गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

निन्दक नियरे राखिये

कुछ व्यक्तियों का मुख्य ध्येय ही निन्दा करना होता है, वे इसी पावन उद्देश्य हेतु धरती पर अवतरित होते हैं। निन्दा का विषय वैसे तो नियमित बदलता रहता है पर कुछ स्थायी चरित्र ऐसे होते हैं जो इनके विशेष लक्ष्य होते हैं। भले ही निन्दक से मिले बेचारे को वर्षों बीत गए हों पर निन्दा ऐसे करते हैं जैसे कल ही उससे मिले हों। निन्दा भी पटकथा के संवाद जैसे की जाती है।
अरे! आपने सुना नहीं वो बहुत गन्दा लड़का है, मोहल्ले भर की लड़कियों से अफेयर है उसका(जैसे कोई लड़का न होकर साक्षात् कामदेव हो)।
जान! सुना नहीं है क्या आपने उनके बारे में?बहुत गन्दा चरित्र है उनका, एक बार तो मेरे पापा ने उन्हें डाँट के घर से भगाया था।(चाहे उनके सात खानदान की औकात उस लड़के से बात तक करने की न हो, चाहे हर कदम पर उस लड़के की जरूरत उन्हें पड़े...चाहे ज़िन्दगी भर उस लड़के के परिवार के परीजीवी रहे हों इनके पुर्वज)।
आपको पता है एक बार मैंने उन्हें चौराहे पे मार करते हुए देखा था इतना क्रूर है कि किसी से भिड़ पड़ता है(चाहे इन्ही की हिफाज़त के लिए उसने दो-चार को ठोका हो और इन्ही की वजह से बदनाम हुआ हो)।
उस लड़की से इतने दिनों तक अफेयर था उसका(चाहे हर दो-चार दिन बाद इनका भी अफेयर कॉलेज और मोहल्ले के दो-चार सड़क छाप आशिकों से हो जाता हो)।

मैं कोई पटकथा नहीं लिख रहा। लोग दूसरों के चरित्र की पटकथा लिखने,प्रकाशित और प्रसारित करने से पहले अपने आप को भी देख लिया करें और ऐसे लोगों के माँ-बाप भी ज़रा अपने बच्चों की हरकतें देख लिया करें कि घर में क्या सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती रहती हैं। दूसरों के बच्चों की बुराइयाँ करने से बेहतर है कि अपने बच्चों पर नज़र रखा जाये।
बूढ़ी माँ से बर्तन धुलवाना,उससे बिना वजह लड़ना, प्रतिस्पर्धा करना, सर दबवाना, मेहमानों से बदतमीज़ी करना,बैठे-बैठे संसार भर की बुराई करना संस्कार है और एक इंसान जो किसी को अपनी बहन से ज्यादा प्यार करे और कोई उसे छेड़े तो छेड़ने वाले की मरम्मत कर दे वो गुण्डा है, चरित्रहीन है,कुसंस्कारी है? हाँ!  है। क्योंकि उसने कृतघ्नों पर उपकार किया है। उसने अपना फ़र्ज़ तो निभाया पर ये भूलकर कि जिसके लिए मैंने किया है कल वही मुझे बदनाम करेगा।
क्या करे मज़बूर है वो अपने खून से क्योंकि उसे ये हरकतें विरासत में मिली हैं। जिस परिवार का वो हिस्सा है वहां का एक ही नारा है-तुम कितनी भी मेरे साथ कृतघ्नता क्यों न करो, मुझे बदनाम क्यों न  करो मैं तुम्हारे साथ हमेशा अच्छा करूँगा। (क्योंकि मुझे यही संस्कार मिले हैं।)
एक बात कहूँ किसी दिन आप अपने भाई से झूठ-मूठ का झगड़ा कर लें और अगले दिन अपने पड़ोसियों के घर घूम लें आपके भाई की एक हज़ार खामियाँ आपको जानने को मिल जाएँगी और फिर अपने भाई को दौरे पे भेजें जहाँ-जहाँ आप गए हों। आपको अपनी भी हज़ार खामियाँ जानने को मिल जाएँगी। ये वाक़ई बेहद सच्ची और परखी हुई बात है।
हद है यार! दीवारों के भी कान होते हैं सुना नहीं है क्या? एक भाई से दुसरे भाई की शिकायत करोगे तो क्या बातें पच जाएँगी? बहुत बेवक़ूफ़ हो यार...हम साथ-साथ पले-बढ़े हैं। टॉफी तो हम छिपा नहीं पाते थे एक-दुसरे से ये तो बातें हैं। सब कुछ ख़बर मिलती है...वो भी अक्षरशः....इतनी बड़ी बेवकूफ़ी तो आपको नहीं करनी चाहिए। एक भाई से दुसरे भाई की बुराई? दिमाग़ तो ठीक है न आपका?
किसी की नज़रों में आप महान नहीं हो सकते किसी को नीचा दिखा कर।
कितना फालतू समय है आपके पास बैठकर उसकी बुराई करने का जिसके पास सुबह से लेकर शाम तक काम का ढ़ेर लगा रहता है? जिसे आपके बारे में सोचने तक का समय नहीं है उसके व्यक्तित्व पर आप शोध कर रहे हैं....कोई और काम नहीं है क्या आपके पास अनावश्यक नुक्ताचीनी करने के अलावा?
बहुत अच्छा है आप अपने काम को इसी समर्पण के साथ करते रहिये आपकी बहुत जरुरत है हमें...मन तो कर रहा है आपको अपने ही घर में लेते आऊँ पर....
हिन्दी के एक बड़े होनहार सिपाही ने एक बात कही है जो मुझे बहुत प्रिय है..आपने भी सुनी ही होगी-
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय,
बिन साबुन-पानी बना निरमल करे सुभाय।।
आप का बहुत-बहुत धन्यवाद......कान में मैल जमी थी अब साफ़ हो गई...अरे हाँ! सुना है आपके पास पूरी दुनिया के चरित्र प्रमाणपत्र का ठेका है? एक तथ्य निष्पक्ष होकर कहेंगे दुनिया से.......आपका चरित्र कैसा है?

