शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

कश्मीर की समस्या

कश्मीर में इन दिनों जो हो रहा है उसे देखकर
संदेह होता है कि हमारा देश वास्तव में एक
सम्प्रभु राष्ट्र है अथवा टुकड़ों में बाटे भू-
भागके अतिरिक्त और कुछ नहीं जहाँ
सियासत के नाम पर देश तक की सौदेबाज़ी
होती है।कभी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर
का नासूरजो हमारे समर्थ होने के कल्पित
आभास पर एक काला धब्बा है असीम कष्ट
देता है तोकभी जम्मू और कश्मीर के
नागरिकों का पाकिस्तान प्रेम जो हमें
भीतर से खोखलाकरता है । पाकिस्तान
वर्षों से अपनी आतंकी और कुटिल छवि को
बरक़रार रखे हुए है। अक्सर अपने कुटिलता का
सबूत भी देता है। बात चाहे१९६५ की हो या
१९७१ और १९९९ के कारगिल युद्ध की हो
पाकिस्तान ने अपनी सधी-सधाई फितरत को
हर बार अंजाम दिया है।बेशर्म इतना है कि
तीन बार करारी हार के बाद भी लड़ने का
एक मौका नहीं छोड़ना चाहता। कश्मीर का
भारत में विलय होना पाकिस्तान की नजरों
में हमेशा खटकता है कि कैसे एक मुस्लिम
बाहुल्य प्रांत एक हिन्दू बाहुल्य राष्ट्र का
हिस्सा हो सकता है?कौनसमझाए इन
पाकिस्तानियों को राष्ट्र धर्म से नहीं
सद्भावना से से बनता है। ये तो पाकिस्तान
की बात हुई अब भारत की बात करते हैं। ऐसा
क्या है जो आजादी के छः दशक बाद भी
'जम्मू और कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में
अस्थायी उपबन्ध' अनुच्छेद ३७० आज तक हट न
सका या संशोधित न हो सका?एक राष्ट्र
और ''दो संविधान" सुनकर कितना बुरा
लगताहै न? अधिकतर 'एक्ट' जो भारत सरकार
पास करती है वे जम्मू और कश्मीर में शून्य होते
हैं। आप कुछ महत्वपूर्ण एक्ट्स के सेक्शन पढ़ सकते हैं
उनमे अधिकतर जम्मू और कश्मीर में अप्रभावी
होने की बात कही गयी है। उदहारण के लिए
"भारतीय दण्ड संहिता" के धारा 1 को देखते
हैं- संहिता का नाम और उसके प्रवर्तन का
विस्तार- यह अधिनियम भारतीय
दण्डसंहिता कहलायेगा और इसका विस्तार
जम्मू- कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत
पर होगा। भारत के सबसे बड़े और प्रभावी एक्ट
का ये हाल है तो सामान्य एक्ट्स की बातही
क्या की जाए। यह कैसी संप्रभुता है भारत देश
की? किसी राज्य को विशेष दर्जा कब तक
दिया जाना उचित है? जवाब निःसंदेह यही
होगा कि जब तक वो प्रदेश सक्षम न हो
जाए। अब किस तरह की सक्षमता का इंतज़ार
देश को है? एक देश और दो संविधान क्यों है?
कहीं न कहीं यह हमारे तंत्र की विफलता है
कि हम अपनों को अपना न बना सके। कश्मीर
के निवासियों से पूछा जाए कि आपकी
राष्ट्रीयता क्या है तो अधिकांश लोगों
का जवाब होगा 'कश्मीरी'। अपने आपको
भारतीय कहना शायद उनके मज़हब और मकसद
की तौहीन होती है। हमारे देश के नागरिक
होकर उनका पाकिस्तान प्रेम अक्सर छलक
पड़ता है ख़ास तौर से जब कोई पाकिस्तानी
नेता भारत आये या भारत और पाकिस्तान
का क्रिकेट मैच चल रहा हो, कश्मीरी
नौजवानों को पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे लगाने का मौका मिल जाता चाहे वो
कश्मीर में हों या दिल्ली एअरपोर्ट पर या
मेरठ के सुभारती विश्वविद्यालय में।
कश्मीरियों का लगाव पाकिस्तान से कुछ
ज्यादा ही है क्योंकि अराजकता और
जिहाद का ठेका पाकिस्तान बड़े मनोयोग
से पूरा करता है संयोग से अलगाव वादियों
को पाकिस्तान भरपूर समर्थन भी दे रहा है
और ज़िहाद के नाम पर मुस्लिम युवकों को
गुमराह भी कर रहा है।७० हूरों के लिए ७००
लोगों को बेरहमी से मारना केवल यहीं
जायज हो सकता है।अलगाव वादियों की
ऑंखें पाकिस्तान केआतंरिक मसलों को देख कर
नहीं खुलतीं; राजनीतिक अस्थिरता, गृह युद्ध
कीस्थिति, आतंकवाद और भुखमरी के अलावा
पाकिस्तान में है क्या? एक अलग राष्ट्र की
संकल्पना करने वाले लोग गिनती के हैं पर
उनकेसमर्थन में खड़ी जनता को भारत का प्रेम
नहीं दिखता या आतंकवाद की पट्टी आँखों
को कुछ सूझने नहीं देती। कश्मीर के कुछ
कद्दवार नेता हैं जिनके बयान अभिव्यक्ति के
नाम पर छुब्ध करते हैं।अनुच्छेद ३७० विलोपन के
सम्बन्ध में बहस पर उनकी दो टूक प्रतिक्रिया
होती है कि यदि ऐसा होता है तो 'कश्मीर
भारत का हिस्सा नहीं होगा' ऐसी
प्रतिक्रिया आती है, भारतीय संप्रभुता पर
इससे बढ़कर और तमाचा क्या होगा? केंद्र
सरकार कब तक विश्व समुदाय के भय से अपने
ही हिस्से को अपना नहीं कहेगी? अनुच्छेद
३७० को कब तक हम "कुकर्मो की थाती की
तरह ढोएंगे? एक भूल जो नेहरू जी ने की थी कि
अपने देश की समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले
गए और दूसरी भूल हमारी सरकारें कर रही हैं
जो कल के भूल को आज तक सुधार नहीं पायी
। हमारे आतंरिक मसले में भला तीसरे संगठन का
क्या काम? भारत सरकार जम्मू-कश्मीर की
सुरक्षा के लिए अरबों पैसे खर्च करती है पर बदले
में क्या मिलता है, सैनिकों की नृषंस हत्या?
जनता का दुत्कार और उपेक्षा? सुनकर हृदय
फटता है कि सैनिकों की हत्या के पीछे सबसे
बड़ा हाथ वहां की जनता का है। जो उनकी
हिफाज़त के लिए अपनों से दूर मौत के साए में
दिन-रात खड़ा है उसे ही मौत के सुपुर्द कर
दिया जाता है। क्या हमारे जवानों के
शहादत का कोई मतलब ही नहीं? कब तक
हमारे सैनिकों का सर कटा जाएगा? कब तक
भारतीय नारी वैधव्य की पीड़ा झेलेगी
सियासत की वजह से? कम से कम शहादत पर
सियासत तो न हो। हमेशा देश के विरुद्ध
आचरण करने वाली जम्मू-कश्मीर की प्रदेश
सरकार जो कुछ दिन पहले तक सत्ता में थी जब
महाप्रलय आया तो हाथ खड़े कर दिया और
केंद्र सरकार से मदद मांगी। सेना ने अपने जान
पर खेल कर कश्मीरियों की जान बचाई पर
सुरक्षित होने पर प्रतिक्रिया क्या मिली?
सैनिकों पर पत्थर फेंके गए, जान बचाने का
प्रतिफल इतना भयंकर? कभी-कभी
कश्मीरियों की पाकिस्तान-परस्ती देख कर
ऐसा लगता है कि ये हमारे देश के हैं ही नहीं,
फिर हम क्यों इनके लिए अपने देश के जाँबाज़
सैनिको की बलि देते हैं? एक तरफ पाकिस्तान
का छद्म युद्ध तो दूसरी तरफ अपनों का
सौतेला व्यवहार आम जनता को कष्ट नहीं
होगा तो और क्या होगा? अनुच्छेद ३७० का
पुर्नवलोकन नितांत आवश्यक है और विलोपन
भी अन्यथा पडोसी मुल्क बरगला कर
कश्मीरियों से कुछ भी करा सकता है
अप्रत्याशित और बर्बरता के सीमा से परे। एक
तरफ हमारा पडोसी मुल्क चीन है जो
सदियों से स्वतंत्र राष्ट्र "तिब्बत" को अपना
हिस्सा बता जबरन अधिकार करता है तो
दूसरी ओर हम हैं जो अपने अभिन्न हिस्से पर
कब्ज़ा करने में काँप रहे हैं। यह कैसी कायरता है
जो इतने आज़ाद होने के बाद भी नहीं मिटी।
दशकों बाद भारत में बहुमत की सरकार बनी
है,वर्षों बाद कोई सिंह गर्जना करने वाला
व्यक्ति प्रधान मंत्री बना है तो क्यों न
जनता के वर्षों पुराने जख़्म पर मरहम लगाया
जाए कौन सी ऐसी ताकत है जो भारत के
विजय अभियान में रोड़ा अटका सके?
आज़ादी के इतने वर्षों बाद कोई तो
निर्णायक फैसला होना चाहिए, सैनिकों के
शहादत का कोई प्रतिफल आना चाहिए।
भारतियों को बस एक ही बात खटकती है कि
देश एक है, संप्रभुताएक है, राष्ट्रपति और
प्रधानमंत्री एक हैं पर संविधान अलग-अलग
क्यों है? एक देश में दो संविधान क्यों है?

