चित्र गूगल से साभार)
उकेरे गए
कुछ तथ्यहीन
सत्य,
भय लगता है
जिनके
स्मरण से ही
वे अक्सर सामने आते हैं.
कभी प्रथा बनकर
तो
कभी रूढ़ि बनकर,
कहीं दहेज़
तो
कहीं अंतरजातीय
विवाह के विरोध के
मुखरित स्वर बन कर.
खून बहते हैं
पानी की तरह,
मानवता
बस ''शब्द'' मालूम
पड़ता है
दबा-कुचला
किताबों के फटे पन्नों में.
प्रेम है आज भी सहज कब?
वर्जनाएं
पग-पग पर हैं
इस पथ पर,
आहत हो जाता है
आत्मसम्मान
अभिभावकों का
प्रेम से,
जैसे सबसे जघन्य अपराध
प्रेम ही हो.
कुरीतियां जो व्याप्त हैं
समाज में
उनपर
पर्दा डालना ''इज्जत''
बचाना है,
और
अमानवीय परंपरा तोडना
अपराध है
जिसके लिए
मृत्युदंड भी कम है.
बेटा गलती करे
तो उसकी माफ़ी है
पर
बेटी को मारने
की
परिपाटी है.
हाय रे समाज!
कितनी रूढ़ियाँ हैं
पग-पग पर.
बेड़ियां हैं
कभी रस्म बनकर
कभी रिवाज़ बनकर.
जलायी जाती हैं
निर्दोषों की चिताएं .
मानव की बस्तियों में
पिशाचों
की संख्या
इतनी अधिक कैसे
कहीं
मानव
विलुप्त तो नहीं हो गया?
प्रथा की शक्ल में
कुरीति
रूढ़ियाँ
जिन्हे हम धो रहे हैं
बुजुर्गों की थाती की तरह
पीढ़ी दर पीढ़ी;
जिन
प्रथाओं ने मानवता को
दूषित किया
उन्हें हमने
परंपरा कहा,
क्या सभ्यता है
परित्यक्त को अंगीकार कर
गौरवान्वित
होते हैं.
बुराइयों पर गर्व
ढोंग का शंखनाद
कैसी सभ्यता है
हम भारतियों की?
(चित्र गूगल से साभार)
मंगलवार, 4 मार्च 2014
उलझन
यूँ तो ख़ामोश हूँ मैं
पर
आती है आवाज़ कहीं से
मेरी ही
रह-रह कर;
घबराहट होती है
अपनी आवाज सुनकर,
तड़पता हूँ अक्सर
अपने दर्द से,
चोट भी मुझे लगती है
और चीख भी
मेरी निकलती है.
घुट रहा हूँ
पर
हस -हस कर.
क्या कहुँ?
रोना मक्कारी लगता है
हंसना
मुमकिन नहीं
टूटते रिश्तों को
जोड़ना मुश्किल है
और
तोडना और भी मुश्किल.
क्या करूँ ?
हसूँ
तो दुनिया,
रोऊँ तो दुनिया।
पर
आती है आवाज़ कहीं से
मेरी ही
रह-रह कर;
घबराहट होती है
अपनी आवाज सुनकर,
तड़पता हूँ अक्सर
अपने दर्द से,
चोट भी मुझे लगती है
और चीख भी
मेरी निकलती है.
घुट रहा हूँ
पर
हस -हस कर.
क्या कहुँ?
रोना मक्कारी लगता है
हंसना
मुमकिन नहीं
टूटते रिश्तों को
जोड़ना मुश्किल है
और
तोडना और भी मुश्किल.
क्या करूँ ?