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

जो रहे अपरिचित स्वयं से भी


मैं गीत नहीं गा सकती हूँ अब
मौन मुझे हो जाने दो
इस काल की कलरव लीला में अब
गौण मुझे हो जाने दो,
अवरुद्ध कण्ठ से गीत कहूँ यह
मुझसे न हो पायेगा
जो रहे अपरिचित स्वयं से भी वह
कौन मुझे हो जाने दो।।

(मेरी नानी पता नहीं कहाँ चली गयी.....जाने किस अनजान जगह...जाने किस अनजान देश में..बादलों के पार.दिल कह रहा है कि नानी भगवान् के पास बैठी है और हमें देखकर कह रही है....न रो दहिजरा..हम फिर आइब)

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

ए-दिल! इश्क़ की राहों में


फिर तबीयत बिगड़ रही है ए-दिल! इश्क़ की
राहों में
फिर मेरा दिल तड़प रहा है रात कट रही
आहों में,
फिर सुलगी है इक चिंगारी फिर दिल तेरे
पनाहों में,
फिर तू दौड़ी-दौड़ी आजा कोरी-कोरी
बाँहों में
(wonderful
painting by my sister himani)

शनिवार, 26 सितंबर 2015

कंदर्प का संहार होना है...


एक कम्पन हो रहा मेरे
ह्रदय में
मेरे विखण्डन को कोई 
आतुर हुआ है,
इस तरह उद्विग्न है स्वासों 
का प्रक्रम,
जैसे यम ने आज ही सहसा 
छुआ है,
मैं बना हूँ लक्ष्य संभवतः 
प्रलय का
आज मेरे दर्प का उपचार 
होना है,
युगों से जिस नेह ने जकड़ा 
मुझे था,
आज उस कन्दर्प का संहार 
होना है।।
-अभिषेक शुक्ल
(प्रस्तुत पंक्तियाँ मेरी कविता "अविजित दुर्ग" के आगे की कड़ी है)

बुधवार, 23 सितंबर 2015

मैं अविजित दुर्ग हूँ अपने समय का...

मैं अविजित दुर्ग हूँ अपने समय का
सैकड़ों सेनाएं थक कर हार बैठीं,
किन्तु टूटा नहीं मेरा एक कण भी
धैर्य साहस वीरता सब वार बैठीं।
किन्तु अब मैं स्वयं ही फटने लगा हूँ
चल रहा एक द्वंद्व और एक युद्ध मुझमें,
शांति और उत्पात का संगम बना हूँ
आज गुण-अवगुण सभी हैं क्रुद्ध मुझमें।।
-अभिषेक
(क्रमशः)

रविवार, 20 सितंबर 2015

गरज-गरज घनघोर घटा ने..


गरज गरज घनघोर घटा ने आज बरसने की
ठानी है,
बरसा दे ओ नभ् के ईश्वर जितना तेरे तेरे घर
पानी है,
तू विस्तृत है तो हम सागर बन तेरा आह्वान
करेंगे,
मेघदूत तेरे कलरव का हम हिय से सम्मान
करेंगे।।
-अभिषेक शुक्ल