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

किसान का दर्द


किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। एक किसान दिन-रात एक करके अन्न उपजाता है जिससे देश वासियों को दो वक्त की रोटी मिलती है। उद्योग-धंधों से जेब भर सकती है पेट नही, पेट भरने के लिए खेत चाहिए जिसे सुरक्षित रखना सरकार का दायित्व है किन्तु सरकार तो भूमि अधिग्रहण कानून के प्रवर्तन में व्यस्त है।
 देश में जब भी चुनाव का मौसम आता है तो किसानो को बारिश से ज्यादा आस सरकार से होती है पर सरकार तो अपने फायदे के लिए काम करती है चाहे वो राज्य सरकार हो अथवा केंद्र सरकार हो। किसानों के हिस्से में हमेशा कर्ज़ आता है जिसे चुकाने के चक्कर में किसान कभी जमीन बेचता है तो कभी ज़मीर।
बैंक उद्योगपतियों को करोड़ों रुपयों के लोन पास कर देता है और वसूली के लिए कोई जल्दी भी नहीं करता पर किसान सही समय पर पैसे न दें तो उनकी जमीन की कुर्की या निलामी करने पहले पहुँच जाता है। एक किसान जब लोन लेने जाता है तो उसके नाम लोन तब तक पास नहीं होता जब तक कि बैंक वाले अपना हिस्सा न वसूल लें।

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एक लाख रुपयों का लोन है तो पच्चीस हज़ार तो बैंक वाले घूस खा जाते हैं। एक किसान हर जगह शोषित होता है। उसके लिए उसके शोषित होने की वजह किसान होना नहीं है अपितु गरीब होना है। भारत में समता कहीं नहीं है। गरीबी उन्मूलन के दावे करके पार्टियां वोट बटोरती हैं और जैसे ही सत्ता में आती हैं सरकार अमीरों की हो जाती है। भारतीय जनता हर बार छली गई है। अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन कब गले पड़ते हैं पता ही नहीं चलता।
पिछले कुछ सप्ताह से उत्तर भारत में बारिश के कहर ने भूमि अधिग्रहण बिल से किसानों का ध्यान भटका दिया है। बारिश और बिल के कशमकश में तड़पता किसान इतना व्यथित है कि किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है। बिन मौसम बरसात ने फसलें चौपट कर दी हैं। गेहूं की फसल एक बार के बारिश से बर्बाद हो जाती है खासतौर से जब फसल पक गयी हो तो फसल बर्बाद होने का खतरा और बढ़ जाता है। दुर्भाग्य से बारिश ने अपना काम कर दिया है और सरकार भी काम के समापन के दिशा की ओर उन्मुख है।
सरकार खुद को किसानो का मसीहा भले ही कह रही हो पर किसानो के मन में सरकार की अलग ही छवि बन रही है। भारत में विकास के लिए सरकार यदि भूमि अधिग्रहण बिल की जगह किसान सुधार बिल लाती तो तो देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होती और विकास के नए आयाम भी पैदा होते।
पिछले कुछ वर्षों से किसान कृषि कार्यों  की जगह आत्महत्या कर रहे हैं। वहज भी है। कृषि के लिए लोन लेना और फिर वापस न कर पाना, कभी अति वृष्टि तो कभी अना वृष्टि, कभी सूखा तो कभी बाढ़, सीमित संसाधन और अपेक्षाएं दर्जन भर, एक किसान कितना दर्द झेलता है और इस दर्द की दवा के लिए जब सरकार से उम्मीद करता है तो उस पर थोप दिया जाता है कोई न कोई नया बिल। 
सरकार क्यों नहीं समझती की बिल से ज्यादा जरूरी है बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ती। कृषि योग्य जमीनों पर सिंचाई की उचित व्यवस्था हो, खाद, बिजली की व्यवस्था हो, कृषि हेतु लिए गए ऋण में ब्याज़ की दरें कम हों तथा फसलों के विक्रय के लिए उचित बाजार हो। सरकार यदि बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराये तो उद्योगपतियों से कम कर किसान नहीं देंगे। आज भी भारत की सबसे ईमानदार कौम किसान ही है। सरकार किसानों के विकास के लिए कुछ नहीं कर रही है लेकिन भूमि अधिग्रहण बिल पर उनका समर्थन और सहमति दोनों चाहती है। यह कैसा न्याय है?
किसान के लिए खेत कमाऊ पूत होता है पर इस पूत पर हज़ार भूत चढ़े रहते हैं। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी आंधी कभी पानी और कभी जंगली जानवरों का प्रकोप। एक अनार और सौ बीमार वाली दशा होती है किसान की, फिर भी सरकार का मन पसीज नहीं रहा, किसान के कलेजे के टुकड़े को बिना छीने चैन कहाँ मिलेगा?
पिछले एक दशक से किसानों की संख्या तेजी से घट रही है। वजह भी है। लगातार घाटे सहना मुश्किल काम है और किसान तो वर्षों से घाटे ही खा रहा है। सारे व्यवसाय सफल हैं पर कृषि व्यवसाय निरंतर घाटे में है ऐसी दशा में किसानों की कृषि के प्रति उदासीनता प्रत्याशा से परे नहीं है।
 एक किसान अपने बच्चों को कभी किसान नहीं बनाना चाहता क्योंकि उसे पता है इस क्षेत्र में नुकसान ही नुकसान है। सरकार कृषि योग्य भूमि को भी आवासीय भूमि करार देकर कब छीन ले पता नहीं। इसलिए कैसे भी करके कामयाब बन जाओ चाहे ज़मीन बिके या ज़मीर, पर कामयाबी मिलनी चाहिए। किसानी तो नाकामयाबी का दूसरा नाम है।
कभी ऐसा कहा जाता था कि किसान कभी बेरोजगार नहीं हो सकता पर आज ये रोजगारी सांत्वना लगती है। कृषकों के पास कोई विकल्प नहीं है कृषि के अलावा, अन्यथा खेती से तो अब तक सन्यास ले चुके होते। सरकार किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है, लेकिन इस दिशा में कोई काम सरकार को नहीं करना क्योंकि ये तो उद्योगपतियों की सरकार है।