हसूँ
तो दुनिया,
रोऊँ तो दुनिया।
शनिवार, 22 फ़रवरी 2014
अनुलग्नक
कभी-कभी हम सुन-सुन के थक जाते हैं और बोलना अपरिहार्य हो जाता है. विधाता कुछ लोगों को अद्भुत तर्क शक्ति से समृद्ध करके धरा पर भेजते हैं, ऐसे महान लोगों को न तो कोई कुछ समझा सकता है न ये समझना चाहते हैं. क्योंकि जब इन्हें औसत बुद्धि का कोई मानव कुछ समझाना चाहता है तो ये उसे अपने अकाट्य तर्कों से चुप कर देते हैं. यह ध्रुव सत्य नहीं है कि हम हमेशा सत्य ही होंगे.त्रुटियाँ सबसे होती हैं चाहे कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो. सदैव अपने निर्णय सर्वश्रेष्ठ नहीं होते औसत बुद्धि के लोग भी प्रकांड पंडितों से अधिक बुद्धिमानी का कार्य करते हैं. अपने विचारों को शाब्दिक अर्थ देना उचित है किन्तु उस सीमा तक कि जब तक शब्द किसी का अहित न करे अथवा कष्ट न पहुचाये.शब्द जितने सरल होते हैं उनका प्रभाव उतना ही गहरा होता है, किन्तु कुछ अतिबुद्धिमान व्यक्ति अपना पांडित्य सिद्ध करने हेतु कुछ विशिष्ट शब्दों का चयन करते हैं जो श्रोता के मन में अकारण ही क्रोध उत्पन्न करता है. रसायन शास्त्र में अनुलग्नक और पूर्वानुलग्नक का बड़ा महत्व है, कुछ लोगो को सरल भाषा आती ही नहीं, उसमे अनायास ही पूर्वानुलग्नक और अनुलग्नक सम्मिलित करते है, फलतः अर्थ का अनर्थ हो उठता है.
लोग बोलते समय भूल जाते हैं कि वो बोल क्या रहे हैं? किसी को उससे दुःख पहुँच सकता है. दुःख की नींव पर विद्वान् बनना उचित तो नहीं हो सकता? एक शांत व्यक्ति जिसने अपने शब्दों को सीमा में बाँधा है अथवा स्वयं को वाक्पटुता के श्रेणी से परे रखा है इसका अर्थ यह नहीं कि वह जड़बुद्धि है. चुप रहने और मूर्ख होने में कोई समता नहीं होती. दुर्भाग्य से कुछ लोग शांत होने और मूर्ख होने में समता दिखाने का एक भी अवसर नहीं छोड़ते. बड़े अकाट्य तर्क होते हैं उनके पास. यदि तर्क ही सच कहने का प्रमाण हो तो दर्शन या भगवान जैसे शब्द अप्रासंगिक सिद्ध हो चुके होते.
आप अपने विचारों को पूरे दुनिया में फैलाइये, कुशल वक्ता बनिए पर ऐसा कुछ मत कहिये जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति को कष्ट पहुंचे. आप अपने तर्क की कसौटी पर उसका अहित कर दें, भले ही इसके पीछे आपका कोई बुरा उद्देश्य न हो. शब्द तीर से अधिक पीङा दायक होते हैं और तीर चलने से बचना चाहिए क्योंकि इनका घाव बहुत गहरा होता है और घाव -नासूर वाली कहावतें तो बहुत सुनी होगी आपने. सीधे शब्दों में बोलते समय ये सोच लेना चाहिए कि शब्द तीर की श्रेणी में न आयेँ. कोई एक व्यक्ति मूक हो सकता है सारे नहीं, यदि सब जवाब देने लगें तो आप को वधिर होने से कोई रोक नहीं सकता.
खैर बोलने वाले को कब किसी की परवाह होने लगी? नसीहत है मान लेंगे तो अच्छी बात होगी, नहीं मानेंगे तो और भी अच्छी बात होगी. शब्द आपके हैं फेंकते रहिये, वादा है आपसे कोई प्रतिक्रिया नहीं दुँगा..