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

साहित्य मंथन

यदि सारे साहित्यकार एक-दूसरे की घृणित
आलोचना छोड़कर कुछ सकारात्मक कार्य
करने लगें, नए प्रतिभाओं को हेय दृष्टि से न
देखकर उनकी अनगढ़ प्रतिभा को गढ़ें, सुझाव दें
तथा भाषा को रोचक बनायें और नए
साहित्यिक प्रयोगों की अवहेलना न करें तो
हिंदी भाषा स्वयं उन्नत हो जायेगी।
बहुत दुःख होता है जब वरिष्ठ साहित्यकारों
की वैचारिक कटुता समारोहों में, सोशल
मीडिया पर प्रायः देखने-पढ़ने को मिलती है।
साहित्यकार कभी विष वमन् नहीं करता
किन्तु इन-दिनों ऐसी घटनाएं मंचों पर
सामान्य सी बात लगती हैं।
कुछ कवि जिन्हें वैश्विक मंच मिला है, जिन्हें
दुनिया सुनती है, जिन्होंने साहित्य का
सरलीकरण किया उनकी आलोचना करना
आलोचना कम ईर्ष्या अधिक लगती है।
किसी का लोकप्रिय होना उसकी
मृदुभाषिता,सहजता,व्यवहारिकता तथा
प्रयत्नों की नवीनता पर निर्भर करता
है....यदि आपको पीछे रह जाने का आमर्ष हो
तो मंथन कीजिये, अपने शैली पर ध्यान
दीजिये..कोई परिपूर्ण तो होता नहीं है,
सुधार सब में संभव है...आप अच्छा लिखेंगे.सुनायें
गे तो लोग आपको भी पढ़ेंगे,सुनेंगे।
भला कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जिसे
अच्छा साहित्य अच्छा न लगे।
कुछ साहित्यकार ऐसे भी हैं जिनके मनोवृत्ति
को माँ शारदा भी नहीं बदल पाईं भले ही वे
माँ के सच्चे साधक रहे हों।
कुछ समय पहले एक वरिष्ठ साहित्यकार का
सन्देश आया फेसबुक पर। वो सन्देश कम अध्यादेश
अधिक था मेरे लिए। सन्देश का सार ये था कि
उन्होंने मेरे ब्लॉग पर मेरी कविताएँ पढ़ीं,
आलेख पढ़े। पाठकों की, ब्लॉगर मित्रों की
टिप्पणियां भी पढ़ीं..और उसके बाद खिन्न
होकर मुझे सन्देश भेजा कि- मैं आज की पीढ़ी
को पढ़कर व्यथित हूँ। तुम्हीं लोग हिंदी
साहित्य को गन्दा कर रहे हो। उन्मुक्त
कविता लिखते हो। छंदों का ज्ञान नहीं
है..लयात्मक नहीं लिखते तुकबंदी करके स्वयं को
कवि कहते हो।कोई हिंदी प्रेमी कुछ पढ़ने के
लिए इंटरनेट खोले तो तुम्हारी तरह अनेक
साहित्य के शत्रु दिख जाते हैं।न शैली है न
रोचकता है कुछ भी लिखने लगते हो जो मन में
आये उसे पोस्ट कर देते हो चाहे उसका स्तर
कितना भी निम्न क्यों न हो। तुम छुटभैय्ये
ब्लॉगरों ने हिंदी को बदनाम कर के रख
दिया है।
मैंने भी प्रत्युत्तर दिया- गुरुदेव प्रणाम! क्षमा
चाहता हूँ आप मेरी रचनाओं से व्यथित हुए।
आपने जिन विषयों की ओर इंगित किया है मैं
उनमें सुधार लाने का प्रयत्न करूँगा किन्तु मेरी
एक समस्या है गुरुदेव कि मैं विधि विद्यार्थी
भी हूँ। कानून तो स्वयं पढ़ सकता हूँ पर मेरे
प्रवक्ता गण मुझे साहित्य नहीं पढ़ाते। कुछ
ऐसी विडम्बना है इस देश कि सर्वोच्च
न्यायालयों की भाषा आंग्ल भाषा है। प्रश्न
आजीविका का है इसलिए इसलिए इस विषय
को भी मैंने अंग्रेजी में ही पढ़ा है। हिंदी मुझसे
छूट सी गयी है।मुझे कोई हिंदी आचार्य मिल
नहीं रहा है जो मुझे व्याकरण सिखाये। आप
जैसे वरिष्ठ लोगों से पूछता हूँ तो कहते हैं कि
स्वयं अध्यन करो। केवल पुस्तक पढ़ने से ज्ञान आ
जाता तो अब तक संभवतः हर कुल में एक महर्षि
वाल्मीकि होते।आपने कहा की मेरे जैसे अधम
लोग साहित्य को दूषित कर रहे हैं..गुरुदेव
दूषित वस्तुओं को स्वच्छ करने का कर्तव्य भी
आप जैसे जागरूक लोगों पर होता है। मुझे भी
स्वच्छ कर दीजिये जिससे कि मैं भी स्वच्छता
फैला सकूँ। आपका बहुत-बहुत आभार मुझ पर इस
विशेष स्नेह के लिए।
गुरुदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया किंतु मुझे
ब्लॉक अवश्य कर दिया।
यह कारण मेरे समझ में नहीं आया। मैंने कौन सी
उदण्डता कर दी? मैंने उन्हें कैसे आहत कर दिया?
कुछ दिन ये सोचता रहा कि क्या मैं अपनी
काव्यगत उच्छश्रृंखलता से कहीं सच में साहित्य
को दूषित तो नहीं कर रहा? क्या छन्दमुक्त
कविता, कविता की श्रेणी में नहीं आती.?
इन्ही प्रश्नों में उलझ कर कई दिन कुछ नहीं
लिखा। एक दिन शाम को कुछ पढ़ रहा था
तो अचानक ही रामायण का एक प्रसंग याद
आया। सीता माता का पता चल चुका था।
वानर सेना समुद्र में सेतु निर्माण के लिए लिए
प्रयत्नशील थी। कोई पहाड़ तो कोई पर्वत
तो कोई पत्थर फेंक रहा था समुद्र में, तभी
भगवान की दृष्टि एक नन्ही सी गिलहरी पर
पड़ती है जो स्थल पर लेटकर अपने सामर्थ्य भर
शरीर में रेत इकट्ठा करती और समुद्र के किनारे
उसी रेत को गिरा देती। उसका समर्पण देख
भगवान उसे प्यार से सहलाते हैं आशीष देते हैं और
देखते ही देखते बांध बन जाता है। त्रेता युग में
निर्मित वह सेतु आज भी यथावत है।
मुझे एक क्षण को आभास हुआ कि मैं वही
गिलहरी हूँ जो साहित्य के सागर में सेतु बना
रहा हूँ। निःसंदेह मेरा प्रयत्न अकिंचन है किन्तु
है तो।मैं तो अपने आराध्य की उपासना कर
रहा हूँ। मैं लिखना क्यों बंद करूं?
मुझे उनकी टिप्पणी अप्रिय नहीं लगी थी
किन्तु अपने कार्य पर संदेह होने लगा था।
ये केवल मेरी समस्या नहीं है। मेरे जैसे अनेक हैं
जो लिखते है टूटी-फूटी भाषा में...जिन्हें
सीखने की तीव्र इच्छा तो है पर सिखाने
वाले हाथ खड़ा कर लेते हैं। जो जानते हैं
जिनकी कलम पुष्ट है वे ही लोग बच्चों को कुछ
सिखाने से कतराते हैं। कोई स्वयं ही नहीं
सीख सकता न ही इस युग में आदि कवि
वाल्मीकि जैसा कोई बन सकता है।
गुरु को भारतीय दर्शन नें ईश्वर से श्रेष्ठ कहा
है..आप गुरुवत् आचरण करने लगें तो आप सबका
शिष्य बनने में नई पीढ़ी कब से आतुर है।
एक अनुरोध है साहित्य में पुरोधाओं से यदि
आप कुछ जानते हैं तो आपका सुझाव, आपका
मार्गदर्शन, आपका अनुभव हमारा संबल बन
सकता है...हमें सुधार सकता है।
आपके द्वारा प्रदत्त सकारात्मक वातावरण न
केवल हमारी लिपि,हमारी भाषा को
उन्नतिशील बनाएगा वरन हमारी संस्कृति
को सशक्त बनाएगा..क्योंकि लोग कहते हैं कि
हम बच्चे ही भारत के भविष्य हैं...इस भविष्य
को संवारने में आपका योगदान इस द्वीप के
लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
आपकी आपसी कटुता हमें भी आहत करती है।
साहित्य कला है, कला अर्थात आनंद...और
आनंद सदैव शाश्वत होता है।जब तक साहित्य
शाश्वत है तभी तक पठनीय है जब मन का
ईर्ष्या,द्वेष, दुर्भावना साहित्य में आने लगता
है तो साहित्य बोझिल लगने लगता है..कोई
दुःख नहीं पढ़ना चाहता कोई विषाद नहीं
सुनना चाहता...सब को उल्लास अभीष्ठ
है..प्रयोग करके तो देखिये...दुनिया सुनने के
लिए सदैव उत्सुक रहेगी।एक ऊर्जावान व्यक्ति
सदैव ऊर्जा बिखेरता है..आपके आस-पास आपसे
प्रभावित बिना हुए नहीं रह सकते..सरस्वती के
साधक अवसाद में रहें तो युग अंधकारमय हो
जाता है फिर भाषा की उन्नति तो स्वप्न
जैसा है...देश की ही अवनति प्रारम्भ हो
जाती है।
समदर्शक बनें..सहनशील बनें...गंभीर
बनें..निःसंदेह भाषा भी गौरवान्वित होगी
और देश भी...भविष्य आपकी प्रतिबद्धता पर
टिका है, आपके समर्पण पर टिका है....
सकारात्मकता की ओर बढ़ें.....लक्ष्य तक तो
पहुँच ही जाएंगे शनैः-शनैः।