कहने के लिए तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, ग्रामीण भण्डारण योजना जैसे अनेक उपक्रम हैं पर दुर्भाग्य से ये योजना बनकर ही रह गए। सूचनाओं पर गौर करें तो इन योजनाओं से लाभान्वित होने वाले किसान गिनती के हैं। इस सरकार से अच्छे दिनों की उम्मीद थी पर अच्छे दिन तो कहीं गायब हो गए हैं।
जब कोई कृषक किसान क्रेडिट कार्ड बनवाता है ऋण लेकर खेती करने के लिए तो डर लगता है; कहीं ऋण चुकाने के लिए जमीन न बेचनी पड़े क्योंकि मैंने अपने आस-पास यही देखा है। पहले किसान ऋण लेता है इस उम्मीद में कि वो ऋण खेती से ही चुका देगा पर खेती तो हर बार दगा देती है, समय बीतता जाता है और ब्याज बढ़ता जाता है फिर इसकी कीमत किसान को अपनी जमीन बेच कर चुकानी पड़ती है या परिवार सहित ख़ुदकुशी करके। मेरे देश के अन्नदाता की यही व्यथा है की परोपकार में सारा जीवन बिता देते हैं पर उनके जीवन के सुरक्षा की चिंता किसी को भी नहीं होती।
किसान आज भी परम्परागत खेती में विश्वास करते हैं। नए प्रयोग से डरते हैं क्योंकि न तो उनकी मदद के लिए कोई कृषि विशेषज्ञ आगे आते हैं न किसान मित्र जैसी कोई संस्था। पुराने ढर्रे को छोड़कर किसान जब तक नई पद्धतियों की ओर  ध्यान नहीं देंगे तब तक उनके अच्छे दिन नहीं आने वाले। पर नई तकनीक किसानों तक तब पहुंचेगी जब उन्हें इसके बारे में बताया जायेगा। जब सरकार किसानों की समस्याओं पर ध्यान देगी। बैंक सस्ते ब्याज़ पर लोन देंगे और लोन चुकाने के लिए पर्याप्त समय भी। एक सीमा तक के लिए शून्य ब्याज़ दर पर लोन किसानों को मिलनी चाहिए तभी किसान देश के विकास में सक्रिय भागीदारी निभा सकते हैं।
भारत में फसल बीमा से लगभग सारे किसान अनभिज्ञ हैं। इसी तरह पशु बीमा से भी। बीमा कंपनियों को चाहिए कि जनता को इस विषय से अवगत कराएं कि अब फसलों की भी बीमा होती है। किसी प्राकृतिक प्रकोप की दशा में भी बीमा कंपनी किसानो की सच्ची हितैषी बन उनके साथ खड़ी हैं। इससे किसानों का मनोबल बढ़ेगा और वे बेहतर विधि से खेती करने के लिए तत्पर रहेंगे।
किसानों की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को प्रयत्न करना चाहिए तथा कृषि की बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए आगे आना चाहिए तभी किसान सुरक्षित रहेंगे और देश में अनाज आपूर्ति संभव हो सकेगा। देश तभी विकसित होगा जब किसान विकसित होंगे। 
केंद्र सरकार को ये आभास क्यों नहीं हो रहा है कि देश को भूमि अधिग्रहण बिल की नहीं किसान सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
भारत आज भी गाँव में बसता है।
और गाँव में किसान बसते हैं जो भारत की शान हैं, अन्नदाता हैं यदि जमीन नहीं रहेगी तो अनाज कहाँ से आएगा? 
इतने जुल्म हम पर न करो सरकार! जीने का हक़ हमें भी है। देश के भाग्यविधाता हम भी हैं, 
हमारी जमीन छीनी गयी तो हम मर जाएंगे, हमें जीने दो,
हमारी जमीन मत छीनो।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

प्रकृति के रंग

प्रकृति! तुझमें कितने रंग है,कितने जीवित
दृश्यों का संकलन है तेरा स्वरूप? कितनी
विविधता है तुझमें,कितना नैसर्गिक आनंद है
तेरा दर्शक बनने में।

कौन सी कूची है तेरे पास ? कहाँ से लाती है तू
इतने रंग जिन्हें गिना नहीं जा सकता....कोई
चित्रकार क्या तुझे बनाएगा.....तेरा
चित्रकार तो बैठा है किसी पर्वत पर, किसी
नाग की शैय्या पर, किसी कमल पर...जिसने
तुझे रच तो दिया....सजीव तो किया पर छिप
गया कहीं।
पर कहाँ तक बचता? उस कलाकार ने मानव
बनाया और मानव ने ढूंढ लिया अपने रचयिता
को,अभिव्यक्त किया अपनी कृतज्ञता कभी
शब्दों से तो कभी विराट कैनवास पर तो
कभी रंगमंच पर।
सोचता हूँ कि मैं चित्रकार क्यों नहीं हूँ?
क्यों नहीं उकेर पाता मैं छवि उन
कलाकृतियों की जिन पर प्रकृति मौन रही,
जो दृश्य छिपे रहे चित्रकारों से। मन कहता है
कि कूची उठा लूँ, खोज लूँ कोई कैनवास
विशालतम प्रकृति में।
मैं चित्रकार कभी नहीं था, मेरी
रचनात्मकता बस शब्दों तक सीमित रही
किन्तु शब्द तो स्वाभाव से ही अपूर्ण हैं। कभी
व्याकरण की तो कभी शिष्टाचार की
सीमाओं में जकड़े हुए; हलंत, प्रत्यय, उपसर्ग,
अलंकार और न जाने कितने अनिवार्य नियमों
के पालन करने को बाध्य, आडम्बरों की
दासता में तड़पते शब्द।
विधाता के कृत्या (यह कृत्य से पृथक है) को
कौन अभिव्यक्त कर सकता है चित्रकार के
अतिरिक्त? शब्द शिल्पी असहाय है इस दशा
में।
अभिव्यक्ति के लिए शब्द पर्याप्त नहीं होते,
शब्द सीमित हैं क्योंकि इन्हें मानव ने बनाया
है अपनी सूझ-बूझ से,
किन्तु कला सम्पूर्ण है, कला ईश्वर है।
प्रकृति के वे दृश्य जिन्हें शब्द जानते ही नहीं,
क्या वर्णित करेंगे?
किसी पर्वत पर कोई अभिसारिका बैठी हो
किसी किसी कल्पना में गुमसुम सी, किसी
महर्षि की ब्रम्ह से मौन वार्तालाप जहाँ न
शब्दों की आवश्यकता हो न ही अभिव्यक्ति
की, किसी माँ का वात्सल्य, या गंगा की
अविरल धरा क्या शब्दों से व्यक्त हो सकी है
कभी?
कौन शब्द शिल्पी है जो शब्दों में संवेदना भर
दे?
शब्दों की एक सीमा है न?
किन्तु
चित्रकार एक कूची उठाता है और मानवीय
कल्पना से परे शिवत्व की ऐसी छवि बनाता है
जिसे मानव पूजता है। पत्थरों को काटकर
उसमे संवेदना भरता है, निर्जीव को सजीव
बनाता है। कभी-कभी अखरता है कि मैं,
चित्रकार क्यों नहीं? कलम छोड़ कुछ सूझता
ही नहीं, न कोई दृश्य न अभिसारिका न
अभिनय, न शाश्वत कला...शब्द अपूर्ण हैं न?

मंगलवार, 31 मार्च 2015

ये कैसा धंधा है?