लोग बोलते समय भूल जाते हैं कि वो बोल क्या रहे हैं? किसी को उससे दुःख पहुँच सकता है. दुःख की नींव पर विद्वान् बनना उचित तो नहीं हो सकता? एक शांत व्यक्ति जिसने अपने शब्दों को सीमा में बाँधा है अथवा स्वयं को वाक्पटुता के श्रेणी से परे रखा है इसका अर्थ यह नहीं कि वह जड़बुद्धि है. चुप रहने और मूर्ख होने में कोई समता नहीं होती. दुर्भाग्य से कुछ लोग शांत होने और मूर्ख होने में समता दिखाने का एक भी अवसर नहीं छोड़ते. बड़े अकाट्य तर्क होते हैं उनके पास. यदि तर्क ही सच कहने का प्रमाण हो तो दर्शन या भगवान जैसे शब्द अप्रासंगिक सिद्ध हो चुके होते.
आप अपने विचारों को पूरे दुनिया में फैलाइये, कुशल वक्ता बनिए पर ऐसा कुछ मत कहिये जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति को कष्ट पहुंचे. आप अपने तर्क की कसौटी पर उसका अहित कर दें, भले ही इसके पीछे आपका कोई बुरा उद्देश्य न हो. शब्द तीर से अधिक पीङा दायक होते हैं और तीर चलने से बचना चाहिए क्योंकि इनका घाव बहुत गहरा होता है और घाव -नासूर वाली कहावतें तो बहुत सुनी होगी आपने. सीधे शब्दों में बोलते समय ये सोच लेना चाहिए कि शब्द तीर की श्रेणी में न आयेँ. कोई एक व्यक्ति मूक हो सकता है सारे नहीं, यदि सब जवाब देने लगें तो आप को वधिर होने से कोई रोक नहीं सकता.
खैर बोलने वाले को कब किसी की परवाह होने लगी? नसीहत है मान लेंगे तो अच्छी बात होगी, नहीं मानेंगे तो और भी अच्छी बात होगी. शब्द आपके हैं फेंकते रहिये, वादा है आपसे कोई प्रतिक्रिया नहीं दुँगा..
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014
भूले-बिसरे गीत
बचपन में मुझे गाने सुनने का बड़ा शौक था, सोचता था कि बड़ा होकर गीतकार बनूँगा, गाने लिखूंगा. मेरे लिखे हुए गाने रेडियो पे बजेंगे. विविध भारती मेरा पसंदीदा रेडियो चैनल था. बचपन में जब भी गाने सुनता था तो कुछ न कुछ लिखता रहता था, मन में एक ही उद्देश्य होता था कि गीतकार बनना है, फिर ''कमल शर्मा '' अपने शो में मेरा इंटरव्यू लेंगे मेरे लिखे हुए गाने रेडियो पर बजेंगे.
अपने बचपन के उन्ही दिनों में जुदाई वाले गाने सुनके मैंने एक गाना लिखा था, मेरे पास शब्द भी कम थे, भाव बिलकुल भी नहीं थे .पांचवी या छठी कक्षा में था जाहिर सी बात है कि प्यार जैसे शब्दों को लिखने कि समझ नहीं थी, ऐसे ही कुछ सोच रहा था तो पंक्तियाँ एक-एक करके याद आने लगीं...लिहाजा आप सबसे अपनी यादें बाँट रहा हूँ ...
मैंने खोया जब तुमको खुद से
मिटाया अपनी हस्ती को
भटकना ही हुआ हासिल
डुबोया अपनी कश्ती को.
तू ही आका तू ही मौला
तू ही आरजू दिल की
भले हम टूटे हो खुद से
ताजा हैं यादें हर पल की.
कुभी तुमने मुझे देखा
कभी मैंने तुम्हे देखा
हुआ बस दर्द ही हासिल
इस गम ने क्यों मुझे देखा?
मेरे भीगी सी पलकों पर
तुम्हारे नाम की नींदे
इन्हे जब-जब कहीं धोया
मेरा मांझी मुझे खींचे.