बुधवार, 9 सितंबर 2015

धार्मिक असहिष्णुता से आहत भारत


प्राचीन भारतीय दर्शन के अनुसार धर्म की एक बहुत सुन्दर सी परिभाषा है-"जो धारण करने योग्य है वही धर्म है।"
प्रश्न यह उठता है कि धर्म के लक्षण क्या हैं? इन लक्षणों को मनु ने इस प्रकार  है बताया है-
"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं
धर्मलक्षणम्।
अर्थात- धैर्य, क्षमा, दम(दुष्प्रवित्तियों पर नियंत्रण), अस्तेय, आंतरिक तथा बाह्य शुचिता, इन्द्रिय निग्रहः, बुद्धिमत्ता पूर्ण आचरण, विद्या के लिए तीव्र पिपसा, मन,कर्म तथा वचन से सत्य का पालन करना, क्रोध पर नियंत्रण ये धर्म के दस लक्षण हैं।
आज संसार के किसी भी धर्म में इन लक्षणों का दूर-दूर तक कहीं समावेश नहीं है। भारत जिसे धर्मों का संगम कहा जाता है, जहाँ सदियों से अलग-अलग धार्मिक संस्कृतियां पुष्पित और पल्लवित होती रही हैं, जिस देश ने विश्व के सभी धर्मों के अनुयायियों को संरक्षण प्रदान किया उसी भारत में आज धार्मिक कलह से भारतीयता आहत है।
हर धर्म के अनुयायी उस धर्म की मूल भावना से परे हटकर कुरूतियों को धर्म कहकर देश में धार्मिक कटुता का बीज बो रहे हैं। अब देश में भारतीय खोजना मुश्किल हो गया है। हिन्दू और मुसलमान तो गली-चौराहों पर मिल जाते हैं पर भारतीय विलुप्तप्राय हो गए हैं। सरकार को भारतियों के संरक्षण के लिए कोई बिल पास करना चाहिए ये संकटग्रस्त प्रजाति है।
देश में अलग-अलग जगहों पर पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट के झण्डे फहराये जा रहे हैं, हिंदुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाये जा रहे हैं। जिस देश में खाने के लिए लाले पड़ रहे हों जो खुद दहशत के आग में जल रहा हो उसके अनुयायी भारत में कहाँ से आये ये सोचने वाली बात है। ऐसी कौन सी बात है जिससे आहत हो लोग वतन से गद्दारी कर रहे हैं? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हिन्दू और मुसलमान में नफ़रत इस कदर बढ़ गयी है कि जगह-जगह से सांप्रदायिक तनाव की ख़बरें आ रही हैं। ऐसी धार्मिक असहिष्णुता कभी नहीं थी जिनती अब हो गयी है। ऐसी विषाक्त परिस्थितियों को देखकर देश की आत्मा व्यथित है।
कोई धर्म देश से गद्दारी नहीं सिखाता। किसी भी धर्म की शिक्षाएं मानवता को शर्मसार नहीं करती पर धर्म के ठेकेदारों को कौन समझाए?  आज धार्मिक उन्माद का मुख्य कारण धार्मिक राजनीति है। नफरत उगाई जा रही है और दहशत की फसलें काटी जा रही हैं।
हर धर्म में एक से बढ़कर एक संप्रादियिक तनाव पैदा करने वाले चेहरे हैं जो केवल ज़हर ही उगलते हैं।
धर्म की राजनीति करने वाले इन असहिष्णु लोगों को ये नहीं पता है कि धर्म का उद्देश्य क्या है।
"श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव
अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न
समाचरेत् ॥"
धर्म का सर्वस्व क्या है? उसे समझो और वैसा आचरण करो। जो आचरण तुम्हारे लिए प्रतिकूल हो उसे दूसरों के साथ मत करो।
धर्म का आशय क्या है? धर्म क्या है? आचरण क्या है? पाप क्या है? कुछ नहीं पता पर सब स्वयं को धार्मिक कहते हैं।
जो व्यवहार अपने अनुकूल न हो वैसा आचरण किसी दुसरे के साथ नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करना प्रवित्ति है तो यह पाप है।
किसी भी धर्म का उत्थान हिंसा से असंभव है। जो धर्म सबसे अधिक उदार होगा,समरसता पूर्ण होगा और मानवीय होगा वही अस्तित्व में रहेगा। किन्तु कोई भी इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
जब धर्म राष्ट्र भक्ति में बाधक बने तो उसे त्याग देना चाहिए। क्योंकि जो व्यक्ति अपने मातृभूमि से गद्दारी कर सकता है वह किसी भी धर्म या संस्कृति का पोषक नहीं हो सकता है।
आज पूरे विश्व में आगे बढ़ने की होड़ मची है। कोई मंगल पर तो कोई प्लूटो पर जाने की तैयारी कर रहा है पर एशिया धर्म संरक्षण में कट-मर रहा है। ऐसे धर्म की प्रासंगिकता क्या है जिसमें मानवता लेश मात्र भी न बची हो?
सनातन धर्म की एक प्रचलित सूक्ति है-
"हिंसायाम् दूरते यस्य सः सनातनः।"
आर्थात मन से,वचन से और कर्म से जो हिंसा से दूर है वही सनातन है। जो कर्म प्राणी मात्र को कष्ट दे वह हिंसा है। जो हिंसक है वह सनातनी नहीं है...मानव भी नहीं है। यह कथन सभी धर्मीं के अनुयायियों को समझना चाहिए।
क्या जो लोग ऐसे धार्मिक उन्माद पैदा करते हैं जिससे देश में आतंरिक कलह पैदा होता है उन्हें धार्मिक कहा जा सकता है? ये सत्ता लोलुप लोग हैं किसी भी धर्म से इनका कोई मतलब नहीं है।
न ये हिन्दू हैं न मुसलमान हैं कोई और ही धर्म है इनका। शैतान इन्हें ही कहते हैं शायद।
कुछ मुसलमान इस देश की सरकार से असंतुष्ट लोग पाकिस्तान के बरगलाने की वजह से वतन से ग़द्दारी कर पूरे इस्लाम को कठघरे में खड़ा करते हैं। पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने वाले लोग, देश से ग़द्दारी करने वाले लोग न तो मुसलमान हैं न हिंदुस्तानी।
गद्दारों की कोई कौम नहीं होती है। इस देश को धर्मों में बाँटने वाले लोग ये क्यों भूल जाते हैं जब कलाम साहब विदा लेते हैं वतन से तो पूरा देश रोता है। जब क़साब को,अफज़ल गुरु को और याक़ूब को फाँसी होती है तो देश में लड्डू बंटता है।
कोई भी इंसान वतन से ग़द्दारी करके महान नहीं बनता काफ़िर जरूर बन जाता है। ऐसी हरकतों से न ईश्वर खुश हो सकते हैं न ख़ुदा।
भारतीय दर्शन राष्ट्ररक्षा को ही धर्म मानता है। मंदिरों में कोई भी यज्ञ,हवन की पूर्णाहुति तब तक नहीं होती जब तक "भारत माता की जय" नहीं बोला जाता। देशभक्ति संसार के सभी धर्मों से श्रेष्ठ है। धर्म द्वितीयक हो तथा राष्ट्र प्राथमिक तो समझिये आप ईश्वर के सच्चे उपासक हैं।
आप हिन्दू, मुसलमान या इसाई हों पर  भारतीय होना न भूलें। देश से वफ़ादारी करने वालों पर हर मज़हब के खुद को फ़ख़्र होता है।आइये आप और हम मिलकर देश को मज़बूत बनायें,प्रगतिशील बनायें..विकसित बनायें। हम हिंदुस्तानी हैं। विश्व बंधुत्व का पाठ हम दुनिया को पढ़ाते हैं यदि हम सांप्रदायिक दंगे करेंगे, धार्मिक उन्मादी बनेंगे तो हमारे देश की साझा संस्कृति को कितना ठेस पहुंचेगा।इक़बाल साहब ने बहुत सही बात कही है-
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ
हमारा।।
हम सब एक हैं। एक ही माँ के बेटे हैं। क्या हुआ हमारे पूजा की पद्धतियाँ अलग हैं...हमारा देश तो एक है..हमारी माँ तो एक है।
संसार की प्राचीनतम् सभ्यता जब बर्बरता का ताण्डव देखेगी तो क्या उसका ह्रदय नहीं फटेगा?
आओ इस महान संस्कृति को क्षत्-विक्षत् होने से रोकें। इस देश की आत्मा को व्यथित न होने दें...आओ "वसुधैव-कुटुम्बकम्" की भावना को विकसित करें..हम सब मिलकर रहें...अपने राष्ट्र को एक आदर्श राष्ट्र बनायें जिससे पूरी दुनिया बोल पड़े-
"सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ तुम्हारा।"
जय हिन्द! वन्दे मातरम्।
-अभिषेक शुक्ल।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

यूँ अचानक पकड़ कर तुम हाथ मेरा, क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?



यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा
क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?
प्रेम है अवसाद का ही रूप
दूजा
वर्षों से ये तथ्य दुनिया कह
रही है,
क्या नहीं दिखती तुम्हे
अश्रु गंगा
आज मेरे आँखों से जो
बह रही है।
तुम विरह के वेदना की मुख्य कारक!
ह्रदय की एकांकी होगी
न तुमसे,
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा.....

आज भी भूला नहीं हूँ उस
तिथि को
विरह का एक ज्वार जब जीवित हुआ था,
शून्यमय इस विश्व में आकार
 लेकर
प्रेम का उद्गार मेरा मृत हुआ
हुआ था।
लोग कहते शाश्वत जिस
कल्पना को
आज उसका हो गया तक़रार मुझसे,
अहंकारित स्वरों का अट्टहास
उसका
सुन सहजता रूठ बैठी
 पुनः मुझसे
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा...