आज इंसान भले ही चाँद पर पहुँच चुका हो, आधुनिकता और विज्ञान अपने चरम सीमा पर हों पर इंसान के लिए भविष्य आज भी एक अनजान पहेली की तरह है ऐसी पहेली जो सुलझती नहीं। हर कोई भविष्य जानना चाहता है, अपने आने वाले कल में जाना चाहता है। भविष्य एक रहस्य है जो बहुत आकषर्क होता है। प्रायः लोग भविष्य जानने का प्रयत्न भी करते हैं बस कोई एक भविष्यवक्ता दिख जाए लोग पहुँच जाते हैं भविष्यवक्ता के चरणों में मानो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड का विपद इनके हाथों ही लिखा हो। भाविष्यवक्ताओं का आत्मविश्वास अनुकरणीय होता है। बोलते ऐसे हैं जैसे कि विधाता अपने सारे काम इन्ही से पूछ कर करते हों। झूठ की भी हद होती है पर ये लोग उनमे से हैं जो हदों को मानते ही नहीं। यह कहना सर्वथा अनुचित होगा कि इस यह विधा झूठी है, इसके अधिष्ठाता लोग झूठे हैं जो अपनी रोटी सेंकने के लिए दूसरों के भावनाओं से खेलते हैं। निःसंदेह ज्योतिष विद्या  बड़ी चमत्कारिक विधा है। विद्वानों  के बातों का प्रभाव कई बार जीवन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनके द्वारा निर्देशित कर्म एक व्यथित व्यक्ति को शांति भी पहुँचाते हैं। विडम्बना इस बात की है कि भारत में हर दूसरा व्यक्ति अपने आपको विद्वान समझता है। कुछ ऐसे ही विद्वान व्यक्ति अपने जैसा एक और विद्वान बना देते हैं। बात विद्वता तक रहे तो ठीक है पर जब नए विद्वान को ज्ञान मिलता है अनर्थ तब शुरू होता है। ज्योतिष विद्या विशुद्ध गणित और आस्था का विषय है।किन्तु जब आस्था धंधा होने लगे तब? भारत में आस्था भी धंधा का विषय है अन्यथा धर्म का कारोबार इतनी फलता-फूलता नहीं। व्यथित कौन नहीं है? जब विपदा चारो तरफ से पड़ती है, जब व्यक्ति हारने लगता है तब उसे भगवान् याद आते हैं। कुछ अपवाद भी हैं जिन्हें हर परिस्थिति में भगवान् अभीष्ठ हैं, किन्तु ऐसे लोग गिनती के हैं। हमारे धर्मग्रन्थ कहते हैं कि भगवान् कण-कण में हैं। भगवान् सर्वव्यापी हैं, सबकी सुनते हैं फिर भगवान  को सुनाने के लिए माध्यम की आवश्यकता क्यों? भक्ति का दलाली से कैसा रिश्ता? भक्तों की बात भगवान् तक पहुँचाने वालों की कोई कमी नहीं है। थोडा पैसा और थोडा यश मिलते ही भगवान और भाग्य के प्रतिनिधि टेलीविज़न पर आने लगते हैं। सुबह-शाम बाबा जी का दरबार सजने लगता है। इनके भक्तों की लंबी कतारें लगने लगतीं हैं। बाबा कहते हैं-बेटा ये कर वो कर, यहां जा-वहां जा। ऐसे बाबाओं की प्रसिद्धि सीमा पार भी जाती है। कलियुग में भक्त कम और अंधभक्त ज्यादा हैं। इन भगवान के प्रतिनिधियों को कई बार कारागार  की सैर भी करनी पड़ती है अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण, पर शीघ्र ही मुक्त कर दिए जाते हैं । भाई! इनकी पहुँच तो विधाता तक होती है। हाँ, कुछ ऐसे भी हैं जो खानदान सहित कारागार में हैं। असल में वे उनमे से हैं जो भक्ति की उस अवस्था में हैं जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। भक्त स्वयं को भगवान  समझ बैठता है और भगवान स्वयं को भक्त। खैर उनकी भक्ति ही निराली है। भगवान् के प्रतिनिधियों का धंधा कभी मंद नहीं होता है। साल के बारह महीने इनकी चांदी रहती है। दुःख के हिसाब से दाम लगाये जाते हैं । जितना दुःख उतना दाम। कभी राहु रूठते हैं तो कभी केतु। इनके शांति के लिए व्यक्ति ज्योतिषियों, भगप्रतिनिधियों(जैसे जनता के प्रतिनिधि जनप्रतिनिधि वैसे भगवान के प्रतिनिधि भग प्रतिनिधि) का सहारा लेता है पर परिणाम शून्य का शून्य रहता है। किसी से दस हज़ार तो किसी से बीस हज़ार, भगवान  के दाम  भी यजमान देखकर लगाये जाते हैं। ग्रहों का रूठना-मानना समय का चक्र न होकर सौदा हो गया है। ग्रह भी घूस खाते हैं। देखो भारत से भ्रष्टाचार कहाँ तक पहुँच गया। ठेकेदारों ने सलाह देने के भी दाम लगा रखे हैं। पांच सौ रुपये मे बाबा जी बस दस मिनट सलाह देंगे। ग्रह शांति तो बिना पाँच हज़ार बाबा जी को अर्पित किये बिना होते ही नहीं, पाँच हज़ार तो शुरुआत के होते हैं बाद में तो बढ़ते रहते हैं बाबा जी के निर्देशानुसार। आम आदमी की जेब से इतने पैसे निकल जाएँ तो अपने-आप ही ग्रह शांत हो जाते हैं। आज-कल आस्था विज्ञापन की विषय-वस्तु हो गयी है। कई टी.वी चैनलों पर एक चुड़ैल जैसी अम्मा आती हैं। बड़ी हाई-फाई व्यवस्था है उनकी। समाधान फ़ोन पर ही कर देती हैं और अपने किताब के लिए मोटा पैसा वसूलती हैं। अगर आप मुफ़्त वाले चैनल पर कोई फ़िल्म पूरे मनोयोग से देख रहें हों और इनका विज्ञापन अचानक से आ जाए तो इन्हें डंडे मारने का मन करेगा। एक मोटा तगड़ा बाबा भी विज्ञापन में दिखते हैं। दुनिया के पहले और आखिरी व्यक्ति हैं जो दुनिया के सभी समस्याओं का विनाश एक ही पन्ने में कर देते हैं। पूरी किताब पढ़ते-पढ़ते तो आदमी सफलता का पर्याय बन जाता है इनके दावे के अनुसार। बहुत दुःख होता है हम भारतीयों की बुद्धि घास चरने क्यों चली जाती है? असफल होने का कारण खोजने के बजाय पाखंडियों के चंगुल में फंसते हैं और अंततः भगवान् की सत्ता पर ही प्रश्न उठाते हैं। हद है इंसानी फितरत भी बिन ठोकर खाए आँख नहीं खुलती।

रविवार, 29 मार्च 2015

कवी! तू याद किसे करता है?


जब-जब ये आँखें खुलतीं हैं
किरणों से नज़रें मिलती हैं,
दिल हौले से ये कहता है
कवि! तू याद किसे करता है?

