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मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

इंतज़ार!(लौट आओ न!)

उन अधूरी बातों का क्या
जो निकलते ही नहीं
हलक से,
कहीं तो-कभी तो
पूरी हों
ये हसरतें
न जाने क्यों
उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं;
तुम थे
वक्त ठहरा था
हवा, फ़िज़ा, बादल
सब साथ थे
तुम गए तो कुछ न रहा
साँस चलती है
किसी तरह
तुम्हारे बिन,
अगर ये ज़िन्दगी है
तो
समझ लो ज़िंदा हूँ;
इन अधूरी धड़कनों का क्या
जिस दिन भी
धड़कना बंद कर दें
फिर कौन तुम
 कौन हम?
सब कुछ स्थिर
शून्य
अड़िग,
न धड़कने रूकती है
न साँस
शायद इन्हें भी
इंतज़ार है
तुम्हारे आने का
कितने पागल हैं न हम
जो
इंतज़ार करते हैं।

8 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम में इंतज़ार के अलावा कुछ है भी कहाँ ... चाहे अंतिम सांस तक ... अच्छी रचना ...

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  2. शायद इन्हें भी
    इंतज़ार है
    तुम्हारे आने का
    कितने पागल हैं न हम
    जो
    इंतज़ार करते हैं।
    इस इंतज़ार में भी अपना एक अलग ही आनंद है मित्रवर अभिषेक जी !!

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  3. बहुत बढ़िया दिल से निकला हुआ हर शब्द

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  4. प्रेम का दूसरा नाम शायद इंतजार ही है...बहुत भावपूर्ण रचना...

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  5. बहुत भावपूर्ण रचना अभिषेक जी।

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  6. हम इंतज़ार करेंगे कयामत तक........

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