क्यों निराशा स्वयं में आशा जगाती
और मन आशान्वित हो
गुनगुनाता?
पर भला किसमें है
सामर्थ्य  ऐसा?
प्रेयसी से बिछुड़ कर जो मुस्कुराता?
मैं विरह से व्याप्त मन की
उपज हूँ,
और तुम परमात्मा की
श्रेष्ठ रचना
मैं बना अवधूत जग में
घूमता हूँ
तुमने सीखा ही कहाँ
निर्लज्ज रहना?
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा...

स्मरित करना कभी तुम उस मिलन को
जब मुझे भी स्वयं का आभास
न था
मैं अलग हूँ क्या प्रिये
तुमसे कभी?
तुम्हें अपने आप पर विश्वास
न था
वह मधुर संयोग जो तुम
भूल बैठी
अब नहीं करना मुझे स्वीकार
कुछ भी
मन तुम्हारे पाश् से मुक्त
है अब
है नहीं जीवन में मेरे प्यार
कुछ भी
और सुनना चाहती हो क्या
तुम मुझसे?
यूँ अचानक पकड़ कर तुम
हाथ मेरा
क्यों दिखाना चाहती हो प्यार फिर से?
                                                                          -अभिषेक शुक्ल

( इस चित्र को मेरी छोटी बहिन हिमानी ने बनाया है....मैंने कुछ दिन पहले सोचा था इस चित्र के लिए कोई कविता लिखूँगा पर लिख नहीं सका। कोई कविता इस योग्य लिख ही नहीं पाया जिसे इस चित्र के साथ पोस्ट कर सकूँ।
प्रेम का संयोग पक्ष तो मेरे लिए अनभिज्ञ है.....वियोग की ही तरह..पर वियोग लिखना तनिक आसान है...मैंने वियोग श्रृंगार लिखने की कोशिश की कुछ पल के लिए ये मत सोचियेगा कि ये प्रकृति और पुरुष हैं जो कभी पृथक ही नहीं होते..कुछ पल के लिए ये मानना है की ये चित्र किसी प्रेमी युगल के अतीत की ऐसी छवि है जिसका कोई वर्तमान या भविष्य नहीं है)



शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

समस्याओं के चक्रव्यूह में देश

भारत कलह,अराजकता और समस्याओं का देश है। भारत की दासता के पीछे भी यही कारण थे अन्यथा गोरों में इतनी ताकत नहीं थी जो भारतियों को गुलाम बना लेते। तब भी भारतीय जनता शोषित हो रही थी आज भी भारतीय जनता शोषित हो रही है अन्तर बस इतना सा है कि तब हमें विदेशी रुला रहे थे और आज रोने वाले भी भारतीय हैं और रुलाने वाले भी। तब हमारी आवाज ब्रिटिश हुक़ूमत गोलियों से, फाँसी से और कोडों से दबा देती थी और आज अगर जेब में पैसे न हों तो आवाज अपने आप दब जाती है बिना किसी बाह्य प्रयत्न के। आज हम भ्रष्टाचार के साए में जी रहे हैं और दुर्बल या सशक्त हम पैसों के हिसाब से होते हैं।
इन दिनों असुरक्षा की अजीब सी भावना मन में पनप रही है। हर पल यही लग रहा है कि कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए।ये डर केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है वरन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है।
विगत दो वर्षों में विज्ञान ने जितनी उन्नति की है उतना ही डर भी पैदा किया है। हथियारों को विश्व में अनाज की तरह ख़रीदा है। हमारे पडोसी राष्ट्रों ने तो हथियार ख़रीदने और आतंक मचाने को अपना राष्ट्रीय कार्यक्रम बना लिया है। इनके हथियार खरीदने का मकसद अपनी सुरक्षा नहीं भारत में नरसंहार करना है। पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंकी गतिविधियों के पीछे किसका हाथ है फिर भी संयुक्त राष्ट्र संघ को नहीं दिखता क्योंकि हमारे संसद को ही कुछ नहीं दिखता।जब हमारे लोग मारे जाते हैं तो हमें ही कोई फर्क नहीं पड़ता तो दुनिया को क्यों पड़े। हमारे देश में न सैनिकों के जान की कोई कीमत है न आम जनता के जान की।
किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र की संसद उस राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली और बुद्धिमान संस्था होती है। भारत में तो संसद तो कुछ अधिक ही सक्षम है।
दो सदन हैं राज्य सभा और लोक सभा। राज्य सभा को विद्वानों का गृह कहा जाता है क्योंकि राष्ट्र के विद्वान और अनुभवी राजनीतिज्ञों का जमावड़ा यहीं लगता है, विभिन्न क्षेत्रों से इसके सांसदों का चुनाव किया जाता है किन्तु यहाँ भी आज-कल एक सूत्रीय कार्यक्रम चल रह है संसद को ठप्प करने का। पता नहीं क्यों भारत में कोई भी पार्टी विपक्ष में जैसे ही जाती है कट्टर ईमानदार बन जाती है और सत्तारूढ़ सरकार का विरोध करना राष्ट्रीय धर्म।
ख़ैर बात चाहे राज्यसभा की हो या लोकसभा की हर जगह वामपंथियों का उत्पात है।
किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष का कार्य सरकार को दिशा निर्देश देना है, उन विषयों पर विरोध करना है जहाँ पर सरकार का काम गलत हो लेकिन भारत में तो उल्टा नियम चल रहा है। यहाँ बेहद संवेदनशील विषयों पर भी हंगामा किया जाता है। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा की हो या विकास की सरकार और विपक्ष की निरर्थक बहस चलती रहती है,  कोई आम सहमति नहीं बन  रही है।
भारत की कलहप्रिय राष्ट्र भी है।यहाँ का कलह प्रेम तो युगों-युगों से विख्यात है। त्रेता , द्वापर और अब कलियुग हर  युग में कलह का क्रमिक विकास हुआ है। घर से लेकर संसद हर जगह समान रूप से यह विद्यमान है। संसद में तो आज-कल अलग ही नजारा है। राजनीतिज्ञों की कलह जनता को खून के आँसू रुला रही है। जिस परिवार में कलह हो वह परिवार भ्रष्ट हो जाता है....किसी कवि ने कहा भी है-
"संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।"
कुछ ऐसी ही विषम परिस्थितियां हैं मेरे देश में। जब देश में इतना कलह है तो पडोसी राष्ट्र क्यों न हमें तबाह करने के लिए हाथ आजमाएं। तभी तो रोज घुसपैठ होती है। जब घर के दाम खोटे हों तो परखने वाले का क्या दोष?
रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं। नक्सलवाद की आग में देश जल रहा है। नक्सली देश की व्यवस्था या सरकार से रुष्ट लोग नहीं हैं बल्कि विदेशी शक्तियों से दुष्प्रेरित लोग हैं जिन्होंने देश को कुरुक्षेत्र बना दिया है।
मुद्दे और भी हैं, विपदाएँ और भी हैं, शिकायतें और भी हैं। भारतीय जनमानस व्यथित है। देश की दुर्दशा देखि नहीं जा रही है। देश के वीर सपूत मर रोज़ शहीद हो रहे हैं, आतंकवादी गाज़र-मूली की तरह इंसान काट रहे हैं। मुट्ठी भर की जनसँख्या वाला देश पाकिस्तान हमारे खिलाफ जहर उगल रहा है, दहाड़ रहा है, तेवर दिखा रहा है, धमकी दे रहा है। सरकार हर बार शहादत पर दो सांत्वना के बोल बोलकर चुप हो जाती है। आतंकवादी हमलों पर भी राजनीती की जाती है। झूठी संवेदनाओं का कुछ दिन दौर चलता है। कुछ घड़ियाली आंसू,कुछ वादे और कुछ सांत्वना के शब्द..हद है राजनीति की भी। केंद्र तो कई बार गंभीर दिखती है पर प्रदेश सरकारों के बयान तो समझ से परे होते हैं, कई बार विदूषकों के जैसे वक्तव्य आते हैं।
प्रदेश की व्यवस्था देख नहीं पाते केंद्र को कोसने पहले कूदते हैं। आम जनता  व्यथित है और ये सच है कि समस्याओं को सुलझाने वाला कोई नहीं है। नेता लूटने-खसोटने में व्यस्त हैं। विचित्र परिस्थितियों ने जन्म लिया है। मन बहुत दुखी है..हे ईश्वर! कुछ तो मार्ग बताओ। अब परिस्थिति नियंत्रण से बाहर हो रही है।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