गुरुवार, 26 मार्च 2015

समान नागरिक संहिता: राष्ट्र की आवश्यकता

समान सिविल संहिता : राष्ट्र की आवश्यकता
एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उस राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता होती है। धर्मनिरपेक्षता राज्य की ऐसी व्यवस्था का  नाम है जिसमें राज्य किसी धर्म विशेष का अनुयायी नहीं होता अपितु सभी धर्मों का संरक्षक होता है। धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों को एकता के सूत्र में पिरोती है।
धर्मनिरपेक्ष संविधान की यही विशेषता होती है कि राज्य किसी भी धर्म का प्रवर्तक नहीं होता तथा राज्य किसी भी तरह का धार्मिक, सांप्रदायिक या जातीय पक्षपात नहीं करता।
संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र की धार्मिक विविधता देखते हुए ही संविधान के भाग चार में राज्य के निति निर्देशक तत्वों में एक अनिवार्य तत्त्व 'सामान सिविल संहिता' (अनुच्छेद 44)का प्रावधान रखा।
इस अनुच्छेद के अनुसार-" राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक सामान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।"
किन्तु कुछ मूलभूत विडंबनाओं के कारण 'राज्य के निति निर्देशक तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्त्व के प्रवर्तनीय होने का प्रयास महज एक स्वप्न बन कर रह गया।
सामान नागरिक संहिता, विधि के समक्ष समता की बात करता है जो अनुच्छेद चौदह में वर्णित है।
इस अनुच्छेद के अनुसार- "राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के सामान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।"
यह अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों में से एक है। समता का अधिकार एवं प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रायः बहस का विषय बनते हैं जब धार्मिक कानून और सिविल कानून का टकराव होता है।
यदि देश में एक समान सिविल संहिता लागू होती तो ऐसे टकराव नहीं जन्म लेते।
समान सिविल संहिता के अंतर्गत तीन मुख्य तथ्य प्रकाश में आते हैं-
प्रथम- व्यक्तिगत विधि
(धार्मिक कानून)
द्वितीय- संपत्ति के अधिग्रहण तथा संचालन का अधिकार
तृतीय- विवाह, तलाक तथा गोद लेने की विधि।
धार्मिक आधार पर कानूनी विभेद इन्ही तीन आधारों पर होता है।
सामान्यतः भारत में हिन्दू, मुस्लिम, पारसी तथा इसाईयों के अपने-अपने व्यक्तिगत सिविल विधियां हैं जिनके आधार पर उनके पारिवारिक वाद निपटाए जाते हैं।
इस तरह कभी-कभी कानून तथा व्यक्तिगत विधियों का टकराव होता है जिससे समाज में तनाव जन्म लेता है।
एक ही देश के समान नागरिकों के लिए कानून अलग-अलग क्यों है?
उदाहरण के लिए विवाह व्यवस्था चुनते हैं।
एक मुस्लिम पुरुष चार विवाह एक समय में कर सकता है। चार विवाह करने के बाद भी उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 जिसमे 'पति या पत्नी के जीवन काल में पुनः विवाह करना' जो कि किसी अन्य धर्मावलम्बी के लिए अपराध है तथा जिसकी सजा सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा किन्तु एक मुस्लिम पर यही धारा चार विवाह तक अमान्य होगी क्योंकि ऐसा उनका धार्मिक कानून कहता है।
क्या किसी महिला के लिए यह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम है? क्या यह उस विवाहता के प्रेम के साथ छल नहीं है? क्या धर्म के नाम पर ऐसी कुप्रथा एक गणतांत्रिक राष्ट्र में उचित है जिसे कानून की मान्यता प्राप्त हो।
एक व्यक्ति के लिए एक कृत्य अपराध की श्रेणी में है और दूसरे व्यक्ति के लिए वही कृत्य अपराध नहीं है, यह कैसी विधि के समक्ष समता है?
हिन्दू विधि तथा सामान नागरिक संहिता-
एक दौर ऐसा चला था जब बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म ग्रहण कर रहे थे। वजह सिर्फ इतनी ही थी कि बहु विवाह करने पर भी न्यायिक प्रक्रिया से मुक्त रहें।
सरला मुद्गल बनाम भारत संघ(ए.आई.आर 1995) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को देश की एकता और धार्मिक सहिष्णुता के लिए सामान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय करने का निर्देश दिया तथा अगस्त 1995 में विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को सरकार के रुख को लेकर रिपोर्ट मांगी किन्तु परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात।
किसी फैसले के पूर्व ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक मुस्लिम उलेमा से कहा कि- आप चिंता न करें। समान सिविल संहिता कभी लागू नहीं होगी।
इस वाद के बाद एक के बाद एक अनुच्छेद 32 के अंतर्गत चार याचिकाएं दर्ज की गईं। पहली याचिका महिलाओं के सामाजिक कल्याण के लिए काम करने वाली एक रजिस्टर्ड सोसाइटी द्वारा लोकहित वाद के रूप में दायर की गयी। दूसरी,तीसरी और चौथी क्रमशः मीना माथुर, गीत रानी तथा सुष्मिता घोष ने दायर किया। उक्त वादों में एक बात आम थी।एक सवाल था  कि पति द्वारा धर्मपरिवर्तन कर लेने मात्र से विवाह विच्छेद पूर्ण हो जाता है?
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि- केवल धर्म परिवर्तन कर लेने मात्र से विवाह विच्छेद पूर्ण नहीं होता,  जब तक की विवाह विच्छेद की डिक्री उपयुक्त न्यायलय द्वारा घोषित न कर दिया जाए।
अर्थात हिन्दू धर्म में विवाह विच्छेद केवल धर्मपरिवर्तन कर लेने से नहीं होता, ऐसा तब हो सकता है जब न्यायलय ने विवाह विच्छेद डिक्री पारित की हो।
 एक समान नागरिक संहिता ऐसे कृत्यों को समाज में पनपने से रोकने में सहायक होगी। हिन्दू विधि का संहिताकरण हो चुका है तथा हिंदुओं को सामान नागरिक संहिता से आपत्ति नहीं है।
ईसाई धार्मिक विधि तथा समान नागरिक संहिता-
जॉन वल्लमत्तोम बनाम भारत संघ(ए.आई.आर 2003) वाद में एक इसाई धर्मगुरु ने उत्तराधिकार अधिनियम,1925 की धारा 118 के क़ानूनी मान्यता को इस आधार पर चुनौती दी कि यह विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद-14) का उल्लंघन करता है तथा यह धारा  विधि के विरुद्ध एवं असंवैधानिक है।
धारा 118, एक व्यक्ति जिसका कोई भतीजा या भतीजी या रक्त संबंधी हो, उसे अपनी संपत्ति को धार्मिक उद्देश्य के लिए वसीयत द्वारा दान देने से रोकता था।
कोर्ट ने धरा 118 को असंवैधानिक घोषित किया।
समान नागरिक संहिता जनता के हित की बात करती है न की धार्मिक अधिकार छीनने की।
मुस्लिम विधि तथा समान नागरिक संहिता-
मुस्लिम विधि में आज भी महिलाओं के कल्याण के लिए संकीर्ण प्रावधान प्रचलन में हैं।
शरियत कानून के अनुसार एक तलाकशुदा महिला को पति से केवल इद्दत काल तक (जो कि नब्बे दिनों का होता है ) ही भरण-पोषण पाने का अधिकार है। इद्दत काल बीत जाने पर पत्नी, पति से भरण-पोषण के लिए मांग नहीं कर सकती।
इस नियम को लेकर तथा सिविल प्रकिया संहिता में प्रायः टकराव होता रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने
नूर सबा खातून बनाम मो. कासिम (ए.आई.आर1997)
में निर्णय दिया कि- एक मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से तब तक भरण-पोषण ले सकती है जब तक कि बच्चे वयस्क न हो जाएं।
इस फैसले के विरोध में पूरा मुस्लिम समुदाय उतर आया और बड़ी बहस हुई।
दंड प्रक्रिया संहिता की धरा 125 में पत्नी के भरण-पोषण का प्रावधान है किन्तु यही धारा कई बार बहस का विषय बनती है। मुस्लिम अपने धार्मिक कानून और व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर छूट जाते हैं। यदि देश में एक समान नागरिक संहिता लागू होती तो मुस्लिम महिला इतनी असुरक्षित नहीं होती।
विवाह पंजीकरण सभी के लिए अनिवार्य हो- समान सिविल संहिता की दिशा में एक सशक्त कदम-
सुप्रीम कोर्ट ने सीमा बनाम अश्वनी कुमार(ए.आई.आर2006) के
ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित किया कि विवाह का पंजीयन अनिवार्य हो तथा यह नियम सभी पर सामान रूप से लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नितांत अनिवार्य था।
एक समान नागरिक संहिता यदि लागू  होती है तो न केवल सभी धर्म के लोगों को लाभ मिलेगा बल्कि सदियों से सीमित अधिकारों में कैद मुस्लिम महिलाओं को जो चाह कर भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध नहीं कर पाती थीं, इस दशा से मुक्त हो सकेंगी तथा आधुनिक युग में समाज के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल सकेंगी।
इस्लाम में महिलाओं को तलाक सम्बन्धी अधिकार बहुत सीमित मिले हुए हैं, वहीं मुस्लिम पति के अधिकार असीमित हैं। समान नागरिक संहिता के प्रवर्तनीय होने से नारी सशक्तिकरण होगा तथा आधुनिक युग में उत्तपीड़ित महिलाएं भी आजादी की साँस ले सकेंगी।
केंद्र सरकार को मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से परे हटकर एक समान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय करना चाहिए तथा सबके लिए एक समान सिविल कानून होना चाहिए।
शुरुआत में हर सार्थक परिवर्तन का विरोध होता है। एक समय के बाद जब लोग इस परिवर्तन से लाभान्वित होंगे तो स्वतः ही विरोध करना छोड़ देंगे।
कोई भी आचरण जो लोक आचरण के विरूद्ध हो तथा कुछ इस तरह से विनियमित होता हो जिससे एक वर्ग विशेष, लिंग विशेष के लिए वह आचरण अभिशाप हो तो ऐसी विधि को प्रतिबंधित करना ही श्रेयष्कर है।
नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों में एक अनिवार्य तत्त्व है किन्तु ऐसा धार्मिक आचरण जो वर्तमान समय में अनुपयुक्त हो उसे त्यागना ही उचित है।
इस युग में भी बहु-विवाह जैसी कुप्रथाओं का होना आधुनिकता के नाम पर तमाचा है, ऐसी परम्पराएँ कहीं से भी प्रसंगिक नहीं लगतीं।
केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय कर राष्ट्र में एक सामान सिविल संहिता लागू करना चाहिए जिससे देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित हो, तथा संविधान उस उद्देश्य की ओर उन्मुख हो जिस हेतु हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बलिदान दिया।
यही भारतियों की उन महान आत्माओं के प्रति सच्ची कृतज्ञता
 होगी।
जय हिन्द! वंदे मातरम्।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

आलोचना और रिश्ते (भइया की कलम से)