तुम्हारी बेवजह बातें
या तन्हाई की रातें
मुझे जब याद आती हैं
मेरी आँखे भिगोती हैं.
तुम्हारे होने से मैं हूँ
कभी तुम मुझको न खोना
भले ही भूल जाओ तुम
बहुत मुश्किल जुदा होना.
अपने बचपन के उन्ही दिनों में जुदाई वाले गाने सुनके मैंने एक गाना लिखा था, मेरे पास शब्द भी कम थे, भाव बिलकुल भी नहीं थे .पांचवी या छठी कक्षा में था जाहिर सी बात है कि प्यार जैसे शब्दों को लिखने कि समझ नहीं थी, ऐसे ही कुछ सोच रहा था तो पंक्तियाँ एक-एक करके याद आने लगीं...लिहाजा आप सबसे अपनी यादें बाँट रहा हूँ ...
मैंने खोया जब तुमको खुद से
मिटाया अपनी हस्ती को
भटकना ही हुआ हासिल
डुबोया अपनी कश्ती को.
तू ही आका तू ही मौला
तू ही आरजू दिल की
भले हम टूटे हो खुद से
ताजा हैं यादें हर पल की.
कुभी तुमने मुझे देखा
कभी मैंने तुम्हे देखा
हुआ बस दर्द ही हासिल
इस गम ने क्यों मुझे देखा?
मेरे भीगी सी पलकों पर
तुम्हारे नाम की नींदे
इन्हे जब-जब कहीं धोया
मेरा मांझी मुझे खींचे.
तुम्हारी बेवजह बातें
या तन्हाई की रातें
मुझे जब याद आती हैं
मेरी आँखे भिगोती हैं.
तुम्हारे होने से मैं हूँ
कभी तुम मुझको न खोना
भले ही भूल जाओ तुम
बहुत मुश्किल जुदा होना.
गुरुवार, 9 जनवरी 2014
हैरत
थक गया हूँ
जीवन के उतार-चढ़ाव
देखकर,
खुशियों पर भारी
पड़ते
गम देखकर,
बिन बारिश के
जहाँ
नम देखकर,
हैवानों कि बस्ती में
इंसान
कम देखकर,
खुशियों से लबरेज़
गम देखकर
थक सा गया हुँ मैं.
क्या है होना?
क्या है न होना?
कुछ भी पता नहीं;
कौन अपना
कौन पराया
अनुमान भी नहीं,
अपने ही अक्स
की
पहचान नहीं,
बीतते लम्हे
छूटते रिश्ते
बेवजह के जज्बात
उलझते रास्ते,
सब कुछ अनजाना
फिर भी
सब कुछ
खंगालने की कोशिश,
एक कसक
कुछ न कर पाने की.
हैरत में हूँ
ऐ जिंदगी तू ही बता
तू है क्या?
जीवन के उतार-चढ़ाव
देखकर,
खुशियों पर भारी
पड़ते
गम देखकर,
बिन बारिश के
जहाँ
नम देखकर,
हैवानों कि बस्ती में
इंसान
कम देखकर,
खुशियों से लबरेज़
गम देखकर
थक सा गया हुँ मैं.
क्या है होना?
क्या है न होना?
कुछ भी पता नहीं;
कौन अपना
कौन पराया
अनुमान भी नहीं,
अपने ही अक्स
की
पहचान नहीं,
बीतते लम्हे
छूटते रिश्ते
बेवजह के जज्बात
उलझते रास्ते,
सब कुछ अनजाना
फिर भी
सब कुछ
खंगालने की कोशिश,
एक कसक
कुछ न कर पाने की.
हैरत में हूँ
ऐ जिंदगी तू ही बता
तू है क्या?
गुरुवार, 2 जनवरी 2014
बीते लम्हे
बीते साल के कुछ खूबसूरत लम्हे जो अब बस स्मृतियों में हैं-
न मैं कवी हूँ,न कवितायें
मुझे अब रास आती हैं;
मैं इनसे दूर जाता हूँ,
ये मेरे पास आती हैं,
हज़ारों चाहने वाले
पड़े हैं इनकी राहों में,
मगर कुछ ख़ास मुझमें है,
ये मेरे साथ आती हैं.