मेरा यार है मेरा वतन...मेरा प्यार है मेरा वतन!


सारे रिश्ते नाते छोड़कर
सारे कसमें वादे तोड़कर,
हम सरहदों को चल दिए
सिर पे कफ़न इक ओढ़कर,
अब अलविदा! ऐ बेख़बर
किस बात का तुमको है डर?
जब यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!

बर्फीली राहों की डगर
माना कि है मुश्किल सफ़र,
तेरे इश्क़ का ऐसा असर
अब मौत से लगता न डर,
धुंधली हुई है ज़िन्दगी
पर दुश्मनों पे है नज़र,
मेरा यार है मेरा वतन!
तू प्यार है मेरा वतन!

आज़ादी की चाहत लिए
फाँसी का फन्दा चूमकर,
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्
गाते थे जो दिल झूमकर,
वे तो शहादत को चले
मिट्टी वतन की चूमकर,
उनकी शहादत को नमन!
शान-ए-वतन! शान-ए-वतन!

तेरे इश्क़ में क़ुर्बान हो
हम देंगे तुझको रौशनी,
हमको शहीदों की कसम
महफ़ूज़ होगी सरज़मीं,
ग़र हम सुपुर्द-ए-ख़ाक हों
या सरहदों पर राख हों,
रोना नहीं प्यारे वतन!
तुझसे है खुशियों का चमन!
मेरा यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!
                   -अभिषेक शुक्ल

बुधवार, 12 अगस्त 2015

ड्रामामय भारत

आजकल हर तरफ ड्रामा चल रहा है.....मेरे हॉस्टल से लेकर संसद तक।
ड्रामा,हंगामा या अभिनय जो भी हो...सारे कार्यक्रम बड़े दमघोंटू  लग रहे हैं।
कहीं नए भगवान् पैदा हो जा रहे हैं तो कहीं आदिशक्ति...कहीं अल्लाह के रक्षक अल्लाह के बंदों पर कहर बरसा रहे हैं, क़त्ल कर रहे हैं..तो कुछ ऐसे भी नेक बन्दे हैं जो ईश्वर को गाली दे रहे हैं।.किसी को हिंदुओं को मारने में मज़ा आ रहा है...तो कोई घरवापसी में मगन है।
आज भगवान् के घर में भगदड़ मची दर्ज़नो लोग भगवान् के पास ही पहुँच गए।
प्रधानमंत्री जी भाइयों एवं बहनो में व्यस्त हैं...तो विपक्षी पार्टी ने संसद को प्राइमरी पाठशाला बना दिया है...अंतर बस इतना सा है कि प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों से थप्पड़ कर उन्हें सभ्य बनाया जा सकता है लेकिन संसद वाले बच्चों पर कोई लगाम ही नहीं कसा जा सकता.....इन्हें हंगामे करने की मोटी तनख़्वाह दी जाती है...कमीशन भी...घूस भी....एक तो यूनिफार्म इनका ऐसा है कि जितने काले करतूत उतने साफ़ कपडे..।
वाद से भारत का तो रिश्ता पुराना है...जातिवाद, धर्मवाद, सम्प्रदायवाद,मार्क्सवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, अलगाववाद..बलात्कार वाद...हर वाद में भारत अव्वल है...हर विषय पर सीरियल, एपिसोड बन रहा है.....टी.वी. खोलिए चैनल बदलिये..और जी भर के कोसिये अपने आपको...कि आपको नींद नहीं आ रही है....मुझे पता है कि मैं बकवास कर रहा हूँ पर न करूँ तो frustrate होना तय है...कसम से देशव्यापी ड्रामे ने न मेरा सर खा लिया है.....इस बड़े लेवल वाले ड्रामे से मेरे हॉस्टल वाला ड्रामा ठीक है...कम से कम बोलने वाले को चुप तो कराया जा सकता है...टांग पकड़ कर बहार फेंका जा सकता है या सामने वाले पार्क में कुछ देर खुद से बात तो किया जा सकता है...इन संसद वालों का क्या करें......कोई idea हो तो बताओ भाई...इन्हें कैसे सुधारें.....देश के सारे नमूने संसद में हैं...खैर समस्या संसद में ही नहीं है.....संसद के बाहर भी हैं...हमारे आस-पास भी हैं...हम-तुम ही हैं..#बक़वासतुमभीकरो