******आलोचना और रिश्ते************;
ऑस्कर वाईल्ड का कहना है कि " आलोचना
आत्म-कथा का एकमात्र विश्वसनीय रूप है|"
ऑस्कर का यह कथन सटीक है क्योंकि;
आलोचना; आलोचना के विषय-वस्तु से ज्यादा
आलोचक के बारे में व्याख्या करती है| यहॉ तक
कि मनोवैज्ञानिक किसी की आलोचना
सुनकर ही आलोचक का एक visual diagnostic
hypothesis तैयार कर सकते हैं|
आलोचना John gottman के उन चार प्रसिद्ध
apocalypse घुड़सवारों में से एक है;जो ९०% से
भी अधिक सटीक बैठती है| बाकी तीन अन्य
stonewalling, defensive, and contemptuous
प्रकृति से भी अधिक घातक है!
आलोचना रिश्तों के लिये घातक हो जाती
है जब यह-
*व्यक्ति के चरित्र अथवा व्यक्तित्व पर आक्षेप
करता हो; अथवा;
*किसी प्रकार का आरोप लगाती हो|
*आलोचना सुधारों पर आधारित न हों|
*"एकमात्र right way" पर आधारित आलोचना|
*अनादर या अवमूल्यन(Belittling.)|
घनिष्ठ रिश्तों में ;अधिकॉश मामलों में बहुत
नगण्य विषय से प्रारम्भ होकर;समय के साथ-२
आत्म-अवनति के साथ-२ increasing resentment
तक पहुंच जाता है|
ऐसा देखा गया है कि,जिसकी आलोचना की
जाती है वह व्यक्ति नियन्त्रित महसूस करने
लगता है; यह नियन्त्रण आलोचक को अधिक
frustrated करता है; जिसके परिणाम -स्वरूप,
आलोचक और अधिक अनियन्त्रित होकर
आलोचना करने लगता है; और इसी प्रकार
आलोचना का शिकार व्यक्ति अधिकाधिक
नियन्त्रित होता चला जाता है|
आलोचकों की यह आत्म-अवनति एक आवश्यक
तथ्य का निष्पादन करती है;आलोचना के
द्वारा किसी भी प्रकार का स्वीकार्य
व्यावहारिक परिवर्तन लाने में; आलोचक
पूर्णतया असफल रहता है| कोईअल्पकालिक
लाभ आलोचक को मिल भी जाये तो इस
लाभ को resentment में तब्दील होने से कोई
रोक नहीं सकता|
आलोचना सदैव निष्फल हो जाती है;
क्योंकि यह ऐसी दो चीजें आरोपित करती है
जिसे मानव-मात्र घृणा करता है:-
**आलोचना गलती का स्वीकरण चाहती
है;और हम स्वीकरण से परहेज करते हैं|
**आलोचना अवमानना (devalued)करती है;और
हम अवमानित महसूस करने से नफरत करते हैं|
.
जबकि लोग गलतियों के स्वीकरण से परहेज
करते हैं;तो हमें उनको गलती स्वीकार करवाने
से बेहतर है कि हम आलोचना के स्थान पर
सहयोग करें | ऐसा लगता है कि आलोचक
मानव-स्वभाव के एक अति-आवश्यक अवयव से
गाफिल होते हैं| यह मानव स्वभाव है कि आप
मान दीजिये ; सहकारिता स्वत: आ
जायेगी;जबकि अवमानना स्वत: एक बाध
(resistant) है|
यदि आप व्यवहार में परिवर्तन चाहते हैं; तो
अपेक्षित व्यक्ति के प्रति मान व्यक्त
कीजिये;और यदि आपको उस व्यक्ति से बाध
(resistance) अपेक्षित है तो आलोचना
कीजिये|
***************************
आलोचक व्यक्ति निश्चित तौर पर इतने
चालाक होते हैं कि वह ये भांप लेते हैं कि
उनकी आलोचना प्रभावी सिद्ध नहीं हो
रही है; फिर आखिर वो यह करते क्यों हैं?
वह ऐसा करते हैं क्योंकि आलोचना "अहं" के
defence का सबसे सरलतम रूप है;हम किसी की
आलोचना इस लिये नहीं करते कि हम किसी
व्यवहार अथवा संव्यवहार(behavior or attitude)
से असंतुष्ट होते हैं| हम किसी की आलोचना
इसलिये करते हैं कि हम उस व्यवहार या attitude
से किसी प्रकार से खुद को अवमानित महसूस
करने लगते हैं|आलोचक बहुत जल्दी अपमानित
महसूस करने लगता है;और ego-defence की जरूरत
भी आलोचक को ज्यादा ही होती है||
ऐसा पाया गया है कि वास्तव में आलोचक
अपने बचपन में ही अपने अभिभावकों;भाई-ब
हनों या दोस्तों के द्वारा आलोचित होते
रहते थे;आलोचना विशेषतया छोटे बालकों के
लिये अधिक कष्टदायक हो सकती है| बच्चे
आलोचना और अस्वीकरण(rejection) में फर्क
नहीं कर पाते; हम उनके सामने आलोचना तथा
अस्वीकरण को स्पष्ट करने का कितना भी
प्रयत्न क्यों न कर लें;बच्चों को इस अन्तर की
समझ ही नहीं होती||"आप अच्छे बच्चे हो परन्तु
आपका यह व्यवहार सही नहीं है" इस प्रकार
का स्पष्ट अन्तर ही उनके मनोभावों को
नियन्त्रित कर सकता है|
दस साल से कम उम्र के किसी बालक के लिये
किसी भी आलोचना का एक-मात्र अर्थ
होता है कि वह बुरा बच्चा है और अयोग्य है|
चाहे आलोचना कितनी भी soft paddled क्यों
न हो||
***जीवन व मृत्यु का प्रश्न***
.
बच्चा जिन्दा रहने( survival )रहने के लिये
सिर्फ यही कर सकता है कि वह अपने
अभिभावकों से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे|
आलोचना के प्रभाव स्वरूप बच्चा जब स्वत: को
उस भावनात्मक जुड़ाव के लिये अयोग्य पाने
लगता है और यह स्थिति काफी हद तक जीवन
और मृत्यु का प्रश्न खड़ा कर देती है|ऐसी
परिस्थिति में बालक आलोचना की असह्य
वेदना को कम करने के लिये, स्व-आलोचना के
पथ पर चल पड़ता है
क्योंकि खुद को दिया गया दर्द "अपनों" के
अवाञ्छनीय rejection से कहीं अच्छा होता है|
प्रारम्भिक किशोरावस्था में वही बालक
खुद को "आक्रमक"तौर पर प्रस्तुत करने लगता
है-जो अधिक शक्तिशाली आलोचक बना
देता है|किशोरावस्था के आखिरी चरण में
वही बालक स्वयं एक प्रखर आलोचक के तौर पर
उभरता है| प्रत्येक आलोचक प्रारम्भ में आत्म-
आलोचक होता ही है|आलोचक जितना कठोर
अन्य लोगों के प्रति होता है;निश्चित तौर
पर स्वयं के प्रति भी उतना ही कठोर होता
है|
आलोचना बनाम प्रोत्साहन
( Criticism vs. Feedback)
आलोचकों का यह भ्रम सदैव बना रहता है कि
वह आलोचना के जरिये लोगों को
प्रोत्साहित करते हैं;जबकि स्थिति भिन्न
होती है; वास्तव में आलोचना और प्रोत्साहन
के भेद को इस प्रकार समझा जा सकता है:-
*आलोचना केन्द्रित होती है कि "गलत क्या
है?" (उदा•तुम फीस जमा क्यों नहीं कराते?)
जबकि प्रोत्साहन केन्द्रित होता है कि "
सुधार कैसे किये जायें"(उदा• चलें फीस जमा
कर आयें)
*आलोचना की विषय वस्तु किसी के
व्यक्तित्व के बारें में कुछ "बुरी" बातें होती हैं
(उदा•तुम कुन्द-बुद्धि और आलसी हो|)
प्रोत्साहन व्यवहार पर केन्द्रित होता है न
कि व्यक्तित्व पर|(उदा•क्या हम फीस जो
बाकी रह गई हैं;उन्हें निपटाते चलें)
*आलोचना अवमानना करती है(e.g.यह तुमसे
नहीं होगा)
प्रोत्साहन हौसला बढ़ाती है(e.g.मुझे पता है
आप काबिल हैं ;परन्तु हमदोनों मिलकर इसे
आसानी से निपटा सकते हैं|)
*आलोचना में आरोप छुपा होता है(जैसे-ये
आर्थिक तंगी तुम्हारी वजह से आई है)
प्रोत्साहन भविष्य पर फोकस करता है(उदा•
हम इस तंगी से निकल सकते हैं यदि हम दोनों
यह चीजें छोड़ दें|)
* आलोचना नियन्त्रण करने की कोशिश है(मैं
जानता हूं कि सही क्या है? मैं तुमसे ज्यादा
पढ़ा हूं)
प्रोत्साहन दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान
करता है-(e.g.मैं आपके मार्ग-चयन के अधिकार
कद्र करता हूं;भले ही मैं इससे सहमत नहीं हूं|
*आलोचना अवपीड़क(coercive) होती है(तुम
वही करोगे जो मैं चाहता हूं नहीं तो
परिणाम भुगतना पड़ेगा)
प्रोत्साहन किसी भी कीमत पर coercive
नहीं हो सकती(उदाहरण-हमें पता है कि
मिलकर ऐसा रास्ता निकाल लेंगे;जो हम
दोनों के लिये अच्छा होगा)|
प्रोत्साहन के लिये सावधानियॉ
यदि आप गुस्से अथवा क्षोभ में हैं तो feedback
न दें| क्योंकि वह आलोचना के श्रेणी में आयेगी
क्योंकि लोग आपके "आशय" का नहीं आपके
emotional tone के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं|
*प्रोत्साहन सदैव दिल से दें;दिमाग से नहीं|
.
*हमेशा सुधारों पर केन्द्रित रहें|
*ऐसे व्यवहार पर ध्यान दें जो अपनों के लिये
उपयुक्त न हों|
*परिवर्तनों को बढ़ावा दें न कि
आत्मविश्वास गिरानें में विश्वास रखें|
*गम्भीरतापूर्वक मदद करनें की पेशकश करें|
*दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करें|
*हमेशा अपने माफिक कार्य न करने पर या
किसी भी गलती पर दण्ड अथवा प्यार न करने
की धमकी बच्चों को कभी भी न दें|
तो यदि आप आलोचक व्यक्ति हैं तो इससे पहले
कि यह वृत्ति आपके रिश्तों का नाश कर दे;
बदल लें खुद को......
||शुभमस्तु||
-अनुराग शुक्ल