''कई चाहत दबी दिल में,
जो अक्सर टीस भरती हैं,
मेरे ख्यालों में आकर
मुझी को भीच लेती हैं ,
कई राहों से गुजरा हूँ
दिलों को तोड़कर अक्सर,
मगर कुछ ख़ास है तुझ में,
जो मुझको खींच लेती है.''
तुम्हारी आँख लगती है
तो आँखे बंद होती है,
तुम्हारी नींद खुलती है
तो साँसे मंद होती है,
अजब है हाल -ए-दिल मेरा
जुड़ा हूँ जब से मैं तुमसे,
मेरे अपने ही धड़कन से
मेरी ही जंग होती है.
मेरे ख्यालों से अब निकलो,
ये दुनिया भी तो खाली है,
है खुशियों का यहाँ मंज़र,
समझ लो कि दिवाली है,
मेरी अँधेरी दुनिया को
मेरे ही पास रहने दो,
उम्मीदों कि ये जो लौ है,
वो अब बुझने वाली है.
यहाँ जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैँ,
तुम्हे जब सोचता हूँ मैँ तो
रातेँ कम सी होती हैँ,
अजब है गम का भी आलम
न कुछ कह के कह पाऊँ,
तुम्हारे बिन मेरी दुनिया
बड़ी बेदम सी होती है.
न मैं कवी हूँ,न कवितायें
मुझे अब रास आती हैं;
मैं इनसे दूर जाता हूँ,
ये मेरे पास आती हैं,
हज़ारों चाहने वाले
पड़े हैं इनकी राहों में,
मगर कुछ ख़ास मुझमें है,
ये मेरे साथ आती हैं.
''कई चाहत दबी दिल में,
जो अक्सर टीस भरती हैं,
मेरे ख्यालों में आकर
मुझी को भीच लेती हैं ,
कई राहों से गुजरा हूँ
दिलों को तोड़कर अक्सर,
मगर कुछ ख़ास है तुझ में,
जो मुझको खींच लेती है.''
तुम्हारी आँख लगती है
तो आँखे बंद होती है,
तुम्हारी नींद खुलती है
तो साँसे मंद होती है,
अजब है हाल -ए-दिल मेरा
जुड़ा हूँ जब से मैं तुमसे,
मेरे अपने ही धड़कन से
मेरी ही जंग होती है.
मेरे ख्यालों से अब निकलो,
ये दुनिया भी तो खाली है,
है खुशियों का यहाँ मंज़र,
समझ लो कि दिवाली है,
मेरी अँधेरी दुनिया को
मेरे ही पास रहने दो,
उम्मीदों कि ये जो लौ है,
वो अब बुझने वाली है.
यहाँ जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैँ,
तुम्हे जब सोचता हूँ मैँ तो
रातेँ कम सी होती हैँ,
अजब है गम का भी आलम
न कुछ कह के कह पाऊँ,
तुम्हारे बिन मेरी दुनिया
बड़ी बेदम सी होती है.
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013
ख़ामोशी
रात के अँधेरे मेँ,
ख़ामोशी
कुछ इस कदर
पाँव
पसारती है
कि,
समझना
मुश्किल हो जाता है
कि
ख़ामोश हम हैँ
या रातेँ ?
अनजान राहोँ पर,
ड़गमगाते
कदमो के सहारे
मँजिल तलाशना
मक्कारी
लगता है
फिर भी
हर रोज निकलता हूँ
तलाश मेँ,
कभी गिरता हूँ
कभी
गिरा दिया जाता हूँ ,
मीलोँ भटकता हूँ
पर
अफसोस
मँजिल फिर भी दूर लगती है.