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

याद आया मनभावन सावन

सावन लग गया है लेकिन पता नहीं चल रहा है।
आज गाँव की बहुत याद आ रही है। मेरे मन में
जो छोटा सा कवि बैठा है न वो इस महीने में
कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो जाता था गाँव
में। जब बारिश होती थी तो अक़्सर मैं भीगते
हुए निकल पड़ता था खेतों की ओर....बादलों
से बात करने। मेरे खेत के आस-पास खूब सारे
तालाब हैं। बारिश में तालाब की सुंदरता कुछ
अधिक ही बढ़ जाती है...हरी-भरी धरती और
सुन्दर सा गगन...इसी ख़ूबसूरती को टटोलने मैं
घर से निकलता था..कभी अकेले तो कभी दो-
चार छोटे बच्चों के साथ...हाँ बच्चों के साथ
घूमना मुझे बेहद पसंद है..सावन जितना ही...।
पुरवाई हवा...काले बादल...खूबसूरत मौसम
भला किसे न अपनी ओर खींच ले....पर याद
सिर्फ इसीलिए नहीं आई है...
सावन भर गाँवों में गली-गली में आल्हा और
कजरी गाया जाता है। कजरी महिलाएं
गाती हैं और पुरुष लोग आल्हा। मुझे दोनों बहुत
पसंद है। शाम को जब भी कोई काकी या
भौजी, अम्मा(दादी) से मिलने आतीं तो मैं
उनसे कजरी ज़रूर सुनता...एक हैं पड़राही
भौजी...दादी के उम्र की हैं पर भौजी लगती
हैं...मज़ाक भी खूब करती है...उनके गाने का तो
मैं फैन हूँ। कजरी ऐसे गाती हैं जैसे आशा ताई
गा रही हों।
सावन व्यर्थ है अगर आल्हा न सुना
जाए.आल्हा सुनाते हैं बेलन भाई....वीर रस का
क्या अद्भुत गान है आल्हा। बेलन भाई का
अंदाज़ भी निराला है जब आल्हा सुनाते हैं
तो खुद ही सारे चरित्र निभाने लगते हैं..सावन
भर बेलन भाई रात को आल्हा सुनाते..एक
लड़ाई ख़त्म होती की दुसरे की ज़िद
करता..10 बजे से कार्यक्रम 12 बजे रात तक
चलता..गाँवों में इतनी रात तक कोई नहीं
जगता..पर मैं, पापा, मम्मी और अम्मा
श्रोता मण्डली में थे..बेलन भइया भी पूरे मन से
सुनाते..जब थक जाते तो कहते- "बाबू अब नहीं
होस् परत थै, भुलाय गय हन, बिहान पढ़ि के
आइब तब सुन्यो।"
रात के एक बजे घर पहुँचते थे भइया भौजी तो
उन्हें बेलन से ही पीटती रही होंगी..पर बताते
नहीं थे...कहते बाऊ तोहार भौजी लक्ष्मी
हिन्...
मैं भी कहता हाँ भइया..सही कहत हौ।
आल्हा और ऊदल का रण कौशल इतना अद्भुत
था जैसे साक्षात् शिव ताण्डव कर रहे हों...
एक पंक्ति है-
"खींच तमाचा जेके हुमकैं निहुरल डेढ़ मील ले
जाय"
आज ऐसे भारतीय होने लगें तो चीन को हम
अंतरिक्ष में फेंक देते।
जीवन का वास्तविक सुख गाँव में ही है...मेरे
मन में बसा छोटा सा साहित्यकार अक्सर
अपना गाँव खोजता है.....मन तो उसका वहीं
रमता है।
करीब चार साल हो गए सावन घर पर बिताए
हुए...मेरठ में तो किसी मौसम का पता ही
नहीं चलता...हमेशा पतझड़ का एहसास होता
है...पता नहीं क्यों...
न यहाँ झूले दिखते हैं न हरे-भरे खेत..न धान की
रोपाई करते लोग गीत गाते हैं...न ही मिट्टी
में वो सोंधी सी खुशबू है जो मेरे गाँव में
है।....आज फिर मन कह रहा है चलो कुछ दिन
रहते हैं गाँव में...घुमते हैं खेतों में..भीगते हैं
बारिश में...बन जाते हैं एक छोटा सा
बच्चा..बच्चों की टोलियों में...शहर के
बनावटीपन से दूर...चलो बिताते हैं कुछ
पल...अपने साथ....अपनों के साथ.....।