( प्रस्तुत आलेख मेरे भइया ने लिखा है। भइया अधिवक्ता हैं और मेरे शिक्षक भी। मेरी लेखन शैली, थोडा बहुत दर्शन जो भैया से सीखा है और भी बहुत कुछ...मेरे पथ प्रदर्शक हैं भइया।
नहीं जनता कि मेरा भविष्य कैसा है पर मेरे भविष्य के नींव की ईंट भइया हैं...इमारतें तो मुझे गढ़नी है।उनके प्रति कृतज्ञता का यही एक मात्र साधन है। है न? )

रविवार, 15 मार्च 2015

एक पगली लड़की

एक लड़की मैंने देखी है
जो दुनिया से अनदेखी है
दुनिया उससे अनजानी है
मेरी जानी-पहचानी है।
रहती है एक स्टेशन पर
कुछ फटे-पुराने कपड़ों में
कहते हैं सब वो ज़िंदा है
बिखरे-बिखरे से टुकड़ों में।
प्लेटफॉर्म ही घर उसका
वो चार बजे जग जाती है
न कोई संगी-साथी है
जाने किससे बतियाती है।
वो बात हवा से करती है
न जाने क्या-क्या कहती है
हाँ! एक स्टेशन पर देखा
एक पगली लड़की रहती है।
मैंने जब उसको देखा
वो डरी-सहमी सी सोयी थी
आँखें  उसकी थीं बता रहीं
कई रातों से वो रोई थी।
बैडरूम नहीं है कहीं उसका
वो पुल के नीचे सोती है,
ठंढी, गर्मी या बारिश हो
वो इसी ठिकाने होती है।
वो हंसती है वो रोती है
न जाने क्या-क्या करती है
जाने किस पीड़ा में  खोकर
सारी रात सिसकियाँ भरती है।
जाने किस कान्हा की वंशी
उसके कानों में बजती है
जाने किस प्रियतम की झाँकी
उसके आँखों में सजती है।
जाने किस धुन में खोकर
वो नृत्य राधा सी करती है
वो नहीं जानती कृष्ण कौन
पर बनकर मीरा भटकती है।
उसके चेहरे पर भाव मिले
उत्कण्ठा के उत्पीड़न के,
आशा न रही कोई जीने की
मन ही रूठा हो जब मन से।
है नहीं कहानी कुछ उसकी
पुरुषों की सताई नारी है
अमानुषों से भरे विश्व की
लाचारी पर वारी है।
वो पगली शोषण क्या जाने
भला-बुरा किसको माने
व्यभिचार से उसका रिश्ता क्या
जो वो व्यभिचारी को जाने?
वो  मेरे देश की बेटी है
जो सहम-सहम के जीती है
हर दिन उसकी इज्जत लुटती
वो केवल पीड़ा पीती है।
हर गली में हर चौराहे पर
दामिनी दोहरायी जाती है,
बुजुर्ग बाप के कन्धों से
फिर चिता उठायी जाती है।
कुछ लोग सहानुभूति लिए
धरने पर धरना देते हैं,
गली-नुक्कड़-चौराहों पर
बैठ प्रार्थना करते हैं,
पर ये बरसाती मेंढक
कहाँ सोये से रहते हैं
जब कहीं दामिनी मरती है
ये कहाँ खोये से रहते हैं।
खुद के आँखों पर पट्टी है
कानून को अँधा कहते हैं
अपने घड़ियाली आंसू से
जज्बात का धंधा करते हैं।
जाने क्यों बार-बार मुझको
वो पगली याद आती है,
कुछ घूँट आँसुओं के पीकर
जब अपना दिल बहलाती है।
उसकी चीखों का मतलब क्या
ये दुनिया कब कुछ सुनती है
यहाँ कदम-कदम पर खतरा है
यहाँ आग सुलगती रहती है।
हर चीख़ यहाँ बेमतलब है
हर इंसान यहाँ पर पापी है,
हर लड़की पगली लड़की है
पीड़ा की आपाधापी है।

मंगलवार, 10 मार्च 2015

किस्मत की मार

कभी-कभी समाज कुछ ऐसी झलकियाँ दिखता है जो अकारण ही अवसाद का कारण बनती हैं।
आज सुबह-सुबह पापा से मिलने पुद्दन पहलवान आए, उनकी एक खास बात है ये है कि वो पापा से या तो अपने मुक़दमे की तारीख़ पूछने के लिए आते हैं या किसी को लेकर आते हैं जो कभी पुलिस वालों से तो कभी गावँ के दबंगों का सताया हुआ होता है। पापा दीन दुनिया के जितने लुटे हुए लोग होते हैं उन्ही का केस लड़ते हैं।कभी-कभी लगता है कि विधिक आचार के समस्त यम और नियम अकेले मेरे पापा ही अपनाते हैं। पीड़ित को न्याय मिले भले ही खर्चा अपने जेब से जाए, पर न्याय अवश्य मिले।
आज पुद्दन काका के साथ दो बिलकुल डरे हुए लोग आए। पूछने पर पता चला दोनों बाप-बेटे हैं। गरीबी चेहरे से ही झलक रही थी। बाप करीब अस्सी साल का रहा होगा और बेटा लगभग पचास साल का। शक्ल से दोनों बीमार लग रहे थे लगें भी क्यों न गरीबी अपने आप में एक बीमारी है जिसका इलाज़ बस रब के हाथ में है।
पापा खाना खाकर बहार निकले तो पता चला की झूठे दावे का केस है। पुलिस आई और बाप-बेटों को हड़का के चली गयी। पापा ने विस्तार से पूछा तो पता चला कि पुलिस ने पूरे घर का मुआयना किया और पीड़ितों पर लाठी बजा कर चली गई।
विरोधी दमदार रहे तो गरीब बेचारे की जान जाती ही है। वैसे भी हमारे देश में पुलिस वालों को हड्डी फेंक दी जाए तो काम पूरे मनोयोग से करते हैं।
पैसे में बड़ा दम है पुलिस वाले तो वैसे भी  डाकू होते हैं।
एक निवेदन अपने हमउम्र मित्रों से है आप सब भविष्य हो भारत के जिस दिन कोई उच्च संवैधानिक पद मिले जिससे पुलिस वालों को आप हड़का सकें, पुलिस वालों का इतना शोषण करना कि ये खून के आँसू रोएँ। इन्हें तिरस्कृत करना, अपमानित करना और कुत्ता बना के रखना क्योंकि भारतीय पुलिस इसी योग्य है। सबसे भ्रष्ट कौम पुलिस ही है। इतना उत्पीड़ित करना इन्हें कि आत्महत्या करने की नौबत आ जाए.....ख़ुदा बहुत नेक दिल है तुम पर रहम करेगा।
देखो विस्तार के चक्कर में तो असली बात ही भूल गया।
मेरे गावँ से थोड़ी ही दूर पर यादवों का एक गावँ है। अब हल्की बिरादरी तो है नहीं ये..लालू और मुलायम जैसे प्रतापी इस वंश में पैदा हुए हैं। जोखू और लौटन भी जाति से यादव हैं। बस जाति से यादव हैं पर यादवों जैसे गुण नहीं हैं। जोखू बाप हैं और लौटन बेटे। बेटा बाप से अधिक उत्साही लगता है किन्तु बेटा बहुत कमजोर दिखता है। कमजोर है भी तभी तो करीब अठ्ठाइस
बरस पहले पत्नी छोड़ कर चली गयी थी। लौटन की पत्नी ने दूसरी शादी कर ली बगल के ही गावँ में। एक पति के लिए सबसे बड़ा दर्द यही है कि पत्नी छोड़ के चली जाए।
गावँ में हरिजनों की संख्या भी कम नहीं है कभी दलित-शोषित थे पर आज बाहुबली हैं। धन किसी को भी दुराचारी बना सकता है। एक पीड़ा का दर्द बेचारा विगत दो दशक से झेल रहा था कि अचानक एक झूठे केस में फंस गया। केस बना हरिजन उत्पीड़न का।
एक व्यथित और शोषित व्यक्ति क्या उत्पीड़न करेगा पर कानून इसे कब मानता है? कानून भावनाओं से कब चलता है। भारत की भ्रष्ट शासन व्यवस्था से अनभिज्ञ कौन है। लौटन और जोखू झूठे केस में जेल काट के आये हैं। घर की जो जमा पूँजी थी वो जमानत में खर्च हो गई। बाहर आए तो मुकदमा चला, वकील से लेकर हाकिम तक सब पैसे चूसने वाले होते हैं। आमदनी का साधन खेती था। करीब पंद्रह बीघे जमीन थी जिसमे पाँच बीघा बेचना पड़ा। खरीदने वाला दबंग निकला कुछ हज़ार देकर लाखों का माल हड़प लिया। पैसा मांगने बाप-बेटे जाते हैं पर दुत्कार और धमकी के अलावा कुछ नहीं मिलता। सत्ता से सहयोग मिलने से रहा.. बड़ी मछली छोटी मछली वाली कहावत तो अपने सुनी ही होगी।
किसी-किसी पर समय का ऐसा प्रकोप चलता है कि विपत्ति पर विपत्ति आती रहती है। इतना कम न था कि एक मुकदमा और हो गया। इस बार पूर्व पत्नी ने दावा किया कि उसका बड़ा बेटा लौटन का है। महिला के बड़े बेटे की उम्र लगभग बीस वर्ष की है। बड़ा बेटा लौटन के एकाकीपन के लगभग आठ वर्षों बाद पैदा हुआ। भारतीय डाक भी शायद इतने सालों बाद डिलिवरी न करे जितने सालों के विलगन के फलस्वरूप पुत्र रत्न का जन्म हुआ। महामिलन का इतने वर्षों बाद परिणाम तो महाभारत काल में भी नहीं आता था पर कलियुग में तो कुछ भी हो सकता है।
जोखू ने पापा से कहा कि सरकार! हमार लरिकवा नामर्द है। एकरे कौने मेर लड़िका होइ जाई?
(मेरा लड़का नामर्द है, ये कैसे बाप बन सकता है।)
लौटन की पूर्व पत्नी ने थाने में पैसे देकर जोखू के घर की नपाई करा ली है। गावँ वाले चाहते हैं की बाप-बेटे घर से निकल जाएँ। बाप-बेटे दोनों घबराए हुए लग रहे हैं। जमीन छिनने का डर साफ़ तौर पर झलक रहा है। पहले से गरीबी का दंश, चौतरफा शोषण और अब ये नया ड्रामा। पहले से मुश्किलें कम न थीं जो एक और आ टपकी।
सच्चाई जो भी हो मुझे नहीं पता पर उन्हें देख कर मुझे रोना आ गया। एक बाप जो जीवन के अंतिम पड़ाव में है। उसकी कोशिश है कि जीवन के अंतिम पलों में राहत मिले पर राहत, चैन तो धनाढ्यों के लिए है। गरीब तो दुःख सहने के लिए ही पैदा होते हैं।
एक वक़ील के दिन की शुरुआत कुछ इसी तरह होती है। हर दिन एक नई कहानी..एक नया दुखड़ा।
पापा की अब आदत हो गई है ऐसे किस्सों से निपटने की। भइया के लिए अनुभव नया है पर धीरे-धीरे भावुकता कम हो रही है। मैं अधर में हूँ। इस कशमकश में हूँ कि इस भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बनूँ या भ्रष्टाचार के खिलाफ़ उतरूँ.....मन तो यही कह रहा है पर ख़ुद से किया वादा तोड़ना नहीं है.......पढ़ाई करूँ...उलझन तो वक्त खुद ही सुलझा देता है।
शायद जोखू और लौटन को न्याय मिल जाए.....पर उन अनगिनत असहायों का क्या जो ख़ुद के लिए वकील भी नहीं रख सकते..दो वक़्त की रोटी का ठिकाना नहीं कोर्ट में न्याय कैसे खरीदेंगे?
भारत सरकार को "सत्यमेव जयते" की जगह कोई और स्लोगन तलाशना चाहिए...वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह अप्रासंगिक प्रतीत हो रहा है.....