रोशनी मिलती नहीँ,
अधेरे मेँ
कुछ सूझता नहीँ
पर
ज़िद है फिजा मेँ
घुली हुई विरानियोँ
के सहारे,
मँजिल पाने की
जानता हूँ
खामोशियाँ कुछ नहीँ कहतीँ
पर
इक उम्मीद है
कि
इनके बिना कहे,
सुन लुँगा
मँजिल की पुकार.
(चित्र गूगल से साभार )
ख़ामोशी
कुछ इस कदर
पाँव
पसारती है
कि,
समझना
मुश्किल हो जाता है
कि
ख़ामोश हम हैँ
या रातेँ ?
अनजान राहोँ पर,
ड़गमगाते
कदमो के सहारे
मँजिल तलाशना
मक्कारी
लगता है
फिर भी
हर रोज निकलता हूँ
तलाश मेँ,
कभी गिरता हूँ
कभी
गिरा दिया जाता हूँ ,
मीलोँ भटकता हूँ
पर
अफसोस
मँजिल फिर भी दूर लगती है.
रोशनी मिलती नहीँ,
अधेरे मेँ
कुछ सूझता नहीँ
पर
ज़िद है फिजा मेँ
घुली हुई विरानियोँ
के सहारे,
मँजिल पाने की
जानता हूँ
खामोशियाँ कुछ नहीँ कहतीँ
पर
इक उम्मीद है
कि
इनके बिना कहे,
सुन लुँगा
मँजिल की पुकार.
(चित्र गूगल से साभार )
बुधवार, 25 दिसंबर 2013
थकान
मिला था तुमसे
कुछ
उलझनो की पोटली
लेकर,
सुनाया था तुम्हे
कुछ पुराने
बेमतलब जज्बातों को,
सोचा था
सुलझा दोगे
अपने उलझनो की तरह,
पर तुम तो मुझे
सुन भी नहीं पाये.
क्या सुनोगे?
हर कोई अपनी शिकायतें
थक -हार कर
लाता है तुम्हारे पास,
इस थकान में
भूल जाते हो
तुम अपनी थकान.
रो भी नहीं सकते,
हस भी नहीं सकते.
तुम्हारी जिंदगी भी
गुजरती होगी
तकलीफें
सह-सह कर.
जाने क्यों मेरे जेहन में
कौंधते है कुछ सवाल
बिजली बनकर.
हर पल
हर वक्त
हर लम्हे,
तलाशता हूँ जवाब
पर
मिलती है सिर्फ बेचैनी.
समझ में नहीं आता
मेरी उलझने
सुलझती क्यों नहीं?
क्यों हारता हुँ
अक्सर अपनी परेशानियों से?
डर लगता है अब
अपने आप से,
किस ओर जा रहे है मेरे कदम?
बिना मेरी मर्ज़ी के....
कुछ
उलझनो की पोटली
लेकर,
सुनाया था तुम्हे
कुछ पुराने
बेमतलब जज्बातों को,
सोचा था
सुलझा दोगे
अपने उलझनो की तरह,
पर तुम तो मुझे
सुन भी नहीं पाये.
क्या सुनोगे?
हर कोई अपनी शिकायतें
थक -हार कर
लाता है तुम्हारे पास,
इस थकान में
भूल जाते हो
तुम अपनी थकान.
रो भी नहीं सकते,
हस भी नहीं सकते.
तुम्हारी जिंदगी भी
गुजरती होगी
तकलीफें
सह-सह कर.
जाने क्यों मेरे जेहन में
कौंधते है कुछ सवाल
बिजली बनकर.
हर पल
हर वक्त
हर लम्हे,
तलाशता हूँ जवाब
पर
मिलती है सिर्फ बेचैनी.
समझ में नहीं आता
मेरी उलझने
सुलझती क्यों नहीं?
क्यों हारता हुँ
अक्सर अपनी परेशानियों से?
डर लगता है अब
अपने आप से,
किस ओर जा रहे है मेरे कदम?
बिना मेरी मर्ज़ी के....
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