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

आओ रक्तदान करें।


यूँ तो बड़ा बहुत पहले हो गया था पर बड़ा होने का एहसास आज पहली बार हुआ। आज मैंने रक्तदान किया है पहली बार, बड़ी उत्सुकता थी की कैसा अनुभव होता है जब खून निकलता है, दर्द होता है या नहीं होता है? सच कहूँ तो पता ही नहीं चला। सूई चुभने जैसा  दर्द हुआ फिर सब सामान्य हो गया।
बहुत अच्छा लग रहा है, कभी इतनी ख़ुशी नहीं मिली जितनी आज मिली है..लगा है की पहली बार ज़िन्दगी में कुछ अच्छा किया है।
ये ख़ुशी बहुत प्यारी है, आप भी रक्तदान कीजिये....ख़ुशी मिलेगी।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

सिर्फ तुम्हारे लिए

कई चाहत दबी दिल में,
जो अक्सर टीस भरती हैं,
मेरे ख्यालों में आकर
मुझी को भीच लेती हैं ,
कई राहों से गुजरा हूँ
दिलों को तोड़कर अक्सर,
मगर कुछ ख़ास है तुझ में,
जो मुझको खींच लेती है.''


(कभी आपने मुझे मंच पर गीत गाते हुए नहीं देखा है न? ये रही मेरी तस्वीर सोचिये कि माइक मेरे हाथ में है और मैं गा रहा हूँ।)

तुम्हारी आँख लगती है
तो आँखे बंद होती है,
तुम्हारी नींद खुलती है
तो साँसे मंद होती है,
अजब है हाल -ए-दिल मेरा
जुड़ा हूँ जब से मैं तुमसे,
मेरे दिल के धड़कन से
मेरी ही जंग होती है.

मेरे ख्यालों से अब निकलो,
ये दुनिया भी तो खाली है,
है खुशियों का यहाँ मंज़र
समझ लो कि दिवाली है,
मेरी अँधेरी दुनिया को
मेरे ही पास रहने दो,
उम्मीदों कि ये जो लौ है
वो अब बुझने वाली है.

यहाँ जब भी हवा चलती
तो आँखे नम सी होती हैँ,
तुम्हे जब सोचता हूँ मैँ तो
रातेँ कम सी होती हैँ,
अजब है गम का भी आलम
न कुछ कह के कह पाऊँ,
तुम्हारे बिन मेरी दुनिया
बड़ी बेदम सी होती है.
(बिना प्यार किए प्यार लिखना मुश्किल होता है न?)

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

बाल श्रम और अभिजात वर्ग

बालश्रम; समाज का कोढ़ जिसे मिटाने की जगह अभिजात वर्ग खाद-पानी डालने का काम करता है।बच्चे हमेशा सस्ते होते हैं बशर्ते अपने न हों। वैसा भी सुना है बड़े लोग अपने बच्चों से कोई काम नहीं कराते क्योंकि उनके बच्चे फूल से नाजुक होते हैं और गरीबों के बच्चे पैदायशी चट्टान जिनका काम ही पहाड़ तोडना होता है। हाँ बच्चे चट्टान नहीं होते हैं पर गरीबी बना देती है।
बड़े लोग अपने बच्चों को धूल-मिटटी से बचाते हैं जिससे इन्हें इन्फेक्शन न हो, धुप से बचाते हैं कहीं रंग न काला हो जाए। हाँ भाई रंग का भी बड़ा खेल है ज़माने में, बच्चा तो गरीब का भी गोरा होता है पर कब अपने नसीब की तरह काला हो जाता है पता ही नहीं लगता।
अमीर माँ-बाप का बच्चा कोई काम नहीं करता है क्योंकि अगर वो काम करेगा तो लाड-प्यार में कमी रह जायेगी। ये सारे ढोंग और तमाशे उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों के हैं या अभिजात वर्ग के जिनके घरों को अक्सर "बड़ा घर" कहा जाता है।
यूँ तो यही लोग ढोंग पीट-पीट कर कहते हैं कि बालश्रम अपराध है इसे रोकें पर खुद इनके घरों में काम करने वाले बच्चों की उम्र सात से चौदह वर्ष तक से कम  की होती है। शहरों में मज़दूरी भले ही मंहगी हो पर बचपन तो सस्ता है। काम बड़ों से ज्यादा लिया जाता है लेकिन मज़दूरी मिलती है कौड़ी भर।
बच्चों को child labour (protection and regulation) act 1986 ने जो राहत दी है, जो बालश्रम को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बना है उसे देखकर तो गश आता है। परस्पर विरोधाभास है क्या कहा जाए?
एक तरफ कहा कहा गया है कि बालश्रम अपराध है दूसरी तरफ उनके काम करने का समय और छुट्टियों का प्रावधान नियत किया गया है। यह कैसा गड़बड़-झाला है जो समझ में नहीं आता।
कुछ परिस्थियों को आधार ठहरा कर बालश्रम को वैध किया गया है।
बच्चे घरेलू काम कर सकते हैं, सच तो ये है कि अमीरों के घरों में गरीब बाल मज़दूरों का सबसे ज्यादा शोषण होता है। शोषण का कोई दायरा तय नहीं है यह किसी भी प्रकार का हो सकता है। आर्थिक,शारीरिक या यौन शोषण..बच्चे हैं किसी से कहेंगे थोड़े ही। कुछ चॉकलेट, टॉफी और कपडे काफी हैं उन्हें मानाने के लिए। किसी से कहें भी तो कौन सुनेगा इनकी? बच्चों की अवाज़ बड़ों तक पहुँचती कब है?